Wednesday, December 19, 2012

मर्जी के मालिक हो गए, यहाँ के सब कारिंदे है।













तन-आबरू बचाते कुछ मर गये, तो कुछ जिंदे है,
हर दरख़्त की शाख पर बैठे,डरे-डरे सब परिंदे है

खौफजदा नजर आता है, हर सरपरस्त शहर का,
क्योंकि बेख़ौफ़ सड़कों पे घूमते फिर रहे दरिंदे है।

शठ-कुटिलो का ही है बोल-बाला यहाँ  हर तरफ,  
नारकीय जीवन जी रहे देखो,सुशील (वा)शिंदे हैं।
  
यह न पूछो कि दहशत का ये आलम हुआ कैसे,     
दरवान जो थे, कुछ सोये पड़े है तो कुछ उनींदे है।

शर्म से सर हिन्द का तो, झुक रहा अब बार-बार,
किन्तु बेशर्म बने बैठे भ्रष्ट,जनता के नुमाइन्दे है।
    
दर्द हजारों है, फरियाद करें तो करें किससे 'परचेत', 
मर्जी के मालिक हो गए , यहाँ के सब कारिंदे है।

Saturday, December 15, 2012

सुनहरे तिलिस्म टूटे है


गली वीरां-वीरां सी क्यों है, उखड़े-उखड़े क्यों खूंटे है,
आसमां को तकते नजर पूछे, ये सितारे क्यों रूठे है। 

डरी-डरी सी सूरत बता रही, महीन कांच के टुकडो की,
कहीं कुपित सुरीले कंठ से,कुछ कड़क अल्फाज फूटे है। 

फर्श पर बिखरा चौका-बर्तन, आहते पडा चाक-बेलन,
देखकर उनको कौन कहेगा कि ये बेजुबाँ सब झूठे है। 

तनिक हम प्यार में शायद,मनुहार मिलाना भूल गए,
फकत इतने भर से ख़्वाबों के,सुनहरे तिलिस्म टूटे है। 

अजीजो को झूठी खबर दे दी,'परचेत' तेरे गुजरने की,
वाल्लाह,बेरुखी-इजहार के उनके, अंदाज ही अनूठे है। 

Wednesday, December 5, 2012

मैं हर घड़ी, घड़ी देखता हूँ !




दस्तूरन मैं भी एक मुसाफिर ही था और जिस मंजिल की तलाश मुझे थी वो तुम्हारे ही चौबारे पर आकर खत्म होती थी.…  मेरी मंजिल...... और मैं इकदम अकेला.......... कोई साथ मेरे यदि था तो तुम तक पहुँचने को बेकरार, ये कम्वख्त निहायत ही नादाँ और आवारा दिल। ये नालायक, यथार्थ के धरातल को छोड़ हमेशा ख्याली ऊंचाइयों के गगन में सुपरसोनिक विमानों जैसी उड़ाने भरता रहता। यह मुंगेरीलाल रूपी दिल हमेशा इसी अधेड़-बुन में उलझा रहता कि काश,  किसी तरह वह मेरी जिन्दगी को एक तोप और मेरे शरीर को एक तोप के गोले की तरह इस्तेमाल कर पाता तो  मेरे साबुत जिस्म को ही तोप में डाल,ट्रिगर दबाकर पल-भर में अपनी मंजिल पर जा धमकता। डफर, अक्सर यह भी आस लगाए रखता था कि क्या पता शायद किसी रोज मुझ पर तरस खाकर तुम्हारा कोई अजीज तुम् तक पहुँचने के तमाम अवरोध भरे रास्तों पर फ्लाई-ओवर बनाने का नेक कार्य कर बैठे, मगर, इस इडियट को ये कौन समझाता कि मंजिलों की राह इतनी आसान नहीं होती, क्योंकि बंदिशों की पथरीली,धूल-धर्सित, उबड़-खाबड़ और पैमानों की ऊंची-नीची सड़क, समाज के तमाम भीड़-भाड़ भरे उन चौराहों से होकर गुजरती है जहां कदम-कदम पर तुम्हारे अपने  सगे-संबंधी यातायात पुलिस के सिपाहियों की तरह बहिष्कार का फरमान रूपी चालान हाथ में पकडे खड़े रहते हैं, कि कब मैं खतरे की बत्ती पार करू  और ये कमवख्त,  पुलिस वाले की तरह हाथ दिखाते और व्हिसिल बजाते हुए मेरी नैया को सड़क किनारे खड़ा करके भारी भरकम चालान मेरे हाथ में थमा दें । और बस फिर वही हुआ, जिसका डर था  ............................जिन्दगी की गाडी जाम के झाम में ही फंसकर रह गई।





