Thursday, December 31, 2009

तू ब्लॉगर क्यों हुआ !

एक बार पुन: सभी को नववर्ष की मंगलमय कामनाये ! चलो नए साल की शुरुआत की जाये इस भोंडी सी गजल के साथ;


ठण्ड पूछती है कुर्ते से, तू पुलओवर क्यों हुआ,
अरुणोदय को निहारना इतना, सोबर क्यों हुआ !

इस शरद-ऋतु में नव-वर्ष की प्रथम बेला पर,
दिल्ली का जर्रा-जर्रा,फौगी से फौगर क्यों हुआ !

जश्न-ए-शाम पी तो हमने भी सलीके से ही थी,
नहीं मालूम यह कमबख्त, हैंग ओवर क्यों हुआ !

झेल पाने को देह इसकदर भी, बूढ़ी न थी अभी,
फिर ये भरोसे का स्तर इतना, लोअर क्यों हुआ !

'लिंग-भेद'की नोकझोक देख,यहाँ साहित्य पूछता है
'गोदियाल',तू साहित्यकार ही ठीक था,ब्लॉगर क्यों हुआ !

Thursday, December 24, 2009

आ जाओ क्रिस, अब आ भी जाओ !


यार "क्रिस" यूं कब तलक तुम,
ज़रा भी टस से "मस" नहीं होगे !
गिरजे की वीरान दीवारों पर,
इसी तरह 'जस के तस' रहोगे !!

ज़माना गया,जब परोपकार की खातिर,
महापुरुष खुद लटक जाया करते थे !
अमृत लोगो में बाँट कर ,
जहर खुद घटक जाया करते थे !!

युगों से चुपचाप लटके खड़े हो,
खामोशी की भी हद होती है भई !
एक बार सूली से उतर कर तो देखो,
दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई !!

दौलत और सोहरत की चकाचौंध में,
सभ्यता निःवस्त्र घूम रही है !
संस्कृति बचाती लाज फिर रही,
बेशर्मी शिखर को चूम रही है !!

भाई-भाई का दुश्मन बन बैठा,
बेटा, बाप को लूटने की फिराक में है!
माँ कलयुग को कोसे जा रही,
बेटी घर से भागने की ताक में है !!

नैतिकता ने दम तोड़ दिया कबके,
मानवीय मूल्य सबका ह्रास हो गया !
झूट की देहरी जगमग-जगमग,
दबा सच का आँगन कहीं घास हो गया !!

लोर्ड क्रिस अब उतर भी आओ,
चहुँ ओर पाप का अन्धेरा घनघोर छा गया है !
यह आपके लटकने का वक्त नहीं,
अपितु पापियों को लटकाने का वक्त आ गया है !!

सर्वत्र तुम्ही विद्यमान हो, वो चाहे
मंदिर हो,मस्जिद, चर्च अथवा गुरुद्वारे हो !
आ जाओ क्रिस, अब आ भी जाओ,
तुम इस जग के रखवारे हो ! !

Merry Christmas to all Blogger friends !

Wednesday, December 23, 2009

२००९ में रचित कुछ बिखरे मोतियों के विशष्ट अंश !

यूँ तो बेवजह सुर्ख़ियों में आने का कभी शौक नहीं रहा, मगर जैसे कि शायद आप लोग भी जानते होंगे कि मेरे एक लेख की वजह से ब्लॉगजगत पर आजकल मेरी टी.आर.पी काफी ऊपर जाकर बैठी हुई है, इसलिए मैं फिलहाल कोई टुच्चा-मुच्चा लेख अथवा कविता लिखकर उसको नीचे नहीं लाना चाहता :) सन २००९ में मैं इस ब्लॉगजगत पर लगभग हर दिन उपस्थिति दर्ज करवाई , इसलिए सोचा कि चलो, जो साल जाने वाला है उसकी कुछ जो कविताये अथवा गजल मैं पढ़ पाया और मुझे अच्छी लगी, मैं यहाँ प्रस्तुत करू, ताकि अन्य ब्लॉगर मित्र जोकि उन्हें पढने से किसी वजह से वाचित रह गए हो, वे भी एक बार फिर से उन्हें पढ़ सके ! तो लीजिये प्रस्तुत है सब २००९ का काव्य लेखा-जोखा : यहाँ सिर्फ भिन्न-भिन्न रचनाकारों की मैं कविता या गजल के कुछ चुनिन्दा अंश ही प्रस्तुत कर रहा हूँ,साथ ही उस कविता या गजल का लिंक भी मैंने यहाँ पर दिया है, विस्तृत तौर पर आप उसे उस ब्लॉग पर जाकर पढ़ सकते है, और मुझे उम्मीद है कि इसपर किसी ब्लॉगरमित्र / रचनाकार को कोई आपति नहीं होगी !

शुरुआत करता हूँ आदरणीय डा० रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी की इस प्यारी से गजल से, उनकी गजल फ्रेम समेत पोस्ट कर रहा हूँ ;





निर्मला कपिला जी ने गुजर रहे साल की शुरुआत में (जनवरी २००९) एक गजल लिखी थी
http://veerbahuti.blogspot.com/search/label/%E0%A4%97%E0%A4%BC%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A4%B2?updated-max=2009-05-20T20%3A16%3A00-07%3A00&max-results=20

आज महफिल में सुनने सुनाने आयेंगे लोग
समाज के चेहरे से नकाब उठाने आयेंगे लोग

किसी की मौत पर रोना गुजरे दिनों की बात है
अब दिखावे को मातम मनाने आएंगे लोग

दोस्ती के नकाब में छुपे है आज दुश्मन
पहले जख्म देंगे, फिर सहलाने आएंगे लोग



श्री समीर लाल ’समीर’ जी को सुनिए ;
http://udantashtari.blogspot.com/2009_03_01_archive.html
झूट की बैसाखियों पे, जिन्दगी कट जायेगी
मूँग दलते छातियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

सज गया संपर्क से तू, कितने ही सम्मान से
कागजी इन हाथियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

है अगर बीबी खफा तो फिक्र की क्या बात है
कर भरोसा सालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

गाड़ देना मुझको ताकि अबके मैं हीरा बनूँ,
सज के उनकी बालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी




श्याम सखा ‘श्याम’ जी की गजल
http://gazalkbahane.blogspot.com/2009/10/blog-post_27.html

नम तो होंगी आँखें मेरे दुश्मनों की भी जरूर
जग-दिखावे को ही मातम करने जब आएँगे लोग

फेंकते हैं आज पत्थर जिस पे इक दिन देखना
उसका बुत चौराहे पर खुद ही लगा जाएँगे लोग

है बड़ी बेढब रिवायत इस नगर की ‘श्याम’ जी
पहले देंगे जख्म और फिर इनको सहलाएँगे लोग




ओम आर्य जी की गजल
http://ombawra.blogspot.com/2009/06/blog-post_19.html
वहीं पे है पडा अभी तक वो जाम साकी
निकल आया तेरे मयखाने से ये बदनाम साकी

हो न जाए ये परिंदा कोई गुलाम
कहते है शहर में बिछे है पिंजड़े तमाम साकी

खुदा हाफिज करने में है न अब कोई गिला
उसकी तरफ से आ गया है मुझको पैगाम साकी




डा.चन्द्रकुमार जैन जी ने श्री ज्ञानप्रकाश विवेक की ग़ज़ल प्रस्तुत की
http://chandrakumarjain.blogspot.com/2009/09/blog-post_02

मैं पूछता रहा हर एक बंद खिड़की से
खड़ा हुआ है ये खाली मकान किसके लिए

गरीब लोग इसे ओढ़ते-बिछाते हैं
तू ये न पूछ कि है आसमान किसके लिए

ऐ चश्मदीद गवाह बस यही बता मुझको
बदल रहा है तू अपना बयान किसके लिए



एम् वर्मा जी की कविता देखिये
http://ghazal-geet.blogspot.com/2009/06/blog-post_09.html

हर सुंदर फूल के नीचे कांटा क्यों है भाई?
भीड़ बहुत है पर इतना सन्नाटा क्यों है भाई?

मशक्कत की रोटी पर गिद्ध निगाहें क्यों है?
हर गरीब का ही गीला आटा क्यों है भाई?

चीज़ों की कीमत आसमान चढ़ घूर रही है
मंदी-मंदी चिल्लाते हो, घाटा क्यों है भाई?

सीधी राह पकड़कर जाते मंजिल मिल जाती
इतना मुश्किल राह मगर छांटा क्यों है भाई?



वन्दना गुप्ता जी की नज्म देखिये ;
http://vandana-zindagi.blogspot.com/2009/04/blog-post_11.html

तू कृष्ण बनकर जो आया होता
तो मुझमे ही राधा को पाया होता
कभी कृष्ण सी बंशी बजाई होती
तो मैं भी राधा सी दौड़ आई होती
फिर वहाँ न मैं होती न तू होता
कृष्ण राधा सा स्वरुप पा लिया होता



संदीप भारद्वाज जी की गजल
http://gazals4you.blogspot.com/2009/10/blog-post_8856.html
खता मेरी ही थी जो दुनिया से दिल लगा बैठा
ये कमबख्त जिन्दगी कब किसी से वफ़ा करती थी,

मैं काश ये कह सकता "मुझे याद कीजिये"
कभी मेरी याद जिनकी धड़कन हुआ करती थी,

देखो आज हम उनकी दुनिया में शामिल हे नहीं,
जिनकी दुनिया की रौनक हम से हुआ करते थी,




दिगंबर नासवा जी की ब्लॉग पर फोटो उपलब्ध नहीं
http://swapnmere.blogspot.com/2009/11/blog-post_24.html

छू लिया क्यों आसमान सड़क पर रहते हुवे
उठ रही हैं उंगलियाँ उस शख्स के उत्कर्ष पर

मर गया बेनाम ही जो उम्र भर जीता रहा
सत्य निष्ठां न्याय नियम आस्था आदर्श पर

गावं क्या खाली हुवे, ग्रहण सा लगने लगा
बाजरा, मक्की, गेहूं की बालियों के हर्ष पर



नीरज गोस्वामी जी के बेहतरीन अल्फाजो में से चंद अल्फाज
href="http://ngoswami.blogspot.com/2008/10/blog-post_14.html">

उठे सैलाब यादों का, अगर मन में कभी तेरे
दबाना मत कि उसका, आंख से झरना ज़रुरी है

तमन्ना थी गुज़र जाता,गली में यार की जीवन
हमें मालूम ही कब था यहां मरना ज़रूरी है

किसी का खौफ़ दिल पर,आजतक तारी न हो पाया
किया यूं प्यार अपनों ने, लगा डरना ज़रूरी है



सुलभ जायसवाल 'सतरंगी' जी href="http://sulabhpatra.blogspot.com/">http://sulabhpatra.blogspot.com/

लिख सजा बेगुनाह को कलम है शर्मशार
फैसले हुए हैं कागज़ कानूनी देखकर

ख्वाहिशों कि उड़ान अभी बाकी है बहुत
मियाँ घबरा गए ढलती जवानी देखकर

वहां न कोई भेड़िया था न कोई दरिंदा
गुड़िया रोई थी चेहरा इंसानी देखकर


अदा जी
की गजल
http://swapnamanjusha.blogspot.com/2009/09/blog-post_09.html
क्यूँ अश्क बहते-बहते यूँ आज थम गए हैं
इतने ग़म मिले कि, हम ग़म में रम गए हैं

तुम बोल दो हमें वो जो बोलना तुम्हें है
फूलों से मार डालो हम पत्थर से जम गए हैं

जीने का हौसला तो पहले भी 'अदा' नहीं था
मरने के हौसले भी मेरे यार कम गए हैं


पारुल जी
की कविता
http://rhythmofwords.blogspot.com/2009/07/blog-post_30.html

कुरेदती जा रही थी मिटटी
ख़ुद को पाने की भूल में ॥
कुछ भी तो हाथ न आया
जिंदगी की धूल में ॥

कुछ एहसास लपककर
गोद में सो गए थककर
और मैं जागती रही
आख़िर यूं ही फिजूल में॥


Bold


मासूम सायर जी की शायरी blogspot.com/2009/08/blog-post_19.html">http://masoomshayari।blogspot.com/2009/08/blog-post_19.html
ली थी चार दिन हँसी मैने जो क़र्ज़ में
चुका नही सका कभी अब तक उधार मैं

तन्हा गुज़ारनी ना पड़े उस को ज़िंदगी
रहने लगा हूं आजकल अक्सर बीमार मैं

'मासूम' देखनी थीं मुझे ऐसे भी शादियाँ
डोली में है वो और उस का कहार मैं



रविकांत पाण्डेय जी
(फोटो उपलब्ध नहीं)
http://jivanamrit.blogspot.com/2009/11/blog-post_09.html

कुछ बिक गये, कुछ एक जमाने से डर गये
जितने भी थे गवाह वो सारे मुकर गये

हमने तमाम उम्र फ़रिश्ता कहा जिन्हे
ख्वाबों के पंछियों की वो पांखें कुतर गये

दुनिया की हर बुराई थी जिनमें भरी हुई
सत्ता के शुद्ध-जल से वो पापी भी तर गये




रजिया मिर्जा जी
http://raziamirza.blogspot.com/2009/09/blog-post_2889.html

क्यों देर हुई साजन तेरे यहाँ आने में?
क्या क्या न सहा हमने अपने को मनाने में।

बाज़ारों में बिकते है, हर मोल नये रिश्ते।
कुछ वक्त लगा हमको, ये दिल को बताने में।

अय ‘राज़’ उसे छोडो क्यों उसकी फ़िकर इतनी।
अब खैर यहीं करलो, तुम उसको भुलाने में।




सदा जी की कविता
http://sadalikhna.blogspot.com/2009/09/blog-post_23.html

माँ की आँखों ने फिर एक सपना बुना
अब यह कमाने लगे तो मैं
एक चाँद सी दुल्हन ले आऊ इसके लिए
मैं डरने लगा था सपनो से
कहीं मैं एक दिन अलग न हो जाऊ माँ से
माँ की दुल्हन भी तो सपने लेकर आयेगी
अपने साजन के,
मैं किसकी आँख में बसूँगा ?



अंत में श्री योगेन्द्र मौदगिल जी की सच्ची बात सुनिए ;
http://yogindermoudgil.blogspot.com/2009/08/blog-post_09.html
खुद को सबका बाप बताया, कुछ उल्लू के पट्ठों ने.
अपना परचम आप उठाया, कुछ उल्लू के पट्ठों ने।

जीते जी तो बाथरूम में रखा बंद पिताजी को,
अर्थी पर बाजा बजवाया, कुछ उल्लू के पट्ठों ने .
लंगडो को मैराथन भेजा, गूंगे भेजे युएनओ,
सूरदास को तीर थमाया कुछ उल्लू के पठ्ठो ने .
सड़के, चारा, जंगल, पार्क, आवास योजना पुल नहरे ,
खुल्लमखुल्ला देश चबाया कुछ उल्लू के पठ्ठो ने.



कोशिश बहुत की थी कि लिंक यही से काम करे परन्तु पता नहीं क्यों ACTIVE लिंक नहीं लगा ! आप लोगो से विनम्र निवेदन है कि आप यह कतई न समझे कि मैं यह कह रहा हूँ कि मैंने इस साल की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं को चुना, मैंने यहाँ पर सिर्फ उन रचनाओं के अंश प्रस्तुत किये है, जिन्हें मैं पढ़ पाया, जहां तक मैं पहुँच सका ! इसलिए बस इतना ही कहूंगा कि E&O.E.



चलते-चलते एक अपनी भी फेंकता चलूँ :

संग अपने हर वक्त अपनी बेगुनाही की ख़ाक रखते है !
ये सच है कि हम आपकी हर बात से इत्तेफाक रखते है !!

यूँ मुश्किल न था कुछ भी हमें, बेशर्मी की हद को लांघना !
ख्याल आपका आता है कि हम भी इक नाक रखते है !!

