Thursday, December 31, 2009

तू ब्लॉगर क्यों हुआ !

एक बार पुन: सभी को नववर्ष की मंगलमय कामनाये ! चलो नए साल की शुरुआत की जाये इस भोंडी सी गजल के साथ;


ठण्ड पूछती है कुर्ते से, तू पुलओवर क्यों हुआ,
अरुणोदय को निहारना इतना, सोबर क्यों हुआ !

इस शरद-ऋतु में नव-वर्ष की प्रथम बेला पर,
दिल्ली का जर्रा-जर्रा,फौगी से फौगर क्यों हुआ !

जश्न-ए-शाम पी तो हमने भी सलीके से ही थी,
नहीं मालूम यह कमबख्त, हैंग ओवर क्यों हुआ !

झेल पाने को देह इसकदर भी, बूढ़ी न थी अभी,
फिर ये भरोसे का स्तर इतना, लोअर क्यों हुआ !

'लिंग-भेद'की नोकझोक देख,यहाँ साहित्य पूछता है
'गोदियाल',तू साहित्यकार ही ठीक था,ब्लॉगर क्यों हुआ !

Thursday, December 24, 2009

आ जाओ क्रिस, अब आ भी जाओ !


यार "क्रिस" यूं कब तलक तुम,
ज़रा भी टस से "मस" नहीं होगे !
गिरजे की वीरान दीवारों पर,
इसी तरह 'जस के तस' रहोगे !!

ज़माना गया,जब परोपकार की खातिर,
महापुरुष खुद लटक जाया करते थे !
अमृत लोगो में बाँट कर ,
जहर खुद घटक जाया करते थे !!

युगों से चुपचाप लटके खड़े हो,
खामोशी की भी हद होती है भई !
एक बार सूली से उतर कर तो देखो,
दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई !!

दौलत और सोहरत की चकाचौंध में,
सभ्यता निःवस्त्र घूम रही है !
संस्कृति बचाती लाज फिर रही,
बेशर्मी शिखर को चूम रही है !!

भाई-भाई का दुश्मन बन बैठा,
बेटा, बाप को लूटने की फिराक में है!
माँ कलयुग को कोसे जा रही,
बेटी घर से भागने की ताक में है !!

नैतिकता ने दम तोड़ दिया कबके,
मानवीय मूल्य सबका ह्रास हो गया !
झूट की देहरी जगमग-जगमग,
दबा सच का आँगन कहीं घास हो गया !!

लोर्ड क्रिस अब उतर भी आओ,
चहुँ ओर पाप का अन्धेरा घनघोर छा गया है !
यह आपके लटकने का वक्त नहीं,
अपितु पापियों को लटकाने का वक्त आ गया है !!

सर्वत्र तुम्ही विद्यमान हो, वो चाहे
मंदिर हो,मस्जिद, चर्च अथवा गुरुद्वारे हो !
आ जाओ क्रिस, अब आ भी जाओ,
तुम इस जग के रखवारे हो ! !

Merry Christmas to all Blogger friends !

Wednesday, December 23, 2009

२००९ में रचित कुछ बिखरे मोतियों के विशष्ट अंश !

यूँ तो बेवजह सुर्ख़ियों में आने का कभी शौक नहीं रहा, मगर जैसे कि शायद आप लोग भी जानते होंगे कि मेरे एक लेख की वजह से ब्लॉगजगत पर आजकल मेरी टी.आर.पी काफी ऊपर जाकर बैठी हुई है, इसलिए मैं फिलहाल कोई टुच्चा-मुच्चा लेख अथवा कविता लिखकर उसको नीचे नहीं लाना चाहता :) सन २००९ में मैं इस ब्लॉगजगत पर लगभग हर दिन उपस्थिति दर्ज करवाई , इसलिए सोचा कि चलो, जो साल जाने वाला है उसकी कुछ जो कविताये अथवा गजल मैं पढ़ पाया और मुझे अच्छी लगी, मैं यहाँ प्रस्तुत करू, ताकि अन्य ब्लॉगर मित्र जोकि उन्हें पढने से किसी वजह से वाचित रह गए हो, वे भी एक बार फिर से उन्हें पढ़ सके ! तो लीजिये प्रस्तुत है सब २००९ का काव्य लेखा-जोखा : यहाँ सिर्फ भिन्न-भिन्न रचनाकारों की मैं कविता या गजल के कुछ चुनिन्दा अंश ही प्रस्तुत कर रहा हूँ,साथ ही उस कविता या गजल का लिंक भी मैंने यहाँ पर दिया है, विस्तृत तौर पर आप उसे उस ब्लॉग पर जाकर पढ़ सकते है, और मुझे उम्मीद है कि इसपर किसी ब्लॉगरमित्र / रचनाकार को कोई आपति नहीं होगी !

