Tuesday, October 25, 2011

यथास्थिति !

एक मरियल सा माली है, बगिया में बदहाली है,
दस्यु सुन्दरी नचा रही, वादक गुंडा और मवाली है !
दरोगा घर भर-भर रहा,चोर तिजोरी साफ़ कर रहा ,
निष्कपट बैठा लुटा-पिटा, कपटी के घर दीवाली है !
शठता की चकाचौंध में नेकता,नैन-दृष्ठि खो बैठी है,
सावन के अंधे की मति में, हरयाली ही हरियाली है !
सबल बेख़ौफ़ होकर इतराए,दुर्बल को क़ानून डराए,
भैंस हांक ले वही जा रहा अब, जो यहाँ बलशाली है !
न्याय नित पैंतरे बदलता,छानबीन का नाटक चलता,
दाल में काला क्या ढूढें , जब पूरी दाल ही काली है !!





आपको दीपावली की हार्दिक शुभ-कामनाएं !