तरह आपकी हमने दर्द को पलकों में नहीं छुपाये रखा !
और न नजरो में अपनी हम कोई बला–ए–ताक रखते है !!

फ़ेंक दो निकाल गर दिल में है कोई बुरा ख़याल आपके !
जख्म-ए-जिगर में हम न कोई इरादा नापाक रखते है!!

लिख देना इसपर जब भी जी करे लिखने को कोई नज्म !
दिल श्याम-पट्ट है,जेब में हर वक्त हम चाक रखते है!!

Saturday, December 19, 2009

लघु कब्बाली !

पता नहीं आप लोगो का मन भी ऐसा करता है अथवा नहीं, मगर मेरा कभी-कभी ये मन बड़ी अजीबोगरीब हरकते करता है ! आज सुबह से मन कर रहा था कि मैं ताली बजाऊ , रास्ते में ड्राइव करते वक्त स्टेरिंग छोड़ ताली बजाने लगता, फिर अगल-बगल झांकता, चलने वालो को देखता कि कोई मेरी हरकते तो नहीं देख रहा :) बाद में ध्यान आया कि आज हमारे मुस्लिम बंधुओ का नववर्ष है , तो सर्वप्रथम मैंने उन्हें नवबर्ष की शुभकामनाये दी और फिर सोचा कि क्योंकि अपने मुस्लिम भाई-बहन कब्बाली गाना बहुत पसंद करते है तो चलो आज एक कब्बाली ट्राई की जाए ! सुन्दर और थोड़ा लम्बी तो नहीं बन पडी मगर जो भी है, उन्हें नवबर्ष पर समर्पित कर रहा हूँ ! तो आइये आप भी ताली बजाये, मेरे संग :)

मेरे प्यार का जानम तुमने वाह, क्या सिला दिया !
जाम-ए-मोहब्बत दिखा, घूंट जहर का पिला दिया !!
अरमां-ए-दिल को खाक मे, पलभर मे मिला दिया !
जाम-ए-मोहब्बत दिखा, घूंट जहर का पिला दिया !!

सुनो इश्क वालों सुनो, तुम प्यार ज़रा संभलकर करना !
गिलास में परोसा क्या है, उधर भी देख लिया करना !!
फिर न कहना, किसी ने हमको अलर्ट नहीं किया !
जाम-ए-मोहब्बत दिखा, घूंट जहर का पिला दिया !!

मेरे प्यार का जानम तुमने वाह, क्या सिला दिया !
जाम-ए-मोहब्बत दिखा, घूंट जहर का पिला दिया !!
अरमां-ए-दिल को खाक मे, पलभर मे मिला दिया !
जाम-ए-मोहब्बत दिखा, घूंट जहर का पिला दिया !!

कभी हमको भी शर्म आती है कि हम इस तरह जिये क्यो ?
अमृत का जाम मांग कर फिर प्याला जहर का पिये क्यो ??
सुरूर ऐसा मिला कि जिसने रोम-रोम हिला दिया !
जाम-ए-मोहब्बत दिखा, घूंट जहर का पिला दिया !!

मेरे प्यार का जानम तुमने वाह, क्या सिला दिया !
जाम-ए-मोहब्बत दिखा, घूंट जहर का पिला दिया !!
अरमां-ए-दिल को खाक मे, पलभर मे मिला दिया !
जाम-ए-मोहब्बत दिखा, घूंट जहर का पिला दिया !!

Friday, December 18, 2009

जीवन सच !


इम्तहानों से रही बेखबर,
जिन्दगी की यह रहगुजर,
भटकता फिरा मैं इधर-उधर,
सफ़र-ए-मंजिल चार तलों में !
मुश्किल था मंजिले सफ़र,
संग आया न कोई हमसफ़र,
जिन्दगी बस यूँ गई गुजर,
नामुराद इन पांच बोतलों में !!

उतरा था जब बनके नंदन,
मैंने माँगा था स्नेही स्पंदन,
तुत्ती लगी बोतल नन्ही रूह में,
जबरदस्ती ठूंस दी गई मेरे मुहं में !
वक्त संग मैं कुछ और बड़ा हुआ,
अपने पैरो पर जाकर खडा हुआ,
जब उमंग भरी थी इस देह में ,
तब वक्त गुजरा शीतल पेय में !!

आलिंगन को व्याकुल हुए हम,
गले मिलने को आ पहुंचे गम,
मनोरंजन भरने को जवानी में,
जिन्दगी डुबो दी रंगीन पानी में !
लिफ्ट पहुँची अब अगले तल में,
उम्र सिमट गई फिर शुद्ध जल में,
बचा न फिर कुछ मनमानी में,
और ट्विस्ट आ गया कहानी में !!

अबतक की तो मुहं से घटकी थी,
मगर अबके ऊपर से लटकी थी,
फिर पाचन क्षमता कम हो गई,
और एक दिन आँखे नम हो गई !
यही तो था वह मेरा रहगुजर,
पांच बोतलों के बीच का सफ़र,
बोतल से शुरू हुई थी जो कहानी,
इकरोज बोतल पे जाके ख़त्म हो गई!!

Tuesday, December 15, 2009

फिर हम तुम्हारे किसलिए ?

आ मिल-बैठ सुलझा ले आपसी कलह को,
ये विद्वेष सारे किसलिए ?
गर बात दिल की न हम से कह सको,
फिर हम तुम्हारे किसलिए ?

इक रोज तुम्ही ने तो हमको उठाकर,
अपनी पलकों में था बिठाया,
फिर इस तरह आज ये तन्हाई का
पल-पल, हम गुजारे किसलिए ?

याद है खाई थी हम-तुमने कसमे,
साथ सच का निभाने की उम्रभर
तो सच पर लगाये जा रहे अब नित ये,
झूठ के पैवंद प्यारे किसलिए ?

खाकर कसमें, भरोसा दिया था,
हम बनेगे हमेशा इक-दूजे का सहारा
फिर आज इतने पास रहकर भी,
हम-तुम हो गए बेसहारे किसलिए ?

बेचैन होकर रह गई दिल की उमंगें,
खफा हो गई अब रातों की नींद है,
सोचकर बताना हमें, हमने लगाए
अँधेरे गले, तजकर उजारे किसलिए ?

Friday, December 11, 2009

अंधे आगे नाच के, कला अकारथ जाए !

हुआ गुलाम फिर से कुटिल राजनैतिक परिवेश का,
कुछ भी नही हो सकता, अब मेरे इस देश का !

ज्यूं चल रहा, यूं ही चलता रहा और यूं ही चलेगा,
जैचन्द शत्रु संग बैठ सेकेगा रोटी, और यह जलेगा !

शक्लें एक सी है,पता चले कैसे गद्दारों के भेष का,
कुछ भी नही हो सकता, अब मेरे इस देश का !

एक पटेल थे,जी-जान से, बिखरी रियासतें समेटी,
एक ये बांट रहे फिर कहीं बुन्देलखन्ड,कही अमेठी !

घॊडा भाग रहा यहां हर तरफ़, वोट की रेस का,
कुछ भी नही हो सकता, अब मेरे इस देश का !

बिरले मनमोहन ही यहां, सोनी का दिल हरते है,
वरना राज-बाला जैसे कुंए से टर्र-टर्र करते है !

जला न खून’गोदियाल’,निज शरीर अवशेष का,
कुछ भी नही हो सकता, अब तेरे इस देश का !

Thursday, December 10, 2009

एक जोकर !

याद तो होगा आपको
वह सर्कस का जोकर,
तमाम कलाकारों के मध्य,
एक अजीबो-गरीब किरदार,
मकसद सिर्फ़ और सिर्फ़
दर्शकों को हंसाना,
उनका मनोरंजन करना,
और खुद की शख्सियत
सर्कस के जानवरों से भी कम ।
जोकर जो ठहरा,
आम नजरों मे
उसकी अहमियत इतनी
कि बस उसे
एक भावना-विहीन,
नट्खट अन्दाज का
रोल अदा करने वाला,
प्राणी मात्र समझते है हम ।।

दिन ढलने पर जब
कहीं निद्रा की आगोश मे
सिमटने का प्रयास करता है ,
तो सर्द रातों की बयार मे,
उसकी आत्मीय प्राताण्डनायें
उसे बहुत बेचैन कर जाती है ।
आंखो के सीमित आसमान से,
जब ओंस झरने लगती है,
तो वह लिहाफ़ के बादल ओढ,
यही सोचता रहता है कि
क्यों ये कमबख्त सर्द रातें,
जख्मों का दर्द इतना बढा देती है ?
पता नही क्यो ??

पूरे पैर पसार सोने की चाहत !

रात की दिल्ली की कुहास भरी ठण्ड,
एक छोटे से सफ़र पर निकला था,
निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर
कोने से सटी बेंच पर बैठ,
गाडी का इन्तजार करने लगा !
बगल पर ही कोई एक जीव
पुरानी सी एक कम्बल ओढ़ ,
अपनी दिनभर की थकान
मिटाने को व्याग्र था ,
मुझे कोई रिक्शा चालक लगा !!

तभी कुछ दूरी से,
बूटो की कदमताल
खामोशी को तोड़ते
मेरे वाले बेंच की ओर बड़ी,
पास से गुजरते,
मैं उन्हें देख रहा था,
रेलवे सुरक्षा बल के जवान थे वो !

तभी अचानक
मेरी ध्यान निद्रा टूटी
यह देख कि एक जवान ने
उस सोये जीव पर बूट की ठोकर मारी
और कड़ककर बोला,
" हे बिहारी, पैर भांच के सो" !!

बूट की ठोकर से
और सुन के गाली ,
हडबडा के उठ बैठा था,
एक नजर,
दूर जाते जवानो पर डाली,
फिर मेरा चेहरा ताक झांका इधर-उधर !
यही कोई ६०-६५ साल का
वृद्ध लगता था,
वही पुरानी कम्बल फिर से
अपने ऊपर ओढ़ते हुए बडबडाया,
"हे प्रभु ! वो दिन कब आयेगा,
जब मैं पूरे पैर पसार कर सो पाऊँगा,बेख़ौफ़,
किसी के बूट की ठोकरों से बेखबर ?? "

Wednesday, December 9, 2009

जाने क्यों अबके, साकी ने भी पिलाई नहीं !

उनके देखे से आ जाती है हर बारी चेहरे पे रौनक,
मगर इस बारी नयनों ने, कोई उम्मीद दिलाई नहीं !
यूँ दिल बहलाने को मयखाने से भी होकर गुजरे थे,
पर न जाने क्यों अबके, साकी ने भी पिलाई नहीं !!

पतझड़ की बारिश को पैमाने में भर लिया आखिर,
बहारों की बारात में अपनी चाहत शुमार हो पाई नहीं !
किसी गैर के दर पे से तो हमने कुछ माँगा न था,
उनकी हर चीज यूँ भी अपनी ही तो थी, पराई नहीं !!

प्यासे ही लौट आये बड़े बेआबरू होकर उस कूचे से,
भरम था, वह आयेगी हाथ पकड़ने, पर आई नहीं !
थोड़ा और जी लेते, गर इक जाम पिला दिया होता,
खैर, ये शायद मेरी बेरुखी थी, उनकी रुसवाई नहीं !!

पलकों में छुपी आँखों से ही शराब-ए- दीदार कर लेते ,
पर वो थे कि इक बार भी हमसे नजरे मिलाई नहीं !
यूँ दिल बहलाने को मयखाने से भी होकर गुजरे थे,
पर न जाने क्यों अबके, साकी ने भी पिलाई नहीं !!



वैसे अपना ही लिखा एक पुराना शेर याद आ रहा है,
कर कुछ ऐसा कि रिश्तों की पोटली तार-तार हो जाए !
इसबार इतना पिला साकी, कि हम भी पार हो जाए !!

Monday, December 7, 2009

न जाने नया साल क्या गुल खिलाए !


गया साल प्यासा तरसकर ही काटा,
न जाने नया साल क्या गुल खिलाए !
कभी बरसात होगी इसी आश में हम,
छाता उठाके यहाँ भी लचकते चले आए !!


साल गुजरा जो ऐसा मनहूस निकला,
महंगाई ने जमकर हमारे छक्के छुडाए !
जब मंदी बेचारी किसी मंडी से गुजरी,
सब्जी के भावो ने हाथो के तोते उडाए !!


कमबख्त अरहर भी इतनी महंगी हुई है,
कड़ी-चावल में ही दिन-रैन हम रहे रमाए !
यों तो दिवाली पे हरसाल बोनस मिले है,
गतसाल लाला ने तनख्वाह से पैसे घटाए !!


आसार यों अब भी लगते अच्छे नहीं है,
कोरे सरकारी वादों से रहे तिलमिलाए!
साल गुजरा वो तो जैसे-तैसे ही गुजारा,
न जाने नया साल क्या गुल खिलाए !!

Sunday, December 6, 2009

दास्तां मुसाफिर की !

इस जग सारे को तब तक, वह सुन्दर ही भाता था ,
उसे जब तक अपने पैरों पर, चलना नही आता था !
फिर एक दिन वह, खुद के पैरों पे चलता दीख गया,
बडा खुश था उस दिन, जब वह चलना सीख गया !!

इस जग मे यूं भी, बहुतेरे किस्म के इन्सान होते है,
कुछ दूसरों की खुशी देख खुश होते, तो कुछ रोते है !
और उसे भी, इस बात का अह्सास होने लगा था,
आसां नही थी डगर, इस राह पर वह खोने लगा था !!

कभी वह सोचने लगता कि फिजूल ही है बडा होना,
कितना दुखदाई है यहां, खुद के पैरो पर खडा होना !
मगर उसने चलना नही छोडा, बस वह चलता रहा,
उबड-खाबड राह मे ठोकरें खा, गिरता-संभलता रहा !!

इधर चरम पर यौवन था, उबलता जवानी का खून था,
शकूं पाने की जिद थी, कुछ कर गुजरने का जुनून था !
वह चलता गया, क्योंकि उसे मंजिल जो पानी थी,
कुछ भी हो ,रुकूंगा नही, उसने मन मे ठानी थी !!

शुकुं व मंजिल तलाशने मे ही, जाने कब उम्र ढल गई,
लकडी जो शिरे से जलनी शुरु हुई, जाने कब जल गई !
दुर्बल हाथों ने लाठी ली, थके बदन की कमर झुक गई,
भागते वक्त की सुइयां, इक दिन अचानक रुक गई !!

थका-हारा मुसाफ़िर,इसकदर खुद से परेशां हो गया,
पडाव पर पैर पसारे, आंख लगी और सो गया !
कारवां आगे बढा, उसकी सुद किसी को न लग सकी
मुसाफिर की रूह इसकदर सोई कि फिर न जग सकी !!

Saturday, December 5, 2009

मैं ख्वाब ही बुनती रही

ताऊ की पहेली का समय हो रहा है, ज्यादा नहीं लिख पाया, इसलिए एक आठ लाइनों की नज्म पेश है;
कब न जाने वो दिल का हर इक, तार आकर छेड़ गए,
मैं जिन्दगी के साज-सरगम, यूँ आँचल में ही चुनती रही !
तबले के ताल, सरोद-ए-दिल-नशीं, व बीणा की तान पर,
जाने कब वो राग मल्हार गा गए, मैं ख्वाब ही बुनती रही !!

इस कदर मन को मोहित किया था, राग के हर बोल ने,
साज बजता रहा, वो बेखर गाते रहे, और मैं सुनती रही !
दिल के खंडहर की टूटी मेहराबें एवं धूल-धूसरित मीनारें ,
ताने-बानो के इर्द-गिर्द रूह को रूई की मानिंद धुनती रही !!