शुरुआत करता हूँ आदरणीय डा० रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी की इस प्यारी से गजल से, उनकी गजल फ्रेम समेत पोस्ट कर रहा हूँ ;





निर्मला कपिला जी ने गुजर रहे साल की शुरुआत में (जनवरी २००९) एक गजल लिखी थी
http://veerbahuti.blogspot.com/search/label/%E0%A4%97%E0%A4%BC%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A4%B2?updated-max=2009-05-20T20%3A16%3A00-07%3A00&max-results=20

आज महफिल में सुनने सुनाने आयेंगे लोग
समाज के चेहरे से नकाब उठाने आयेंगे लोग

किसी की मौत पर रोना गुजरे दिनों की बात है
अब दिखावे को मातम मनाने आएंगे लोग

दोस्ती के नकाब में छुपे है आज दुश्मन
पहले जख्म देंगे, फिर सहलाने आएंगे लोग



श्री समीर लाल ’समीर’ जी को सुनिए ;
http://udantashtari.blogspot.com/2009_03_01_archive.html
झूट की बैसाखियों पे, जिन्दगी कट जायेगी
मूँग दलते छातियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

सज गया संपर्क से तू, कितने ही सम्मान से
कागजी इन हाथियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

है अगर बीबी खफा तो फिक्र की क्या बात है
कर भरोसा सालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.

गाड़ देना मुझको ताकि अबके मैं हीरा बनूँ,
सज के उनकी बालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी




श्याम सखा ‘श्याम’ जी की गजल
http://gazalkbahane.blogspot.com/2009/10/blog-post_27.html

नम तो होंगी आँखें मेरे दुश्मनों की भी जरूर
जग-दिखावे को ही मातम करने जब आएँगे लोग

फेंकते हैं आज पत्थर जिस पे इक दिन देखना
उसका बुत चौराहे पर खुद ही लगा जाएँगे लोग

है बड़ी बेढब रिवायत इस नगर की ‘श्याम’ जी
पहले देंगे जख्म और फिर इनको सहलाएँगे लोग




ओम आर्य जी की गजल
http://ombawra.blogspot.com/2009/06/blog-post_19.html
वहीं पे है पडा अभी तक वो जाम साकी
निकल आया तेरे मयखाने से ये बदनाम साकी

हो न जाए ये परिंदा कोई गुलाम
कहते है शहर में बिछे है पिंजड़े तमाम साकी

खुदा हाफिज करने में है न अब कोई गिला
उसकी तरफ से आ गया है मुझको पैगाम साकी




डा.चन्द्रकुमार जैन जी ने श्री ज्ञानप्रकाश विवेक की ग़ज़ल प्रस्तुत की
http://chandrakumarjain.blogspot.com/2009/09/blog-post_02

मैं पूछता रहा हर एक बंद खिड़की से
खड़ा हुआ है ये खाली मकान किसके लिए

गरीब लोग इसे ओढ़ते-बिछाते हैं
तू ये न पूछ कि है आसमान किसके लिए

ऐ चश्मदीद गवाह बस यही बता मुझको
बदल रहा है तू अपना बयान किसके लिए



एम् वर्मा जी की कविता देखिये
http://ghazal-geet.blogspot.com/2009/06/blog-post_09.html

हर सुंदर फूल के नीचे कांटा क्यों है भाई?
भीड़ बहुत है पर इतना सन्नाटा क्यों है भाई?

मशक्कत की रोटी पर गिद्ध निगाहें क्यों है?
हर गरीब का ही गीला आटा क्यों है भाई?

चीज़ों की कीमत आसमान चढ़ घूर रही है
मंदी-मंदी चिल्लाते हो, घाटा क्यों है भाई?

सीधी राह पकड़कर जाते मंजिल मिल जाती
इतना मुश्किल राह मगर छांटा क्यों है भाई?



