Monday, May 31, 2010

सबके सब बिन पैंदे के लोटे हो गए है !

बापू, अब तेरे देश में, अच्छे लोगो के टोटे हो गए है ,
जिधर देखो, सब के सब बिन पैंदे के लोटे हो गए है !
कोई लल्लू बन के लुडक रहा, कोई चिकना मुलायम,
खुद को अमर बताने वाले, खा-खा के मोटे हो गए है !!


तेरे इस देश के गरीब की तो माया भी निराली हो गई,
धन चिंता में दिल सफ़ेद और काया भी काली हो गई !
साम्यनिर्धन हिताषियों के तो कर्म ही खोटे हो गए है,
जिधर देखो, सब के सब बिन पैंदे के लोटे हो गए है !!


पास्ता माता के चरणों में, मुखिया भी लमलेट हो गया,
जनप्रतिनिधि सिपैसलार तो जैसे फौजी तमलेट हो गया !
घर-उदर इनके बड़े हो गए, किन्तु दिल छोटे हो गए है,
जिधर देखो, सबके सब बिन पैंदे के लोटे हो गए है !!


फतवे बेचने लगे, धर्म की भट्टी पे आग तापने वाले,
कोई और बाबरी ढूढ़ रहे, राम का राग अलापने वाले !
हकदार का हक़ मारने को, रिजर्वेशन कोटे हो गए है,
जिधर देखो, सबके सब बिन पैंदे के लोटे हो गए है !!

Saturday, May 29, 2010

विकसित होता भारत देखो !

अटल, सोनिया, एपीजे, मनमोहन और प्रतिभा-रत देखो,
लालू, मुलायम, ममता , येचुरी, प्रकाश-वृंदा कारत देखो !
संतरी देखो, मंत्री देखो, अफसर, प्रशासक सेवारत देखो,
आओ दिखाएँ तुमको अपना,विकसित होता भारत देखो !!




शहर,सड़क व गलियों की 'प्रगति-ज्वर' से हया मर गई,
जन-प्रतिनिधियों की नाक तज,शर्म पलायन देश कर गई !
बेशर्मी बंद वाताकूलन में, इनकी हर ओंछी शरारत देखो,
आओ दिखाएँ तुमको अपना, विकसित होता भारत देखो !!


निर्धन कुटिया की छान को, महंगाई का बोझ ढा गया,
नेता राशन,तोप, खेल, संचार,और पशु चारा खा गया !
भूखे व्याकुल जन, मवेशी और गइया कूड़ा चारत देखो,
आओ दिखाएँ तुमको अपना, विकसित होता भारत देखो !!


style="font-size:100%;">
जन-जन की आँख में पानी है,धरा के माथे परेशानी है,
चादर ओढ़ के मुखिया सो रहा, जाग लगाना बेमानी है !
लहुलुहान हो रही धरती माता, भाई-भाई को मारत देखो,
आओ दिखाएँ तुमको अपना, विकसित होता भारत देखो !!

कहने को इस लोकतंत्र में,जिस आम आदमी का राज है,
प्रतिनिधि उसी का कर रहा उसे, दाने-दाने को मोहताज है !
लूट मची जनता के धन की, माला कंठ में धारत देखो,
आओ दिखाएँ तुमको अपना, विकसित होता भारत देखो !!





Monday, May 24, 2010

यूं भी बावफा होते है लोग !


निसार राहे वफ़ा करके जाना कि राहे जफा होते है लोग,
सच में, हमें मालूम न था कि यूं भी खफा होते है लोग !

हम सोचते थे कि ये जज्बा नेमत है खुदा की, किसे पता,
वफ़ा की कस्मे खाने वाले, इस कदर बेवफा होते है लोग !

आग लगा जाते है घरों में, दनल से नफरत करने वालों के,
बेवक्त नीर बहाने वाले, उस वक्त ही क्यों दफा होते है लोग !

प्यार के खातिर सबकुछ न्योछावर करने का दम भरने वाले,
खुद का भरोसा बेच दे सरे राह,यूं भी बावफा होते है लोग!

दिल और आँख के रिश्तों की, अजब दास्तां हमने भी देखी,
नजर देखे, दिल शकूं पाए,समझदार यूं भी नफ़ा होते है लोग !

Friday, May 21, 2010

कल रात को मैं कुछ लिख न पाया !




मुझको मेरी रहमदिली ने सताया,
कल रात को मैं कुछ लिख न पाया !
धीमी- आहिस्ता शाम ढल रही थी,
मेरे सामने इक शमा जल रही थी !

तभी फिर वहाँ एक परवाना आया,
कल रात को मैं कुछ लिख न पाया !

पतंगा कोई एक गीत गा रहा था,
शम्मा के इर्द-गिर्द मंडरा रहा था !
प्यार के जुनून में था वह मनचला,
जब तक जली शमा वो भी जला !
'
'
कभी साथ ऐसा किसी ने निभाया,
कल रात को मैं कुछ लिख न पाया !

बदन अपना वो लौ में लुटाता रहा,
हालत उसकी देख मैं छटपटाता रहा !
जिन्दगी से जाने क्यों रुष्ट था वो,
इरादे का पक्का बड़ा दुष्ट था वो !

दृड़-प्रण वो उसका मुझे बहुत भाया,
कल रात को मैं कुछ लिख न पाया !!

Wednesday, May 19, 2010

स्पष्ठीकरण !

इर्द-गिर्द सदा ही घूम पाता, मैंने तो
तुमसे वो धूरी चाही थी, दूरी नहीं,
दिल की बात हम हक़ से कह जाते,
वो सहभागिता चाही थी, मजबूरी नहीं !

मेरे दिल में रखने की आदत बुरी है,
हर ख्वाब दिल के कोने में सजाता हूँ,
इजहार-ए-इश्क पलकें कर लेती है ,
हर बात लबों पे आये, ये जरूरी नहीं !

अक्सर ही ख्वाब तुम्हारे सजाने को,
हरदम आँखे चुराता हूँ रातों को नींद से,
बनाई ख़्वाबों ने जब भी तस्वीर तेरी,
पहुंचाई मुकाम पर है, छोडी अधूरी नहीं !

दिल की दीवारों पर टंगी तेरी तस्वीर में ,
प्रेम की कुंची से इन्द्रधनुषी रंग बुनता हूँ,
हसरते यों तो बहुत रखे था दिल में पाले,
न जाने क्यों ये तमन्नायें होती पूरी नही !

Monday, May 17, 2010

सड़क !


आड़ी-तिरछी ,
टेडी-मेडी,
कहीं चिकनी,
कहीं कड़क,
सुनशान
पहाडी सड़क,
यों समेटे है खूबसूरती
वह भी शुद्ध सब,
दीखने में मगर
एकदम खूसट सी
गंवार, बेअदब,
रास्तों का मंजर और
खुशनुमा पलों का प्राकृतिक सौन्दर्य ,
पथिक को भाता है,
मगर
कोप- इजहार सभी को डराता है!
पथिक का मन रखने को,
झूठ भी नहीं बोल पाती,
और सीधे ही
सतर्कता का संकेत लगाती,
उसे तो
बनावटी बनना ही नहीं आता है !!


दूसरी तरफ
लिए ढेरों तड़क-भड़क,
वो मैदानी सड़क,
खूब चौड़ी और
बड़ी-बड़ी,
अनेकानेक
सौन्दर्य सुधार के
लेप से दबी पडी,
दीखने में एकदम
सीधी लगती है, मानो
कोई सी उलझनों में
वो ना घिरी हो,
एकदम चिकनी सपाट,
ऐसी कि हया भी
फिसलकर कहीं,
किसी गटर में जा गिरी हो,
मुस्कुराकर स्वागत करती
हर पथिक का,
उसकी हर इक अदा
यों तो बनावटी है,
मगर लगती खरी है,
राही को तनिक अहसास
नहीं होने पाता !
जिस राह पर वो चल रहा,
आगे वो राह
इसकदर काँटों भरी है,
कि चलना बेहद कठिन हो जाता!!