Friday, December 4, 2009

To err is human to forgive is devine

एक बार फिर से अंग्रेजी की चार लाईने और ठेल रहा हूँ ब्लॉग पर ;
Yes, I have commited a sin,
If you think love is a crime.
I brought down the sky for you,
like a drink with a twist of lime.
Of course, It’s nobody’s fault but mine.
Now , all I can say is that
To err is human to forgive is devine.
You can just pray to a god,
please forgive him, Oh lord !
as he doesn’t know what he is doing.
What is the theme of love and wooing.
Frankly My dear, I don't give a damn,
For me, every day is a day of valentine,
That’s why I say,
To err is human to forgive is devine.


और चलते-चलते यह भी गुनगुनाइएगा ;
हम बेवफ़ा तो पैदाइशी थे….!
हम बेवफ़ा पैदाइशी थे,
पर तुमसे वफ़ा करते रहे !
जानू, तुमने कोई धोखा तो नही दिया?
अरे नही जानम, तुम्हें कोई धोखा हुआ ।
कितनी अकेली रही होगी वो गोद जिसकी,
छत्र-छाया मे अब तक हम अकेले पलते रहे।
पैदा होते ही अपनी सगी मां से बेवफ़ाई की,
और सौतेली मां संग कंटीली राहों पे चलते रहे ॥
तुमने किया हमसे जो सिकवा
हम वो गिला करते रहे !
हम बेवफ़ा तो पैदाइशी थे,
पर तुमसे वफ़ा करते रहे !

Thursday, December 3, 2009

यूनियन कार्बाइड !

खंडहर कर दिया उन हसीं वादियों को ,
रहा करते थे जहां इन्सान कल तक !
पिला गया उनको ही जहर का प्याला,
यहाँ तेरे रहे थे जो कदरदान कल तक !!

थम गया सब कुछ जहां इक घडी मे,
लगता न था वह शहर वीरान कल तक !
मिलती नही अब जहां धड़कन की आहट ,
वहां रुकते न थे सांसो के तूफ़ान कल तक !!

मारा बेदर्दी तूने हर उस एक शख्स को,
जो समझता था तुझको नादान कल तक !
उसी का लूटा घरबार कुहरे की धुंध में ,
बनकर रहा जिसका तू मेहमान कल तक !!

बिख्ररे पडे जहां हरतरफ हड्डियो के ढेर,
इसकदर तो न थी वह बस्ती बेजान कलतक !
संजोया था अपना जो ख्वाबो का भोपाल,
लगता नही था जालिम वो शमशान कल तक !!

़़़़़़
यह कविता या गजल मैने भोपाल गैस त्रास्दी पर ३० दिसम्बर, १९८४ को लिखी थी;

Wednesday, December 2, 2009

धुंधलाई यादे !

कल एक आंग्ल भाषा में कविता लिखी थी, "फ़ॉगी मेमोरी" कुछ सम्मानीय पाठको ने उसके अनुवाद की पुरजोर मांग की थी अत: यहाँ उसका छंद क्रमश: अनुवाद प्रस्तुत है, कविता रूपी अंदाज में ढालने के लिए अनुवाद को तोड़ मरोड़ कर पेश कर रहा हूँ ;


मदमस्त तेरा जहां आज भौरों ने घेरा है !,
लेकिन ऐ दोस्त ! तुझे याद है कि
तेरा प्यार ही तो यहाँ,सब कुछ मेरा है !!
तुम्हे बताऊ,तुम्हे भुलाना नामुमकिन है !
युगों से मेरा दिल,
ज्यों किसी बूढ़े खलिहान की तरह
टूटकर हो गया छिन्न-भिन्न है !!

I know, your life is full of bumblebee,
But, your love is everything for me .
do you remember, eh, Mate ?
you are so hard, so hard to forget.
I miss you, I wanna tell you,
for epoch,an old barn falling apart!
across the inner circle of my heart !!


तकदीर का उसकी ख़याल न कर,
जो तुमने लिखे प्यार के चार अक्षर ,
नहीं मालूम कि
जान के लिखा था या अनजाने में !
ताजे बर्फ की उस चादर पर ,
तुम्हारी कला के हर कण ने
क्या खुशी भरी थी मेरे दिल के तहखाने में !!

Once, without knowing its fate,
You wrote ‘l’ ‘o’’v’’e’, four alphabets.
willingly or unwillingly don’t know,
Like on the keffiyeh of fresh snow.
And gladness filled
every ounce of your art !
across the inner circle of my heart !!


मेरा पागलपन कह लो इसे मगर,
तुम रुकी थी वहाँ , मेरे दिल के बीचो-बीच ,
और मासूमियत से यह उल्लेख किया था
कि तुमने मुझसे प्यार किया !
और फिर प्यार से इसतरह मारा
कि एक तीर
मेरे दिल के पार उतार दिया !!
At middle of the circle on a hoarding,
It looks funny, but you had a boarding.
and you mentioned innocently there,
“I love you so much, oh, my dear”
You killed me loftly-softly
with a dart !
across the inner circle of my heart !!


धीमे से वहाँ बैठकर रंगने लगी थी
तुम मेरे दिल को यों,
सच है न ? फिर तस्वीर बिगड़ी
अचानक क्यों ?
याद करो उन खुशनुमा पलो में !
मै चुस्त और तुम अभी भी ख़ूबसूरत
चलकर बस जाए फिर से दिलो में !!

You sat down slowly and began to paint,
and you colored entire my heart, ain’t ?
why painting turned suddenly so bad ?
Remember the good times that we had?
you’re equally beautiful,
‘m smart !
across the inner circle of my heart !!


बिना किसी द्वेष और हिचक के
आ जाओ तुम मेरे पास, तुम्हारा स्वागत है
कोई बोझ नहीं, कोई कर नहीं !
जब चाहो उतर आना दिल में गाडी समेत ,
दिल की सड़क हर वक्त खुली है,
और उसमे कोई दर नहीं !!

Without any hesitation and malice
you are always welcome at my place
no levy, no toll-tax, no gate even
anytime, as the road is open 24x7
you can joy drive in
with your cart !
across the inner circle of my heart !!

Tuesday, December 1, 2009

Foggy memory !

यों तो अग्रेजी में हाथ बहुत साफ़ नहीं है ,या यूँ कह लीजिये कि बहुत तंग है ! मगर आज बस, परखने के लिए एक अंगरेजी पोएम लिखी, इसे भी ब्लॉग पर ठेल रहा हूँ आपके सुझाओ की प्रतीक्षा में ;

I know, your life is full of bumblebee,
But, your love is everything for me .
do you remember, eh, Mate ?
you are so hard, so hard to forget.
I miss you, I wanna tell you,
for epoch,an old barn falling apart!
across the inner circle of my heart !!

Once, without knowing its fate,
You wrote ‘l’ ‘o’’v’’e’, four alphabets.
willingly or unwillingly don’t know,
Like on the keffiyeh of fresh snow.
And gladness filled
every ounce of your art !
across the inner circle of my heart !!

At middle of the circle on a hoarding,
It looks funny, but you had a boarding.
and you mentioned innocently there,
“I love you so much, oh, my dear”
You killed me loftly-softly
with a dart !
across the inner circle of my heart !!

You sat down slowly and began to paint,
and you colored entire my heart, ain’t ?
why painting turned suddenly so bad ?
Remember the good times that we had?
you’re equally beautiful,
‘m smart !
across the inner circle of my heart !!

Without any hesitation and malice
you are always welcome at my place
no levy, no toll-tax, no gate even
anytime, as the road is open 24x7
you can joy drive in
with your cart !
across the inner circle of my heart !!

Monday, November 30, 2009

ये दुनियां चलायमान है मूरख!

लीजिये झेलिये ;

इस कदर करता तू,
किस बात पर अभिमान है !
ये दुनियां चलायमान है मूरख,
ये दुनियां चलायमान है !!

यहां बीबी-बच्चे,
भाई-भतीजा, गांव-गदेरा,
जाना तय है और,
अन्तकाल मा कोई न तेरा,
फिर तुझमे किस बात का,
यों इतना गुमान है !
ये दुनियां चलायमान है मूरख,
ये दुनियां चलायमान है !!

अच्छा और बुरा ,
इन्ही दोनो मे ही तुझे कुछ करना,
यह भी तय है कि जैसा करेगा,
प्रतिफल भी है उसका भरना,
यही तो इस जगत का
सदियों पुराना विधान है !
ये दुनियां चलायमान है मूरख,
ये दुनियां चलायमान है !!

समय नही लगता यहां
पाप-पुण्य उलझने मे,
फर्क है कथनी और करने मे,
जिस ढंग से समझना चाहो
देर कहां, उसी ढंग से समझने मे,
भला करेगा तो भला होगा,
यही जीवन का सार और ज्ञान है !
ये दुनियां चलायमान है मूरख,
ये दुनियां चलायमान है !!

सत्य को पकड के रख
जरुरत से ज्यादा चिकना है यह
कब हाथ से फिसल जाये पता नही ,
इसलिये उसे जकड के रख,
यहां बर्गलाने को,
स्वार्थ की आंधियां बहुत चलती है,
इसमे जो डगमगा गया ,
वही तो तेरा ईमान है !
ये दुनियां चलायमान है मूरख,
ये दुनियां चलायमान है !!

Saturday, November 28, 2009

सांख्यिकी और संभाव्यता !



ठुमकते हुए चलते,
तुम्हारे पैरो के
तलवों की सरगम
और तुम्हारे नुपुर की
मणियों की धड़कन से,
दिल की गहराइयों में
छुपे मेरे भावो को ,
गूढ़ शब्द-रूपी काव्यता मिली है !
तुम भी मुझे प्यार करती हो
धूल साफ़ करते वक्त,
अचानक मिले इक
फूल की गणना से ,
मुझे अपनी
सांख्यिकी की किताब में
आज यह प्रबल संभाव्यता मिली है !!

Friday, November 27, 2009

कसाब की माँ की..... !

आज सुबह से व्यस्तता की वजह से समय नहीं मिल पाया, कल इसे अपने ब्लॉग पर डाला था, मगर फिर यह सोचकर इसे हटा लिया था कि आज तो देश उन शहीदों को याद कर रहा है, जिन्होंने पिछले साल पाकिस्तानी दरिंदो से लड़ते अपने प्राण न्योछावर किये, मगर, अगर हम लोग इस चिंगारी को सुलगाये नहीं रखेंगे तो ये हमारे कमजोर याददास्त वाले देशवासी कलतक सब कुछ भूल जायेंगे ! इसलिए मैंने कल इसे डिलीट कर दिया था, आज पुनः लगा रहा हूँ !

जैसा कि आप सभी जानते है कि पिछले साल पाकिस्तान से आये अन्य नौ राक्षसों के साथ इस एक जीवित बचे और इज्जत से पाले पोसे जा रहे दरिन्दे, अजमल कसाब ने सेकड़ो निहत्थे, निर्दोषों को मौत के घाट उतारा था! उसके बाद खबर आई थी कि इस दरिन्दे की माँ (अम्मी ) नूर इलाही उससे मिलने मुंबई आ रही है ! फिर पता चला कि इस दरिन्दे को आतंकवादियों के हाथो इसके ही बाप (अब्बू ) मोहमद अमीर ईमान ( जैसा कि अमूमन देखा गया है उसी परिपाटी पर खरे उतरते हुए हरामखोर नाम{अमीर ईमान } के ठीक विपरीत भिखमंगा था, और एक नंबर का बेईमान भी ) ने बेचा था, तो यह जान कर उसकी अम्मी काफी विचलित है और जिन्ना को एक चिठ्ठी लिख रही है, आईये, देखे कसाब की माँ की चिट्ठी जिन्ना के नाम;



क्या मिला जिन्ना तुझे, तेरे पाकिस्तान बनाने मे ,
क्या–क्या न सहा जालिम इस जह्न्नुम मे आने मे !
इससे बेहतर तो हम उस पार हिन्दुस्तान में ही थे,
जाने कैसे आ गए भले मानुष , तेरे इस बहकाने मे !!

आशाओं का दीपक मैने जलाया था जिस 'ईमान' संग,
उसी कम्वख्त ने खुद पहल कर दी उसको बुझाने मे !
चंद रुपयों की खातिर बेच डाला इस काफिर ने उसे,
कसाइयों के हाथो, न रहे उसके दीमाग ठिकाने मे !!

जालिम ईमान ने थोड़ी भी ईमानदारी दिखाई होती,
फिर क्यों आज इसकदर थू-थू मिलती हमें जमाने में !
और न वहाँ उस पार मुंबई में सेकड़ो माँ-बहिने रोती,
अगर कसाब ने बस्ती को न बदला होता बूचड़ खाने में !!

कसाब को बेचने की जो कीमत मिली थी, खा-पी ली,
नंगे थे, नंगे है , अब कुछ भी तो नहीं बचा खजाने में !
सोच रही थी कबसे कि अपना दर्द तुम्हे लिखकर भेजू ,
करते-करते साल बीता दिल की यह बात बताने में !!

Thursday, November 26, 2009

आह्वान- उठ, जाग मुसाफिर जाग !

कद्र हो जहां शान्ति की, वहां शान्ति का इजहार कर,
यही इन्सानियत का सार है,हर इंसान से प्यार कर,
पथ अहिंसा का नितान्त, यहाँ एक श्रेष्ठतम मार्ग है,
पर दुश्मन न माने प्यार से, पलटकर तू वार कर !


यूं हम सदा से शान्ति के, पथ पर ही चलते आये है,
किन्तु ऐवज मे हमने हमेशा, जख्म ही तो पाये है,
जिल्लत उठाई खूब,मुगलों और फिरंगियो से हार कर,
अगर दुश्मन न माने प्यार से, पलटकर वार कर !


आखिर इस तरह कब तक सहेगा, जुल्म सहना पाप है,
क्रूर दानव दर पे है बैठा, यह हम पर एक अभिशाप है,
छद्म युद्ध थोंपा है उसने, निरपराध का नरसंहार कर,
गर दुश्मन न माने विनम्रता से, पलटकर तू वार कर !


आपस मे ही हमको लड मराया, जाति-धर्म की ठेस ने,
भाषा-क्षेत्र मे बांट अपनो को , जयचन्द पाले देश ने,
खुले हाथ को बना मुठ्ठी, जन-धन को रख संवार कर,
गर दुश्मन न माने विनम्रता से, पलटकर वार कर !


अन्याय की आहट पे गर, तू खुद ही नजरें फेर लेगा,
इसे शत्रु अशक्तता समझकर, आ तुझे फिर घेर लेगा,
लोग कायर समझ बैठे , ऐंसा न कोई व्यवहार कर,
गर दुश्मन न माने विनम्रता से, पलटकर वार कर !


जमने न दे हर्गिज लहू को, वीरता दिखाना फर्ज है,
मत भूल जननी,जन्म-भूमि का,एक तुझ पर कर्ज है,
न उलझ मायाजाल मे, स्वार्थ की हद पार कर,
अगर दुश्मन न माने विनम्रता से, पलटकर वार कर !


छिपकर सदा की तरह, वैरी का तुझपर वार होगा,
खुद ही लड्ना है तुझे, कोई न तेरा मददगार होगा ,
जो समझे न बात को शिष्टता से, उससे तकरार कर,
गर दुश्मन न माने विनम्रता से, पलटकर वार कर !


सरहदो पर हौंसला असुर का, हो रहा नित सशक्त है,
उठ,जाग मुसाफ़िर जाग, अभी भी पास तेरे वक्त है,
तू दे जबाब मुहतोड उसको, घाट मृत्यु के उतार कर,
अगर दुश्मन न माने विनम्रता से, पलटकर वार कर !


मुफलिसों के तलवों जिन्दगी, घुट-घुट के ही खो जायेगी ,
जाग मुसाफिर जाग, वरना बहुत देर हो जायेगी,
फिर फायदा क्या, अगर पछताना पड़े थक-हार कर,
अगर दुश्मन न माने प्यार से, पलटकर तू वार कर !

Sunday, November 22, 2009

यादें !