वन्दना गुप्ता जी की नज्म देखिये ;
http://vandana-zindagi.blogspot.com/2009/04/blog-post_11.html

तू कृष्ण बनकर जो आया होता
तो मुझमे ही राधा को पाया होता
कभी कृष्ण सी बंशी बजाई होती
तो मैं भी राधा सी दौड़ आई होती
फिर वहाँ न मैं होती न तू होता
कृष्ण राधा सा स्वरुप पा लिया होता



संदीप भारद्वाज जी की गजल
http://gazals4you.blogspot.com/2009/10/blog-post_8856.html
खता मेरी ही थी जो दुनिया से दिल लगा बैठा
ये कमबख्त जिन्दगी कब किसी से वफ़ा करती थी,

मैं काश ये कह सकता "मुझे याद कीजिये"
कभी मेरी याद जिनकी धड़कन हुआ करती थी,

देखो आज हम उनकी दुनिया में शामिल हे नहीं,
जिनकी दुनिया की रौनक हम से हुआ करते थी,




दिगंबर नासवा जी की ब्लॉग पर फोटो उपलब्ध नहीं
http://swapnmere.blogspot.com/2009/11/blog-post_24.html

छू लिया क्यों आसमान सड़क पर रहते हुवे
उठ रही हैं उंगलियाँ उस शख्स के उत्कर्ष पर

मर गया बेनाम ही जो उम्र भर जीता रहा
सत्य निष्ठां न्याय नियम आस्था आदर्श पर

गावं क्या खाली हुवे, ग्रहण सा लगने लगा
बाजरा, मक्की, गेहूं की बालियों के हर्ष पर



नीरज गोस्वामी जी के बेहतरीन अल्फाजो में से चंद अल्फाज
href="http://ngoswami.blogspot.com/2008/10/blog-post_14.html">

उठे सैलाब यादों का, अगर मन में कभी तेरे
दबाना मत कि उसका, आंख से झरना ज़रुरी है

तमन्ना थी गुज़र जाता,गली में यार की जीवन
हमें मालूम ही कब था यहां मरना ज़रूरी है

किसी का खौफ़ दिल पर,आजतक तारी न हो पाया
किया यूं प्यार अपनों ने, लगा डरना ज़रूरी है



सुलभ जायसवाल 'सतरंगी' जी href="http://sulabhpatra.blogspot.com/">http://sulabhpatra.blogspot.com/

लिख सजा बेगुनाह को कलम है शर्मशार
फैसले हुए हैं कागज़ कानूनी देखकर

ख्वाहिशों कि उड़ान अभी बाकी है बहुत
मियाँ घबरा गए ढलती जवानी देखकर

वहां न कोई भेड़िया था न कोई दरिंदा
गुड़िया रोई थी चेहरा इंसानी देखकर


अदा जी
की गजल
http://swapnamanjusha.blogspot.com/2009/09/blog-post_09.html
क्यूँ अश्क बहते-बहते यूँ आज थम गए हैं
इतने ग़म मिले कि, हम ग़म में रम गए हैं

तुम बोल दो हमें वो जो बोलना तुम्हें है
फूलों से मार डालो हम पत्थर से जम गए हैं

जीने का हौसला तो पहले भी 'अदा' नहीं था
मरने के हौसले भी मेरे यार कम गए हैं


पारुल जी
की कविता
http://rhythmofwords.blogspot.com/2009/07/blog-post_30.html

कुरेदती जा रही थी मिटटी
ख़ुद को पाने की भूल में ॥
कुछ भी तो हाथ न आया
जिंदगी की धूल में ॥

कुछ एहसास लपककर
गोद में सो गए थककर
और मैं जागती रही
आख़िर यूं ही फिजूल में॥


Bold


मासूम सायर जी की शायरी blogspot.com/2009/08/blog-post_19.html">http://masoomshayari।blogspot.com/2009/08/blog-post_19.html
ली थी चार दिन हँसी मैने जो क़र्ज़ में
चुका नही सका कभी अब तक उधार मैं

तन्हा गुज़ारनी ना पड़े उस को ज़िंदगी
रहने लगा हूं आजकल अक्सर बीमार मैं

'मासूम' देखनी थीं मुझे ऐसे भी शादियाँ
डोली में है वो और उस का कहार मैं



रविकांत पाण्डेय जी
(फोटो उपलब्ध नहीं)
http://jivanamrit.blogspot.com/2009/11/blog-post_09.html

