Tuesday, January 25, 2011

अग्नि-पथ !

लुंठक-बटमारों के हाथ में, आज सारा देश है,
गणतंत्र बेशक बन गया, स्वतंत्र होना शेष है !
सरगना साधू बना है, प्रकट धवल देह-भेष है,
गणतंत्र बेशक बन गया, स्वतंत्र होना शेष है!!

भ्रष्ट-कुटिल कृत्य से, न्यायपालिका मैली हुई,
हर गाँव-देश, दरिद्रता व भुखमरी फैली हुई !
अविद्या व अस्मिता, अभिनिवेश, राग, द्वेष है,
गणतंत्र बेशक बन गया, स्वतंत्र होना शेष है!!

राज और समाज-व्यवस्था दासता से ग्रस्त है,
जन-सेवक जागीरदार बना,आम-जन त्रस्त है !
प्रत्यक्ष न सही परोक्ष ही,फिरंगी औपनिवेश है,
गणतंत्र बेशक बन गया, स्वतंत्र होना शेष है!!

शिक्षित समझता श्रेष्ठतर है,विलायती बोलकर,
बहु-राष्ट्रीय कम्पनियां नीर भी, बेचती तोलकर,
देश-संस्कृति दूषित कर रहा,पश्चमी परिवेश है,
गणतंत्र बेशक बन गया, स्वतंत्र होना शेष है!!

Friday, January 21, 2011

मातृ-भूमि की पुकार !








तुम्हे मादरे हिंद पुकार रही है,उठो सपूतों,
तुम वतन के मसले पर, ढुलमुल कैसे हो !
बहुत लूट लिया देश को इन बत्ती वालों ने,
अब यह सोचो, इनकी बत्ती गुल कैसे हो!!

हर हाल, हमको इनसे देश बचाना होगा,
स्वावलंबन पथ पे नव-अंधड़ लाना होगा!
दूषण विरुद्ध हमारा बुलंद बिगुल कैसे हो,
अब यह सोचो, इनकी बत्ती गुल कैसे हो!!

एक और जंग हमको फिर लडनी होगी,
आजादी की उचित परिभाषा गढ़नी होगी!
अलख जगाये,उज्जवल आगे कुल कैसे हो,
अब यह सोचो, इनकी बत्ती गुल कैसे हो!!

जाति-धर्म,वर्ग वैमनस्यता छोडनी होगी,
दिल में वतन-परस्त भावना जोड़नी होगी!
देश-प्रेम का जर्जर, मजबूत ये पुल कैसे हो,
अब यह सोचो, इनकी बत्ती गुल कैसे हो!!



छवि गूगल से साभार

कैसा कलयुग आया देखो !

घनघोर अन्धेरा छाया देखो,
कैसा कलयुग आया देखो !
भद्र अस्तित्व को जूझ रहा,
शठ-परचम लहराया देखो !!

गोवा, बांदा, पूर्णिया देखो,
विधि-तंत्र चरमराया देखो !
डाकू बना विधायक घूमे,
लोकतंत्र शरमाया देखो !!

कुकर्मी निर्भय घूम रहे है,
दण्डित अबला काया देखो !
सृष्टि भूख से अति त्रस्त है,
केक काटती माया देखो !!

गगन खो रहा रंग अपना,
भू पर नील गहराया देखो !
जीवित तो उपचार रहित है,
मूर्ति पर धन बरसाया देखो !!

इंतियाज़ चरम को चूम रहा,
ऐसा राम-राज्य पाया देखो !
घनघोर अन्धेरा छाया देखो,
कैसा कलयुग आया देखो !!

गुजरे दशक का लेखा-जोखा !

शठ, रंक-राजा दुर्जनों का, काम देखा,काज देखा,
हमने ऐ सदी इक्कीसवीं,ऐसा तेरा आगाज देखा।

बनते हुए महलों को देखा, झूठ की बुनियाद पर,
छल-कपट, आडम्बरों का,इक नया अंदाज देखा॥

भरोसे को दर्पण दिखाया, विकिलीक्स-आसांजे ने,
छलता रहा जो दोस्त बन,हर वो धोखेबाज देखा।

अरसा गुजर गया कहने को, रजवाड़े त्यागे हुए,
जनतंत्र संग पल रहा,फिर भी एक युवराज देखा॥