फिर शरद ऋतु आई है,
अलसाये से मौसम ने भी
ली अंगडाई है !
आज फिर से कुछ यादे,
ताजी होकर,
सर्द हवाओं संग
चौखट से अन्दर घुसी तो
फूल बगिया मे सब,
कुम्हला से गये है !
दिमाग मे हरतरफ़
वो श्याम-श्वेत चल-चित्र
चहल कदमी करने लगे
फिर से,
जो वक्त के थपेडो संग
कुछ धुंधला से गये है !!

वो पल,
वो हंसीन लम्हें,
तुम्हें याद हैं न
कि जब
मेरी रूह की परछाइयों से,
इक आह निकली थी !
और युगो से,
सांसों मे भट्कती
किसी अतृप्त तड्पन ने,
धड्कते हुए तुम्हारे
दिल के किसी कोने पे,
खुबसूरत सी वो
इक नज्म लिखली थी !!

और फिर हम
निकल पडे थे तलाशने
अपने लिये
दूर गगन की छांव मे,
एक सुन्दर सा आशियाना !
देखो न,
तुम तो नज्म भी साथ ले गई,
मगर मैने,
उस नज्म का एक-एक मिसरा
कंठस्थ रखा है ,
और हरपल,
गुनगुनाता रहता हूं
वह प्यार का तराना !!

और तो और,
वो हमारे बेड रूम के,
डबुल बेड की दोनो फाटे,
जो तुम खुद ही
अलग-अलग कर गई थी,
मैने उन्हे न तो छेडा,
और न ही फिर से
वो आपस मे सटाई है !
कोने पे रखे
तुम्हारे उस
ड्रेसिंग टेबल के आइने पर
जमी धूल की मोटी गर्त,
इस डर से कि कही,
तुम्हारे माथे की
वह एक बिंदिया,
जो शायद तुम भूल बस,
आइने पे ही
चिपकी छोड गई थी,
कहीं गुम न हो जाये,
मैने इस लिये नही हटाई है !!
बस तुम्हारी
वही तो एक सौगात बची है मेरे पास !

Friday, November 20, 2009

भई, अपनी तो जिन्दगी मस्त है !


सुबह उठकर,
नहा -धो के नाश्ता किया,
झोला कांधे पे लटकाके,
मंझे पत्रकार की शैली में
टा-टा करके घर को !
निकल पड़ता हूँ दफ्तर को !!
दफ्तर पहुँच आँखों को
एक अलोकिक सुख की
अनुभूती होती है,
क्योंकि अपने
दफ्तर के रिसेप्शन की
साज-सज्जा ही कुछ ऐसी जबरदस्त है!
भई, अपनी तो जिन्दगी मस्त है !!

दफ्तर की पहली चाय के साथ,
कंप्यूटर खोला और लगे टिपियाने,
कुछ जो रात का लिखा था,
उसे अपने ब्लॉग पर डाला !
तभी कभी-कभार राउंड पे
आ टपक पड़ता है लाला !!
पहले से एक फाइल खोले रखता हूँ,
और झट से लैटर बनाने लगता हूँ ,
भले ही पत्र का
मैटर कोई याद नहीं,
मगर उल्लू बनाने में
मैं भी कम उस्ताद नहीं,
उसके बाद तो समझो,
बॉस ही काम के बोझ तले पस्त है !
भई, अपनी तो जिन्दगी मस्त है !!

सांझ ढले घर पहुंचा,
तो रोज एक सी ही रहती है दिनचर्या,
क्योंकि है भी नहीं कोई और जरिया,
बेटा अपना मस्त रहता है कुड़ियों में !
बेटी, ताना-बाना बुनती है गुड्डे-गुड़ियों में !!
बीबी, किचन में झूमती है आई-पोड में,
बूढी मम्मी मग्न रहती है अपने गौड़ में,
मैं भला किसके संग मन बहलाऊ अपनी रेंज में !
खुद ही गुम हो जाता हूँ, दो पैग रोंयल चैलेन्ज में !!
टीवी पे एक ऐड देखा था कि
सिर्फ चार हजार में रोंयल पेंट लगाओ
और पूरा का पूरा घर रंगीन पाओ,
मैं तो कहूँ कि
अरे छोडो ये बाते सारी,
भाड़ में गई दुनियादारी,
वो करो कि हर चीज तुम्हे भायेगी !
चार सौ की रोंयल चैलेन्ज लाओ,
पूरी दुनिया ही रंगीन नजर आयेंगी !!
महंगाई से दुनिया भले ही त्रस्त है !
पर भई, अपनी तो जिन्दगी मस्त है !!

Thursday, November 19, 2009

कभी मेरे शहर आना !

क्योंकि तुम मानते हो कि
शहर इक खुशनुमा जिन्दगी
जीने का आधार है न ?
तभी तो तुम्हे ,
शहरी जिन्दगी से
इतना प्यार है न ??
मगर ये बात सम्पूर्ण सच नही,
तुम्हे कैसे समझाऊ ?
यहाँ सांझ ढलने के बाद,
मै कैसे जीता हूं,
तुम्हे क्या बताऊ ?


अरे नासमझ,
गांव एवं शहर की जिन्दगी मे,
फर्क हैं नाना !
शहरी जिन्दगी देखनी हो,
तो कभी
मेरे शहर आना !!
तुम्हे दिखाऊंगा कि
कथित विकास की आंधी मे,
मेरा शहर कैसे जीता है !
प्यास बुझाने को
पानी के बदले , पेट्रोल-डीजल,
मिनरल और ऐल्कोहल पीता है !!

क्या घर, क्या शहर,
हर दिन-हर रात की
मारा-मारी में,
वो सिर्फ जीने के लिए जीते है !
जीवन की इस जद्दोजहद में
क्या शेर, क्या मेमना
सब के सब मजबूरी में ,
एक ही घाट का पीते है !!

ऊँचे उठने की चाहत में,
मकान-दूकान, सड़क-रेल,
यहाँ सब के सब,
टिके है स्तंभों पर !
जिन्दगी भागती सरपट
कहीं जमीं के नीचे,
तो कहीं खामोश लटकती ,
खम्बों से खम्बों पर !!

गगनचुम्बी इमारतों में
मंजिल तक जाने को,
पैर भी लिफ्ट ढूंढते है ,
खुद नहीं आगे बढ़ते !
ऊँचे-ऊँचे मॉल पर ,
सीडियों से
चड़ते -उतरते वक्त
घुटने नहीं भांचने पड़ते !!

एक बहुत पुराने,
किले का खंडहर जो
चिड़ियाघर के पास है ,
वहाँ आजकल दिन में भी
अतृप्त आत्माओं का वास है !
उसके सामने से
एक सीधी सड़क
पहुंचा देती है ,
उस एक खुले से मैदान में
जो अपने में ख़ास है !!

राजा से लेकर
रंक तक,
यहाँ विचरण करती,
हर तरह की हस्ती हैं !
इस मैदान से जो
सीधी सड़क जाती है,
उसके एक तरफ
मुर्दा-परस्तो की भी बस्ती है !!
उनके लिए तो बस आज है,
न कल था, न कल की
कोई आश है,
न कोई झूठ है न कोई सांच है !
सूरज ढलने पर
जहां हर रोज,
खचाखच भरे रंगमंच पर
सभ्यता दिखाती
अपना नंगा नाच है !!

कहीं मेरे इस शहर में,
कोई अभागन,
देह बेच कर भी दिनभर
भरपेट नहीं जुटा पाती है !
और कहीं,
कोई नई सुहागन ,
दुल्हे को वरमाला पहनाने हेतु,
क्रेन से उतारी जाती है !!

मैं तो बस,

हैरान नजरो से
देख-देखकर ,
सोचता रहता हूँ कि ,
यहाँ वन्दगी गा रही

यह कौन सा तराना !
ये दोस्त !
शहरी जिन्दगी देखनी हो,
तो कभी,
मेरे शहर आना !!


Monday, November 16, 2009

कबाडी और साहित्यकार !

आपने देखा होगा कि अक्सर घरो, गलियों मे आने वाला हर फेरिया व्यापारी अपना कुछ न कुछ सामान, जोकि अमूमन एक ही तरह की वस्तु होती है, बेचने को लाता है, कही एक खास जगह से खरीद कर, जबकि कबाडी इसके ठीक विपरीत भिन्न-भिन्न जगहों, घरों, गलियों से भिन्न-भिन्न तरह का कूडा खरीद्कर व इक्कठ्ठा कर, एक जगह पर बेचने ले जाता है । साहित्य-जगत मे एक रचनाकार भी एक कबाडी की ही तरह होता है, उस कबाडी की तरह, जो घर-घर जाकर कूडा इकठ्ठा करता है। साहित्य-जगत से जुडा एक रचनाकार अथवा साहित्यकार भी भिन्न-भिन्न जगहो, मौसमो, वातावरण और परिस्थितियों से साहित्यिक और बौद्धिक कूडा-कच्ररा अपने दीमाग मे इक्कठाकर लाता है, और फिर एक जगह पर उसे संग्रहित कर देता है, या फिर बेच डालता है। सचमुच कितनी समानताये है न, एक रचनाकार और एक कबाडी मे ? हां, फर्क बस इतना है कि कबाडी का इक्कठा किया हुआ कूडा तो उसे कुछ न कुछ आर्थिक अर्जन देता ही है, मगर साहित्यकार का कूडा उसे मौद्रिक लाभ भी देगा, इसकी कोई गारन्टी नही होती।

ऐ साहित्यकार !
तूम भी एक कबाडी हो,
साहित्य की गलियों के ।
वन और उपवन की
पौधे, फूल और कलियों के॥

कबाड खाने के ,
मंजे एक खिलाडी हो,
ऐ साहित्यकार !
तूम भी एक कबाडी हो ।

सर्दी, गर्मी और बरसात
सुबह, दिन, शाम,
शहर, गली, और धाम,
कुछ न कुछ,
बिनते ही रहते हो ।
हां, एक फर्क भी है,
कबाडी आवाज लगा कर,
कूडा खरीदता है,
मगर तुम चुपचाप,
कुछ भी तो नही कहते हो ॥

कहीं उस्ताद
तो कहीं अनाडी हो,
ऐ साहित्यकार !
तूम भी एक कबाडी हो ।

बस खामोश,
तत्परता से जुटे रहकर,
समेट लेते हो बौद्धिक कच्ररा,
दिमाग के गोदाम मे।
परख-परखकर,
जब ढेरों इक्कठ्ठा हो जाये
फिर लग पडते हो,
अपने असली काम मे ॥

सचमुच मे,
बडे ही जुगाडी हो ,
ऐ साहित्यकार !
तूम भी एक कबाडी हो ।

Friday, November 13, 2009

ख़त उसके नाम !

बहा ले जाए सुप्त-थमे हुए दरिया में भी जो ,
यहाँ हर तरफ ऐसी कुछ मौजो के सफीने है,
तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली,
क्या बताऊ, यहाँ के तो पत्थर भी कमीने है !

माँ को माँ नहीं समझते, बहन को बहन नहीं,
बेरहमी का मंजर ये, मानो इनमें जहन नहीं
उंगली की मुन्दरिया के खोटे सब नगीने है,
तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली,
और तो और, यहाँ के तो पत्थर भी कमीने है !

प्यास बुझाने को भी तोल के मिलता पानी है
दीन-ईमान की बात तो, सब के सब बेईमानी है,
बेचने को समेटते बूँद-बूद टपके हुए पसीने है,
तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली,
तुम क्या जानो, यहाँ के पत्थर भी कमीने है !

बेशर्मी का आलम ये, शर्म न इनकी नाक में है
किसे लगाए ठोकर रहते,हरवक्त इसी ताक में है,
मार्बल के चेहरे इनके, तारकोल के जैसे सीने है,
तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली,
तुम्हे नहीं मालूम, यहाँ तो पत्थर भी कमीने है !

Tuesday, November 10, 2009

आज बस इतना ही .....

फिर से लुटती देखी सरे-आम अस्मिता, विधान भवन के कुंजो ने !
जब हमारी राष्ट्र-भाषा को बेइज्जत किया, कुछ सियासी टटपुंजो ने !!

अपनी स्वार्थ सिद्धि हेतु राष्ट्र-गीत,राष्ट्र-भाषा की आबरू लूटने वालो !
तुमसे किस तहजीव में पेश आये, बस यही कहूंगा, डूब मरो सालो !!

Monday, November 9, 2009

शराफत और प्रेम !

१;

लापरवाह बहुत हो,
आज सुबह-सबेरे
जब मै ,
तुम्हारी गली से गुजरी थी,
घर के बाहर गली मे
तुम्हारा कुछ सामान
पडा देखा !


अरे वो ?
हां,हां…..
तुम ठीक ही समझी,
वो मेरी
शराफत का चोला था,
जिसे मैने कल रात,
बस यूं ही ….
खुन्दक मे,
उतार फेंका !!




२;

प्रेम भी
अब नही बचा
आडम्बर के
परिवेश से !
कभी
प्रेम सच्चा होता था,
चाहे वह इन्सान से हो,
या फिर देश से !!

मगर आज हर चीज को
’स्युडोइज्म’ (छद्मता) का
ऐसा बुखार चडा है !
कि दिखावे को ही सही,
मगर इन्सानी धर्म,
राष्ट्र-धर्म से बडा है !!

आज सच्चा प्यार तो
दबा कहीं
तुष्टिकरण की ढेर रहा,
बस छद्म प्यार ही
इस कदर जलवे बिखेर रहा,
हकीकत क्या है
कोई भी उसे
गहनता से नही लेता !
प्रेम के मायने वो बन गये
जो कुछ कम-संख्यक
आज
इस देश से कर रहे,
और
उन कम-संख्यको से
हमारे धर्म-निरपेक्ष नेता !!

Saturday, November 7, 2009

गलत वो नहीं हम है !

वन्दे मातरम् ,
धरती माँ के नमन का गीत है,
और दर्शाता,
धरती के प्रति इंसां की प्रीत है !
जिसमे उसने,
जन्म लिया, खेला, पला, बढा ,
और मिट गया,
फिर उसी माटी का तिलक चढा !
उसी धरा को,
समर्पित उसका यह गीत है,
जो दर्शाता,
धरती के प्रति इंसां की प्रीत है !!

जिसने भी,
धरा के गीत को नकारा है आज,
मै तो कहूंगा,
की गलत नहीं है वह बन्दा नवाज !
वह जब,
इस धरती के प्रति वफादार ही नहीं,
तो उसके लिए,
भला गीत की क्या उपयोगिता रही ?
गलत तो हम है,
जो उसे समझने में ही गलती किये रहे,
और खुद ही,
आस्तीन में सांपो को दूध दिए रहे !

दगा देना,
तो उसकी सदियों पुरानी रीत है !
वन्देमातरम,
धरती माँ के नमन का गीत है !!

Friday, November 6, 2009

बेच खाया देश को........

सत्ता की बागडोर पकड़ ली,
लुच्चे  और लफंगों ने !
बेच खाया इस देश को,
भूखे और नंगो ने !!

सोने की चिडिया कभी ,
इसका सर्वनाम था !
अनजान  पथिक  के लिए ,
यह आश्रय-धाम था !!

चहु दिशा  से  लपेट लिया
अब बिषधारी  भुजंगों ने !
बेच खाया इस देश को,
भूखे और नंगो ने !!

तुष्टिकरण के लिए बिक रहा ,
राष्ट्र -सम्मान है !
कहीं भी अब बचा नहीं,
धर्म-ईमान है!!

लोकतंत्र शर्मशार कर दिया,
मानसिक अपंगों ने !
बेच खाया इस देश को,
भूखे और नंगो ने !!

Thursday, November 5, 2009

जाने क्यूँ ?


जाने क्यूँ ?
हम पक्षी भी न,
बड़े अजीब होते है
मेहनत करके
आशियाना कोई और बनाते है !
और तिनका-तिनका समेट
सपने सजाने हम पहुँच जाते है !!

