Tuesday, March 30, 2010

सरिस मन डोला !




छवि गुगुल से साभार



दिन तन्हा तो गुजर गया,
सूनी सी रात मगर बाकी है।

मयखाना ठिकाना,
मय गम की दवा है
और हमसफ़र साकी है ।

दो पैग के बाद
परवाना सोचता है कि
उसने तो सदा ही जिन्दगी
चरागों की रोशनी पे फिदा की है।

ऐ काश ! कि ये 'अर्थआवर' भी
सदा के लिए ही हो जाता।
अपना भी बड़े दिनों से चल रहा
मंदी का दौर ख़त्म हो जाता।

मुहावरे ही मुहावरे !


तू डाल-डाल,मैं पात-पात,नहले पे दहले ठन गए,
जबसे यहाँ कुछ अपने मुह मिंया मिट्ठू बन गए।

ताव मे आकर हमने भी कुछ तरकस के तीर दागे,
बडी-बडी छोडने वाले, सर पर पैर रखकर भागे

अक्ल पे पत्थर पड गये क्या, आग मे घी मत डालो,
दूसरों पर पत्थर फेकना छोडो, अपना घर संभालो

समझदार नहीं धर्म की आंच पर रोटियाँ सेका करते,
कांच के घरों में रहने वाले, पत्थर नहीं फेंका करते।

हमेशा एक ही लकडी से हांकना ठीक सचमुच नहीं ,
मिंया, मुल्ले की दौड मस्जिद तक बाकी कुछ नहीं ।

आंखों मे धूल झोंक,खुद को तीस मारखा बताते हो,
चोर-चोर मौसेरे भाई हो,खिचडी अगल पकाते हो।

अपुन तो सौ सुनार की, एक लोहार की पे चलते है,
चिराग तले अन्धेरा है आपके, काहे फालतू में जलते है।

हम सब जानते है कि दूर के ढोल सुहाने होते है,
नहीं समझदार लोग बहती गंगा में हाथ धोते है।

Monday, March 29, 2010

आस्था से अरे, यह तेरा प्यार कैसा !

कृत्यों मे संदिग्धता हो, फिर करे कोई ऐतबार कैसा ।
शालीनता न दिखे स्वभाव मे,यह तेरा व्यव्हार कैसा ।।

पाले रखे है नित जिगर मे, अंत्य ख्याल प्रतिघात के ।
फ़रमाबरदार अल्लाह का बन, आस्था से प्यार कैसा ॥

निकले नही जुबां से कभी, सरस स्नेह के दो लफ़्ज भी ।
रिपु बनाके अग्रज को, जेहाद मुक्ति का आधार कैसा ॥

भोग के लोभ मे लबे-राह, बना लिया इक आशियाना ।
वसीला बना अशक्त-ए-पर्दानशीं, सर्ग का करार कैसा ॥

खुदा के फ़जल से बना जब, कृति अनवरत संसार की ।
पाने को अज्ञेय जन्नत हो रहा, इस कदर बेकरार कैसा ॥

एक ही माटी से ढले जब उसने सभी एक ही चाक पर ।
कहे, तोड डाल काफ़िर घडों को,अरे यह कुम्हार कैसा ॥

गैर-मजहब की भी स्तुति करना सीख ले, निन्दा नही ।
इन्सानियत ईश धर्म है, फिर यह तेरा अहंकार कैसा ॥

- अंत्य = तुच्छ -फ़रमाबरदार=आज्ञाकारी
- लबे-राह= सड्क किनारे -वसीला= जरिया,
- अग्रज= बडा भाई - सर्ग= सृष्टि, रिपु= शत्रु

Thursday, March 25, 2010

कभी-कभी मेरे दिल में ....

