Saturday, September 18, 2010

जिन्दगी तू मुझे न थाम पायेगी !







मेरे दिल की हसरत जब, कोई मुकाम पायेगी,
सच कहता हूँ जिन्दगी, तु मुझे न थाम पायेगी।

बेवफ़ा मुसाफ़िर हूँ, चल दूंगा यूंही संग छोड्कर,
किसी मोड पर खुद को तू ही,  तमाम पायेगी॥

सरे महफिल उठ लूंगा  जब, मैं तेरे मयखाने से,
हाथ अपने साकी, खाली खाली सा जाम पायेगी।

यूं तो क़दमों को  अबतक अपने संभाले  रखा हूँ,
लडखडा गए पग जिसदिन, बहुत बदनाम पायेगी॥

नेकियों के बदले मिली, हमें तो ठोकरें ही सदा,
इनायतों के बदले तू भी कहाँ, कोई इनाम पायेगी।

संग चलने की तेरे, कोशिशे तो भरसक है 'परचेत' ,
संशय उस रोज का है, जब कभी नाकाम पायेगी॥








अनुभव !

कमवक्त दिल ने तो
ताउम्र,एक ही बार,
बस एक ही
चाहत माँगी थी,
इश्क का भूत
कहीं दिल में जगा।
ट्विटर पर
ट्विट्ट करते-करते
इक हसीना से जा लगा॥

वो मुझसे करती
खूब ट्वीट थी,
बाते भी उसकी
बड़ी स्वीट थी।
जब रहा न गया
तो लिख भेजा कि
ऐ हुस्न की मल्लिका!
हम तुम्हारे चेहरे का
दीदार करना चाहेंगे,
कोई उपाय बताइये ?
जबाब आया,
जनाब "फेसबुक"पर आइये॥
बस,आज की
संचार तकनीकी को कोसते हुए
दिल मसलकर रह गए!!

वक्त-वक्त की बात !

उपवन के एक सिरे पर
एक खिलता गुलाब,
यौवन से लबालब
चेहरे की रौनक संग,
मध्-भरी आँखों से
आईने को घूरते हुए
दर्पण में उभरे
अपने अक्स को
छेड़ते हुए कहता है
अरे अक्स रे,
मुझे प्रेम-रोग हो गया !

दूसरे छोर पर,
हाथों में कुछ थामे
ढलती शाम के
बुझे-बुझे से नयनों को
सूरज की ओर उठाते हुए
एक मुरझाया सा फूल,
चिंतित मन से पूछता है,
हे अक्स-रे,
मुझे कौन सा रोग हो गया ?
अक्स-रे कहे भी तो क्या ?
वो डाक्टर तो था नहीं !!

Friday, September 10, 2010

तकदीर से आजमाइश थी!

थे बादल घनेरे,
तो हुई बहुत तेज बारिश थी,
थी दिल में कसक,

तो लवो पे सिफारिश थी!

शामें उल्फत भरी थी,
कोई तन्हा न रह जाए ,
कोई मायूस न हो,
यही मन की गुजारिश थी!!

चाहता अगर रात
बसर कर देता मयखाने में,
न तमन्ना थी ऐसी,
और न कोई ख्वाइश थी!

मनाही पे भी
मिन्नते करता रहा मुकद्दर से,
बस ये समझ लो,
तकदीर से आजमाइश थी !!

शिक्षक दिवस के उपलक्ष में !

गुरु गुरु ना रहा,
शिष्य शिष्य ना रहा,
वैदिक परम्पराओ का
अब कोई भविष्य ना रहा !
निज-सुखों को त्यागकर,
देने को मुझको ज्ञान तुम
करते रहे कोशिश तमाम,
वो मेरे गुरुजी तुम ही थे,
तुम्ही तो थे !
जो ज़िंदगी की राह मे
बने थे मेरे मार्गदर्शक,
वो मेरे गुरूजी तुम ही थे,
तुम्हीं तो थे!!
इस कलयुगी समाज में,
गुरुकुल परम्परा व
गुरु-शिष्य के सर्मपण भाव का
अब वो परिदृश्य ना रहा,!
सफ़र के वक़्त में झुका था,
जब चरण छूने आपके,
गले लगाया था आपने
पलक पे मोतियों को तोलकर
वो गुरुदेव तुम न थे तो कौन था
तुम्हीं तो थे,
ऋषिकुल में कोचिंग केंद्र खुल गए
द्रोर्ण काटता जेब
एकलव्य के बाप की,
एकलव्य की भी नजर टिकी
सम्पति पर है आपकी,
अफजल गुरु बन गए
कसाब मनुष्य ना रहा !
वैदिक परम्पराओ का
अब कोई भविष्य ना रहा !!