मुंबई साक्षी बना, मजहबी नफ़रत-ए-जुनून का,
दहशती शोलों मे लिपटा, देश का वो ताज देखा॥

नमक,प्याज-रोटी, जो दीन-दुर्बल का आहार था,
खून के आंसू रुला गया, हमने ऐसा प्याज देखा।

असहाय माँ देखी शिशु को, घास की रोटी खिलाती.
बरसाती गोदामों में सड़ता, सरकारी अनाज देखा॥

फक्र था चमन को जिस,अपने तख़्त-ए-ताज पर,
चौखटे एक दबंग चंड की,दम तोड़ता वो नाज देखा।

उम्मीद है कि राम-राज लाएगा, आगामी तेरा दशक ,
माँ कसम,अबतक तो हमने,सिर्फ जंगल-राज देखा॥

दिल तू इतना नादाँ क्यों है !

ऐ मेरे वहशत-ए-दिल, मुझको बता, तू इतना नादाँ क्यों है,
एहसास-ए-जिगर गैरों को बताके ,फिर होता परेशाँ क्यों है।

छुपा न अब, जमाने पर यकीं करके तूने फरेब खाया है,
गर जख्म खाए नहीं, तो चहरे पे उभरते ये निशाँ क्यों है।

अपने ठहरे हुए मुकद्दर में, तू भी सुख का तिलिस्म ढूंढ,
जिन्दगी की रुसवाइयों से डरकर, हो रहा तू हैराँ क्यों है।

यूँ तो हर बिखरे ख्वाब को भी, शिकस्त का गम होता है,
पर सीने के सुलगते दोज़ख में, शीतल तेरे अरमाँ क्यों है।

जाम-ए-अश्क छलकने दे, जज्बातों का दम घुटने पर,
फिर कोई ये न कहे तुझसे, ऐसा अंदाज-ए-बयाँ क्यों है।

यादों के दरीचे खोले रख 'परचेत', धडकनों के आहाते में,
वजह रहे न कुछ कहने को, फासला इताँ दर्मियाँ क्यों है।

नीलामी !

काश कि

अगर मैं भी,

अपने ही कुनवे में

हर खिलाड़ी की तरह,

खिलाड़ी न आम होता !

इस देश के

क्रिकेटरों की तरह,

आज कौमियत की

किसी आईपीएल मंडी में,

मैं भी नीलाम होता !!

बोलियाँ लगती बड़ी-बड़ी,

इंसानियत तकती खडी-खडी,

धन-कुबेर दर खट-खटाता !

खुश होता गर,

मै भी

अच्छे भाव बिक जाता !!

आज, चूँकि जब

इंसान का हर ऊसूल,

घन-कुबेर पर ही

टिका हुआ है !

इसीलिये तो,

समूचे कुनवे का

मुखिया भी बिका* हुआ है !!







* एक इटालियन के हाथों

दुआ-शुभकामना !

राष्ट्र-सम्पदा को लूट खा रहा हर रंक, राजा बनकर,
जांच के मरहम से जख्म उभरे है और ताजा बनकर।
भेड़ की खाल में घूमते फिर रहे भेड़िये, गली-चौबारे,
कुटिलता, भद्रता पर हावी है, वक्त का तकाजा बनकर॥

गुजरा साल तो बस यूँ ही गुजर गया ;

दिवस तीन सौ पैसठ साल के, यों ऐसे निकल गए,
मुट्ठी में बंद कुछ रेत-कण, ज्यों कहीं फिसल गए।
दरमियां अवसाद धड़कन भी, दिल से बेजार लगी,
खुश लम्हों में जिन्दगी,चंचल निर्झरिणी धार लगी।
संग आनंद, उमंग, उल्लास कुछ आकुल,विकल गए,
दिवस तीन सौ पैसठ साल के, यों ऐसे निकल गए।
सुख-समृद्धि घर-घर आये,सबको ढेरों खुशियाँ मिले,
मंगलमय हो वर्ष नव, मन-उपवन आशा फूल खिलें।
लम्हा-लम्हा सबका रोशन होवे, अंधियारे ढल गए,
दिवस तीन सौ पैसठ साल के, यों ऐसे निकल गए।

सुण ओए वोट-बैंक सुण !