कुछ बिक गये, कुछ एक जमाने से डर गये
जितने भी थे गवाह वो सारे मुकर गये

हमने तमाम उम्र फ़रिश्ता कहा जिन्हे
ख्वाबों के पंछियों की वो पांखें कुतर गये

दुनिया की हर बुराई थी जिनमें भरी हुई
सत्ता के शुद्ध-जल से वो पापी भी तर गये




रजिया मिर्जा जी
http://raziamirza.blogspot.com/2009/09/blog-post_2889.html

क्यों देर हुई साजन तेरे यहाँ आने में?
क्या क्या न सहा हमने अपने को मनाने में।

बाज़ारों में बिकते है, हर मोल नये रिश्ते।
कुछ वक्त लगा हमको, ये दिल को बताने में।

अय ‘राज़’ उसे छोडो क्यों उसकी फ़िकर इतनी।
अब खैर यहीं करलो, तुम उसको भुलाने में।




सदा जी की कविता
http://sadalikhna.blogspot.com/2009/09/blog-post_23.html

माँ की आँखों ने फिर एक सपना बुना
अब यह कमाने लगे तो मैं
एक चाँद सी दुल्हन ले आऊ इसके लिए
मैं डरने लगा था सपनो से
कहीं मैं एक दिन अलग न हो जाऊ माँ से
माँ की दुल्हन भी तो सपने लेकर आयेगी
अपने साजन के,
मैं किसकी आँख में बसूँगा ?



अंत में श्री योगेन्द्र मौदगिल जी की सच्ची बात सुनिए ;
http://yogindermoudgil.blogspot.com/2009/08/blog-post_09.html
खुद को सबका बाप बताया, कुछ उल्लू के पट्ठों ने.
अपना परचम आप उठाया, कुछ उल्लू के पट्ठों ने।

जीते जी तो बाथरूम में रखा बंद पिताजी को,
अर्थी पर बाजा बजवाया, कुछ उल्लू के पट्ठों ने .
लंगडो को मैराथन भेजा, गूंगे भेजे युएनओ,
सूरदास को तीर थमाया कुछ उल्लू के पठ्ठो ने .
सड़के, चारा, जंगल, पार्क, आवास योजना पुल नहरे ,
खुल्लमखुल्ला देश चबाया कुछ उल्लू के पठ्ठो ने.



कोशिश बहुत की थी कि लिंक यही से काम करे परन्तु पता नहीं क्यों ACTIVE लिंक नहीं लगा ! आप लोगो से विनम्र निवेदन है कि आप यह कतई न समझे कि मैं यह कह रहा हूँ कि मैंने इस साल की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं को चुना, मैंने यहाँ पर सिर्फ उन रचनाओं के अंश प्रस्तुत किये है, जिन्हें मैं पढ़ पाया, जहां तक मैं पहुँच सका ! इसलिए बस इतना ही कहूंगा कि E&O.E.



चलते-चलते एक अपनी भी फेंकता चलूँ :

संग अपने हर वक्त अपनी बेगुनाही की ख़ाक रखते है !
ये सच है कि हम आपकी हर बात से इत्तेफाक रखते है !!

यूँ मुश्किल न था कुछ भी हमें, बेशर्मी की हद को लांघना !
ख्याल आपका आता है कि हम भी इक नाक रखते है !!

तरह आपकी हमने दर्द को पलकों में नहीं छुपाये रखा !
और न नजरो में अपनी हम कोई बला–ए–ताक रखते है !!

फ़ेंक दो निकाल गर दिल में है कोई बुरा ख़याल आपके !
जख्म-ए-जिगर में हम न कोई इरादा नापाक रखते है!!

लिख देना इसपर जब भी जी करे लिखने को कोई नज्म !
दिल श्याम-पट्ट है,जेब में हर वक्त हम चाक रखते है!!

Saturday, December 19, 2009

लघु कब्बाली !

पता नहीं आप लोगो का मन भी ऐसा करता है अथवा नहीं, मगर मेरा कभी-कभी ये मन बड़ी अजीबोगरीब हरकते करता है ! आज सुबह से मन कर रहा था कि मैं ताली बजाऊ , रास्ते में ड्राइव करते वक्त स्टेरिंग छोड़ ताली बजाने लगता, फिर अगल-बगल झांकता, चलने वालो को देखता कि कोई मेरी हरकते तो नहीं देख रहा :) बाद में ध्यान आया कि आज हमारे मुस्लिम बंधुओ का नववर्ष है , तो सर्वप्रथम मैंने उन्हें नवबर्ष की शुभकामनाये दी और फिर सोचा कि क्योंकि अपने मुस्लिम भाई-बहन कब्बाली गाना बहुत पसंद करते है तो चलो आज एक कब्बाली ट्राई की जाए ! सुन्दर और थोड़ा लम्बी तो नहीं बन पडी मगर जो भी है, उन्हें नवबर्ष पर समर्पित कर रहा हूँ ! तो आइये आप भी ताली बजाये, मेरे संग :)

मेरे प्यार का जानम तुमने वाह, क्या सिला दिया !
जाम-ए-मोहब्बत दिखा, घूंट जहर का पिला दिया !!
अरमां-ए-दिल को खाक मे, पलभर मे मिला दिया !
जाम-ए-मोहब्बत दिखा, घूंट जहर का पिला दिया !!