शिक्षक दिवस के उपलक्ष में इस पूर्व संध्या पर मेरा अपने समस्त आदरणीय गुरुदेवों को दंडवत प्रणाम ! हे गुरुदेवो ! ये आपका आशीर्वाद ही था जो आज मैं इस लायक बना हूँ कि उन्मुक्त होकर यहाँ एक आधुनिक और पौराणिक गुरु का तुलनात्मक अध्ययन कर रहा हूँ ! आप सदैव मेरे पूज्य रहोगे !!!

कुचले कुछ ऐसे अरमां भी जरूरी है !

सितम सहने को तो जुबां भी जरूरी है,
दिल में धडकनों के निशां भी जरूरी है।
जख्मों को छेड़े जो पड़े-पड़े दामन में,
कुचले कुछ ऐसे अरमां भी जरूरी है॥
ख्वाइशे जो टूटी दिल की आँधियों में,
आँखों से बहा ले वो तूफां भी जरूरी है।
कभी गुने जो हमें नाम लेकर हमारा,
ऐसा इक किसी पे अहसां भी जरूरी है।
ज़रा ढकने को जमीं की लाजो-शर्म को ,
सिरों के ऊपर आसमां भी जरूरी है।
पश्चिमी हवाए अगर हदे लांघने लगे,
रुख बदलने को तालिबां भी जरूरी है॥
आसमां तले बहुत मुश्किल है बसर,
वादियों में रहने को मकां भी जरूरी है।
चाहो जिधर भी शहर बस तो जायेंगे,
संग रहने को अच्छे इंसां भी जरूरी है॥

नक्कारखाने के.... !

आज एक मित्र का ईमेल मिला, पूछा था कि आजकल आप कोई लेख-वेख नहीं लिखते ! जबाब देने की सोची तो ये पंक्तियाँ फूट पडी ;

सुबह शाम
ये जो भ्रष्ट,
नाक रगड़ते हैं
इतालवी जूतियों पर !
मैं अपना
कागज-कलम घिसकर
वक्त बरबाद करूँ क्यों,
इन तूतियों पर !!

ये तो बुजदिल
बेशर्म हैं,
मगर मुझे तो
आती शर्म है,
इन विभूतियों पर !
अपनी गुलाम मानसिकता
तो सुधार नहीं पाते,
और उंगली उठाते है
सामाजिक कुरीतियों पर !!

अप-शब्दों के लिए
क्षमा चाहता हूँ ,
मगर क्या करू
नियंत्रण रख नहीं पाता,
मैं अपने मन की
कटु-अनुभूतियों पर !
लिखकर भी क्या फायदा,
इन्होने तो सदा
नाक ही रगडनी है,
इतालवी जूतियों पर !!

अन्दर की बात !

सोचा कि बता दूं तुम्हे,
फिर कहोगी, बताया नहीं ,
महीनो से ठीक से खाया नहीं,
सिर्फ पीने पे जोर ज्यादा है !
इसलिए आजकल
ये शरीर कमजोर ज्यादा है!!


अभी भी सोच लो,
वक्त है तुम्हारे पास,
कल को मर गया,
लोग तो भूखमरी से
मौत का लगायेंगे कयास !
मगर क्या तुम खुश रह पाओगी
करके मुझे उदास ? नहीं न !!