न आज देश बना, चोरो का निवाला होता,
न तख़्त-ए-ताज लुच्चों ने संभाला होता।
सुण ओए वोट-बैंक ,ऐसा दिन न आता,
वोट तुमने सोच-समझकर डाला होता॥

उपकार अपेक्षा व्यर्थ है भिखमंगो से,
दरवार को पाट दिया भूखे-नंगो से।
आज न भ्रष्टाचार का बोलबाला होता,
वोट तुमने सोच-समझकर डाला होता॥

ओंछे माई-बाप के चरण चूम रहे है,
हिस्ट्रीशीटर जन-प्रतिनिधि बने घूम रहे है।
पंक में धंसा न नीचे से ऊपरवाला होता,
वोट तुमने सोच-समझकर डाला होता॥

Thursday, January 20, 2011

नवगीत- हम भारत वाले! (रिमिक्स)

करलो जितनी जांचे,
आयोग जितने बिठाले,
नए साल में फिर से करेंगे,
मिलकर नए घोटाले !
हम भारत वाले, हम भारत वाले !!

आज पुराने हथकंडों को छोड़ चुके है,
क्या देखे उस लॉकर को जो तोड़ चुके है,
हर कोई जब लूट रहा है देश-खजाना,
बड़े ठगों से हम भी नाता जोड़ चुके हैं,
बडे कार-बंगले, उजली पोशाके,
कारनामे काले !
हम भारत वाले, हम भारत वाले !!

अभी लूटने है हमको तो कई और खजाने,
भ्रष्टाचार के दरिया है अभी और बहाने,
अभी तो है हमको समूचा देश डुबाना,
देश की दौलत से हैं नए-नए खेल रचाने,
आओ मेहनतकश पर मोटा टैक्स लगाए,
नेक दिलों को खुद जैसा बेईमान बनाए,
पड़ जाए जो इक दिन फिर
इमानदारी के लाले !
हम भारत वाले, हम भारत वाले !!

करलो जितनी जांचे,
आयोग जितने बिठाले,
नए साल में फिर से करेंगे,
मिलकर नए घोटाले !
हम भारत वाले, हम भारत वाले !!


जय हिंद !

अहसास !




ये बताओ,
तुम्हारे
उस बहुप्रतीक्षित
कुम्भ आयोजन का
क्या हुआ,
जो तुम्हारी
हुश्न, मुहब्बत
और वफ़ा की त्रिवेणी पर
अर्से से प्रस्तावित था ?

मैं तो कबसे
अपने मन को
इस बात के लिए
प्रेरित किये था कि
इस बार मैं भी
संगम पर,
जिगर के कुछ दाग
धो ही डालूँगा !

अब तो यही सोचकर
संयम पैरोंतले से
फिसलता नहीं
कि प्रतीक्षा करवाना
तुम्हारी पुरानी आदत है !!

मेरी बला से !

लड़कपन बिगड़ गया, माँ-बाप के लाड में,
यौवन में संग अंतरंग हम चढ़ गए झाड में।

कुछ ने तो पा लिया बुलंदियों को प्यार की,
कुछ रह गए जो हतभाग्य, वो गए खाड में।

अब दिखाते किसे हो ये भय बदनामियों का,
हम तो सदा यूँ ही प्यार करते रहेंगे आड़ में।

जी-भर के करेंगे मुहब्बत अपने हमनशीं से,
दर्द होवे चाहे जितना जगवालों की दाड में।

जमाना दे हमें जितना,अधर्मियों का ख़िताब,
हम तो हमेशा यों ही लगे रहेंगे जुगाड़ में।

देख हमको भला अब कोई नाक-भौं सिकोडे,
हमारी बला से,दुनिया जाये तो जाये भाड मे॥

हरामखोर !

भूखे-नंगे,लालची,हरामखोर परजीवी,
'पेट-भर' खा गए,
जो मेहनत का अपनी भरा था मैने,
वो 'कर' खा गए !

टूजी, सीडब्ल्युजी, बैंक,एलआइसी,
आदर्श 'हर' खा गए,
जो मेहनत का अपनी भरा था मैने,
वो 'कर' खा गए !!

कोड़ा, कारगिल,क्वात्रोची, आइपीएल,
चारा और हवाला,
तेलगी, हर्षद, केतन, राजु-सत्यम,
कर्नाटक जमीन घोटाला !

