Saturday, March 3, 2012

प्रणय गीत- तुम मिले !













कातिबे तकदीर को मंजूर पाया,             (कातिब-ऐ-तकदीर=विधाता)


तस्सवुर में तेरा हसीं नूर पाया।            (तस्सवुर में = ख्यालों में )


बिन पिए ही मदमस्त हो गए हम,


तरन्नुम में तुम्हारे वो सुरूर पाया।              (तरन्नुम= गीत )


कुछ बात हममे है कि तुम मिले,


मन में पलता ये इक गुरुर पाया।


सेहर हसीं और शामे  रंगीं हो गई,            (सेहर = सुबह )


तुमसा जब इक अपना हुजूर पाया।


जब निहारने नयन तुम्हारे हम गए,


प्यार के खुमार में ही चूर पाया ।


बेकस यूँ लगा खो गई महक फूल की,    (बेकस = अकेला )


तुम्हें जब कभी खुद से दूर पाया।

बादह-कश !












मुरीद ये माह-जबीं
मधुशाला के दर पर,
एक जीवन जी गया,
आब-ऐ-आतिश,
आधी खपी बांटने में,
बाकी बची खुद पी गया।

आब-ऐ-आतिश= शराब
फिर शाम रंगीं
मीना की हुई, छूकर
गुलाबी आतिश-ऐ-तर,
मय को दर्द-ऐ-दिल में
जन्नत मिली,
साकी लब सी गया।

मीना-मय की प्याली, आतिश-ऐ-तर=आशिक के ओंठ
हमनशीं को रख लिया
दिल में छुपाकर,
जाहिरी के खौफ से,
अल्फ़ाजों ने अपनी चाल बदली,
रंग चेहरे का आफताबी गया।

आफताबी= सुनहला रंग (सूरज जैसा)
पलक ही बंद हम कर गए थे ,
नजरें मेहरबाँ होने से पहले,
इर्द-गिर्द गश्त-ऐ-काएनात में,
मुकम्मल भूगोल भी गया।

गश्त-ऐ-काएनात= दुनिया की सैर
ख्वाइशे जाने कहाँ
गुम हो गई फिर,
दश्त की वीरानियों में,
ज़ुल्मत में, दीदार
चाँद-तारों का हुआ,
हुनर आगाही गया।

ज़ुल्मत=अंधकार में, आगाही= चेतन युक्त बादह-कश = शराबी
छवि  गूगल  से  साभार ! 

वक्त आयेगा एक दिन !






















दिन आयेगा महफ़िल में जब, होंगे न हम एक दिन,
ख़त्म होकर रह जायेंगे सब रंज-ओ-गम एक दिन।


नाम मेरा जुबाँ पे लाना, अखरता है अब तक जिन्हें ,
जिक्र आयेगा तो नयन उनके भी होंगे नम एक दिन।


किस तरह भी रखा कायम, हमने अपने वजूद को,
इल्म न था इस कदर हमपर होंगे सितम एक दिन।


जख्म रहें ज़िंदा सदा ये सोचकर, उन्हें खरोचता रहा,
दिल पिघलेगा, वो आएंगे,  लगाने मरहम एक दिन।


ढुलमुल यूँ इसतरह कबतक, चलती रहेगी जिन्दगी,
कुछ न कुछ सख्त तो उठाने ही होंगे कदम एक दिन।


महंगी वसूली हमसे 'परचेत',कीमत हमारे शुकून की,
वक्त आयेगा जब भाव उनके भी होंगे कम एक दिन।




छवि गूगल से साभार !

सुखांतकी !


इस रंगशाला के हम मज़ूर
कोई कुशल, कोई अकुशल, 
कोई तन-मन से,
कोई अनमन उकताया  सा,  
निभा तो रहे किन्तु सब 
अपना-अपना किरदार !
पर्दा उठते ही अभिनय शुरू  
और गिरने पर  ख़त्म !!
मगर कभी-कभी कम्वक्त
मुंह बायें खडा यक्ष-प्रश्न   
मन  उद्द्वेलित कर जाता है; 
कि क्या उचित है तब, जब 
रंगकर्मी ही  तंग आ जाए  
किरदार निभाते-निभाते;
समर्पण अथवा परित्याग ? 

शिव अराधना !














अनुतप्त न होगा कभी तेरा मन,

कर भोर भये भोले का सुमिरन|

रख शिव चरणों में मनोरथ अपना,

निश्चित मनोकामना होगी पूरन||



सरल सहृदय मन कृपालु बड़े है,

जय भोलेनाथ सन्निकट खड़े है|

अनसुलझी रहे न कोई उलझन,

कर भोर भये भोले का सुमिरन||


सिंहवाहिनी सौम्य छटा में रहती,

तारणी प्रभु शीश जटा से बहती|

ढोल, शंखनाद, घडियाली झनझन,

कर भोर भये भोले का सुमिरन||


नील कंठेश्वर इस जग के रब है,

धन-धान्य वही, वही सुख-वैभव है|

प्रभु-पाद सम्मुख फैलाकर आसन,

कर भोर भये भोले का सुमिरन||



तारणहार जयशंकर विश्व-विधाता,

सर्व शक्तिमान शिव जग के दाता|

न्योछावर करके अपना तन-मन,

कर भोर भये भोले का सुमिरन||
.
.
 