जिसके चक्करों में पडी हो,
उसकी दौलत पे मत जाओ,
वो ईमानदार कम, चोर ज्यादा है !
दिन-रात गबन करता है,
चूँकि तुम अपने घर की इकलौती हो,
इसलिए तुम पर नहीं,
तुम्हारे बाप की दौलत पर मरता है !
सोचा कि बता दूं तुम्हे,
फिर कहोगी बताया नहीं,
महीनो से ठीक से खाया नहीं,
सिर्फ पीने पे जोर ज्यादा है !!
इसलिए आजकल
ये शरीर कमजोर ज्यादा है!!

XXXXXXXXXXXXXXX

कितना चाहता था तुम्हे, तुमको न अहसास था,
गुमनाम सी मौत मर गया, वो आशिक ख़ास था।
तड़फ-तड़फ दीवाने ने दम तोड़ा, वफ़ा की राह में,
लोगो ने भुखमरी से मौत का, लगाया कयास था।
देखकर भी न देखा कभी, इक नजर उसकी तरफ,
मगर रहता हर वक्त वो, तुम्हारे ही आस-पास था।
वो चहरे की हंसी उसकी, जिन्दादिली का सबब थी,
इन दिनों नजर आता मगर, कुछ-कुछ उदास था।
यूं मर तो वर्षों पहले गया था, तेरे रूहे-सबाब पर,
समा पे मंडराता परवाना, बस इक ज़िंदा लाश था।
जमाने की नजरों से छुपाता फिरा, अपनी चाह को,
वनवास बाद 'परचेत' , यह उसका अज्ञातवास था॥

गिद्ध बैठे होंगे, प्रजातंत्र की डाल पर !

शहीदों ने कभी सोचा न होगा,
शायद इस सवाल पर,
इक रोज उनका मादरे वतन होगा,
अपने ही हाल पर।
आम-जन ढोता फिरेगा,
अपने ही शव को काँधे लिए,
और पंख फैलाए गिद्ध बैठे होंगे,
प्रजातंत्र की डाल पर॥

ख़त्म हो जायेगी कर्तव्यनिष्ठा,
भ्रष्टाचार भरी सृष्ठि होगी,
कबूतरों का भेष धरके,
देश पर बाजो की कुदृष्ठि होगी।
जहां 'शेर-ए-जंगल' लिखा होगा,
हर गदहे की खाल पर,
और पंख फैलाये गिद्ध बैठे होंगे,
प्रजातंत्र की डाल पर॥

बेरोजगारी व महंगाई से,
गरीब का निकलता तेल होगा,
प्रतिष्ठा के नाम पर राष्ट्र के धन की,
लूट का खेल होगा।
घर भरेगा कल~ माड़ी
आबरू वतन की उछाल कर,
और पंख फैलाये गिद्ध बैठे होंगे,
प्रजातंत्र की डाल पर॥

तेरे चाहने वाले, तमाम बढ़ गए है|

सर्द मानसूनी पुरवाइयों के पैगाम बढ़ गए है,
प्रकृति के जुल्म,कातिलाना इंतकाम बढ़ गए है।
मुश्किल हो रहा अब तेरे, इस शहर में जीना,
शाम-ए-गम की दवा के भी दाम बढ़ गए है॥

तरक्की की पहचान बनी सुन्दर चौड़ी सड़कें है,
ये बात और है कि इन पर, जाम बढ़ गए है।
चुसे, पिचकाए बहुत मिलते है पटरियों पर,
इन्सां तो बचे नही, आदमी आम बढ़ गए है॥

शहर-गाँव से हुई बेदखल जबसे हया-सत्यनिष्ठा,
गली-मोहल्ले के नुक्कड़ों पर,बदनाम बढ़ गए है।
'बेईमानी' संग रचाई है, 'दौलत' ने जबसे शादी,
घरेलू उद्यमों में भी तबसे, बुरे काम बढ़ गए है॥

जन-सेवा की आड़ में अपनी तृष्णा-तृप्ति लेकर,
स्वामी-महंतों के भी कुटिल धाम बढ़ गए है।
'परचेत' कहे खुश होले, ऐ भ्रष्ठाचार की जननी,
हर तरफ, तेरे चाहने वाले तमाम बढ़ गए है॥