आजादी की लड़ाई से अब तक, इन अपने सेकुलर नेताओं की शक्ले और करतूते देखते-देखते तो आप भी पक चुके होंगे, मगर क्या कभी आपने भी ऐसा सोचा कि अगर सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर जैसे अपने अमर शहीद १९४७ तक ज़िंदा रहते तो क्या पाकिस्तान बन जाता ? या फिर बन भी जाता तो क्या ऐसा पाकिस्तान बनता जो हमने देखा/ देख रहे है ? खैर, अगर आप नहीं सोचते हो तो सोचना इस बारे में भी, कभी वक्त मिले तो !

अब और न बिगड़ी तकदीर कोस,
और न दिल को बेकरार कर !
रात ढले न ढले मगर तू,
इक सुहानी भोर का इन्तजार कर !!

अब हासिल न होगा कुछ भी यहाँ,
सच्चाइयों से मुख मोड़ कर !
हरवक्त दर्द-ए-गम का पिटारा खोलकर,
दिल से इस कदर न तकरार कर !!

शाख-ए-गुल से टूटे फूल को,
यूँ न देख अचरज से आँखे फाड़कर !
अब उदासियों के साज तज दे,
और वसंती नगमा-ए-नौबहार कर !!

खुद की बदनसीबी के लिए,
मत इल्जाम दे हाथ की लकीर को !
बाजुओ पर रख भरोसा,
डग बढ़ा और गुलशन को गुलजार कर !!

Wednesday, March 24, 2010

कूड़ा-करकट !

सर्वप्रथम सभी मित्रों को रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाये !

तजुर्बों से ही दुनिया सीखती है अक्सर,
बड़े इत्मिनान से उन्होंने हमें बताई ये बात !
और हम थे कि हमें यह भी मालूम न था कि
रात के बाद दिन निकलता है या दिन के बाद रात !!

सितम बहुत सहे है हमने इस जमाने के,
ख्वाब देखते है अब तो चाँद के पार जाने के !
इसरो, नासा वालों यान फटाफट बनाओ ,
ये बेदर्द जहां अब और रहने के काबिल न रहा !!

और अंत में ये पंक्तियाँ आजकल ब्लॉग-जगत से गुम, महफूज भाई की खिदमत में ;

थी नहीं महफूज मुहब्बत उनकी इस शहर में,
अजब जुल्मो-सितम उन्होंने जमाने के सहे है !
इसलिए छोड़कर सब ब्लॉग्गिंग- स्लोग्गिंग, जनाव
आजकल तकदीर बनाने को उनके शहर गए है !!

Tuesday, March 23, 2010

आत्म-उचाव !

स्वप्न सुन्दरी,
मै अपने इस बदतमीज,

नादां दिल की

हरकतों पर शर्मशार हूं ।

और

मेरी जुबां पे आये

दर्द को सुनकर,

छलक आये उन आंसुओं को,

पलकों मे ही छुपा लेने पर,

तुम्हारे इन

नयनों का शुक्रगुजार हूं ॥



मै जानता हूं कि

किस तरह,

वक्त की नजाकत को समझ,

बडी चतुराई से,

इन झील सी गहरी आँखों ने

आंसुऒं को

पलको मे छुपाये रख छोडा था ।

वरना तो वे,

सब बहा ले जाते संग अपने,

पुतलियों का काजल,

तुम्हारे वेशकीमती उन

गालों के रेगिस्तान से होकर,

जिन पर

क्षणभर पहले ही तुमने,

वो महंगा कौस्मैटिक लपोडा था ॥



सोचता हूं,

काश कि

तुम्हारे नयनों की तरह,

मेरा ये नादां दिल भी

समझदार होता ।

आते चाहे कितने ही

आंधी-तूफ़ान,

जज्बातों के अंधड,

मगर यह अपना

आपा न खोता ॥




हे बापू !
माँ ने तो पूत बस दो ही पैदा किये थे,
एक नमकहराम दूजा हरामखोर निकला।
एक ने आबरू उसकी बाजार बेची,
दूसरा अपने ही घर मे चोर निकला ॥

जयचन्द, मुहम्मद गौरी संग मिलकर,
कातिल मासुमों का पुरजोर निकला।
शकुनी राजनीति की चाल चलकर,
नेता, खल-नेता, वक्ता मुह्जोर निकला॥

आवरण हरीश चन्द्र का डालकर,
अन्यायी , अविश्वासी घनघोर निकला।
माँ ने तो पूत बस दो ही पैदा किये थे,
एक नमकहराम दूजा हरामखोर निकला।।

Sunday, March 21, 2010

साठ साल मे अक्ल न आई.....!