कभी हाथ, दीवारों पे जडी देखता हूँ,
मेज और  दराजों में  पडी देखता हूँ।

कम्वख्त वक्त का मारा हूँ, ऐ दोस्त,
इसलिए हर घड़ी, मैं  घड़ी देखता हूँ।।
 
लांघा न मेरा दर,कभी तूने फिर भी,
पल-पल सामने तुझे खड़ी देखता हूँ।

जो गुमसुम चलूं, दरख्तों के साए में,
राहें- मोड़ पर तुझे मैं अड़ी देखता हूँ।

थककर के मयखाने का, जो करूँ रुख,
तेरी मद भरी आँखें, मैं बड़ी देखता हूँ।

खुद को देखता हूँ, बिखरते हुए जब,
हाथों में तेरे प्रेम की हथकड़ी देखता हूँ।

यादों की बारात, लौट आती  है द्वारे,
शहर में जब कोई घुड़चडी देखता हूँ।

गूँजती है कानों में वही खिलखिलाहट,
हँसी की जब कोई फुलझड़ी देखता हूँ।

आईने में दीखता है, जब तेरा अक्स,
अश्कों की  आखों में  झड़ी देखता हूँ।

कम्वख्त वक्त का मारा हूँ, ऐ दोस्त,
इसलिए हर घड़ी, मैं  घड़ी देखता हूँ।

Tuesday, November 27, 2012

गली से इठला के निकलती है,चांदनी भी अब तो


















देखके लट-घटा माथे पे उनके,मनमोर हो गए है, 
अफ़साने मुहब्बत के इत्तफ़ाक़,घनघोर हो गए है।

कलतक खाली प्लाट सा लगता था  ये दिल मुआ,
इसपे हुश्नो-आशिकी के अब, कई फ्लोर हो गए है। 

गली से इठला के गुजरती है, चांदनी भी अब तो, 
वो क्या कि चंदा के दीवाने, कई चकोर हो गए है। 

वो क्या जाने देखने की कला, टकटकी लगाकर,  
खुद की जिन्दगी से दिलजले जो, बोर हो गए है।   

राह चलते तनिक उनसे, कभी नजर क्या चुराई,  
नजरों में ही उनकी 'परचेत',अपुन चोर हो गए है।  

Monday, May 28, 2012

नवाबिन और कठपुतली !












पहनकर नकाब हसीनों ने, कुछ पर्दानशीनों ने,
गिन-गिनकर सितम ढाये, बेरहम महजबीनों ने !


लम्हें यूं भारी-भरकम गुजरे ,वादों की बौछारों से,
हफ़्तों को दिनों ने झेला, सालों को महीनों ने !


निष्कपटता,नेकनीयती की नक्काशी के साँचों में,
जौहरी को जमके परखा,सब खोटे-खरे नगीनों ने !

खुदकुशी कर गए वो सब , उस सड़ते रवा को देखकर,
जोत-सींच ऊपजाया जिसको ,जिनके खून-पसीनों ने !

डॉलरिया गस खिला रहे , ईंधन में आग लगा रहे,
अध-मरों को अबके पूरा, मार दिया कमीनों ने !