नोट: छवि गुगुल से साभार !

Saturday, May 15, 2010

अदभुत !

दर्द इस दिल को जमीं दे रही है,
संताप सारा आसमान दे रहा है!
पलकों में सुलगते नफरतों के शोले
यादों में तपता जहान दे रहा है !!

वो चले गए हमसे दामन छुड़ाकर,
हमारे दिल के फेल होने के डर से !
इक सब्र है जो हमसफ़र बनकर
संग हरइक घड़ी इम्तहान दे रहा है !!

जो सच था वही तो हम कह गए,
मुख पर कहने की आदत बुरी है!
अब मान-हानि के दावे की धमकी
हमको हर इक बेईमान दे रहा है!!

अनजाने से क्यों बने फिर रहे वो,
हवाओं के रुख पर जान लेने वाले!
है कोई इसका सज्ञान लेने वाला कि
क्यों एक निर्दोष जान दे रहा है !!

दुष्टता-क्लिष्टता, धृष्टता-निकृष्टता से,
अब पापों के सारे घड़े भर गए है!
जिसके लिए मौत मुह खोले खडी है ,
वही जीने का हमको ज्ञान दे रहा है !!

ब्लॉगरों ने तो लगता है पी ली भांग है !

ब्लॉगरों ने तो लगता है पी ली भांग है ,
कुछ ठीक नहीं चल रहा सब उटपटांग है!
निकले तो हिंदी की दुर्दशा सुधारने को थे,
और खीच रहे बस एक-दूजे की टांग है!!

लिखने का मकसद क्या सिर्फ वोट है?
लगता है कि हिंदी में ही कही खोट है!
वरना क्यों हर एक साहित्य सेवक
बन गया आज मानसिक विकलांग है!!

अपनों से ही अगर हम कलेश लेंगे ,
फिर दूसरों को क्या ख़ाक सन्देश देंगे !
मिलजुलकर हिन्दी विकास पर ध्यान,
यही आज हम सब से वक्त की मांग है!!

ब्लॉगरों ने तो लगता है पी ली भांग है ,
कुछ ठीक नहीं चल रहा सब उटपटांग है!
निकले तो हिंदी की दुर्दशा सुधारने को थे,
और खीच रहे बस एक-दूजे की टांग है !!

Tuesday, May 11, 2010

अभी तुम्हे तो बहुत दूर तक चलना है !

आज उदित सूरज है हर हाल में तुम्हे जलना है !
कल सांझ चौखट पे दस्तक देगी, तुम्हे ढलना है !!

ये सच है कि पहाड़ सी जिन्दगी जीना आसां नहीं !
फिर भी पहाड़ बनके क्षण-क्षण हिम सा गलना है !!

वातावरण से छीन के कोई ले गया है खुसबूओ को !
तुम्हे चट्टान बनके उन हवाओं का रुख बदलना है !!

भूल गए, माँ ने तुम्हे शेरनी का सा दूध पिलाया था !
तुम्हे सिखाया किसने, तुम्हारा काम हाथ मलना है !!

थककर रोक ले कहीं पर कदम ये मुमकिन नहीं !
'गोदियाल' अभी तुम्हे तो बहुत दूर तक चलना है !!

Monday, May 10, 2010

इस बार मेरी माँ ने ख़त नहीं भेजा गाँव से !