संशोधित:

साठ साल मे अक्ल न आई,अपने इन भिखमंगों को ।
चुन-चुनकर संसद भेज दिया , लुच्चे और लफ़ंगो को ॥

चमन उजाडने वाला ही, बन बैठा बाग का माली है ।
दुराचार के फूल खिले हैं और बगिया मे बदहाली है ॥

जन-प्रतिनिधित्व के नामपर यह सारा गडबड झाला है ।
जन पैंसे को तरस रहे, कंठ इनके नोटो की माला है ॥

धन-कुबेर की चाबी सौंप दी, राह के भूखे-नंगो को ।
साठ साल मे अक्ल न आई,अपने इन भिखमंगों को ॥

सडकों की बदहाली से, लोग तो जाम मे फंसे हुए है ।
महलों के सुख भोग रहे ये, हाथों मे जाम ठसे हुए है ॥

लूट-खसौट उद्देश्य रह गया, आज यहां हर नेता का।
तथ्यों को झुठलाना रह गया, काम कानून बेता का ॥

जाति-समाज मे हवा दे रहे, ये बे-फजूल के पंगो को ।
साठ साल मे अक्ल न आई,अपने इन भिखमंगों को ॥


कत्ल-हिंसा,व्यभि-बलात्कार, इनका यह सब लेखा है।
आजादी के इस कालखंड मे, देश ने क्या नही देखा है ।।

ज्ञान जग सारे को देने वाला, देश ज्ञान को तरस रहा ।
मक्कार पुजारी, मुल्ला,पादरी, ज्ञानी बनके बरस रहा ॥

ठेकेदार धर्म के बन भडकाते, जाति-धर्म के दंगो को ।
साठ साल मे अक्ल न आई,अपने इन भिखमंगों को ॥

धर्म-निरपेक्षता की माला जपते, तुष्ठिकरण भी करते है।
राष्ट्र-हितों को दर किनार कर, वोट-बैंक पर मरते है ॥

भ्रष्टाचार के साधन ढूढते, नित यहां पर नये-नये ।
चाटुकारिता करते-करते, अपना धर्म भी भूल गये॥

पथ-भ्रष्ठ कर युवा शक्ति को, पैदा कर रहे हुड-दंगो को।
साठ साल मे अक्ल न आई, देश के इन भिखमंगों को ॥

Saturday, March 20, 2010

खूब मजे लूट रहा, घर के भी, घाट के भी !

छवि गुगूल से साभार !

सुना था,
जब-जब अराजकता के बादल घिरते है,
यहाँ, आवारा हर कुत्ते के दिन फिरते है !

कमोबेश,
कुछ ऐसा ही परिस्थिति अबकी भी बार है,
दूषण - प्रदूषण से हुआ हर तंत्र बीमार है !

क्या कहने,
अब तो धोबी के कुत्ते के ठाठ-बाट के भी,
खूब मजे लूट रहा, घर के भी, घाट के भी !!

उसकी तो,
बस नजर, अपने बाहुल्य बढ़ाई में है,
पांचों उँगलियाँ घी में,सिर कढाई में है !

हर तरफ,
जिधर देखो, अराजकता ही नजर आती है,
रोटी की जगह टॉमी, बटर-ब्रेड खाती है !

ऐसी तो,
बादशाहत, हरगिज देखी न सुनी थी हमने,
अवाम-ए-हिंद, कभी किसी बड़े लाट के भी!
क्या कहने,
अब तो धोबी के कुत्ते के ठाठ-बाट के भी,
खूब मजे लूट रहा, घर के भी, घाट के भी !!