सुनो इश्क वालों सुनो, तुम प्यार ज़रा संभलकर करना !
गिलास में परोसा क्या है, उधर भी देख लिया करना !!
फिर न कहना, किसी ने हमको अलर्ट नहीं किया !
जाम-ए-मोहब्बत दिखा, घूंट जहर का पिला दिया !!

मेरे प्यार का जानम तुमने वाह, क्या सिला दिया !
जाम-ए-मोहब्बत दिखा, घूंट जहर का पिला दिया !!
अरमां-ए-दिल को खाक मे, पलभर मे मिला दिया !
जाम-ए-मोहब्बत दिखा, घूंट जहर का पिला दिया !!

कभी हमको भी शर्म आती है कि हम इस तरह जिये क्यो ?
अमृत का जाम मांग कर फिर प्याला जहर का पिये क्यो ??
सुरूर ऐसा मिला कि जिसने रोम-रोम हिला दिया !
जाम-ए-मोहब्बत दिखा, घूंट जहर का पिला दिया !!

मेरे प्यार का जानम तुमने वाह, क्या सिला दिया !
जाम-ए-मोहब्बत दिखा, घूंट जहर का पिला दिया !!
अरमां-ए-दिल को खाक मे, पलभर मे मिला दिया !
जाम-ए-मोहब्बत दिखा, घूंट जहर का पिला दिया !!

Friday, December 18, 2009

जीवन सच !


इम्तहानों से रही बेखबर,
जिन्दगी की यह रहगुजर,
भटकता फिरा मैं इधर-उधर,
सफ़र-ए-मंजिल चार तलों में !
मुश्किल था मंजिले सफ़र,
संग आया न कोई हमसफ़र,
जिन्दगी बस यूँ गई गुजर,
नामुराद इन पांच बोतलों में !!

उतरा था जब बनके नंदन,
मैंने माँगा था स्नेही स्पंदन,
तुत्ती लगी बोतल नन्ही रूह में,
जबरदस्ती ठूंस दी गई मेरे मुहं में !
वक्त संग मैं कुछ और बड़ा हुआ,
अपने पैरो पर जाकर खडा हुआ,
जब उमंग भरी थी इस देह में ,
तब वक्त गुजरा शीतल पेय में !!

आलिंगन को व्याकुल हुए हम,
गले मिलने को आ पहुंचे गम,
मनोरंजन भरने को जवानी में,
जिन्दगी डुबो दी रंगीन पानी में !
लिफ्ट पहुँची अब अगले तल में,
उम्र सिमट गई फिर शुद्ध जल में,
बचा न फिर कुछ मनमानी में,
और ट्विस्ट आ गया कहानी में !!

अबतक की तो मुहं से घटकी थी,
मगर अबके ऊपर से लटकी थी,
फिर पाचन क्षमता कम हो गई,
और एक दिन आँखे नम हो गई !
यही तो था वह मेरा रहगुजर,
पांच बोतलों के बीच का सफ़र,
बोतल से शुरू हुई थी जो कहानी,
इकरोज बोतल पे जाके ख़त्म हो गई!!

Tuesday, December 15, 2009

फिर हम तुम्हारे किसलिए ?

आ मिल-बैठ सुलझा ले आपसी कलह को,
ये विद्वेष सारे किसलिए ?
गर बात दिल की न हम से कह सको,
फिर हम तुम्हारे किसलिए ?

इक रोज तुम्ही ने तो हमको उठाकर,
अपनी पलकों में था बिठाया,
फिर इस तरह आज ये तन्हाई का
पल-पल, हम गुजारे किसलिए ?

याद है खाई थी हम-तुमने कसमे,
साथ सच का निभाने की उम्रभर
तो सच पर लगाये जा रहे अब नित ये,
झूठ के पैवंद प्यारे किसलिए ?