कल मदर्स डे के सुअवसर पर मैंने उस बाबत कुछ नहीं लिखा, क्योंकि मुझे अपनी माँ से एक शिकायत है कि उसने मुझे घडियाली आंसू बहाना नहीं सिखाया ! पता नहीं क्यों ? एक दूसरी वजह भी थी , जिसे यहाँ बयाँकर रहा हूँ इन चंद पंक्तियों में ;

इस बार, इस दिन पर
सैर सपाटे नहीं गया, मदर्स डे की नाव से !
अबके यूँ भी मेरी माँ ने
इस अवसर पर ख़त नहीं भेजा गाँव से !!
पिछली जो चिट्ठी आई थी,
लिख भेजा था उसने अपना दुखड़ा !
यह भी एक वजह रही थी कि
इस मदर्स डे पर रहा उखडा- उखडा !!
अश्रु ज्योति मोतियाबिंद खा गई,
बूढ़ी काया लाचार हो गई पाँव से !
अबके यूँ भी मेरी माँ ने
इस अवसर पर ख़त नहीं भेजा गाँव से !!

Saturday, May 8, 2010

निरुपमा के बहाने एक गजल !


मित्रो, व्यस्तता की वजह से आज ब्लोग-जगत पर मेरी उपस्थिति कम ही रही, मगर मैं समझता हू कि अभी भी यहां इस ब्लोग जगत पर पत्रकार निरुपमा की असामयिक और दर्दनाक मौत से समबन्धित चर्चाओं का बाजार काफ़ी गरम है। जैसा कि मैने कुछ ब्लोग मित्रों के ब्लोगो पर कुछ टिप्पणियों मे भी कहा और अब भी कह रहा हूं कि मीडिया के साथ-साथ अनेक ब्लोगर मित्रों ने बिना सोचे-समझे निष्कर्षो पर पहुंच इस पूरे प्रकरण को एकपक्षीय बनाकर जरुरत से ज्यादा तूल दिया। खैर, भग्वान निरुपमा की आत्मा को शान्ति प्रदान करे, यही प्रार्थना करता हूं, और इस पूरे घटना के मद्यनजर पेश है एक गजल;

त्याग कर पुरा-रीतियां, निकली नये अभियानों पर ।
बदलने लगी है दुनिया, सभ्यता के दरमियानों पर ॥

न स्वयम्बर की दरकार रही, न युवराजों की जंग ।
जंक खाती जा रही तलवारें ,पडे-पडे मयानों पर ॥

क्या पूनम, क्या अमावस, शुक्ल क्या कृष्ण पक्ष ।
सूरज ग्रहण लगा रहे है, चांद के आशियानों पर ॥

कह रहे थे लोग,माली ने खुद गुलशन उजाड डाला।
करें भी कोई ऐतवार कैसे, अपने इन सयानों पर॥

सबूत मिटा डाले उसी ने, जिस पर दारोमदार था ।
मुकदमा दर्ज हुआ भी तो, गिरगिट के बयानों पर ॥

Friday, May 7, 2010

कोई तो बताये मिलती कहाँ होगी ?

कुछ शर्म खरीदनी है,
अपने लिए भी और
अपने देशवासियों के लिए भी !

मुझे लगता है कि शरीर में
विटामिन की तरह इसकी भी
नित कमी होती जा रही,
लाख जुतियाने पे भी
ये कम्वख्त शर्म नहीं आ रही !

हर शख्स का
भ्रष्टाचार के दलदल में खिला चेहरा
यहाँ कमल जलज लगता है ,
और हवाओं का रुख भी
जरुरत से ज्यादा निर्लज्ज लगता है !

अरे भाई कही तो मिलती होगी ?
ढूंढो इसे, यह सन्देश है मेरा,
स्वदेशियों के लिए भी,
और प्रवासियों के लिए भी !

कुछ शर्म खरीदनी है,
अपने लिए भी और
अपने देशवासियों के लिए भी !!

Wednesday, May 5, 2010

वो शख्स !