Friday, March 19, 2010

मिंया, अपनी तो ठीक से धुल नहीं पाते और ...

कल एक सवाल पूछा था मैंने एक ख़ास बुद्धिजीवी वर्ग से, समयाभाव के कारण आज उस पर एक यथोचित लेख न लिख सका, जिसके लिए क्षमा ! मैं उन सभी मित्रों का आभार व्यक्त करना चाहूंगा, जिन्होंने अपने महत्वपूर्ण विचार उस लेख पर टिप्पणी के रूप में रखे ! और जो कुछ आज के लेख में मैं कहना चाहता था, उसका अधिकाँश हिस्सा उन्होंने टिपण्णी के रूप में रख दिया है! जिन ख़ास सज्जनों से मैंने जबाब की उम्मीद की थी, उनमे से कुछ मिले, लेकिन यही कहूंगा कि सवाल का सीधा जबाब किसी ने नहीं दिया! हाँ, श्रीमान कैरानवी साहब का जरूर शुक्रिया अदा करूंगा कि उन्होंने पहले तो गोलमाल ही जबाब दिया था, मगर मेरे पुनः अनुरोध पर उन्होंने स्टॉक मार्केट के ऊपर अपनी बेबाक राय यह रखी कि शेयर ट्रेडिंग इस्लाम के खिलाफ है! मुझे मालूम था कि वे लोग जो दूसरे के धर्म में न सिर्फ खोट निकालते फिरते है, बल्कि उनके लोगो के बारे में भी अपशब्द कहते है! इतना तो इस सवाल के जबाबो से अंदाजा आपको भी लग ही गया होगा कि वे इस सवाल का सीधा जबाब नहीं दे सकते, क्योंकि उन्हें मालूम है कि उनके खुद के आँचल अथवा चादर में कितने छेद है !

तो निष्कर्ष यही निकला कि अगर हमें तुम बुरा बताते हो तो तुम भी भले नहीं हो! यह मत भूलिए कि सनातन धर्म आदिकाल से हजारों वर्षों से चला आ रहा है, तो निश्चित है कि जो जितना पुराना धर्म होगा और जिसके ऐसे तथाकथित सेक्युलर अनुयायी होंगे जो तात्कालिक स्वार्थ सिद्धि के लिए खुद ही बेसिर-पैर की खामिया अपने धर्म में निकाल लेते है! तो उसमे बहुत सी मनगड़ंत बाते होंगी ही ! आपका धर्म तो महज १४०० साल ही पुराना है, उसके बाद भी खुद देख लीजिये कि कठमुल्लों ने अपनी सुविधा के हिसाब से फतवे निकाल-निकाल कर उसको मनमाफिक बना डाला है!

तर्कसंगत और समसामयिक बहस जिससे किसी का भला हो सकता है उसे करने में कोई बुराई नहीं, लेकिन सिर्फ दूसरे को नीचा दिखने के लिए गड़े मुर्दे उखाड़ने लगो तो जो ये सोचते है कि हम ही तोप है, तो उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि यहाँ उनके भी बाप बैठे है! कोई अगर चुप्पी साधे है तो किसी ख़ास वजह से ! तर्क संगत वाद-विवाद का एक उदाहरण इस तरह से दूंगा कि मैं अगर बुर्के की बात कर रहा हूँ, तो उसे गलत मंतव्य से न लेकर इस तरह लीजिये कि हाँ , अगर इस बहस से यह निष्कर्ष निकलता है कि बदलते हालात के मुताविक महिलाओ को बुर्के में रखना उचित नहीं है ! लेकिन अगर आप जबाब में हमारी माँ- बहिनों पर अश्लील आरोप और बेसिर-पैर की आदिकाल की बातें करने लगो तो वह कौन सी समझदारी ? दूसरे की भावनाओं को भड्काओगे , दूसरे ने भी चूड़ियाँ नहीं पहन रखी, कोई कब तक चुप रहेगा ? यह याद रहे कि जम्मू के सोमनाथ मंदिर, काशी मंदिर , दिल्ली और गोधरा के बाद गुजरात भी होता है! तो बेहतर यही है कि घृणा फैलाने की बजाये हम आपसी भाई-चारा बढ़ाएं , ताकि समूची मानव जाति का भला हो !