उड़ता ही देखते रहे सब, उस तंत्र के उपहास को,
कुछ जो फरेबियों ने उड़ाया, कुछ तमाशबीनों ने !


हैरान हैं बहुत नवाबिन के, शातिराना अंदाज से,
शिद्दत से खाया मगर 'परचेत', हर तीर सीनों ने !

Thursday, May 10, 2012

हर ज़ख्म दिल में महफूज़ न छुपाया होता!















तन्हा ही हर दर्द-ए-गम को न भुलाया होता,
मुदित सरगम तार वीणा का बजाया होता !


सरे वक्त जलते न पलकों पे अश्कों के दीये,
हर ज़ख्म दिल में महफूज़ न छुपाया होता!


चाह की मंडियों में अगर प्रेम बिकता बेगरज,
मुहब्बत का तनिक दांव हमने भी लगाया होता !


मुद्दतों से उनीन्दे शिथिल तृषित नयन आतुर,
भोंहें सहलाकर न इन्हें खुद ही सुलाया होता !


रास आ जाती सोहबत किंचित मुए चित को,
दीपक प्यार का इक हमने भी जलाया होता !


गैरों के जुर्म-कुसूर को भी अपना कबूलकर,
सर अपने हर तोहमत को न उठाया होता !


अगर मिलती न कम्वख्त ये खलिश 'परचेत',
मुकद्दर को हमने यूं पत्थर न बनाया होता !

Saturday, March 3, 2012

प्रणय गीत- तुम मिले !













कातिबे तकदीर को मंजूर पाया,             (कातिब-ऐ-तकदीर=विधाता)


तस्सवुर में तेरा हसीं नूर पाया।            (तस्सवुर में = ख्यालों में )


बिन पिए ही मदमस्त हो गए हम,


तरन्नुम में तुम्हारे वो सुरूर पाया।              (तरन्नुम= गीत )


कुछ बात हममे है कि तुम मिले,


मन में पलता ये इक गुरुर पाया।


सेहर हसीं और शामे  रंगीं हो गई,            (सेहर = सुबह )


तुमसा जब इक अपना हुजूर पाया।


जब निहारने नयन तुम्हारे हम गए,


प्यार के खुमार में ही चूर पाया ।


बेकस यूँ लगा खो गई महक फूल की,    (बेकस = अकेला )


तुम्हें जब कभी खुद से दूर पाया।

बादह-कश !












मुरीद ये माह-जबीं
मधुशाला के दर पर,
एक जीवन जी गया,
आब-ऐ-आतिश,
आधी खपी बांटने में,
बाकी बची खुद पी गया।

आब-ऐ-आतिश= शराब
फिर शाम रंगीं
मीना की हुई, छूकर
गुलाबी आतिश-ऐ-तर,
मय को दर्द-ऐ-दिल में
जन्नत मिली,
साकी लब सी गया।

मीना-मय की प्याली, आतिश-ऐ-तर=आशिक के ओंठ
हमनशीं को रख लिया
दिल में छुपाकर,
जाहिरी के खौफ से,
अल्फ़ाजों ने अपनी चाल बदली,
रंग चेहरे का आफताबी गया।

आफताबी= सुनहला रंग (सूरज जैसा)
पलक ही बंद हम कर गए थे ,
नजरें मेहरबाँ होने से पहले,
इर्द-गिर्द गश्त-ऐ-काएनात में,
मुकम्मल भूगोल भी गया।

गश्त-ऐ-काएनात= दुनिया की सैर
ख्वाइशे जाने कहाँ
गुम हो गई फिर,
दश्त की वीरानियों में,
ज़ुल्मत में, दीदार
चाँद-तारों का हुआ,
हुनर आगाही गया।

ज़ुल्मत=अंधकार में, आगाही= चेतन युक्त बादह-कश = शराबी
छवि  गूगल  से  साभार ! 