तुम्हे याद होगा,
वह बड़ा सा घर
और उसकी सह्तीर
जिसपर,
तुम्हारे और मेरे
माँ-अब्बू ने भी
अपने-अपने घरौंदे सजाये थे,
अपने सपनो का जहां बसाया था
सुदूर उस अंचल, उस पहाड़ में !
याद है
कितनी मेहनत करते थे वो
सर्द बर्फीली हवाओं से लड़कर,
हमारे लिए,
दाना-दाना जुटाने के जुगाड़ में !!

और जब
हमारे पर निकल आये तो....
तुम्हे याद होगा,
तुम्ही ने तो उकसाया था
मुझे संग अपने उड़ जाने को !
और मैं भी,
फुर्र करके उड़ दी थी,
तुम्हारे संग इक नया
अपना आशियाना बसाने को !!

करते-करते
इतने बरस बीते,
अपना घर-अंगना छोड़,
इस अजनवी परदेश में,
सब कुछ होते हुए भी
मन के बर्तन है रीते,
जाने क्यों ?
अपने लिए इक अदद घोंसला
तक नहीं ढूँढ पाए अब तक
सिर्फ इस भय से डरकर यूँ !
कि अगर हमारे बच्चे भी
हमारी ही तरह किसी दिन,
हमारा घर छोड़,
पंख फडफडाकर उड़ गये कहीं तो...
ये बेहतर विकल्प भी
घर से दूर ही होते हैं
अक्सर, न जाने क्यूँ !!



साभार: समीर जी के आज के लेख "आसमानी रिश्ते भी टूट जाते है" से प्रेरित लेकर !

Tuesday, November 3, 2009

तुम सुन रहे हो न ?


सुनो न,
तुम सुन रहे हो न ?
पता नही क्यों,
यह मोबाइल फोन,
आजकल इस पर सिगनल
ठीक से नही आते-जाते !
जब से तुम गये हो,
पूरे चार साल हो गये,
लगता है यह भी थक गया,
साथ मेरा निभाते- निभाते !!

तुम सुन रहे हो न ?
कल रात को सुलाते वक्त,
तुम्हारा यह लाड्ला,
मेरी बाहों के सिरहाने पर लेटे-लेटे,
अचानक पूछ बैठा
कि ममा, ये ’पापा’ कैसे होते है ?
उसके इस अबोध सवाल का
भला मैं क्या जबाब देती
उसका मन रखने को
बोली कि बेटा,
जो तुम्हारी ममा को जगा
खुद कहीं चैन की नींद सोते है !
ये पापा ऐसे होते है !!

उसने फिर सवाल किया,
कि ममा, जब भी रात को
तुम मुझे सुलाने लगती हो,
तो मेरे गालो पर
ये पानी की बूंदे
कहां से आकर गिरती हैं ?
मेरे चुप रहने पर
जिद करता है कि ममा तुम कुछ कहोगी !
मै उसे झिड्क देती हूं कि
अब तुम सो जावो,
सर्द रातों का मौसम है,
कहीं आसमां से ऒंस गिरती होगी !!

तुम सुन रहे हो न ?
उतनी देर से
सिर्फ़ हूं-हूं किये जा रहे हो,
तुम कुछ कहो न !
मै तो उसे समझाते-समझाते
थक जाती हूं,
मगर उसे कोई यकीं नही
दिला पाती हूं !
हरदम तुम्हे 'मिस' करता है,
तुम्हारी तस्वीर देख
हंसने लगता है,
तुम्हे देखेगा तो
उसका तो रोम -रोम खिलेगा !
कब लौट रहे हो ?
तुम्हे तुम्हारा वो
'ग्रीन कार्ड' कब तक मिलेगा ?

इमोशनल ब्लैक मेल

Monday, November 2, 2009

तेरा ही लिखा कोई अफ़साना लगा !


सुन्दर सा वह उनका आशियाना लगा,
जग सारा ही अपना घराना लगा !
कुछ लम्हा ठहरे तो गैरों के दर पे थे,
जाने क्यों अपना ही ठिकाना लगा !!

अब तक जी रहे इसी गफ़लत मे थे,
कि होता नही कोई किसी का यहां !
पलभर जो शकूं उनके आंचल मे मिला,
तो अपना हमे सारा जमाना लगा !!

बिठा अंगना मे पसरे गुलाब के झुरमुट,
और अपनी घनी जुल्फ़ो की छांव तले !
हौले से जो गुनगुनाया उस कमसिन ने,
हमको अपना ही कोई तराना लगा !!

घडीभर के लिये मुस्कुरा भी दिये वो
नजरें चुराकर कुछ मेरी नादानियों पर !
मगर हमको तो वह भी महज उनका,
दिल को बहलाने का इक बहाना लगा !!

यूं तो गम की दवा पीकर ही गुजार दी,
हमने भी यहां अपनी तमाम जिन्दगी !
सुरूर जो साकी के परोसे हुए जाम मे था,
हमें ऐसा न कोई मयखाना लगा !!

सोचता था अब तक कि इस जहां मे,
अकेला मैं ही दर्द-ए-गम का मारा हूं !
जिसे समझता था मै किसी गम की दवा,
वह खुद ही गमों का खजाना लगा !!

हुआ जब रुखसत तु उनकी महफिल से,
कुछ पल ठहरने के बाद ’गोदियाल’ !
छ्लका जो दर्द उनकी आंखो से था वो,
तेरा ही लिखा कोई अफ़साना लगा !!

Friday, October 30, 2009

कुर्ता-सलवार !



पिछली होली के बाद के एक कवि सम्मलेन की यादे;
कवि महोदय जगह-जगह पर सुई धागे से भद्दे ढंग से तुल्पे, सफ़ेद कुर्ता-पजामा पहने, चेहरे पर काफी खिन्नता लिए, गुस्से में मंच पर आये, और माथे का पसीना फोंझते हुए माइक थाम कर कविता गायन करने लगे;

फाड़ दिया....
फाड़ दिया.....
फाड़ दिया सालों ने ......
"अरे कविवर, आगे भी बढो, आप यही पर क्यों अटक गए", दर्शक दीर्घा से एक आवाज आई तो कविवर आगे बढे ;

याद है, जब तुम
पिछली बार,
मायके से आयी थी,
वह गिफ्ट मेरे लिए लाई थी,
सुन्दर, सफ़ेद चटकीला था.
न ज्यादा टाइट था,
और न ढीला था,
मगर इस होली पर उसे,
जो दिया था तेरे मायके वालो ने !
मिलकर रंग मलने के बहाने,
फाड़ दिया.....
फाड़ दिया सालो ने !!

कितना निखरता था,
मेरे गठीले बदन पर,
तुम्ही तो कहती थी कि,
जब तुम उसे पहन कर,
किसी कवि सम्मलेन में जाते हो,
सच में,
तुम मंच पर,
और कवियों से,
एकदम अलग नजर आते हो,
मगर इस होली पर,
गली-मोहल्ले के गोरे गालो ने!
मिलकर रंग मलने के बहाने,
फाड़ दिया.....
फाड़ दिया सालो ने !!

याद है तुमने,
कितने प्यार से,
वो मुझे दिया था,
तुम्हारी उस भेंट को,
मैंने भी तो,
खुसी-खुसी कबूल किया था,
दिल नहीं लगता,
जबसे तुम फिर से,
मायके गई हो,
ख़त लिखकर बताना
अबके कब लौट रही हो ?
अपने पापा, यानी
मेरे ससुर जी को भी बता देना,
कि इस होली पर,
बस्ती के कंगालों ने !
मिलकर रंग मलने के बहाने,
फाड़ दिया.....
फाड़ दिया सालो ने !!

Thursday, October 29, 2009

हमको हमारी खाक न मिली !

नापाक जिन्दगी को कोई पाक न मिली,
दिल-ए-गम को हमारे कोई धाक न मिली !
दे पाये कहीं पर वास्ता, जिसके प्यार का,
बदकिस्मती कह लो कि वो इत्तेफाक न मिली !!

मुद्दतो से पाला था जहन में इक हसीं ख्याल,
कि लिखवाएंगे इक सुन्दर नज्म कभी तो!
ज्यूँ श्यामपट्ट, दिल टाँगे भी रखा सीने पर,
लिखने को मगर इक अदद चाक न मिली !!

लिखकर भेजे थे जो प्यार के चंद अल्फाज,
जिन्होंने इक कागज़ के टुकड़े पर कभी हमको !
उम्र गुजर गई ख़त की राह तकते-तकते,
मगर कम्वक्त अब तक हमको वो डाक न मिली !!

बड़ी सिद्दत से ढूंढ तो लाये थे एक सुन्दर सा,
हीरे मोतियों से जडा नथनियाहार उनके लिए !
और ख्वाबो में खूब सजाया भी उस मुखड़े पर,
हकीकत में सजा पाते, ऐसी कोई नाक न मिली !!

धूँ-धूँ कर जलता हुआ तो सबने देखा था यहाँ,
तेरा वो सुन्दर सपनो का आशियाना, गोदियाल !
मौका-ए-वारदात पर लाख तलाशा भी मगर,
अब तक वहाँ से तुम्हारी कोई ख़ाक न मिली !!

Sunday, October 25, 2009

एक अफ़सोसमय गीत !


पाले रखी थी ख्वाईशे बहुत, कहने को कोई हमारा भी हो
किसी के हम भी बने,कोई तन्हाई का सहारा भी हो,
अफ़सोस है मगर, कि मै किसी का भी ना बना !
अब कोसता फिरता हू मन्हूस उस घडी को,
जिस घडी मे मेरी मां ने, मुझे था जना !!

वक्त-ए-हालात युं ही मेरा सदा, यहां जाता है गुजर
कहीं आशा की किरण अबतक, आई न हमको नजर,
उम्मीद की राह मे हर तरफ़ छाया है कुहरा घना !
अब कोसता फिरता हू मन्हूस उस घडी को,
जिस घडी मे मेरी मां ने, मुझे था जना !!

हम तो सदा से बस इक, खुश-फहमी मे ही जीते रहे
कोई होगा संग दिल सनम, जामे-तन्हाई पीते रहे,
थक गये आखिर इस बेकरार दिल को मना-मना !
अब कोसता फिरता हू मन्हूस उस घडी को,
जिस घडी मे मेरी मां ने, मुझे था जना !!

गमो ने चौ-तरफ़ा आकर, इस तरह से हमको घेरा है
नाउम्मीदी ही नाउम्मीदी का छा गया अन्धेरा है,
जहरीला अवसाद का खंजर जाने क्यो मुझपे तना !
अब कोसता फिरता हू मन्हूस उस घडी को,
जिस घडी मे मेरी मां ने, मुझे था जना !!

जो थे भी कुछ रिश्ते उनकी बुनियादे, जाने कब रिस गई
बेकरार आखें तो बस इन्तजार, करते-करते ही घिस गई,
दिल मे इक सूनेपन का यह कैसा द्वन्द है ठना !
कितनी मन्हूस सी रही होगी वह घडी ,
जिस घडी मे मेरी मां ने, मुझे था जना !!

Friday, October 23, 2009

ऐसा अद्भुत देश है मेरा !


हमारे देश की इस पावन धरती ने भी,
भांति-भांति के जीव जने !
कुछ ने अपने हाथो ही चमन उजाडा तो,
कुछ गुलिस्तां की नींव बने !

कभी बनी राम-कृष्ण, बुद्ध व गांधी की भूमि,
तो कभी क्रूर मुगलों के तीर सहे !
कहीं पाला कायर-जयचंदों को तो,
कहीं पृथ्वी-भगत सिंह जैसे वीर हुए !

कहीं बहती यहाँ प्यार की गंगा और,
कहीं नफरत के भी बीज बुए !
कहीं खाप हमारी पहचान बनी तो,
कहीं रांझा और हीर हुए !

बलशाली भी बहुत हुए, उतरे वे अखाडे में,
तो दुनिया ने उन्हें कहा खली !

कहीं कायर करता वार छुपकर बाड़े से,
और खुद को कहता नक्सली !

आजाद हुई यह धरती जब गुलामी से तो,
नेता मिला इसे ऐसा कमीना !
जो लूट रहा दोनों हाथो से, जनता को
दिखाता गुड है और खिलाता पीना !

नोट : 'पीना' का अर्थ है, सरसों से तेल निकालने के बाद जो खली बचती है !

Monday, October 19, 2009

इजाफा ही इजाफा !

जब
आज
कलयुग के
इस चरम पर,
अधर्म और असत्य,
अपनी जय-जयकार कर,
खुद ही फूले नही समां रहे,
तो फिर मै तो सिर्फ यही कहूंगा,
कि वो तो हम भी देख रहे है कि;
चोरी और डकैती में इजाफा हो गया ,
कत्ल और बलात्कार में इजाफा हो गया,
घूसखोरी और भ्रष्टाचार में इजाफा हो गया,
धूर्तता और दुष्टता में भी तो इजाफा हो गया,
और जो धर्मगुरु जोर-शोर से दावा करते है कि
उनके धर्मावलम्बियों की आवादी में इजाफा हो गया
,

तो मेरे भाई ! किसमे कितना इजाफा हुआ, इससे हमें क्या ?
हाँ, अगर कही इंसानों की तादात में इजाफा हुआ हो तो
बताना, हम तो बस इतनी सी बात से ही ताल्लुक रखते है !
!


(आभार-श्री श्याम१९५० का जिनकी टिपण्णी पढ़ यह लिखने का दिल हुआ)

Wednesday, October 14, 2009

ऐ यार मत करना !







.
.
.
गफलतों में भी दगा दिल से,
ऐ यार मत करना !
सलवटों में दबके रह जाए,
वह प्यार मत करना !!

मन निश्छल न हो,
छल चेहरे पे नजर आये !
इस तरह के प्यार का ,
तुम इजहार मत करना !!

फूलो को तेरे कदरदान,
खरीदने पर उतर आयें !
गुल-ऐ-गुलशन को यों ,
सरेआम बाजार मत करना !!

घर के द्वारे पे जो खुद ही,
टकटकी लगाए खडा हो !
ऐसे चाँद का हरगिज,
तुम दीदार मत करना !!

पनाहों में किसी की जब,
गुजर रही हो जिन्दगी !
फ़ुर्सत के उन हसीं लमहो में,
जीना दुष्वार मत करना !!

Saturday, October 3, 2009

बिलेटेड हैप्पी बर्थडे बापू !


चौक-चौराहों पे लटका दिया तेरे बुत को,
बनाके कुटिल राजनीतिक विपणन की ढाल !
एक बार आकर तो देख साबरमती के संत,
कि यहाँ तेरे ये भक्त, कर रहे क्या कमाल !!

थोक और फुटकर दोनों में खूब कमा रहे है,
गली-गली में खोल तेरे खादी की दुकान !
पांचो उंगलिया इनकी घी में, सर कडाई में,
करदाता के पैसो का खूब कर रहे फुकान !!

लालू, माया, अमर-मुलायम, राजा -रंक ,
चल पड़े सब रोडपति से करोड़पति की चाल !
एक बार आकर तो देख साबरमती के संत,
कि यहाँ तेरे ये भक्त कर रहे क्या कमाल !!

सादगी के नाम पर पिछले साठ-बासठ सालो में,
इन्होने यहाँ अपने लिए क्या-क्या नहीं है जोड़ा !
तोपे हजम कर ली, शहीदों के कफ़न खा गए,
और तो और पशुओ का चारा भी नहीं छोडा !!

इनकी बदौलत बनकर चले गए यहाँ से रातोरात,
पता नहीं कितने क्वात्रोक्की होकर माला-माल !
एक बार आकर तो देख साबरमती के संत,
कि यहाँ तेरे ये भक्त, कर रहे क्या कमाल !!

Friday, October 2, 2009

और मजनू बेचारा कुंवारा ही रह गया !