घृणा-नफरत की पौध के दाने से पले हो,
सारा जग गुणहीन है, बस, तुम ही भले हो !
मिंया, अपनी तो ठीक से धुल नहीं पाते,
और ज्ञानी बनकर दूसरों की धुलने चले हो !!

तनिक दूसरों पर पंक उछालने से पहले,
खुद की गरेवाँ में भी झांक लिया करो !
हर बात पे जिसका वास्ता देते हो तुम,
भले-मानुष कम से कम उससे तो डरो !!

जो तुम्हारी न सुने वो काफिर नजर आये,
गैर की आस्था से क्यों इस कदर जले हो!
मिंया, अपनी तो ठीक से धुल नहीं पाते,
और ज्ञानी बनकर दूसरों की धुलने चले हो !!

मुंह से निकलती भले हो अमन की बाते,
मगर कृत्य ने सदा खून-खराबा दिखाया !
कथनी और करनी में फर्क रहता तुम्हारे,
सदाचार ऐसा यह तुमको किसने सिखाया !!

जिस सांचे में प्रभु ने तमाम दुनिया ढली,
मत भूलो उसी सांचे में तुम भी ढले हो !
मिंया, अपनी तो ठीक से धुल नहीं पाते,
और ज्ञानी बनकर दूसरों की धुलने चले हो !!

Tuesday, March 16, 2010

झूठों के गले मे पडी माला, लोकतन्त्र का मुंह…

सर्व-प्रथम आप सभी को हिन्दु नव-वर्ष वि.स. २०६७ की हार्दिक शुभकामनाये! व्यथित मन इस देश मे लोकतन्त्र और संविधान की दुहाई देने वालों की घटिया हरकतों को देख क्रोधित हो उठता है। आज जहां एक तरफ़ करोडों की आवादी भुखमरी के कगार पर खडी है, कानून और व्यवस्था की स्थिति ऐसी है कि एक बेखौफ़ दुष्कर्मी जो एक युवति से दुष्कर्म की सजा काट रहा है, जेल से छूटकर आता है तो फिर उसी युवति को सरे-आम उठा कर ले जाता है। और उसके साथ मुह काला करने के बाद उसे नोऎडा की सड्कों पर फेंक देता है। क्या इसी स्वतन्त्र और सर्वप्रभुत्वसम्पन्न भारत के सपने सजोये थे हमने ? कौन इन्हे यह सब करने का दुस्साहस देता है? दलितों और पिछडों से भी पूछना चाहुंगा कि सत्ता और अधिकारों के नाम पर दिन-दोपहर सडकों पर यह भोंडा प्रदर्शन क्या दर्शाता है । सवर्णों द्वारा दलितों के दमन की शिकायत तो आप अकसर करते है, मगर जब अधिकार आपके हाथ मे आये तो आप दुरुपयोग करने से कहां चूके?अगर आपकी नजरों में यह सब सही है तो फिर सवर्ण भी कहां गलत थे ?