खाकर कसमें, भरोसा दिया था,
हम बनेगे हमेशा इक-दूजे का सहारा
फिर आज इतने पास रहकर भी,
हम-तुम हो गए बेसहारे किसलिए ?

बेचैन होकर रह गई दिल की उमंगें,
खफा हो गई अब रातों की नींद है,
सोचकर बताना हमें, हमने लगाए
अँधेरे गले, तजकर उजारे किसलिए ?

Friday, December 11, 2009

अंधे आगे नाच के, कला अकारथ जाए !

हुआ गुलाम फिर से कुटिल राजनैतिक परिवेश का,
कुछ भी नही हो सकता, अब मेरे इस देश का !

ज्यूं चल रहा, यूं ही चलता रहा और यूं ही चलेगा,
जैचन्द शत्रु संग बैठ सेकेगा रोटी, और यह जलेगा !

शक्लें एक सी है,पता चले कैसे गद्दारों के भेष का,
कुछ भी नही हो सकता, अब मेरे इस देश का !

एक पटेल थे,जी-जान से, बिखरी रियासतें समेटी,
एक ये बांट रहे फिर कहीं बुन्देलखन्ड,कही अमेठी !

घॊडा भाग रहा यहां हर तरफ़, वोट की रेस का,
कुछ भी नही हो सकता, अब मेरे इस देश का !

बिरले मनमोहन ही यहां, सोनी का दिल हरते है,
वरना राज-बाला जैसे कुंए से टर्र-टर्र करते है !

जला न खून’गोदियाल’,निज शरीर अवशेष का,
कुछ भी नही हो सकता, अब तेरे इस देश का !

Thursday, December 10, 2009

एक जोकर !

याद तो होगा आपको
वह सर्कस का जोकर,
तमाम कलाकारों के मध्य,
एक अजीबो-गरीब किरदार,
मकसद सिर्फ़ और सिर्फ़
दर्शकों को हंसाना,
उनका मनोरंजन करना,
और खुद की शख्सियत
सर्कस के जानवरों से भी कम ।
जोकर जो ठहरा,
आम नजरों मे
उसकी अहमियत इतनी
कि बस उसे
एक भावना-विहीन,
नट्खट अन्दाज का
रोल अदा करने वाला,
प्राणी मात्र समझते है हम ।।

दिन ढलने पर जब
कहीं निद्रा की आगोश मे
सिमटने का प्रयास करता है ,
तो सर्द रातों की बयार मे,
उसकी आत्मीय प्राताण्डनायें
उसे बहुत बेचैन कर जाती है ।
आंखो के सीमित आसमान से,
जब ओंस झरने लगती है,
तो वह लिहाफ़ के बादल ओढ,
यही सोचता रहता है कि
क्यों ये कमबख्त सर्द रातें,
जख्मों का दर्द इतना बढा देती है ?
पता नही क्यो ??

पूरे पैर पसार सोने की चाहत !

रात की दिल्ली की कुहास भरी ठण्ड,
एक छोटे से सफ़र पर निकला था,
निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर
कोने से सटी बेंच पर बैठ,
गाडी का इन्तजार करने लगा !
बगल पर ही कोई एक जीव
पुरानी सी एक कम्बल ओढ़ ,
अपनी दिनभर की थकान
मिटाने को व्याग्र था ,
मुझे कोई रिक्शा चालक लगा !!

तभी कुछ दूरी से,
बूटो की कदमताल
खामोशी को तोड़ते
मेरे वाले बेंच की ओर बड़ी,
पास से गुजरते,
मैं उन्हें देख रहा था,
रेलवे सुरक्षा बल के जवान थे वो !

तभी अचानक
मेरी ध्यान निद्रा टूटी
यह देख कि एक जवान ने
उस सोये जीव पर बूट की ठोकर मारी
और कड़ककर बोला,
" हे बिहारी, पैर भांच के सो" !!

बूट की ठोकर से
और सुन के गाली ,
हडबडा के उठ बैठा था,
एक नजर,
दूर जाते जवानो पर डाली,
फिर मेरा चेहरा ताक झांका इधर-उधर !
यही कोई ६०-६५ साल का
वृद्ध लगता था,
वही पुरानी कम्बल फिर से
अपने ऊपर ओढ़ते हुए बडबडाया,
"हे प्रभु ! वो दिन कब आयेगा,
जब मैं पूरे पैर पसार कर सो पाऊँगा,बेख़ौफ़,
किसी के बूट की ठोकरों से बेखबर ?? "

Wednesday, December 9, 2009

जाने क्यों अबके, साकी ने भी पिलाई नहीं !