कहानी है यह भी एक मजनू की
सुनाता हूं तुमको मै दास्तां जुनूं की,
संग-संग वो दोनो बचपन से खेले थे
साथ ही सजाते अरमानो के मेले थे,
जब से था उन दोनो ने होश संभाला
दिलों मे थी उनकी चाहत की ज्वाला,
परिणय़ मे बंधने की जब बारी आई
अपनो को अपने दिल की बात बताई,
मगर रिश्ता ’बाप’ को यह मंजूर न था !

लाख कोशिश पर भी उसने उसे न पाया
और आखिर मे वही हुआ जो होता आया,
गुजरना पडा मजनू को फिर उस दौर से
हुई, लैला की शादी जबरन किसी और से,
इस तरह मजनू, लैला से सदा को दूर हुआ
पल मे सपनों का घरौंदा चकनाचूर हुआ,
फिर उसके अपने मरहम लगाने को आये
एक नया रिश्ता उसके लिये खुद ढूंढ लाये,
पर रिश्ता उसे ’अपने-आप’ को मंजूर न था !

फिर वक्त का पहिया कुछ और आगे बढा
गांव की इक बाला से प्यार परवान चढा,
हुए तैयार निभाने को दुनियां की रस्मे
खाई उन्होने संग जीने मरने की कसमें,
गांव की गलीयों मे शहनाई बज उठी थी
विवाह को घर-आंगन मे बेदी सज उठी थी,
फिर तभी बदकिस्मती का सैलाब बह गया
और वह मजनू बेचारा कुंवारा ही रह गया,
क्योंकि रिश्ता गांव की ’खाप’ को मंजूर न था !!

Thursday, September 24, 2009

तुम्हे तो मालूम है कि.....

तुम्हे तो मालूम है कि
समय कितना बलवान होता है
पल-पल, हर घड़ी,
इसलिए तूम भी समय बनो,
और अगर समय नहीं बन सकते,
तो कम से कम घड़ी तो बनो,
वह घड़ी, जो दूसरो को समय बताती है !

तुम्हे तो मालूम है कि
यहाँ इतनी आसान नहीं है
जीवन की डगर ,
तुम किसी की राह बनो,
और अगर राह नहीं बन सकते,
तो कम से कम छडी तो बनो,
वह छडी, जो दूसरो को राह दिखाती है !

तुम्हे तो मालूम है कि
यहाँ रिश्तो की क्या अहमियत है
बंधने के लिए,
तुम किसी का रिश्ता बनो,
और अगर रिश्ता नहीं बन सकते,
तो कम से कम कडी तो बनो,
वह कडी, जो रिश्तो को रिश्तो से निभाती है !

तुम्हे तो मालूम है कि
यहाँ साँसों की डोर की क्या अहमियत है
जिंदा रहने के लिए,
मैं जानता हूँ कि तुम,
किसी की साँसों की डोर नहीं बन सकते,
मगर कम से कम लड़ी तो बनो,
वह लड़ी, जो साँसों की डोर को जीना सिखाती है !

Thursday, September 17, 2009

कशिश !

आज लिखने के लिए कुछ नहीं मिला तो यह छोटी सी नज्म कह लो या गजल , प्रस्तुत है:

इक मोड़ पे लाकर छोड़ दिया,
हमसे क्यों इतने खफा निकले !
कुछ खोट हमारी वफ़ा में था,
जो इस कदर बेवफा निकले !!

हमको तुम पर ऐसा यकीन था,
न छोडोगे ताउम्र साथ हमारा !
बीच राह में छोड़ के जालिम,
खामोश यों इस दफा निकले !!

पहलू में चले थे हम बनने को,
इक खुबसूरत सी गजल तुम्हारी !
इल्म न था कि लिखे जायेंगे जिस
सफे पर हम, टूटा वो सफा निकले!!

हमने तो कर दिया था अपना,
हर इक पल कुर्बान तुम्ही पर !
सोचा न कभी हाशिये पर अपना ,
जीने का यह फलसफा निकले!!

समझ न पाए अब तक हम,
दस्तूर बेरहम जमाने का !
नुकशान निर्दोष के खाते में,
और दोषी का नफा निकले!!

Thursday, September 10, 2009

जब-जब इंसान की मति मारी गई !

सुख-चैन, यश-कीर्ति, मान-मर्यादा सारी गई,
धरा पर जब-जब इंसान की मति मारी गई !
भोग-विलासिता में चूर मत भूल, अरे नादान,
मरणोपरांत मान्धाता की लंगोट भी उतारी गई !!

दौलत के नशे में खो दिया तुमने अपना धैर्य,
छल-कपट की छाँव में पाकर यह सारा ऐश्वर्य !
टिकता नहीं फरेब बहुत दिनों तक, याद रख,
पाप की कमाई यहाँ अक्सर जुए में ही हारी गई !!

जिस दम पर उछल रहे हो अपने आहते में,
हिसाब सब दर्ज हो रहा वहाँ, उसके खाते में !
छुपा नहीं कुछ भी उसकी नजरो में, ध्यान रहे,
हर एक हरकत तुम्हारी उसके द्वारा निहारी गई !!

सुख-चैन, यश-कीर्ति, मान-मर्यादा सारी गई,
धरा पर जब-जब इंसान की मति मारी गई !
भोग-विलासिता में चूर मत भूल, अरे नादान,
मरणोपरांत मान्धाता की लंगोट भी उतारी गई !!

Sunday, September 6, 2009

बेदर्दी तू तो अंबर से है !

गगन से रातों मे जब-जब ,
ये निर्मोही घन बरसे है,
इक विरहा का व्याकुल मन,
पिया मिलन को तरसे है !

गर सूखा जगत तनिक,
रह भी जाता तो क्या नीरद,
तू क्या जाने दुख विरहन का,
बेदर्दी तू तो अंबर से है !!

विराग का दंश सहते-सहते जब,
तेरा मन भर आता है ,
गरज-घुमडकर नीर नयनों का,
यत्र-तत्र बिखेर जाता है !

एक वह है जो थामे अंसुअन,
मूक ममत्व निभाती घर से है,
तू क्या जाने व्यथा विरहा की,
बेदर्दी तू तो अंबर से है !!

पसार अपने आंचल को पूरा,
देती ममता सारे घर को है,
तेरे दामन की छांव तो यहां,
मिलती बस पलभर को है !

लुट्वा सर्वस्व अपना फिर भी,
खाती ठोकर दर-बदर से है,
तू क्या जाने टीस तरुणा की,
बेदर्दी तू तो अंबर से है !!

कभी आकर देख जरा धरा पर,
इक विरहन कैसे जीती है,
दूजे के मुख देकर मुस्कान,
स्व अंसुअन कैसे पीती है !

इक बस यहां अपने देश मे,
सावन तो कहने भर से है,
तू क्या जाने दुख विरहन का,
बेदर्दी तू तो अंबर से है !!

बेदर्दी तू तो अंबर से है !

गगन से रातों मे जब-जब ,
ये निर्मोही घन बरसे है,
इक विरहा का व्याकुल मन,
पिया मिलन को तरसे है !

गर सूखा जगत तनिक,
रह भी जाता तो क्या नीरद,
तू क्या जाने दुख विरहन का,
बेदर्दी तू तो अंबर से है !!

विराग का दंश सहते-सहते जब,
तेरा मन भर आता है ,
गरज-घुमडकर नीर नयनों का,
यत्र-तत्र बिखेर जाता है !

एक वह है जो थामे अंसुअन,
मूक ममत्व निभाती घर से है,
तू क्या जाने व्यथा विरहा की,
बेदर्दी तू तो अंबर से है !!

पसार अपने आंचल को पूरा,
देती ममता सारे घर को है,
तेरे दामन की छांव तो यहां,
मिलती बस पलभर को है !

लुट्वा सर्वस्व अपना फिर भी,
खाती ठोकर दर-बदर से है,
तू क्या जाने टीस तरुणा की,
बेदर्दी तू तो अंबर से है !!

कभी आकर देख जरा धरा पर,
इक विरहन कैसे जीती है,
दूजे के मुख देकर मुस्कान,
स्व अंसुअन कैसे पीती है !

इक बस यहां अपने देश मे,
सावन तो कहने भर से है,
तू क्या जाने दुख विरहन का,
बेदर्दी तू तो अंबर से है !!

Monday, August 24, 2009

जुल्म गुजरने लगे जब हदे लांघकर !

हक़ ना मिल पाए जब तुम्हे मांगकर,
जुल्म गुजरने लगे जब हदे लांघकर !
क्रान्ति का बिगुल फिर बजा दो दोस्तों,
फायदा फिर कुछ नही नेह-स्वांगकर !!

देश गौरव हो या अस्तित्व की लड़ाई,
मुल्को मिल्लत की उसीने शान बढाई !
वीर बनके जाग उठे जो थाम तलवार
हाथ में, और कर दे दुश्मन पे चडाई !!

फंसना न तुम शत्रु की किसी चाल में,
जो चाहा, उसे जीत लो हर हाल में !
फ़तह का स्वाद तुम तभी चख पावोगे,
रोक लो जब शत्रु के वार को ढाल में !!

कायर यहाँ, रोज-रोज मरता ही रहेगा,
जुल्म जाहिलो के सहन करता ही रहेगा !
वीर को भी मरना तो एक बार है ही,
वो फिर क्यों जुल्म अपने ऊपर सहेगा !!

गर तुम बढोगे अपने शत्रु पर फर्लांग भर,
कदम तुम्हारे खुद-व-खुद बढेगे छलाँग भर !
कहते है लोग हिम्मते मर्दा-मदद-ए-खुदा,
कूद पड़ मैदान में, कफन सर पर टांगकर !!

हक़ ना मिल पाए जब तुम्हे मांगकर,
जुल्म गुजरने लगे जब हदे लांघकर !
क्रान्ति का बिगुल फिर बजा दो दोस्तों,
फायदा फिर कुछ नही नेह-स्वांगकर !!

धन्य है लोकतंत्र !

अपने आस-पास की कुछ घटनाओं पर विचार- मग्न था, तो टीवी पर खबरे देखते-देखते मुह से कुछ इस तरह के बोल फूट पड़े :

लोकतंत्र में राजनीति का, यह कैसा गड़बड़ झाला,
जिसे एबीसीडी पता नहीं,वह नेता बन गया साला.....
जाने कितने कत्ल किये और कितना किये घोटाला,
जिसे एबीसीडी पता नहीं, वह नेता बन गया साला.....

जिसका जेब काटना पेशा था, धंधा तोड़ना ताला,
लोकतंत्र का कमाल तो देखो, नेता बन गया साला.....
जेल था जिसका ठौर-ठिकाना, वह आज बना है आला,
लोकतंत्र का कमाल तो देखो, वह ने बन गया साला.....

मालदार आज बड़ा,जो कलतक था दो पैसे का लाला,
मतदाता की कृपा तो देखो, वह नेता बन गया साला ......
कलयुग में झूठे का मुह उजला है,सच्चे का है काला,
जिसे एबीसीडी पता नहीं, वह नेता बन गया साला.....

Friday, August 21, 2009

हुश्न वाले, तनिक हुश्न का अंजाम देख !


तस्वीर पर नजर गई तो एक पुराने शेर के साथ चंद शब्द गुनगुनाये बगैर न रह सका, आपसे अनुरोध है कि आप इसे कृपया अन्यथा न ले :
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(तस्वीर टाइम्स आफ इंडिया के सौजन्य से)

डूबते सूरज को, तू वक्त-ए-शाम देख,
हुश्न वाले, तनिक हुश्न का अंजाम देख !
राहें अनजानी हैं, अनजाना है कारवां,
तू अपनी राह पर मंजिले-मुकाम देख !!

हवा में बिखरी खुशबुओ को वे जब भी,
इस तरह अपनी साँसों में पाते रहेंगे !
फूल पर मंडराते कुछ दिलजले भंवरे ,
बिखरे चमन को, गुलजार बनाते रहेंगे!!

मौसम आये यहाँ कोई भी रंग बनके,
तू जहां के ढंग देख, इल्जाम देख !
डूबते सूरज को तू, वक्त-ए-शाम देख,
हुश्न वाले, तनिक हुश्न का अंजाम देख !!


Wednesday, August 19, 2009

जिन्ना तो जैसे, मक्का हो गया !

इस कलयुग में,कम-से-कम दो का तो,
जन्नत पाना पक्का हो गया,
आज इन राम-भक्तो के लिए,
जिन्ना तो जैसे, मक्का हो गया !

पहले तो खूब जी भरकर,
बस हिंदुत्व का ही राग अलापा,
कन्याकुमारी से कश्मीर तक,
रथ चढ़ के राम का नाम जापा !

चढावे पे हाथ साफ़ कर चुके तो,
जाम रथ का चक्का हो गया,
आज इन राम-भक्तों के लिए,
जिन्ना तो जैसे, मक्का हो गया !

पहले लाल-हरे कृष्ण हो गए थे,
अबके हनुमान कर गया काम,
घर का भेदी ही लंका ढा गया,
अब तेरा क्या होगा, हे राम !

जिसे तराशा सांचे ढाल कर,
खोटा वह टक्का हो गया,
आज इन राम-भक्तों के लिए,
जिन्ना तो जैसे,मक्का हो गया !

Friday, August 14, 2009

सुन लो पुकार, हे कृष्ण !




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हे कान्हा!अब आ भी जाओ, बचा न सब्र कुछ शेष ,
जरुरत महसूस करे तुम्हारी, अरसे से यह देश !

आओ बनकर चाहे तुम ग्वाला, या बन जावो नंदलाला,
देबकीनंदन सुत बनके,लियो चाहे रिझाइ तुम बृजबाला !
बस तुम अब आ भी जावो, धरकर अवतारी भेष,
जरुरत महसूस करे तुम्हारी, अरसे से यह देश !!

कर्म,उपासना अब कष्ट हो गए,ईमान-निष्ठां नष्ट हो गए,
झूठ-फरेब में उलझे सब है, धर्म गुरु भी भ्रष्ट हो गए !
व्यभिचार के दल-दल में डूबे,दरवारी और नरेश,
जरुरत महसूस करे तुम्हारी, अरसे से यह देश !!

संकट में है आज वो धरती, जिसपर तुमने जन्म लिया,
मत भूलो, इसकी रक्षा का, तुमने था इक बचन दिया !
पूरा करो उसे हे कृष्ण! दिया गीता में जो उपदेश,
जरुरत महसूस करे तुम्हारी, अरसे से यह देश !!

हे कान्हा! अब आ भी जाओ, बचा न सब्र कुछ शेष ,
जरुरत महसूस करे तुम्हारी, अरसे से यह देश !


- सभी पाठकों को मेरी तरफ से जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये !

Monday, August 10, 2009

एक हसीं ख्वाब !

अश्रु पीकर मुस्कुराना चाहती है जिन्दगी,
फिजा को छोड़ बहार पाना चाहती है जिन्दगी,
कांटे युं तमाम देह से अबतक निकाल न पाये मगर,
इक फूल का बोझ फिर भी उठाना चाहती है जिन्दगी !

अब तक तो इस दिल की हमने एक न मानी,
ख्वाबों के बीहडों मे ही शकून-ए-खाक छानी,
हरयाली से आछादित किन्ही खुशनुमा वादियों मे,
मधुर प्यार भरा गीत गुनगुनाना चाहती है जिन्दगी !

छोडकर बेदर्द जहां के सारे दर्द-ओ-गम,
इक साज-ए-नुपुर पर ही मुग्ध हो जाये हम,
विरह की पीडा हमे भी मह्सूस होने लगे ऐसे,
उस इन्तजार मे पलके बिछाना चाहती है जिन्दगी !

जहा दर्मियां हमारे कोई और न हो,
जमाने की बन्दिशो का कोई जोर न हो,
गुजार सके पह्लु मे जिसकी कुछ पल चैन से,
चूडी-कंगन से भरा वह सिरहाना चाहती है जिन्दगी !

नोट: किसी रचनाकार(नाम नही मालूम) की एक बहुत पुरानी खुबसूरत गजल “ मेरी तमन्ना” की तर्ज पर मैने यह भाव युवा पीढी के मनोरंजनार्थ लिखे है, इन्हे कृपया अन्यथा न ले !