माया बटोरने का अजब यह कौन सा मिराक* है,
तार-तार करके रख दी लोकतंत्र की साख है ।
संविधान मुंह चिढा रहा है निर्माता-रक्षकों का,
आढ मे दमित बैठा अब ये कौन सी फिराक है ।।

यही वो भेद-भाव रहित समाज का सपना था,
क्या यही वो वसुदेव कुटुमबकम का नारा था ।
यही वो दबे-पिछडों के उत्थान की बुनियाद थी,
क्या यही स्वतन्त्रता का बस ध्येय हमारा था ॥

नैतिक्ता, मानवीय मुल्य जिनपर हमे नाज था,
कर दिया उन्हे हमने मिलकर सुपुर्द-ए-खाक है ।
माया बटोरने का अजब यह कौन सा मिराक है,
तार-तार करके रख दी लोकतंत्र की साख है ।।

अचरज होता है मुझे कभी-कभी यह सोचकर,
क्या रोशन होगी भी गली श्यामल संसार की ।
जन यू ही सदा अरण्य युग मे ही रमाये रहेंगे,
या फिर कभी खुलेगी भी सांकल बंद द्वार की ॥

जनबल, धनबल, और बाहुबल के पुरजोर पर,
मुंहजोर ने रख छोडा आज कानून को ताक है ।
माया बटोरने का अजब यह कौन सा मिराक है,
तार-तार करके रख दी लोकतंत्र की साख है ।।

• मिराक= मानसिक रोग
• सांकल बंद द्वार की= बौद्धिक चेतना

Sunday, March 14, 2010

तू हिन्द है !

निभा सकता है तू जहां तक और जबतक, बस निभाता रह,
सहिष्णुता तेरा मूल मंत्र है, दिखा सके जबतक, दिखाता रह

असुर तो हमेशा की तरह ही, पथ मे तेरे कंटक बोता रहेंगा,
फूल प्रेम के तू राह उसकी बिछा सके जबतक, बिछाता रह

बैरी को भले ही खुशियां तेरी, देख पाना हरगिज मंजूर हो,
पीडा के अश्रु पीकर भी मुस्कुरा सके जबतक, मुस्कुराता रह

मानव सभ्यता के दुश्मन भले ही, बदन तेरा लहु-लुहां कर दे,
बोझ उनकी दुष्ठता क्रुरता का उठा सके जबतक, उठाता रह

कुटिल-कायरों की अधर्म-सापेक्षता से, असल धर्म अस्तगामी है,
देह पर क्षरण के रिस्ते घावों को छुपा सके जबतक, छुपाता रह

गीत यही तेरावैष्णव जन तो तेने कहीये जै पीड पराई जाणे रे”,
हिन्द हूं, मैं हिन्द हूं,गर्व से गुनगुना सके जबतक, गुनगुनाता रह ।।

Thursday, March 11, 2010

तू क्या निकला !!

धर्म का पुण्य समझा था तुझे, तू अधर्म का पाप निकला,
मानवता का कलंक निकला, पर्यावरण का अभिशाप निकला !

हांकता है बाहुबल के जोर पर, तू यहाँ हर इक झुण्ड को,
भेड़ियों से है भय तुझे, भेड़ पर जुल्म का ताप निकला !

महापंच की चौधराहट दिखाई, निरीह प्रेमियों की राह में,
मुस्लिमों का तालिबां निकला, हिन्दुओ का खाप निकला !

सरिता, सुदूर पर्वतों से निकल,जाती है सागर से मिलन को,
उसकी भी राह रोक डाली, तू तो खाप का भी बाप निकला !

धन-ऐश्वर्य की लालसा ने, इस कदर अँधा बना के रख दिया,
भूखों के मुह का लिवाला छीनकर, गरीबी का संताप निकला !

वो अब तक खुला घूमता है, पशुओ का चारा खा गया जो,
निर्दोष मर-खप गया कारागाह में, यह तेरा इन्साफ निकला !!

Wednesday, March 10, 2010

एक सडक जो कुछ अलग सा कहती है !