उनके देखे से आ जाती है हर बारी चेहरे पे रौनक,
मगर इस बारी नयनों ने, कोई उम्मीद दिलाई नहीं !
यूँ दिल बहलाने को मयखाने से भी होकर गुजरे थे,
पर न जाने क्यों अबके, साकी ने भी पिलाई नहीं !!

पतझड़ की बारिश को पैमाने में भर लिया आखिर,
बहारों की बारात में अपनी चाहत शुमार हो पाई नहीं !
किसी गैर के दर पे से तो हमने कुछ माँगा न था,
उनकी हर चीज यूँ भी अपनी ही तो थी, पराई नहीं !!

प्यासे ही लौट आये बड़े बेआबरू होकर उस कूचे से,
भरम था, वह आयेगी हाथ पकड़ने, पर आई नहीं !
थोड़ा और जी लेते, गर इक जाम पिला दिया होता,
खैर, ये शायद मेरी बेरुखी थी, उनकी रुसवाई नहीं !!

पलकों में छुपी आँखों से ही शराब-ए- दीदार कर लेते ,
पर वो थे कि इक बार भी हमसे नजरे मिलाई नहीं !
यूँ दिल बहलाने को मयखाने से भी होकर गुजरे थे,
पर न जाने क्यों अबके, साकी ने भी पिलाई नहीं !!



वैसे अपना ही लिखा एक पुराना शेर याद आ रहा है,
कर कुछ ऐसा कि रिश्तों की पोटली तार-तार हो जाए !
इसबार इतना पिला साकी, कि हम भी पार हो जाए !!

Monday, December 7, 2009

न जाने नया साल क्या गुल खिलाए !


गया साल प्यासा तरसकर ही काटा,
न जाने नया साल क्या गुल खिलाए !
कभी बरसात होगी इसी आश में हम,
छाता उठाके यहाँ भी लचकते चले आए !!


साल गुजरा जो ऐसा मनहूस निकला,
महंगाई ने जमकर हमारे छक्के छुडाए !
जब मंदी बेचारी किसी मंडी से गुजरी,
सब्जी के भावो ने हाथो के तोते उडाए !!


कमबख्त अरहर भी इतनी महंगी हुई है,
कड़ी-चावल में ही दिन-रैन हम रहे रमाए !
यों तो दिवाली पे हरसाल बोनस मिले है,
गतसाल लाला ने तनख्वाह से पैसे घटाए !!


आसार यों अब भी लगते अच्छे नहीं है,
कोरे सरकारी वादों से रहे तिलमिलाए!
साल गुजरा वो तो जैसे-तैसे ही गुजारा,
न जाने नया साल क्या गुल खिलाए !!

Sunday, December 6, 2009

दास्तां मुसाफिर की !

इस जग सारे को तब तक, वह सुन्दर ही भाता था ,
उसे जब तक अपने पैरों पर, चलना नही आता था !
फिर एक दिन वह, खुद के पैरों पे चलता दीख गया,
बडा खुश था उस दिन, जब वह चलना सीख गया !!

इस जग मे यूं भी, बहुतेरे किस्म के इन्सान होते है,
कुछ दूसरों की खुशी देख खुश होते, तो कुछ रोते है !
और उसे भी, इस बात का अह्सास होने लगा था,
आसां नही थी डगर, इस राह पर वह खोने लगा था !!

कभी वह सोचने लगता कि फिजूल ही है बडा होना,
कितना दुखदाई है यहां, खुद के पैरो पर खडा होना !
मगर उसने चलना नही छोडा, बस वह चलता रहा,
उबड-खाबड राह मे ठोकरें खा, गिरता-संभलता रहा !!

इधर चरम पर यौवन था, उबलता जवानी का खून था,
शकूं पाने की जिद थी, कुछ कर गुजरने का जुनून था !
वह चलता गया, क्योंकि उसे मंजिल जो पानी थी,
कुछ भी हो ,रुकूंगा नही, उसने मन मे ठानी थी !!

शुकुं व मंजिल तलाशने मे ही, जाने कब उम्र ढल गई,
लकडी जो शिरे से जलनी शुरु हुई, जाने कब जल गई !
दुर्बल हाथों ने लाठी ली, थके बदन की कमर झुक गई,
भागते वक्त की सुइयां, इक दिन अचानक रुक गई !!

