Friday, June 11, 2010

समीप तेरे मकान खोल दी मैंने


तेरे लिए मेरी जाँ खोल दी मैंने,
इक दर्द की दुकाँ खोल दी मैंने !
गम देकर बदले में खुशी ले जाना,
समीप तेरे मकाँ खोल दी मैंने !!
खरी है ज़ुबानी धोखा न बेईमानी,
सरे राह-ऐ-इमाँ खोल दी मैंने !
मुनाफ़ा जो भी हो सब तुम्हारा है,
अपने लिए नुकसाँ खोल दी मैंने !!
जुबाँ पर मेरे गर यकीं हो तुम्हे,
भरोंसे की अब खदां खोल दी मैंने !
प्यार तुम्हारे लिए रखा बेपनाह,
प्रेम-रसद बेइंतहां खोल दी मैंने !!

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