कुम्भ मेला भी अपनी समाप्ति की और अग्रसर है, अपने निजी काम से फिर एक बार उस सड़क को नापा, जो दिल्ली से हरिद्वार जाती है ! पिछली यात्रा के बाद इस बार भी कुछ भी नया नहीं था ! वही अस्तव्यस्त पडी सड़क , जिस पर कभी एक कुशल ड्राइवर ४ घंटे में दिल्ली से हरिद्वार पहुचाने की गारंटी देता था , वह भी आज छः साढ़े छः में पहुँचाने के लिए कहता है कि बाबूजी, कोशिश करूंगा, वादा नहीं ! एन डी ए के शासन काल में मंजूर हुआ सड़क चौडीकरण का काम आज भी ज्यों का त्यों पडा है, कहीं चल भी रहा है तो कछुवे की चाल, शायद इस सड़क को तीब्र गति से बनाने के लिए सरकार के पास धन की कमी आड़े आ रही है ! बस सड़क पर गुजरते वक्त यही उम्मीद बंधती है कि बारह साल बाद आने वाले अगले महा-कुम्भ तक शायद कुछ सुधार हो जाए !



कुछ अलग सा कहती है

एक सडक वो,

गन्तव्य की ओर बढते हुए,

मैने देखा था

जिस सडक को,

अपने में

अनेकों भिन्नता लिए,

उदास सी,

अधेड चेहरे पर

कुछ खिन्नता लिए,

मैं एक टक, बस एक टक,

उसे ही देखे जा रहा था ।



किस तरह वह,

समेटने की कोशिश मे लगी थी

अपने फटे सीमित आंचल मे,

हर उस पैदल, साइकिल,

दुपहिया, तिपहिया,कार,

बस और ट्रक सवार को,

और तो और,

ट्रैक्टर,गन्ने से लदी बग्गीय़ों

एवं जुगाड को,

एक सचेत भारतीय मां की तरह

बस,

डूबी इसी फिक्र मे,

कि कही उसके कुनवे का

कोई लाड्ला फिसल न जाये,

गिर न जाये,

किसी गड्डे इत्यादि मे,

उसकी बेवसी,

उसके आंचल की दुर्दशा देख,

मैं मंद-मंद मुस्कुरा रहा था ॥





दिन रात लग्न से,

ढोये जाती थी उन मुसाफ़िरों को,

जो अधिकांशत:

अपने-अपने

पाप धोने जा रहे थे।

या फिर लौटते मे,

पुण्य कमाने का अह्सास लिए,

खुशी-खुशी

घर वापस आ रहे थे॥




उसकी इस बेवशी पर,

मुझे मुस्कुराता देख,

वह कुछ

तिलमिला सी गई,

और मुझसे कहने लगी,

कि हंस ले बेटा तू भी,

सुन, आज मैं तुझे बताती हूं ।

वे लोग जो

भगवान् का

नाम नहीं भजते है,

जिन पर,

मुझे सवारने की

जिम्मेदारी है,

वे कुछ धर्मनिरपेक्ष,

शायद मुझे भी

साम्प्रदायिक समझते है,

क्योंकि मेरा दुर्भाग्य

कि मै,

दिल्ली से हरिद्वार जाती हूं ॥



ऐ काश, कि मैं
भी

दिल्ली से मक्का

या फिर रोम जाती।

सुन्दर,

चौडी और सपाट

सडक क्या होती है,

फिर मैं तुम्हें बताती॥

Saturday, March 6, 2010

क्या ज़माना आ गया है !

,
क़दमों को डगमगाना आ गया है,
सच में क्या ज़माना आ गया है,
बदलते हालात संग हमें भी अब ,

हर रिश्ता निभाना आ गया है!

तेरी खुशी की खातिर हमने कर दी,

हर ख्वाइशे कुर्वान अपनी,
सूना है हमें देखकर अब गुलो को भी,

खिल-खिलाना आ गया है !!

तुमसे बिछुड़कर भी कभी,

तुम्हे भुलाना इस कदर आसाँ न था,
वक्त के सित्तम देखो कि न चाह कर भी,

हमें भुलाना आ गया है !

तुम्हे शिकायत यह थी हम से,

हम पाश्चात्य के रंग में रंग गए,
यह न भूलो, तुम्हारे प्यार के खातिर,

हमें भी शर्माना आ गया है !!