नासमझ !














की होती अगर थोड़ी  वफ़ा जिन्दगी से,
तो होते न इस कदर खफा जिन्दगी से !


बढ़ाए जो कदम होते  ख्वाइशों के दर पर,
मुहब्बत फरमाकर इक दफा जिन्दगी से !


बनता न  दस्तूर तब ये जमाने का ऐसा,
रख लेता कमाकर जो नफ़ा जिन्दगी से !


किये क्यों बयां राज बेतकल्लुफी के ऐंसे,
बदले  में पाई जो हरदम जफा जिन्दगी से ! 


ऐतबार  बनता  न बेऐतबारी का  सबब,
जुड़ जाता जो इक फलसफा जिन्दगी से !  


छवि  गूगल  से  साभार ! 

संत खुशफहमी !


अति सम्मोहित ख्वाब
कैफियत तलब करने
आज भी गए थे
उस जगह, जहां कल
रंगविरंगे कुसुम लेकर
वसंत आया था !
ख़याल यह देखकर
विस्मित थे कि उन्मत्त
दरख्त की ख्वाईशें,
उम्मीद की टहनियों से
झर-झर उद्वत
हुए जा रही थी,
पतझड़ पुन: दस्तक दे गया था  
या फिर वसंत के
पुलकित एहसास ही
क्षण-भंगूर थे, नहीं मालूम !!

दल बदल गए यार सारे !


मन-बुद्धि में धन,शोहरत के,चढ़ गए खुमार सारे,
जिस्म दुर्बल नोचने को, हैं गिद्ध,वृक तैयार सारे।


बर्दाश्त न थी पलभर जुदाई, परम जिस दोस्त की,
वक्त ने जब चाल बदली, दलबदल गए यार सारे।


खो रहा निरपराध भी अब,हक़ अपनी फरियाद का,
रहनुमा बनकर रह गए, वतन के गुनहगार सारे।


जाति,मजहब उन्माद में, है आवाम रंगी जा रही,
नाकाम बनकर रह गए, अमन के हथियार सारे।


कर्तव्यनिष्ठा रह गई, इन्तजामियों की दास बनकर,
हो रहे तंत्र की कब्र में दफ़न,इनके भ्रष्टाचार सारे।


दामन शिष्टता का भी ले गई, निर्लज्जता चीरकर,
नाटे पड़े 'परचेत'अब,इनके लिए तिरस्कार सारे।

छवि  गूगल   से  साभार ! 

क्षणिकाएँ !

देह माटी की,


दिल कांच का,


दिमाग आक्षीर


रबड़ का गुब्बारा,


बनाने वाले ,


कोई एक तो चीज


फौलाद की बनाई होती !


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नयनों में मस्ती,


नजरों में हया,


पलकों में प्यार,


ये तीन ही तो विलक्षणताएँ


प्रदर्शित की थी महबूबा ने


मुह दिखाई के वक्त !


वो हमसे रखी छुपाये,


तेवर जो बाद में दिखाये,


नादाँ ये नहीं जानती कि


सरकारी मुलाजिम से


महत्वपूर्ण जानकारी छुपाना,


भारतीय दंड संहिता के तहत


दंडनीय अपराध है !!


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दहशतें बढ़ती गई,


जख्म फिर ताजा हुआ,


हँस-हँस के बजा जो कभी


वो  बैंड अब बाजा हुआ,


तेरी बेरुखी, तेरे नखरे,


कर देंगे इक दिन मेरा


जीना मुहाल,


छोड़कर बच्चे जिम्मे मेरे


जब तुम मायके चली गई


तब जाके ये अंदाजा हुआ !


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ये मैंने कब कहा था


कि तुम मेरी हो जाओ,


सरनेम (उपनाम ) बदलने को


तुम्ही बेताव थी !!


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क्या तुम जानती हो कि


यह सूचना मिलने पर


कि तुमने अपना


घर बसा लिया,


तुम्हारी माँ,


यानि मेरी सास ने


३ फुट गुणा ६ फुट का


पर्दा क्यों भेजा था?


क्योंकि वो जानती थी कि


महंगाई और


मंदी के इस दौर में


शहरी लोगो के पास


परिधानों की


अत्यंत कमी चल रही है !!



रिश्तों का इल्म !


धड़कन का दिल में बसने,
जीवन के सहभागी बनने हेतु
रिश्तों की बुनियाद में
यकीन नाकाफी क्यों?
इकरारनामे को मुद्रांकित
करवाने की हठ-धर्मिता कैंसी?
तुम जानती हो कि
अनुबंध असीम नहीं होते,
और मैं पंजीकृत पट्टानुबंध के तहत
सिर्फ तयशुदा वक्त के लिए ही
एकनिष्ठता की इस कोमल डोर को
रहन पर नहीं रखना चाहता,
क्योंकि मियाद खत्म होने के बाद
यह मुसाफिर तन्हा ही फिर से
दश्त का वीरान सफ़र तय नहीं कर पायेगा!