वक्त आयेगा एक दिन !






















दिन आयेगा महफ़िल में जब, होंगे न हम एक दिन,
ख़त्म होकर रह जायेंगे सब रंज-ओ-गम एक दिन।


नाम मेरा जुबाँ पे लाना, अखरता है अब तक जिन्हें ,
जिक्र आयेगा तो नयन उनके भी होंगे नम एक दिन।


किस तरह भी रखा कायम, हमने अपने वजूद को,
इल्म न था इस कदर हमपर होंगे सितम एक दिन।


जख्म रहें ज़िंदा सदा ये सोचकर, उन्हें खरोचता रहा,
दिल पिघलेगा, वो आएंगे,  लगाने मरहम एक दिन।


ढुलमुल यूँ इसतरह कबतक, चलती रहेगी जिन्दगी,
कुछ न कुछ सख्त तो उठाने ही होंगे कदम एक दिन।


महंगी वसूली हमसे 'परचेत',कीमत हमारे शुकून की,
वक्त आयेगा जब भाव उनके भी होंगे कम एक दिन।




छवि गूगल से साभार !

सुखांतकी !


इस रंगशाला के हम मज़ूर
कोई कुशल, कोई अकुशल, 
कोई तन-मन से,
कोई अनमन उकताया  सा,  
निभा तो रहे किन्तु सब 
अपना-अपना किरदार !
पर्दा उठते ही अभिनय शुरू  
और गिरने पर  ख़त्म !!
मगर कभी-कभी कम्वक्त
मुंह बायें खडा यक्ष-प्रश्न   
मन  उद्द्वेलित कर जाता है; 
कि क्या उचित है तब, जब 
रंगकर्मी ही  तंग आ जाए  
किरदार निभाते-निभाते;
समर्पण अथवा परित्याग ? 

शिव अराधना !














अनुतप्त न होगा कभी तेरा मन,

कर भोर भये भोले का सुमिरन|

रख शिव चरणों में मनोरथ अपना,

निश्चित मनोकामना होगी पूरन||



सरल सहृदय मन कृपालु बड़े है,

जय भोलेनाथ सन्निकट खड़े है|

अनसुलझी रहे न कोई उलझन,

कर भोर भये भोले का सुमिरन||


सिंहवाहिनी सौम्य छटा में रहती,

तारणी प्रभु शीश जटा से बहती|

ढोल, शंखनाद, घडियाली झनझन,

कर भोर भये भोले का सुमिरन||


नील कंठेश्वर इस जग के रब है,

धन-धान्य वही, वही सुख-वैभव है|

प्रभु-पाद सम्मुख फैलाकर आसन,

कर भोर भये भोले का सुमिरन||



तारणहार जयशंकर विश्व-विधाता,

सर्व शक्तिमान शिव जग के दाता|

न्योछावर करके अपना तन-मन,

कर भोर भये भोले का सुमिरन||
.
.
 

नासमझ !














की होती अगर थोड़ी  वफ़ा जिन्दगी से,
तो होते न इस कदर खफा जिन्दगी से !


बढ़ाए जो कदम होते  ख्वाइशों के दर पर,
मुहब्बत फरमाकर इक दफा जिन्दगी से !


बनता न  दस्तूर तब ये जमाने का ऐसा,
रख लेता कमाकर जो नफ़ा जिन्दगी से !


किये क्यों बयां राज बेतकल्लुफी के ऐंसे,
बदले  में पाई जो हरदम जफा जिन्दगी से ! 


ऐतबार  बनता  न बेऐतबारी का  सबब,
जुड़ जाता जो इक फलसफा जिन्दगी से !  


छवि  गूगल  से  साभार ! 

संत खुशफहमी !