’अलीबाबा और पांच सौ बयालीस चोर’

न सावन की रिमझिम, न पवन करे शोर
कण-कण मे फैला है, भ्रष्ठाचार चहुं ओर
नित महंगाई, बढती जा रही है घनघोर
जन-जन त्रस्त यहां, छटपटाता हर छोर,
उसपर खजाना लिये बैठ मौज उड़ा रहे,
अलीबाबा और पांच सौ बयालीस चोर !

हवालात मे खूब मौज कर रहे है बन्दी
कोतवाल बिठाये रखे है ये अपने पसन्दी
कचहरी मे छाई है तठस्थ जजो की मन्दी
अन्धा-कानून नाचे इनके आगे जैसे मोर,
उसपर खजाना लिये बैठ मौज उड़ा रहे,
अलीबाबा और पांच सौ बयालीस चोर !

नचा रही है इन सबको, वहां एक हसीना
नाच रहा आज यहां खूब हर एक कमीना
घर-घर पे क्रोस लगाने को बेताव मर्जीना
उडेलना छोड, तेल लगाती इनपर पुरजोर
उसपर खजाना लिये बैठ मौज उड़ा रहे,
अलीबाबा और पांच सौ बयालीस चोर !

मर्जीना का नया फन्डा असरदार निकला
अलीबाबा ही चोरों का सरदार निकला
दल-दल मे डूबा हरइक किरदार निकला
रख दिया जन-मानस को करके झकझोर,
उसपर खजाना लिये बैठ मौज उड़ा रहे,
अलीबाबा और पांच सौ बयालीस चोर !

Tuesday, August 4, 2009

रक्षाबंधन पर !


प्रिय कलयुगी भाइयों (बहनों के) ,
आज रक्षाबंधन है , भाई-बहन के प्यार और पवित्र बंधन का त्यौहार ! जैसा कि आप जानते ही होंगे कि पुराने जमाने में जब लोग वीर होते थे, सतयुगी थे, उस जमाने में वे इस त्यौहार पर बहन को हर हाल में उसकी रक्षा का वचन देते थे ! कहते है कि गहने स्त्री की शोभा होते है, और इसी लिए रक्षा बंधन के दिन भाई लोग अपनी सामर्थ्य के हिसाब से बहनों को उपहार स्वरुप गहने देते थे ! आज आप भी दफ्तर में, बाजार में, सडको पर, घर पर माँ-बहनों को देखते होंगे, खाली गर्दन, कानो पर नकली टोप्स, हाथो में नकली कड़े ! वो इसलिए नहीं कि सोना महंगा हो गया और वे खरीद नहीं सकते, वो सिर्फ इसलिए कि आपका दूसरा कलयुगी भाई झपटमार है (इसीलिए इस कलयुग में भाई के म्याने भी बदल गए, अंडरवल्ड की दुनिया में सबसे शातिर किस्म के बदमाश को भाई कहते है ) चेन के लिए बहन की गर्दन भी काट सकता है! आज शहरों में हमारी ज्यादातर बहने, अपने पैरो पर खड़े होने की कोशिश कर रही है,मगर बुनियादी सुबिधावो के नाम पर हमने उन्हें क्या दिया? अरे ! हम तो जहां-तहां अपनी बेशर्मी की मिशाल प्रस्तुत कर देते है, क्या कभी आपने यह जानने की कोशिश की कि हमारी बहनों के लिए शहर में,बस स्टोप्स के आसपास कितने शौचालय बने हुए है? क्या उन्हें इसकी जरुरत महसूस नहीं होती?


अधफटे लिफाफे के अन्दर,
कागज़ के चंद टुकडो में,
चन्दन-अक्षत की
पुडिया संग लिपटा पडा था....
शहर की मुख्य सड़क किनारे,
कूडेदान के बाहर,
उसे देखते ही लगता था,
मानो किसी ने उसे
बड़े प्यार से सहेजा था !
हवा के झोंको संग
फडफडाता....
मंजिल पे पहुँचने को बेताब,
वह धागा,
शायद कहीं दूर से,
अपने भाई के लिए
किसी बहन ने भेजा था !!

धागे के मध्य में जड़ा
चमकता वह सितारा ,
लिफाफे के उस खुले भाग से,
बाहर झाँकने की कोशिश करता
हर आने-जाने वाले को,
यूँ देखता मानो,
वह शहर,
अभी-अभी जागा है !
उसे नहीं मालूम
कि दुनिया,
कहाँ की कहाँ चली गई,
प्रगति के पथ पर,
जिसमे बहन की आबरू
सड़को पर विखर जाती है ,
वह तो फिर भी
सिर्फ इक धागा है !!

Saturday, August 1, 2009

आँखों की नुमाइश !

काली रात और सावन की,
घनघोर घटा छाई थी...
अरसे बाद आँखों ने,
इक सपनो भरी नींद पाई थी !
मीठी नींद- मीठा स्वप्न,
खण्डित नींद-बुरा स्वप्न...
मीठा और बुरा...
दोनों ही प्रकार मौजूद थे,
कैसे श्रेणी-वद्ध करूँ ?
समझ नहीं पा रहा,
कि सपना जो मैंने देखा,
उसे कौन से में धरूँ ?


कहीं घूम आने की चाह,
मेरे दिल में जगी थी ...
और सुप्त चेतना मुझे
स्वप्न-लोक की,
सैर कराने लगी थी !
मैं जा पहुंचा हरियाली से आच्छांदित,
उस ख़ूबसूरत सी जगह पर...
और पहुंचा आखिर उस मॉल में,
आँखों की नुमाइश लगी थी
जहां, एक बड़े से हाल में !


समूचे जगत की आँखे,
मौजूद थी वहाँ...
और बांधा था,
उन भिन्न प्रकार की आँखों ने,
इक ख़ूबसूरत सा समा !
नीली-भूरी, काली-काली
बड़ी-बड़ी आँखे,छोटी-छोटी आँखे....
झील सी गहरी मोटी-मोटी आँखे !


मैं बस डूबता ही जा रहा था,
गहराइयों में,
उन प्यारी-प्यारी आँखों की...
कि तभी ठिठककर,
रुक गया, देखकर कोने में...
एक कुटारी आँखों की !
भिन्न तरह की कुछ आँखे....
सफ़ेद घूँघट के बीच...
बिलखती और रोती,
धोती के आँचल को भिगोती !
उस गीले आँचल को देख,
मैं सोच रहा था, कि...
शायद इन आँखों का,
दिल बहुत रोया है,
देश-हित के नाम पर,
अभी-अभी शायद इन्होने,
कोई अपना सगा खोया है !

कुछ और आँखे जो,
बदरंग पैंट-कमीज में लिपटी,
अलसाई और सोती हुई...
बयाँ कर रही ,
कार्यपालिका की खूबी थी,
और कुछ,
सफ़ेद खादी एवं कोट-टाई के बीच,
पडी मदमस्त,
मद्य-भाव में डूबी थी !
नीचे लिखा था;
'मेड इन इंडिया' यह सब देख...
सूख रही थी जान,
उसके भी नीचे
किसी मसखरे से सैलानी ने...
एक और चिप्पी चेप दी थी,
लिखा था, 'मेरा भारत महान' !

Friday, July 31, 2009

अहमियत-ए-प्यार !


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लौट आये पहलू में फिर से, उनके पुचकारने के बाद,
जाते भी और कहाँ भला हम, थक हारने के बाद !
प्यार की अहमियत तनिक उस ग़मख़्वार से पूछो,
मुहब्बत नसीब हो जिसे ढेरो, झक मारने के बाद !!

साहिल पे बैठ वो थामकर हाथो में चप्पू घुमाते रहे,
हमारे प्यार की कश्ती को भंवर में उतारने के बाद !
मै भला कैसे कोई हसीं ख्वाब दिल में सजा पाता,
सब्ज़ बाग़ दिखाया भी गया,मगर दुत्कारने के बाद !!

चमन-बहारों की चाह में गर्दिशों की खाक हमने छानी,
खाली हाथ लौट आये,वक्त-ए-तूफां में गुजारने के बाद !
अब तो यही कह उनका सुबह-शाम शुक्रगुजार करते है,
कि आप ही घर लौटा लाये है हमें, सुधारने के बाद !!

हाल-ए-वक्त उन पर न्योछावर कर दी सारी हसरतें,
जाम उल्फ़त पिलाये रहे गफ़लत से उबारने के बाद!
प्यार की अहमियत तनिक उस ग़मख़्वार से पूछो,
मुहब्बत नसीब हो जिसे ढेरो, झक मारने के बाद !!

Tuesday, July 28, 2009

इन्द्रदेव मेहरबान हुए भी तो...!



आसमां ने भी दिखा दिया,
अपने इन्द्रदेव क्या हस्ती है !
झमाझम बरसात हो रही,
हर तरफ सावन की मस्ती है !

पानी-पानी हो गई राजधानी,
बारिश की चर्चा हर एक ज़ुबानी !
जहां चलती थी कारे कल तक,
आज चल रही कश्ती है !

एक दिन में ये हाल हो गया,
हर बाशिंदा बेहाल हो गया !
कीचड के सैलाब में घिरकर,
डूबी सारी की सारी बस्ती है !

अब रुकती बारिश दिन-रैन नहीं,
इंसान को कहीं भी चैन नहीं !
कलतक बिनबारिश जीवन महंगा था,
अब मौत हो गई सस्ती है !

Friday, July 24, 2009

चलो, इक नया उल्फ़त का तराना ढूंढ लाते है !


आओ चले, हम भी इक नया उल्फ़त का तराना ढूंढ लाते है,
रिमझिम की ठंडी फुहारों में, मौसम वो पुराना ढूंढ लाते है !

बेचैन हर वक्त किये रहती है अब तो, ये दिल की हसरत,
कहीं दूर इसके निकलने का, उम्दा सा बहाना ढूंढ लाते है !

धुंधला गए, लिखे थे जो मुहब्बत के चंद अल्फाज हमने,
दिलों पर लिखने को फिर इक नया अफसाना ढूंढ लाते है !

हमारी जिन्दगी का हर लम्हा यूँ तो एक खुली किताब है,
खामोशियों में भी जो हकीकत लगे ऐसा फसाना ढूंढ लाते है !

दिल खोल के खर्च करने पर भी जो ख़त्म न हो ताउम्र,
समर्पण का कुछ ऐसा ही अनमोल, खज़ाना ढूंढ लाते है !

बैठ तेरी जुल्फों की घनेरी छाँव तले, फुरसत के कुछ पल,
गुजर सके जहाँ सकूँ से वह महफूज, ठिकाना ढूंढ लाते है !

Wednesday, July 22, 2009

सूरज चाँद से मिला !



आज तडके,
दूर गगन में,
एक अरसे के बाद,
फुरसत से,
सूरज अपनी महबूबा,
चाँद से मिला,
और कुछ पलों तक
दोनों एक दूसरे को
निहारते रहे, जी भर के !

भले ही उनका
यह मधुर मिलन,
देखने वालो को,
खूब भा गया !
मगर सोचता हूँ कि,
वो मिले तो आसमां में थे,
फिर धरा पर क्यों,
अँधेरा छा गया ?

फिर सोचता हूँ कि हो न हो,
ये आशिक अभी भी
पुराने ख्यालातों के है,
इनपर अभी तक,
पश्चिम का जादू नहीं चला !
वरना इसतरह,
रोशनी बुझाकर क्यों
अँधेरे मे एक दूसरे को,
प्यार करते भला ?

Tuesday, July 21, 2009

आज एक आम आदमी रोता है !

लोकतंत्र की खटिया पर जहां हर नेता,
भ्रष्टाचार की चादर ओढ़ के सोता है !
सवा सौ करोड़ के इस बीहड़ में यारो,
आज एक आम आदमी रोता है !

कर्तव्य गौण, हुआ प्रमुख आसन,
निकम्मा, सुप्त पडा वृथा-प्रशासन !
लाज बचाती फिर रही द्रोपदी,
चीर हर रहा हरतरफ दुश्शासन !

धोये जिसने पग मर्यादा पुरुषोतम के ,
वही केवट अब दुष्ट-धूमिल पग धोता है !
सवा सौ करोड़ के इस बीहड़ में यारो,
आज एक आम आदमी रोता है !

चुनाव बन गया इक गड़बड़झाला,
परिवारवाद का बढ़ गया बोलबाला !
न्याय माँगता फिर रहा है दुर्बल,
फरियाद न यहाँ कोई सुनने वाला !

ओंट में वातानुकूलन की, अलसाया अफसर
घोटाले की परिक्रामी कुर्सी पर पसरा होता है !
सवा सौ करोड़ के इस बीहड़ में यारो,
आज एक आम आदमी रोता है !

कभी मुद्रास्फिती, तो कभी रिशेसन,
इसी अर्थशास्त्र में फंसा है जन-जन !
खाद्यानों के आसमान छूं रहे दाम है,
यूँ कहने को देश में है मुद्रासंकुचन !

जहां सब कुछ मंहगा, मौत है सस्ती,
गरीब अपनी लाश काँधे पे रखकर ढोता है !
सवा सौ करोड़ के इस बीहड़ में यारो,
आज एक आम आदमी रोता है !

शर्मशार हो गई पतित नैतिकता,
शरमो-हया को खा गई नग्नता !
संस्कृति नाच रही आज पबो में,
सभ्यता बन गई समलैंगिकता !

हँसते-रोते गुजरे जो अपनों के संग ,
वह बचपन अब मदमस्त नशे में खोता है !
सवा सौ करोड़ के इस बीहड़ में यारो,
एक अकेला आम आदमी रोता है !
-पी.सी. गोदियाल

Saturday, July 18, 2009

मत भूल तू चूडी है !

इतरा न ढलते योवन पर,
हो गई अब तू बूढी है !
ढबका लगा नहीं कि टूट गई,
अरे मत भूल तू चूड़ी है !

अरे मत भूल तू चूडी है,
यह चूडी से कहे कंगना !
खनक जितना खनकना है,
फिरे बाजार या बैठ अंगना !!

क्यों भरमाये भरम रही तू,
कांच के सांचे ढली हुई है !
नीलम-पुखराज जड़े मुझमें,
तू इर्ष्या से क्यों जली हुई है ?

यहाँ हर वह जो चमकता है,
वह सोना नहीं होता है!
साथ ही रहते हम तुम दोनों,
पर हममे फर्क यही होता है !!

इक दिन टूटकर बिखरना है,
मैं कंगन फिर भी हाथ रहूंगा !
कल नई चुडियाँ खनकेगी,
और मैं उनके साथ रहूंगा !!

संवरले आज भले ही जितना,
श्रृंगार कोई वजन नही रखती !
तू चूडी है,सदा चूडी ही रहेगी,
कभी कंगन नही बन सकती !!

होमगार्ड !

पिछले सात सालो से,
वह होमगार्ड था,
महानगरी की सडको पर
कहीं सरपट भागते
और कहीं पर,
कछ्वे की चाल चलते
यातायात का,
मुसलाधार बारिश में भीगकर,
चिलचिलाती हुई धूप में तपकर
वह अपने गंतव्य को
जाने वालो के लिए,
रास्ता मुहैया करवाता था !

अपना कर्तव्य निभाते
दिनभर के थके-हारे
को कल शाम,
एक तेज रफ़्तार कार ने
चौराहे पर ही
मौत की नींद सुला दिया,
और आज
सूर्य निकलते ही,
वह होमगार्ड का जवान,
नींद में ही,
कुछ अपनों के कंधो का
सहारा लेकर,
निकल पडा था अपने
अंतिम पडाव की ओर,

अभागे की किस्मत और,
आधुनिकता की
ड्राइविंग सीट बैठे
मानव की खुदगर्जी देखो,
जिनके लिए वह कल तक
चलने को रास्ता बनाता था,
उन्ही ने उसे
पूरे आधे घंटे तक
सड़क पार नही करने दी,
यह जानते हुए भी कि
अब केवल आख़िरी बार उसे,
सड़क के उस पार
जाना है !!