ये मत समझना सिर्फ तुम ही माहिर हो,

दिल का दर्द छुपाने में,
अब हमें भी अपने आंसुओ को,

पलकों में छुपाना आ गया है !

जो मिला था मुक्कदर से,

जिन्दगी को वह न कभी रास आया,
मुस्कुराकर तुम कर दो विदा,

क्योंकि अब मेरा ठिकाना आ गया है !!

मेरी जां तू उदास क्यों है ?

(छवि गुगूल से साभार )
ये बेरुखी तुम्हारे इतने पास क्यों है,
मुझे बता मेरी जां तू उदास क्यों है ।

पहलू मे रहे सदा हम तेरे हमदर्द बनकर,
फिर गैर की हमदर्दी इतनी खास क्यों है ।

गर आसां न था तुमको साथ मेरा निभाना,
फिर दिल को मेरे तुमसे इतनी आस क्यों है ।

कठिन है तंग-दिल सनम के दिल मे जगह पाना,
तुम मेरी हो तब भी मुझे ऐसा अह्सास क्यों है ।

बनने चले थे हम तो मधुर इक-दूजे के हमसफ़र ,
आ गई यहाँ फिर ये रिश्तों में खटास क्यों है ।

हमारी तो हर धडकन ही तुम्हारे चेहरे का नूर था,
नजरों की अडचन बना फिर ये तेरा लिबास क्यों है।

जानते हो तुम भी कि जिन्दगी बस इक जुआ है,
बीच राजा-रानी के मगर इक्के का तास क्यों है ।

Thursday, March 4, 2010

तस्सली है कुछ पल तो जी लिए !

(छवि गूगुल से साभार )
सिकवे जुबाँ पे आये जब, हम ओंठों को सी लिए ,
दिल से निकले जो अश्क थे, वो आँखों ने पी लिए!
जुल्म-ए-सितम छुपाये, न तुम्हे अपने गम दिखाए,
हर बात को सह गए, इक तेरी बात का यकीं लिए!!

खुशियों के कारवां गुजर गए, बीच राह में छोड़कर,
वो भी कहाँ तक चलते, संग अपने ऐसा बदनशीं लिए!
गले मौत भी लगा जाते, मरने के बहाने लाख थे,
गफलत में सही, तस्सली है कुछ पल तो जी लिए!!

Tuesday, March 2, 2010

हो ली !

आज प्रस्तुत है होली के पर्व की आखों देखी। मैं जब इस तरह की कवितायें लिखते वक्त अपने सबसे अच्छी श्रोता कह लो या फिर मजबूर श्रोता को सुनाता हूं, तो जबाब देने मे माहिर पत्नी जी का वाह-वाही के तौर पर दिया गया सुक्ष्म सा जबाब यह होता है कि “ख्वाब देखने मे अपने बाप का क्या जाता है ?” :)




खेल गई वो आके मेरे संग होरी,
मुहल्ले मे आई जो इक नई गोरी।
हंसमुख चेहरे पे चंचल दो नैना,
बडी नटखट लागे कमसिन छोरी॥

जल्दी से जाने कब निकट आई,
चुपके-चुपके और चोरी-चोरी।
रंग भरी पिचकारी हाथ धरी,
खुद भीगी, मुझे भी भिगोरी॥

गालों पे जब मलती गुलाल वो,
संग मेरे करके खूब जोरा-जोरी ।
मुझे लगता कुछ ऐसा था मानो,
साबुन लगाके, मुख मेरा धो री ॥

जब से गई वो मेरे संग खेलकर,
ऐसी मद-मस्त रंगीली होरी।
तब से बार-बार उसे याद कर,
तबियत भी रंगीली सी हो री ॥

’होली है’ के उसके सुरीले बोल,
यूं पडे कानों मे ज्यूं गाये लोरी।
खींच ले गई वो पल मे दिल को,
ज्यों ले जाती है पतंग को डोरी।।