Wednesday, June 2, 2010

दो जून की रोटी !

सुबह जागा
तो अचानक याद आया,
वो पहली मुलाकात,

दो जून याद आया,
जब तुम आई थी, मेरी कुटी पे,
चंचल, झील से दो नयना,
चेहरे पे वो कातिलाना मुस्कराहट लिए,
मैंने भी संकुचाते हुए पूछा था

जब तुम्हारा नाम ,
कुछ बलखाते ,

कुछ शर्माते हुए तुमने
अपना नाम बता भी दिया था !

सुनकर, पता नहीं अनगिनत कितने
लड्डू फूटे थे मेरे मन के अन्दर ,
फिर मैंने दूसरा सवाल दागा था
कि रहती कहाँ हो ?
कितने इत्मीनान से तुमने
घर तक पहुँचने के सारे दिशा-निर्देश
एक-एक कर मुझे समझाए थे,
और घर का पता भी दिया था !!

याद है तुम्हे ,
उस वक्त मैं चूल्हे पर,
अदगुंदे गीले आटे से बनी
रोटियाँ सेकने में लगा था ,
वो ईंट मिटटी के चूल्हे पर
धूं-धूं कर जलती लकडिया,
माथे पर छलकता पसीना ,
पीतल की परात पर गुंदा आटा,
और वो चूल्हे पर रखा तौवा काला !
जब देखो,
जला-भुना बैठा रहता है ताक में,
कैसे अपनी रोटियाँ सेकूं ,
बस इसी फिराक में,
सोचता हूँ कि इंसान भी कितना
स्वार्थी और कमीना होता है साला !!

मैं उस भट्टी का
एक अकुशल श्रमिक,
तुमने देखकर तुरंत ही भाप लिया था,
और कहा था,
हटो लाओ, मैं बना देती हूँ ,
और फिर तुम्हारे हुनर को मैं
एकटक निहारता रहा था,
वो वक्त, वो खुशनुमा हसीन लम्हें,
मुझसे भूलते नहीं भुलाए !
अरसा बीता,
वो नरम, मुलायम,
तुम्हारे हाथ की बनी,
दो जून की रोटी खाए !!

26 comments:

दिलीप said...

waah sahi hai sir 2 june aur do joon...sundar ati sundar

मिलकर रहिए said...

कुडि़यों से चिकने आपके गाल लाल हैं सर और भोली आपकी मूरत है http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/06/blog-post.html जूनियर ब्‍लोगर ऐसोसिएशन को बनने से पहले ही सेलीब्रेट करने की खुशी में नीशू तिवारी सर के दाहिने हाथ मिथिलेश दुबे सर को समर्पित कविता का आनंद लीजिए।

kunwarji's said...

क्यूँ रुला दिया जी हम जैसे घर से दूर रहने वालो किरायेदारो को....

कुंवर जी,

अरुणेश मिश्र said...

अति सामयिक ।
प्रशंसनीय रचना ।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

सिर्फ वाह.. फिर वाह-वाह-वाह-वाह .......

सुलभ § Sulabh said...

चलिए आपको तो नसीब हुई दो जून की रोटी.

बढ़िया संस्मरणात्मक कविता.

माधव said...

down to earth and pragmatic post

शिवम् मिश्रा said...

बहुत खूब !

वन्दना said...

वाह...........भावो को बहुत ही खूबसूरती से सन्जोया है.

arvind said...

vaah....2 june ko do joon se acchaa tuk milaayaa,.....is jun mahine me to aap kamaal kar rahe hain...ashaa hai is pure mahine aapki rachnaaye pahle se bhi behtar milegii.

SANJEEV RANA said...

गोदियाल साहब हम तो एक अरसे से बाहर ही रह रहे हैं .
यहाँ तो आलम यह हैं की आंटी के यहां जो पकता हैं खा लेते हैं .

वरना फिर वोही जंक फ़ूड जिन्दाबाद

Mahak said...

वाह...........भावो को बहुत ही खूबसूरती से सन्जोया है.

M VERMA said...

भावों को बहुत खूबसूरती से पिरोया है
बहुत सुन्दर

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सचमुच दिल को छू गयी दो जून की रोटी।

--------
क्या आप जवान रहना चाहते हैं?
ढ़ाक कहो टेसू कहो या फिर कहो पलाश...

राजेन्द्र मीणा said...

बहुत खूब ,सुन्दर रचना !

सुनील दत्त said...

चंचल रचना

मो सम कौन ? said...

वाह गोदियाल जी, ऐसी दो जून की रोटी सारी उम्र की भूख मिटा देगी। या फ़िर भूख बढ़ा देगी?
बहुत अच्छी लगी आपकी ये कविता। बधाई।

राजकुमार सोनी said...

दो जून को लिखी गई यह कविता केवल दो जून को नहीं पढ़ी जाएगी। यह एक कालजयी रचना है जिसका महत्व सदियो तक कायम रहना है। बहुत-बहुत बधाई आपको।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरती से दो जून और दो जून की रोटी का तारतम्य मिलाया है......भावनापूर्ण रचना .

pallavi trivedi said...

bahut badhiya likha hai...

सूर्यकान्त गुप्ता said...

हम कल सोच ही रहे थे लिखते समय "कम से कम किसानो को तो मिलेगी रोटी एक जून" कि हमने एक जून को क्यों लिखा। दो जून को क्यों नही और पाया आखिर मे यहां लिखी एक अच्छी रचना। बहुत सुन्दर! आभार्।

दीपक 'मशाल' said...

यादों को दिया कविता का रूप.. सुन्दर प्रतिरूप..

प्रवीण शाह said...

.
.
.
बहुत-बहुत शुक्रिया आपका...

आके साथ-साथ हम भी चख लिये...

दो जून की रोटी !

संजय भास्कर said...

deri se aane ki mafi chaunga...

संजय भास्कर said...

बहुत अच्छी लगी आपकी ये कविता। बधाई।

शरद कोकास said...

2 जून और दो जून का यह कितना अद्भुत सन्योग है ।