अति सम्मोहित ख्वाब
कैफियत तलब करने
आज भी गए थे
उस जगह, जहां कल
रंगविरंगे कुसुम लेकर
वसंत आया था !
ख़याल यह देखकर
विस्मित थे कि उन्मत्त
दरख्त की ख्वाईशें,
उम्मीद की टहनियों से
झर-झर उद्वत
हुए जा रही थी,
पतझड़ पुन: दस्तक दे गया था  
या फिर वसंत के
पुलकित एहसास ही
क्षण-भंगूर थे, नहीं मालूम !!

दल बदल गए यार सारे !


मन-बुद्धि में धन,शोहरत के,चढ़ गए खुमार सारे,
जिस्म दुर्बल नोचने को, हैं गिद्ध,वृक तैयार सारे।


बर्दाश्त न थी पलभर जुदाई, परम जिस दोस्त की,
वक्त ने जब चाल बदली, दलबदल गए यार सारे।


खो रहा निरपराध भी अब,हक़ अपनी फरियाद का,
रहनुमा बनकर रह गए, वतन के गुनहगार सारे।


जाति,मजहब उन्माद में, है आवाम रंगी जा रही,
नाकाम बनकर रह गए, अमन के हथियार सारे।


कर्तव्यनिष्ठा रह गई, इन्तजामियों की दास बनकर,
हो रहे तंत्र की कब्र में दफ़न,इनके भ्रष्टाचार सारे।


दामन शिष्टता का भी ले गई, निर्लज्जता चीरकर,
नाटे पड़े 'परचेत'अब,इनके लिए तिरस्कार सारे।

छवि  गूगल   से  साभार ! 

क्षणिकाएँ !

देह माटी की,


दिल कांच का,


दिमाग आक्षीर


रबड़ का गुब्बारा,


बनाने वाले ,


कोई एक तो चीज


फौलाद की बनाई होती !


xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx


नयनों में मस्ती,


नजरों में हया,


पलकों में प्यार,


ये तीन ही तो विलक्षणताएँ


प्रदर्शित की थी महबूबा ने


मुह दिखाई के वक्त !


वो हमसे रखी छुपाये,


तेवर जो बाद में दिखाये,


नादाँ ये नहीं जानती कि


सरकारी मुलाजिम से


महत्वपूर्ण जानकारी छुपाना,


भारतीय दंड संहिता के तहत


दंडनीय अपराध है !!


xxxxxxxxxxxxxxxxxx


दहशतें बढ़ती गई,


जख्म फिर ताजा हुआ,


हँस-हँस के बजा जो कभी


वो  बैंड अब बाजा हुआ,


तेरी बेरुखी, तेरे नखरे,


कर देंगे इक दिन मेरा


जीना मुहाल,


छोड़कर बच्चे जिम्मे मेरे


जब तुम मायके चली गई


तब जाके ये अंदाजा हुआ !


xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx


ये मैंने कब कहा था


कि तुम मेरी हो जाओ,


सरनेम (उपनाम ) बदलने को


तुम्ही बेताव थी !!


xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx


क्या तुम जानती हो कि


यह सूचना मिलने पर


कि तुमने अपना


घर बसा लिया,


तुम्हारी माँ,


यानि मेरी सास ने


३ फुट गुणा ६ फुट का


पर्दा क्यों भेजा था?


क्योंकि वो जानती थी कि


महंगाई और


मंदी के इस दौर में


शहरी लोगो के पास


परिधानों की


अत्यंत कमी चल रही है !!



रिश्तों का इल्म !


धड़कन का दिल में बसने,
जीवन के सहभागी बनने हेतु
रिश्तों की बुनियाद में
यकीन नाकाफी क्यों?
इकरारनामे को मुद्रांकित
करवाने की हठ-धर्मिता कैंसी?
तुम जानती हो कि
अनुबंध असीम नहीं होते,
और मैं पंजीकृत पट्टानुबंध के तहत
सिर्फ तयशुदा वक्त के लिए ही
एकनिष्ठता की इस कोमल डोर को
रहन पर नहीं रखना चाहता,
क्योंकि मियाद खत्म होने के बाद
यह मुसाफिर तन्हा ही फिर से
दश्त का वीरान सफ़र तय नहीं कर पायेगा!

संकल्प !

क्षमा चाहता हूँ कि कल रात को शहीदी दिवस यानि ३० जनवरी हेतु एक कविता लिखने बैठा था और गलती से सेव करते हुए पब्लिश का बटन क्लिक कर गया था ! खैर, वैंसे  तो रविवार को वक्त कम ही मिलता है, लेकिन आज मेरे पास वक्त ही वक्त था, इसलिए आज ही इसे पूरा कर यहाँ आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ ;


   
भ्रष्टाचार के इस कानन में,
आग लगाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ।

अशक्त जन का हो रहा,
प्राबल्य सद्सद्विवेक नाश,
घर कर बैठे मन में भय को,
दूर भगाना चाहता हूँ॥


परिवार एवं बंशवाद का,
हम पर कोई राज न हो,
देश तमाम में जनमानस,
रोटी को मोहताज न हो।

प्रतिरूप हो जिसमे प्रजा का,
राज वो पाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥


महाभारत के कौशल में,
उपोद्घात न कोई छक्कों का,
जन्नत और न बने अब यह,
लुच्चे, चोर-उचक्कों का।

अस्मिता का मातृभूमि की,
गीत मैं गाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥


इंसाफ  पाने की अभिलाषा,
दीन से हरगिज दूर न हो,
खुदकुशी करने को कृषक, 
अपना कोई मजबूर न हो।

उपजी  युवा दिलों  की
कुंठाओं  को दबाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥


क्षुद्र सियासी लाभ हेतु,
इंतियाज न कोई संचित हो,
सम-सुयोग मिले सबको,
हक़ से न कोई वंचित हो।

ऊँच-नीच, धर्म-जाति का,
हर भेद मिटाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥


हर घर में यहाँ रोज
क्रिसमस, ईद और दीवाली हो,
देश के कोने-कोने में,
सुख-समृद्धि व खुशहाली हो।

शहीदों के सपनों का सच्चा,
स्वराज मैं लाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥


छवि गूगल से साभार !




.

नाम की क्या फिकर तुझको.....

आज आप पहले मेरा ताजातरीन जोक पढ़िए, फिर नज्म ;

एक पड़ोसन दूसरी से पूछती है; तुम अपने शौहर से इतना क्यों झगडती हो,

आखिर इसका आउटकम क्या निकलता है?

दूसरी पड़ोसन: क्या करू, झगड़ना तो मैं भी नहीं चाहती मगर, वो घर से आउट कम निकलते है.....................:) :)











रूठो न इस तरह कि बात ख़ास से आम हो जाए,
अकुलाहट धडकनों की हयात सुबह की शाम हो जाए।

कुछ इस तरह संभाले हम, बिखरने की ये कवायदें,
फजीहत न महफ़िल में,रिश्तों की सरेआम हो जाए।

ढूंढें फिरे तहेदिल से, नफरतों में तेरी मुहब्बत को,
फीके न पड़े ये जलवे, कोशिश न नाकाम हो जाए।

संजोकर रखे हुए जख्मों को जरा मरहम लगाकर के,
दिलों को यूं मनायें कि जाँ, इक-दूजे के नाम हो जाए।

आगाज कर 'परचेत' कुछ ऐंसा सुखद अंजाम हो जाए,
नाम की क्या फिकर तुझको, मुन्नी बदनाम हो जाए।
छवि गुगुल से साभार

ऋतुराज यह वसंत आया !