किसलिए ?

हो रहा असहिष्णुता का उद्भव,दिल में हमारे किसलिए,
उदर में लिए नित फिर रहा, विद्वेष प्यारे किसलिए ?

खुद ही नजरो से छुपाता फिर रहा प्रेम एवं सत्यनिष्ठा,
हर तरफ झूठ पर पैबंद लगाकर, ढेर सारे किसलिए ?

कल तक जो थे आदर्श और प्रेरणास्रोत हमारी राह के ,
बनकर हमारे बीच ही रह गए,अब वो बेचारे किसलिए ?

हर डूबते को दिया जिसने तिनके का कल तक सहारा,
आज अपनों बीच रहकर हो गए,वो बेसहारे किसलिए ?

खुदगर्जी की हद ने हमें , नींद से महरूम कर दिया,
लगाते फिर रहे अंधेरो को गले,तजके उजारे किसलिए ?

Thursday, July 16, 2009

आया फिर सावन है !

बजने लगी है घंटियाँ और जल उठे
अनेको दीप पावन !
घुमड़-घुमड़कर,कही थका-थका सा,
आ गया फिर सावन ! !

दिशा-दिशा से सुनकर लोगो की
रहम की करुणामई गुजारिश !
तरस खा इन्द्रदेव ने कर दी
कही थोड़ी,कही अधिक बारिश !!

जहां कल तक थी कलियाँ मुरझाई
वहाँ आ गई है रुत सुहानी !
गली-कूचे,खेत-खलिहान,हरतरफ
दीख रहा बस बारिश का पानी !!

फूट पड़ने को बेचैन सोचता है
दूर पहाडी ढलान पर एक सोता ,
कि काश इस सुहानी घड़ी में
मेढकी ने गीत कोई गुनगुनाया होता !!

Wednesday, June 24, 2009

घंटा मिलेगा !

पैदा हुआ तो,
पंडत ने पिता से पूछा,
इसकी जन्मकुंडली बनाकर पूजनी है ,
क्या इस हेतु घंटा मिलेगा ?

तीन साल का हुआ तो,
पिता ने मंदिर चलने को कहा,
मैंने कौतुहल से पूछा कि वहाँ क्या मिलेगा?
पापा बोले, बेटा वहाँ पर घंटा मिलेगा !

पांच का हुआ तो,
पिता ने स्कूल चलने को कहा,
मैंने कौतुहल से पूछा कि वहाँ क्या मिलेगा?
पापा बोले, बेटा वहाँ पर भी घंटा मिलेगा !

दाखिले बाद स्कूल जाने को हुआ तो,
पिता ने कहा मन लगा कर पढ़ना,
मैंने फिर कौतुहल से पूछा, पढ़कर क्या मिलेगा?
पापा बोले, बेटा पढ़ के घंटा मिलेगा !

शादी के लायक हुआ तो,
पिता ने दूल्हा बनने को कहा,
मैंने फिर कौतुहल से पूछा, शादी से क्या मिलेगा?
पापा बोले,बेटा शादी से घंटा मिलेगा !

गृहस्थ जीवन में प्रवेश हुआ तो,
नवेली दुल्हन से मैंने कहा,
जानेमन आज नाश्ते में क्या मिलेगा ?
वह मुस्कुराई, अंगूठा दिखाया और चली गई !

आखिर में रिटायर हुआ तो,
बेटे ने वृधाश्रम लेजाकर छोड़ दिया
मैंने प्रश्नवाचक नजरो से उसे निहारा तो
वह बस हाथ में पकडा गया, बोला कुछ नहीं !

Friday, June 19, 2009

मैं गजल समझ के गा गया !

महफिल में फनकारों का दिल पर,
कुछ रोब ऐसा छा गया,
लिखी तो वह इक नज्म थी,
पर मैं गजल समझ के गा गया !

मुखड़े व अंतरे के संग जाने कब,
नज्म के मिसरे गुम हुए,
बीच नग्मों की बौछार दिल को,
इस कदर कोई भा गया !

इजहार करने का ढंग अपना,
इतना रवायती का शिकार है,
बसाते ही तस्वीर नजरो में,
कोई कहर जिगर पे ढा गया!

कहने को यू तो बातो के सैलाब,
लिए फिरते थे हम सीने में,
मिले जब तो,ओंठ कंपकपाते रह गए,
और मैं खुद में ही समा गया!

निहारते ही रहे बस टुकुर-टुकुर,
जुबाँ से कुछ न कह सका,
ढूंढते फिर रहे हम तो सकून थे,
कमवक्त नींद ही उड़ा गया!
-गोदियाल

Wednesday, June 17, 2009

सवाल !

उलझने बख्श देंगी गर कभी हमें तो सोचेंगे,
कि हम क्यों कर भला इस जमाने में आये थे !
था वो दर्द ऐसा कौन सा बिनाह पे जिसकी,
मंद-मंद ही सही, हम पलभर को मुस्कुराए थे !!

मुद्दते हो गई अब तो शराब के घूँट पिए हुए,
क्यों अश्को के ही जाम मयखाने छलकाए थे !
काँटों की सेज पर डाले हार अपनी बाहों का,
संग किन ख्वाबो के हम,खुद में ही समाये थे !!

क्यों अंधेरो में ही कटा सफ़र अबतक हमारा,
किसलिए न राह में चिराग,किसी ने जलाए थे !
था वो दर्द ऐसा कौन सा बिनाह पे जिसकी,
मंद-मंद ही सही, हम पलभर को मुस्कुराए थे !!

Monday, June 8, 2009

नही मालूम !

मुझे नही मालूम,
लोगो का यह कहना कहां
तक सही है कि
मुझे सिर्फ़ मेरी,
कोई होने वाली
मह्बूबा ही सुधार पायेगी,
मेरी खुद की सोच,
जो बैठी है कहीं
आसमान की बुलंदी पर
वही उसे सलीखे से किसी रोज,
इस धरा पर उतार पायेगी,

नही मालूम,
लोगो का यह सोचना
कहां तक उचित है कि
मेरी बिगडी हुई किस्मत,
मेरी मह्बूबा ही संवार पायेगी,
बहारों के काफिले
जो अब निकल जाते है
घर के आगे से
उसके आने के बाद थोडी खुसी,
मेरे दर पे भी पधार पायेगी,

नही मालूम कि
लोगो का यह देखना
कितना सटीक है कि
मेरे इस गुस्सैल स्वभाव को,
मेरी मह्बूबा ही दुलार पायेगी,
मुझे तो बस इतना मालूम है
कि साहित्य मे रुचि वाली हुई
तो, मेरी कवितायें पढके
अपना वक्त,
मजे से गुजार पायेगी !!

Saturday, June 6, 2009

आखिर कब तक ?

तन्हाइयों संग ये जिन्दगी, यूँ ही कब तक चलती रहेगी,
इस घर में कब तक, आपकी गैर-मौजूदगी खलती रहेगी !
बहारें कहती है, बिन तुम्हारे वे भी न आयेगी चमन में,
आखिर कब तक जीवन लौ, यूँ स्नेह बिन जलती रहेगी !!

क्यूँ कर सताए है हमको हरदम, आपकी अनकही बाते,
यादों के पुरिंदे में कब तक, सुनहरी शामे ढलती रहेगी !
कहने को बहुत है मगर, कहे किससे अपना हाल-ए-दिल,
कब तक घुट-घुटके हमारी हस्ती,खाक में मिलती रहेगी !!

चले भी आओ इस जिन्दगी के अँधेरे को रोशन करने
वरना जीवनभर हमको, कमी तुम्हारी खलती रहेगी !
खुशिया और गम सब तुम्ही से, इन्तजार भी तुम्हारा है
तुम्हे पाने की ख्वाइश यूँही, दिल में सदा मचलती रहेगी !!

Wednesday, May 27, 2009

हर बात से इत्तेफाक रखते है !

संग अपने हर वक्त अपनी बेगुनाही की ख़ाक रखते है !
ये सच है कि हम आपकी हर बात से इत्तेफाक रखते है !!

यूँ मुश्किल न था कुछ भी हमें, बेशर्मी की हद को लांघना !
ख्याल आपका आता है कि हम भी इक नाक रखते है !!

तरह आपकी हमने दर्द को पलकों में छुपाये नहीं रखा !
और न नजरो में अपनी हम कोई बला–ए–ताक रखते है !!

फ़ेंक दो निकाल गर दिल में है कोई बुरा ख़याल आपके !
जख्म-ए-जिगर में हम न कोई इरादा नापाक रखते है!!

लिख देना इसपर जब भी जी करे लिखने को कोई नज्म !
दिल श्याम-पट्ट है,जेब में हर वक्त हम चाक रखते है!!

Tuesday, May 19, 2009

निट्ठले बैठे थे जो...

सुना है कि बेनमाजी भी नमाजी बन गए है ।
निट्ठले बैठे थे जो, वो कामकाजी बन गए है।।

अपना वो खौफनाक असली चेहरा छुपाने को,
दाड़ी रखकर मिंयाँ घोटा हाजी बन गए है ।
अदाई की रस्म खुद तो निभानी आती नहीं,
और जनाव इस शहर के काजी बन गए है।।

यों तो लोगो को सिखाते फिर रहे हैं कि
ख़ुदा नाफरमान की हिमायत नहीं करता।
पर जब खुद फरमान बरदारी की बात आई,
शराफत को त्याग, दगाबाजी बन गए है।।

भोग-स्वार्थ के लिए आप तो रूदिवादिता व
असामाजिकता के दल-दल में धंसे रहते है।
हक़ की बात पर उनके लिए औरतों के

Friday, May 15, 2009

वो क्या था ?

दो बूँद गिर थे जब ,
छिटककर दूर आँखों से,
चट कर गया,
शायद वह टुकडा जमीं का बंजर था !

मिलने पडा जो ख़ाक में,
दूर दरख्त की छाव तले,
हुस्न से होकर रुखसत ,
दास्ताँ-ऐ-इश्क का अस्थिपंजर था!

घुट-घुट कर दम तोडा जिसने,
अभी कुछ पल दूर,
कोई नहीं वाकिफ कि
वह कितना भयावह मंजर था !

फूल उछलते देखा था सबने,
एक गुलाब के सा,
घाव मगर कुछ ऐसे दे गया,
फूल नही, वह कोई खंजर था !

देश अपना -लोग पराये !

बड़े बेमन से छोड़कर हम,प्यारा सा वो मुल्क अपना
लेकर चंद ख्वाईसे,तेरे अजनबी इस शहर में आये थे ,
बीच राह,मुसाफिरों की भीड़ में,बिखर गए सब अरमां
बेशक वतन तो अपना था,मगर यहाँ लोग पराये थे !


यूँ मंजूर न था दूर होना, अपने सुन्दर उस अंचल से
मगर कर भी क्या सकते थे, हम हालात के सताये थे,
मैं अकेला चला था,न कोई साथ आया, न कारवां बना
कहने को तो हम भी, आधे-अधूरे ही घर से आये थे !


भीड़ ही भीड़ थी यहाँ क़यामत की, हर कूंचा, हर गली
पर घर एकाकी था, व संग चलने को खुद के साये थे
ढूँढने निकले जिस घर में अपना एक मीत उत्तराँचल से
ठोकर लगी, तो जाना कि वो घर दुश्मन के बसाये थे !


जब आये भी जो कोई यहाँ, बनने को हमदर्द हमारे
गुलाब के फूलों संग छुपाके,वो खंजर भी लाये थे
जिन्दगी बन के रह गयी, इक दर्द भरा मंजर जहाँ,
देश तो अपना ही था, मगर यहाँ लोग पराये थे !

Wednesday, May 13, 2009

खत्म हुआ महाकुम्भ

गोटी फिट कर रहे फिर से, राजनीति के खिलाडी,
दुविधा मे पडे है सबके सब, धुरन्दर और अनाडी,

सोच रहे इस महापर्व मे वो, परमपरागत मतदाता,
खुदा जाने उन पर कौन सा जुल्म, ढा गये होंगे !
पता नही कितने नेता, जो कल तक केन्द्र मे थे,
आज फिर से अचानक, हाशिए पर आ गये होंगे !!

सड्को पर फिर एक बार, खूब रोई आचारसंहिता,
सभी ग्रन्थ असहाय दिखे, क्या कुरान, क्या गीता,

सार्वजनिक मंचो पर अभद्रता ने, खूब जल्वे विखेरे,
विकास स्तब्ध, जाति-धर्म, ऊंच-नीच ही छा गये !
दिल्ली के संगम घाट पर, लोकतन्त्र के महाकुम्भ मे
एक बार फिर, जाने कितने और, पापी नहा गये ?????

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आज देश रोता है !

घी में गाय की चर्बी,
दूध में यूरिया,
अनाज में कंकड़,
मसालों में बुरादा,
सब्जी में रसायन,
दालो पर रंग !

और तो और,
जिसकी सर-जमीं पर,
सरकार ही मिलावटी है,
तो अब रोओ-हंसो,
जीना इन्ही संग !!

मिलावट और बनावटीपन
का युग है
अपने चरम पर पहुंचा
कलयुग है
आज सराफत की पट्टी
अल्कैदा लिए है !

उसे रोना ही होगा
अपनी किस्मत पर,
क्योंकि आजादी के बाद
उसकी माटी ने,
इंसान ही सारे मिलावटी
पैदा किये है !!

Friday, May 8, 2009

दृड़ संदेश

देश में राजनीति के अखाडे का,
महा कुम्भ खत्म हुआ समझो,
मगर अब ध्यान से सुनलें,
जिन्हे जिताया है वो,

सनद रहे कि सबका है,
तुम्हारे ही बाप का नही यह देश,
और इसे धमकी न समझना,
समझो मतदाता का दृड़ सन्देश,

इसलिये चाबी सौंपी है तुम्हे,
कि चलाना राज जरा देखभाल के,
वरना अबके जूता मैने भी रख दिया
एक,तरतीब से संभाल के !

अब तक के सब नाकाम रहे,
किन्तु मेरा वाला न चूकेगा,
तुम्हारे सिर पर वार करेगा,
और मुह पर थूकेगा,

फर्ज के प्रति जबाबदेह बनोगे,
काम मे पारदर्शिता लावोगे,
देश खुशहाल गर बनेगा,
तभी खुद को खुशहाल पावोगे

मत बनाना मोहरा जनता को,
अपनी किसी शतरंज की चाल के,
वरना अबके जूता मैने भी रख दिया
एक,तरतीब से संभाल के !

Wednesday, May 6, 2009

महिमा-मंडन,जूते बनाने वाले का !

हो तेरा भला रहे तू हट्टा-कठ्ठा
साख पर कभी न लगे तेरी बट्टा,
सरेआम न कोई तेरी पगडी उछाले
क्या अदभुत अस्त्र है बनाया तूने ,
शाबाश रे जूता बनाने वाले !

डराते थे,जो कल तक बड़े-बड़े शस्त्र से
डरते है वो भी आज इस अमेध अस्त्र से
इन्द्रचक्र,सौरचक्र सभी फीके कर डाले,
क्या अदभुत अस्त्र है बनाया तूने ,
शाबाश रे जूता बनाने वाले !


नेता अब जूते से डरने लगे,
रहते है सब कुम्भकरण जगे-जगे,
पत्रकार सम्मलेन में भी पड़ गए लाले,
क्या अदभुत अस्त्र है बनाया तूने ,
शाबाश रे जूता बनाने वाले !

प्रत्याशी के हाथ में चुनाव का पर्चा है
हर जुबां पर तुम्हारी ही चर्चा है,
फूल वालो की दूकान पर पड़ गए ताले,
क्या अदभुत अस्त्र है बनाया तूने ,
शाबाश रे जूता बनाने वाले !