और तो और ये कारगिल शहीदों के भी
'घर' खा गए,
जो मेहनत का अपनी भरा था मैने,
वो 'कर' खा गए !!

कुल २० हजार खरब खा चुके,
हरामखोर कितना खाते है,
कर्म से तो हैं ही, शक्ल से भी ये
चोर नजर आते है !

अवैध निर्माण करके ये दिल्ली का,
'लक्ष्मीनगर' खा गए,
खुद अद्धपेट रहकर जो भरा था मैंने,
वो 'कर' खा गए !!

नई आश !

बेचकर इज्जत, धर्म-ईमान,
सिर्फ दौलत का भूखा हुआ इंसान,
निकम्मे माली की बदौलत,
लावारिस बनकर रह गया उद्यान !

चोर साफ़ करते है तिजोरी,
बेखौफ बजाकर नगाड़े !
वक्त जौन सा भी हो,
दिन-दहाड़े अथवा रात-दहाड़े !
जिसे देखो हर कोई,
बस अपना ही स्वार्थ जुगाड़े !
देश का कानून भी अब तो,
आता नहीं इनके आड़े !

या खुदा ! बद-इन्तजामियों का
यह सूरज कब तक ढलेगा ?
तू ही बता, अपना देश
और कितना भगवान् भरोसे चलेगा ?

शायद !

गर फैसले हमने गैरों पे टाले न होते,

तो आज देश में इतने घोटाले न होते।

सांप-छुछंदर आस्तीन में पाले न होते,

तो आज देश में इतने घोटाले न होते॥

मक्कार खुद छुपे रहकर परदे के पीछे,

कठपुतलिया नचाये, डोरी से खींचे।

सिंहासन, कैकई-धृतराष्ट्र संभाले न होते,

तो आज देश में इतने घोटाले न होते ॥

हर कोई रमा बैठा है सिर्फ अपने में,

संत-महात्मा लगे है स्वार्थ जपने में।

गर जनता के मुह पड़े ताले न होते,

तो आज देश में इतने घोटाले न होते॥

समाज यहाँ इस कदर बँटा न होता,

देश अपना जयचंदों से पटा न होता।


गर नेता-शाहों के दिल काले न होते,

तो आज देश में इतने घोटाले न होते ॥

राजनीति के ये खेल अजब निराले है,

कोयले की दलाली में हाथ काले है।

गर गोता लगाने को गंदे नाले न होते,

तो आज देश में इतने घोटाले न होते ॥

हैरत !

जिन्दगी के सफ़र में
मुझसे
आँख मिचोली करता रहा उजाला।
जब कभी
मुझे सफलता की चावी मिली,
कोई कमवख्त बदल ले गया ताला॥

असफलता की गलियों में
जिन्दगी
बस यूँ ही दीन-हीन रही।
क्योंकि वो सड़क
जो मुझे
सफलता की मंजिल पर ले जाती,
दुर्भाग्यवश हमेशा निर्माणाधीन रही॥

विडंबना !

भई, अगर
बनाकर रखोगे
इसतरह दुश्मन की
कातिल औलाद को,
घर अपने घर-जवाई !
तो फिर कसाब तो,
थूकेगा भी, हंसेगा भी,
और नखरे भी दिखाएगा,
पसर बैठ, ले-लेकर जम्हाई !!

आम-जन हों भले असुरक्षित,
मगर उसकी हिफाजत को
लगा है सख्त पहरा !
इसतरह आवाभगत में जुटे है,
मानो देश का
राजसी मेहमान जो ठहरा !!

संशय

मन में संशय उमड़ रहा है ,
एक प्रश्न घुमड़ रहा है,
क्या सचमुच लौट आये
वनवास से पुरुषोतम राम,
करके रावण का काम तमाम ?
क्या अब यह घोर कलयुग
कही समा जाएगा ?
देश में फिर से
क्या राम-राज आयेगा ?
क्या सचमुच अब देश से
भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा ?
कल रावण दहन को
कुछ लोग बता रहे थे,
बुराई पर जीत अच्छाई की !
मगर मेरे ये कुछ सवाल,
अभी तक अनसुलझे है,
मुझे तलाश है सच्चाई की !!

अद्भुत खेल !

इधर जोर-शोर से
तैयारियां चल रही थी,
फाइनल टचिंग की,
सरकारी स्तर पर !