छंट गया धरा से शिशिर का सघन कुहा ,

सितारों से सजीला तिमिर में गगन हुआ।


भेदता है मधुर कुहू-कुहू का गीत कर्ण,

आतप मंदप्रभा का हो रहा अपसपर्ण।


लाली ने छोड़ दी अब ओढ़नी पाख्ली,

मधुकर  ने फूल से मधु-सुधा  चाख ली।


डाल-पल्लव कोंपलों के रंग प्रकीर्ण है,

छटा-सौन्दर्य से हर चित माधुयीर्ण है।


जोत ने धारण किया सरसों के हार को,

उऋर्ण कर दिया अब शीत ने तुषार को।


भावे मन अमवा,महुआ की इत्रमय बयार,

सजीव बन गए सभी जवां और बूढ़े दयार।


विभूषित वसुंधरा बिखेरती पुरातन सुवर्ण,

कश्मीर से केरला, मणिपुर से मणिकर्ण।


तज सभी उद्वेग-रंज, खुशियाँ अनंत लाया,

करने पूरी मुराद ऋतुराज यह वसंत आया।।



शब्दार्थ: आतप मंद्प्रभा = सूरज की मंद किरणे, सघन कुहा= घना कुहरा,

अपसपर्ण=विस्तारण , पाख्ली = गर्म शॉल, प्रकीर्ण= भिन्न-भिन्न,

माधुयीर्ण=प्रमोद से भरा, उऋर्ण=भारमुक्त, तुषार= ओंस

छवि गुगुल से साभार !


Wednesday, January 11, 2012

काव्य-भरता !


फैसला फर्ज है
हुकूमत का मगर
अज्ञ कारिंदे* को
यह नहीं दिखता,
कि उड़ता है
कैंसे सरेआम
मजाक उनके फरमान का।

जिन्दगी तमाम हुई
कर निस्तारण में ,  
सरकार !
कुछ करो ऐंसा कि
मुर्दे को खुद ही
महसूल* भी
चुकाना पड़े शमशान का।
अनहद के अभ्यस्त 
जो है उन्हें यदि
रोक न पायें सरहदें,
खुदा ही मालिक है
फिर तो
इंसानियत के कदरदान का।

सोचा था
चुकता करेंगे प्रभु-उधार
ह्रस्व* आटे के पिंड से,
जनेऊ बह गया
धार में,
न पंडत तरा, न यजमान का।

इज़हार-ऐ-बेकसी
मन की
कोई तब
करे किससे,
अजनबियों के देश में,
न हो कोई अपनी पहचान का।

माना कि
वो आये थे दर पे
घोड़ियों पर चढ़कर,
थामकर तुम
निकले ही क्यों थे
दामन, अजनबी-अनजान का।

पीड़ा का मर्म
न समझे जो
उसे इंसान कहना
फिजूल है ,
खिजां* में डाली भी
बूझती है दर्द  
नख्ल़* से बिछड़े ख़ेज़ान* का।

सारे वादे और
अल्फाज बेअसर,
मुमकिन नहीं
यकीं दिलाना,
भरोसा  न  रहे
जब राम का,
न खुदा के रहमान का।

बदलते वक्त संग
उपकार भी
बदल रहा है पोशाके,
तोहफों से
चुकाने लगे लोग
बदला हर इक अपमान का।

रिश्तों के क़त्ल को
देकर नाम,
खुदगर्जों ने
प्रजाशाही  का,
खाप-पंचायत,
चौपालों में रोज
हाट सजता है झूठी शान का।

सुकून-ए-दिल
मिलता है महत*  
यथेष्ठ  मार-दर्शन करके ,
अंतर्द्वंद्व में गुम्फित,
कुंठित और
दिग्भ्रमित किसी नादान का।

शिक्षा की उपादेयता

तब विघ्नित मानिए
शत-प्रतिशत,
कतिपय जब
व्यावहारिक न हो 
उपयोग अर्जित ज्ञान का।


कारिंदे=कर्ता-धर्ता , महसूल = शुल्क (टैक्स) ,  ह्रस्व = छोटे ,  खिजां = पतझड़ ,नख्ल़ = पेड़ ,  ख़ेज़ान= पत्ता, महत = बहुत