वो शख्स !
जो जिन्दगी से हुआ 'बोर' है,
और पैदाइशी कामचोर है,
मेहनत करना नहीं चाहता,
भूखों मरना नहीं चाहता,
जुए-उठाईगिरी में भाग्य आजमाया,
मगर कहीं भी शकून न पाया,
अभी कल ही सड़क पर जाती
बग्गियों से गन्ना लूछ रहा रहा था,
मुझे देखा तो मुझसे से पूछ रहा था,
भाई साहब, आप सिर मत खुजाओ,
मुझे सिर्फ और सिर्फ इतना बताओ,
मेरी किस्मत में बिजनेस का योग है,
ये 'आइ वास' घरेलू है या लघु उद्योग है ?
मैंने कहा,क्या बात की है भैया !
लग जायेगी तुम्हारी भी पार नैया,
नाम भले ही इसका धोखा है ,
मगर धंधा बड़ा चोखा है ,
ये तो अब हाईप्रोफाइल पेशा बन गया,
लघु क्या ये तो वृहत उद्योग बन गया ,
फटाफट फैक्ट्री लगाओ,
फिर बिजनेस तो क्या
राजनीति में भी किस्मत आजमाओ .
इस देश की जनता के खूब मन भावोगे,
'लक' अच्छा रहा तो
किसी दिन मंत्री-संत्री भी बन जावोगे !!

तू सच क्यों बोलता है ?

एक पुरानी कविता बस यूँ ही याद आ गई , अगर आपने पहले न पढी हो थोड़ा सा लुफ्त आप भी उठाइये ;

छल-कपट है जिस जग में
अंहकार भरा हर रग-रग में !
उस जगत की सब चीजों को तू
एक ही तराजू से क्यों तोलता है ?
झूठ-फरेब भरी दुनिया में,
गोदियाल,तू सच क्यों बोलता है ?

जहां कदम-कदम पर मिथ्या धोखे
बंद हो गए सब सत्य झरोखे !
वहाँ इंसान को आज भला तू
अपने ही भाव क्यों मोलता है ?
झूठ-फरेब भरी दुनिया में,
गोदियाल, तू सच क्यों बोलता है ?

जहां निष्कलंक बन गई दीनता
है चहु दिश फैली मूल्यहीनता !
धूमिल पड़ चुके उस दर्पण में
सच्चाई को क्यों टटोलता है ?
झूठ-फरेब भरी दुनिया में, Italic
गोदियाल, तू सच क्यों बोलता है ?

सब जी रहे है यहाँ भरम में
बचा न कुछ भी धरम-करम में !
इस कलयुग के कटु-सत्य को
सरे आम क्यों खोलता है ?
झूठ-फरेब भरी दुनिया में,
गोदियाल, तू सच क्यों बोलता है ?

Sunday, May 2, 2010

पहला पैग !

जीना है तो आश जगा, दिल में इक अहसास जगा,
हर दरिया को तर सकता है, मन में यह विश्वाश जगा!

हलक उतरता जाम न हो, साकी फिर बदनाम न हो,
तृप्ति का कोई छोर नहीं है, पीना है तो प्यास जगा!

हमदर्द तेरा दिल तोड़ गया, तुझे राह अकेला छोड़ गया ,
आयेगा फिर हमराही बनके, ये तीरे-जिगर अभिलाष जगा!

दुःख देने वाला दुखी नहीं, सुख ढूढने वाला सुखी नहीं,
निराशाओं में भी आशाओं के दायरे अपने पास जगा!

पीछे छूटे का अफ़सोस न कर, किस्मत का दोष न कर,
चित-अन्धकार को रोशन कर दे, दीप वो बेहद ख़ास जगा!

Saturday, May 1, 2010

मिश्रित दूध !

बहुत बोलते सुना है
तुमको कि तुम,
ये कर दोगे, वो कर दोगे !
चलते हुए के कानों में भी,
मिश्री कि तरह जहर भर दोगे !

अपनी माँ का दूध पिया है तो
हमारे भी कान भर के दिखाओ !
ज़रा दूध का दूध और
पानी का पानी कर के दिखाओ !
ये होता कैसे है
मुझे भी सीखना है,

क्योंकि मुझे ये ख्याल आ रहा,
मेरा मिल्कमैन
आजकल
पानी बहुत मिला रहा !
मैं तो क्या
पूरी बस्ती, इसी तरह जी रही !
और साथ ही यह भी कहता है कि
भैंस, गर्मी की वजह से
नहर का पानी ज्यादा पी रही !!