Wednesday, June 9, 2010

दर्द की इक दुकाँ खोल ली मैंने !

झंझटों की पोटली मोल ली मैंने,
ब्लोगिंग जीवन में घोल ली मैंने,
गम खरीदता हूँ, खुशियाँ बेचता हूँ,
दर्द की इक दुकाँ खोल ली मैंने !

सुबह-शाम कंप्यूटर पर जमे रहकर,
वक्त कट जाता है,खुद में रमे रहकर,
फुर्सत के हिस्से का परिश्रम बेचकर,
यह चीज बड़ी ही अनमोल ली मैंने!

दिल की बात आती है जब जुबाँ पे,
सजा लेता हूँ उसे तुरंत ही दुकाँ पे,
ग्राहक को उससे कभी ठेस ना लगे,
जभी हरबात अच्छे से तोल ली मैंने!

लोग तो कहते है मुनाफे का सौदा है,
कम हानि,ज्यादा लाभ का मसौदा है,
मगर मुझे तो बात जो कहनी थी,
दुकान से ही बेधड़क बोल ली मैंने!
गम खरीदता हूँ, खुशियाँ बेचता हूँ,
दर्द की इक दुकाँ खोल ली मैंने !

No comments: