Thursday, December 29, 2011

कबाब में हड्डी !



उद्विग्न,शिशिर,तिमिर व्योम की भी आँखे भर-भरा आई,
प्रीति पर ग्रहण लगा, जब निष्कपट प्रेम बीच धरा आई !


तोड़ डाला बेदर्दी से निष्ठुर ने, आशिक-मासुका का दिल,
जननी धीर की, क्यों उसको उनपर, रहमत न जरा आई !


दिनकर चला था करने,दीदार उसके हुस्नो-शबाब का,
योवन की इक लहर आई, शशि बनके अप्सरा आई !


सज-संवर,खिले मुख यों सम्मुख खड़ी थी आदित्य के,
ज्यों नज़्म फिर घूमकर वापस मुखड़े पे अंतरा आई !


इत्तेफाक देखता रहा चिलमन में दम तोडती संवेदना 'परचेत',
प्रेम-बंधनों में विरक्ति लाने की यह कैसी परम्परा आई !

Wednesday, December 28, 2011

यही वो पाप है जिसपर,जुर्माना नहीं लगता !

घर घराना नहीं लगता, सफ़र वीराना नहीं लगता,
ठट्ठा खाते-खाते अब तो, ताना,ताना नहीं लगता !



घुसे हैं जबसे डोमिनो,इटैलियन,चाइनीज पकवानों में,
'लजीज'गुम-शुदा हो गया, खाना, खाना नहीं लगता !



अपने-पराये के रिश्तों को,जख्म इतना उलझा गए,
लगते है यहाँ सभी अपने,कोई बेगाना नहीं लगता !



अंक अल्पतर पड़े जबसे,अपने उम्रदराज ऐनक के,
बहुत जाना हुआ चेहरा भी,अब पहचाना नहीं लगता !



चतुर करार दिया मुझको,मेरे प्राण-बीमा कराने पर,
यही वो पाप है 'परचेत'जिसपर,जुर्माना नहीं लगता !(*)







नोट : इस गजल को मुख्य ब्लॉग पर देखने हेतु कृपया गजल के शीर्षक पर क्लिक करें !





(*)उलटे मुआवजा मिलता है, घरवालों को :)

Tuesday, December 6, 2011

कौतुक स्वांग !


झुकी पलके उठाकर के, खुली जुल्फें सवारेगी,
कजरारे मस्त नयनों से नरम परदा भी तारेगी,

एक रोज बैठकर अपने, अरमानों की डोली में,
नुक्कड़ से गुजरते साक़ी जब मधुशाला निहारेगी !

हाला अंगूरी नादाँ, जो हर ख्वाइश पे मरती थी,
फलक पे खड़े-खड़े अपनी किस्मत पर विचारेगी !

दिलजले आतुर खड़े होंगे, पीने को कतारों में,
तंदूर पर तड़पते मुर्गे को वो प्यासा ही मारेगी !

गमजदा महलों के वाशिंदे भी, हैराँ-परेशाँ होंगे,
मुग्ध-मुद्रा में उन्हें 'आइये हुजूर' कौन पुकारेगी !

Monday, December 5, 2011

पशोपेश !






मुकद्दर की लकीरों से
तेरे नाम के महल का

एक ख़ूबसूरत आरेखण

मैंने भी सजाया था,

और चला था मैं

हिमालय के ठीक सामने

यादों की वह

मनचाही

ऊँची मीनार

खडी करने !

मगर दिल के जज्बात

कब इन्तकामी हो गए,

नहीं मालूम !!







Thursday, December 1, 2011

प्यासा हलक !


एक मंझे हुए, कुशल


आखेटक की भांति,
टकटकी लगाए

तकती रही वो तब तलक !
कमवक्त एक तरसाती बूँद,
पा नहीं गया जब
उसका तड़पता जिस्म
और प्यासा हलक !

वक्त सचमुच
बहुत बदल गया है ,
जभी तो,
जरूरत पर अक्सर
अब बादल भी
बेवफाई कर जाते है,
और धरा के कंठ से
दूर पहाड़ों पर
मीठे जलगीत भी नहीं फूटते !!