और उधर, खेल गाँव में
सांप जी लेटे थे,
एक अफ्रीकी
ऐथेलीट के बिस्तर पर !!

अफ्रीकी ऐथेलीट
उसे देखकर बोला,
ये तो भैया मेरे साथ
सरासर रंग-भेद है !

मुझे भी लगता है
कि अबके इस
कॉमन वेल्थ के खेल में
कोई बड़ा छेद है !!

रूम अटेंडेंट दौड़ा-दौड़ा
उसके पास जाकर बोला,
चुपकर, अबके अद्भुत
ये खेल निराले है !

पांच साल में ७००००
करोड़ रूपये खर्च कर ,
हमने सांप और
संपेरे ही तो पाले है !!

उलझन !

लगातार
बरसती ही जा रही
सावन की घटाएं हैं ,
जो बिखरा पडा,
नही मालूम
वो प्रकृति की
रौद्र लटाएं है
या सौम्य छटाएं हैं ।
मगर इतना तो
अह्सास हो ही रहा है
कि जिन्दगी बौरा गई है,
जीवन की हार्ड-डिस्क मे
कहीं नमी आ गई है।
प्रोग्रामिंग सारी की सारी
भृकुटियाँ तन रहीं हैं,
टेम्पररी फाइलें भी
बहुत बन रही है।
समझ नही आ रहा
कि रखू,
या फिर डिलीट कर दू !
फ़ोर्मैटिंग भी तो कम्वख्त इतनी आसां नही !!

ख्वाइश !

मैंने न कभी
ये चाह रखी थी
कि मैं भी
बहुत रिच होता,
बस, मेरी तो
इतनी सी ख्वाइश थी
ऐ जिन्दगी,
कि काश !
तुझमे भी एक
ऑन-ऑफ का स्विच होता,
जब जी में आता,
जलाता बुझाता !
कुछ तो अपने
मन माफिक कर पाता !!


न तलाश-ए-मुकद्दर मैं निकला, न तकदीर ही हरजाई थी,
वैभव-विलासिता की भी न मैंने, कभी कोई आश लगाई थी,
इस मंजिल-ए-सफ़र में मेरी तो बस इतनी सी ख्वाइश थी
ऐ जिन्दगी, कि काश तू वैसी होती, जैंसी मैंने चाही थी !

शिकायत

ओ माय गौड़ !
स्वार्थी जन आपको
खूब अलंकारते है,
ऊपर वाला, भगवान्,
ईश्वर, अल्हा, रब, खुदा
और न जाने किन-किन
नामों से पुकारते है!


आप होनहार हो,
दुनिया के पालनहार हो,
खूब लुटाते हो अपने भक्तों पर,
आपकी कृपा हो तो घोड़े-गधे भी,
बैठ जाते है ताजो-तख्तों पर !
मगर एक बात जो
मैं आजतक न समझ पाया,

माय बाप !
सिर्फ मेरी ही बारी,
इस कदर क्यों कंजूस
बनते है आप
मुझे बताओ ऐ ऊपर वाले !
मुझमे ही सारे गुण तुमने
पाइरेटेड क्यों डाले?
अरे, कम से कम उसका
लेबल तो निकाल देते!
कुछ नहीं तो यार,
एंटी-वायरस तो ओरिजिनल डाल देते !!

सलाह !

उनका एसएम्एस आया था,
लिखा था;
एक तो तेरी जुदाई,
ऊपर से ये बरसात भी
कमबख्त दिल दुखा रही !
क्या करू, याद में जलती
ये आँखे सुर्ख हुई जा रही !!
मैंने भी उनकी बात को
सीरिअसली लिया,
और तुरंत रिवर्ट किया;
प्रिये, जुदाई का गम चखो;
साथ ही अपना ख्याल रखो !
वैसे तो इस बीमारी का आँखों से
सिर्फ एक हफ्ते का ही नाता है,
कंजक्टिवाइटिस का वायरस
गंभीर नुकसान नहीं पहुँचाता है!
फिर भी, तुम आँखे न मलना,
धूप का चश्मा लगाके चलना,
मैं हूँ न, तुम बिलकुल मत डरना !
आई ड्रॉप सिर्फ डाक्टर से
परामर्श पर ही इस्तेमाल करना !!!!