संकल्प !

क्षमा चाहता हूँ कि कल रात को शहीदी दिवस यानि ३० जनवरी हेतु एक कविता लिखने बैठा था और गलती से सेव करते हुए पब्लिश का बटन क्लिक कर गया था ! खैर, वैंसे  तो रविवार को वक्त कम ही मिलता है, लेकिन आज मेरे पास वक्त ही वक्त था, इसलिए आज ही इसे पूरा कर यहाँ आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ ;


   
भ्रष्टाचार के इस कानन में,
आग लगाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ।

अशक्त जन का हो रहा,
प्राबल्य सद्सद्विवेक नाश,
घर कर बैठे मन में भय को,
दूर भगाना चाहता हूँ॥


परिवार एवं बंशवाद का,
हम पर कोई राज न हो,
देश तमाम में जनमानस,
रोटी को मोहताज न हो।

प्रतिरूप हो जिसमे प्रजा का,
राज वो पाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥


महाभारत के कौशल में,
उपोद्घात न कोई छक्कों का,
जन्नत और न बने अब यह,
लुच्चे, चोर-उचक्कों का।

अस्मिता का मातृभूमि की,
गीत मैं गाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥


इंसाफ  पाने की अभिलाषा,
दीन से हरगिज दूर न हो,
खुदकुशी करने को कृषक, 
अपना कोई मजबूर न हो।

उपजी  युवा दिलों  की
कुंठाओं  को दबाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥


क्षुद्र सियासी लाभ हेतु,
इंतियाज न कोई संचित हो,
सम-सुयोग मिले सबको,
हक़ से न कोई वंचित हो।

ऊँच-नीच, धर्म-जाति का,
हर भेद मिटाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥


हर घर में यहाँ रोज
क्रिसमस, ईद और दीवाली हो,
देश के कोने-कोने में,
सुख-समृद्धि व खुशहाली हो।

शहीदों के सपनों का सच्चा,
स्वराज मैं लाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥


छवि गूगल से साभार !




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नाम की क्या फिकर तुझको.....

आज आप पहले मेरा ताजातरीन जोक पढ़िए, फिर नज्म ;

एक पड़ोसन दूसरी से पूछती है; तुम अपने शौहर से इतना क्यों झगडती हो,

आखिर इसका आउटकम क्या निकलता है?

दूसरी पड़ोसन: क्या करू, झगड़ना तो मैं भी नहीं चाहती मगर, वो घर से आउट कम निकलते है.....................:) :)











रूठो न इस तरह कि बात ख़ास से आम हो जाए,
अकुलाहट धडकनों की हयात सुबह की शाम हो जाए।

कुछ इस तरह संभाले हम, बिखरने की ये कवायदें,
फजीहत न महफ़िल में,रिश्तों की सरेआम हो जाए।

ढूंढें फिरे तहेदिल से, नफरतों में तेरी मुहब्बत को,
फीके न पड़े ये जलवे, कोशिश न नाकाम हो जाए।

संजोकर रखे हुए जख्मों को जरा मरहम लगाकर के,
दिलों को यूं मनायें कि जाँ, इक-दूजे के नाम हो जाए।

आगाज कर 'परचेत' कुछ ऐंसा सुखद अंजाम हो जाए,
नाम की क्या फिकर तुझको, मुन्नी बदनाम हो जाए।
छवि गुगुल से साभार

ऋतुराज यह वसंत आया !


छंट गया धरा से शिशिर का सघन कुहा ,

सितारों से सजीला तिमिर में गगन हुआ।


भेदता है मधुर कुहू-कुहू का गीत कर्ण,

आतप मंदप्रभा का हो रहा अपसपर्ण।


लाली ने छोड़ दी अब ओढ़नी पाख्ली,

मधुकर  ने फूल से मधु-सुधा  चाख ली।


डाल-पल्लव कोंपलों के रंग प्रकीर्ण है,

छटा-सौन्दर्य से हर चित माधुयीर्ण है।


जोत ने धारण किया सरसों के हार को,

उऋर्ण कर दिया अब शीत ने तुषार को।


भावे मन अमवा,महुआ की इत्रमय बयार,

सजीव बन गए सभी जवां और बूढ़े दयार।


विभूषित वसुंधरा बिखेरती पुरातन सुवर्ण,

कश्मीर से केरला, मणिपुर से मणिकर्ण।


तज सभी उद्वेग-रंज, खुशियाँ अनंत लाया,

करने पूरी मुराद ऋतुराज यह वसंत आया।।



शब्दार्थ: आतप मंद्प्रभा = सूरज की मंद किरणे, सघन कुहा= घना कुहरा,

अपसपर्ण=विस्तारण , पाख्ली = गर्म शॉल, प्रकीर्ण= भिन्न-भिन्न,

माधुयीर्ण=प्रमोद से भरा, उऋर्ण=भारमुक्त, तुषार= ओंस

छवि गुगुल से साभार !