Wednesday, June 9, 2010

हौंसला !


इसलिए प्यार है मुझे,
इसलिए मिस करता हूँ ,
उन ख़ूबसूरत ऊँचे पहाडो को,
जिनके,कहीं चिकने,
कहीं खुरदुरे सीनों पर,
मरहम की तरह लिपटी,
नरम-मुलायम बर्फ
जब पिघलकर,
बूँद-बूँद आंसुओ की तरह बहकर
कहीं ओझल होती है तब भी,
अपने ह्रदय को तड़पता छोड़
जग दिखावे को,
वह दृडता और शालीनता,
चेहरे पर ओढ़े रखता है!
वहीं लंबा, तनकर सीधा खडा,
चीड़ का पेड़,
जब ताप से बचने को लोग
शीतलता ढूंढते है ,
वह अपनी छुन्तियों से,
जेठ की तपती दोपहर में,
हौंसले झाड़ता है,
जिन्हें बचपन में हम लोग
लग्न और तत्परता से
समेटा करते थे !
छूट गई वो हिम्मत
शहर आने के बाद,
उन हौंसलों को एक बार फिर से
बटोर लाने का दिल करता है !

No comments: