Thursday, June 17, 2010

ऐ जिन्दगी ! मैं संवारूं भी तुझे तो क्या सोचकर !

जख्म जो दिए, वो रखे है मैंने ज़िंदा खरोंचकर,
ऐ जिन्दगी! मैं संवारूं भी तुझे तो क्या सोचकर !

मुरादे बह गई धार में, मैं फंसा भंवर-मझधार में,
ख्वाब टूटे, साहिलों पे डूबती कश्तियों में कोचकर !

मौजे समंदर ले गया आके, उम्मीद के टापू ढाके,
किनारे पे बिखरी शिर्क आरजु, लहरें ले गई पोंछकर !

तुझसे न कोई चाव है, मन में बसा इक घाव है,
इस तरह रखूँ भी तुझको, तो कब तलक दबोचकर!

ख्वाइशे फांकती धूल हैं, गिले-शिकवे सब फिजूल हैं,
करूँ भी क्या भला,किस्मत की लकीरों को नोचकर!

10 comments:

शरद कोकास said...

ज़िन्दगी से यह बेहतरीन संवाद है ।

singhsdm said...

यह अंतरा बहुत बेहतरीन बन पड़ा है.....बधाई स्वीकार करें

ख्वाइशे फांकती धूल हैं, तुझसे शिकवे फिजूल हैं,
करूँ भी तो क्या,किस्मत की लकीरों को नोचकर !
ऐ जिन्दगी ! मैं संवारूं भी तुझे तो क्या सोचकर !!

अरुणेश मिश्र said...

अपने से संवाद साहित्य की महत्वपूर्ण विधा है ।
प्रशंसनीय ।

vikram7 said...

स्‍वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

Ashish (Ashu) said...

vaah sir ji, aapki kalam vaaki lajvaab hai.....thanks a lot my dear sir ji

JHAROKHA said...

bahut hi behatreen avam bhav-purn abhivykti.
poonam

हरकीरत ' हीर' said...

जख्म जो दिए, वो रखे है मैंने ज़िंदा खरोंचकर,
ऐ जिन्दगी! मैं संवारूं भी तुझे तो क्या सोचकर !

वाह ये शे'र तो बहुत ही बढ़िया है ......!!

Sonal said...

bahut hi khoob....

A Silent Silence : tanha marne ki bhi himmat nahi

Banned Area News : Mia Michaels is going to start her own Bravo reality show

vikram7 said...

जख्म जो दिए, वो रखे है मैंने ज़िंदा खरोंचकर,
ऐ जिन्दगी! मैं संवारूं भी तुझे तो क्या सोचकर !
शरद कोकास जी ने सही कहा, ज़िन्दगी से यह बेहतरीन संवाद है

कविता रावत said...

ख्वाइशे फांकती धूल हैं,सब गिले-शिकवे फिजूल हैं,
करूँ अब क्या भला,किस्मत की लकीरों को नोचकर
....yahi to rona hain jindagi ka.... kismat apni-apni
sundar prastuti