थका-हारा मुसाफ़िर,इसकदर खुद से परेशां हो गया,
पडाव पर पैर पसारे, आंख लगी और सो गया !
कारवां आगे बढा, उसकी सुद किसी को न लग सकी
मुसाफिर की रूह इसकदर सोई कि फिर न जग सकी !!

Saturday, December 5, 2009

मैं ख्वाब ही बुनती रही

ताऊ की पहेली का समय हो रहा है, ज्यादा नहीं लिख पाया, इसलिए एक आठ लाइनों की नज्म पेश है;
कब न जाने वो दिल का हर इक, तार आकर छेड़ गए,
मैं जिन्दगी के साज-सरगम, यूँ आँचल में ही चुनती रही !
तबले के ताल, सरोद-ए-दिल-नशीं, व बीणा की तान पर,
जाने कब वो राग मल्हार गा गए, मैं ख्वाब ही बुनती रही !!

इस कदर मन को मोहित किया था, राग के हर बोल ने,
साज बजता रहा, वो बेखर गाते रहे, और मैं सुनती रही !
दिल के खंडहर की टूटी मेहराबें एवं धूल-धूसरित मीनारें ,
ताने-बानो के इर्द-गिर्द रूह को रूई की मानिंद धुनती रही !!

Friday, December 4, 2009

To err is human to forgive is devine

एक बार फिर से अंग्रेजी की चार लाईने और ठेल रहा हूँ ब्लॉग पर ;
Yes, I have commited a sin,
If you think love is a crime.
I brought down the sky for you,
like a drink with a twist of lime.
Of course, It’s nobody’s fault but mine.
Now , all I can say is that
To err is human to forgive is devine.
You can just pray to a god,
please forgive him, Oh lord !
as he doesn’t know what he is doing.
What is the theme of love and wooing.
Frankly My dear, I don't give a damn,
For me, every day is a day of valentine,
That’s why I say,
To err is human to forgive is devine.


और चलते-चलते यह भी गुनगुनाइएगा ;
हम बेवफ़ा तो पैदाइशी थे….!
हम बेवफ़ा पैदाइशी थे,
पर तुमसे वफ़ा करते रहे !
जानू, तुमने कोई धोखा तो नही दिया?
अरे नही जानम, तुम्हें कोई धोखा हुआ ।
कितनी अकेली रही होगी वो गोद जिसकी,
छत्र-छाया मे अब तक हम अकेले पलते रहे।
पैदा होते ही अपनी सगी मां से बेवफ़ाई की,
और सौतेली मां संग कंटीली राहों पे चलते रहे ॥
तुमने किया हमसे जो सिकवा
हम वो गिला करते रहे !
हम बेवफ़ा तो पैदाइशी थे,
पर तुमसे वफ़ा करते रहे !

Thursday, December 3, 2009

यूनियन कार्बाइड !

खंडहर कर दिया उन हसीं वादियों को ,
रहा करते थे जहां इन्सान कल तक !
पिला गया उनको ही जहर का प्याला,
यहाँ तेरे रहे थे जो कदरदान कल तक !!

थम गया सब कुछ जहां इक घडी मे,
लगता न था वह शहर वीरान कल तक !
मिलती नही अब जहां धड़कन की आहट ,
वहां रुकते न थे सांसो के तूफ़ान कल तक !!

मारा बेदर्दी तूने हर उस एक शख्स को,
जो समझता था तुझको नादान कल तक !
उसी का लूटा घरबार कुहरे की धुंध में ,
बनकर रहा जिसका तू मेहमान कल तक !!

बिख्ररे पडे जहां हरतरफ हड्डियो के ढेर,
इसकदर तो न थी वह बस्ती बेजान कलतक !
संजोया था अपना जो ख्वाबो का भोपाल,
लगता नही था जालिम वो शमशान कल तक !!

़़़़़़
यह कविता या गजल मैने भोपाल गैस त्रास्दी पर ३० दिसम्बर, १९८४ को लिखी थी;

Wednesday, December 2, 2009

धुंधलाई यादे !

कल एक आंग्ल भाषा में कविता लिखी थी, "फ़ॉगी मेमोरी" कुछ सम्मानीय पाठको ने उसके अनुवाद की पुरजोर मांग की थी अत: यहाँ उसका छंद क्रमश: अनुवाद प्रस्तुत है, कविता रूपी अंदाज में ढालने के लिए अनुवाद को तोड़ मरोड़ कर पेश कर रहा हूँ ;


मदमस्त तेरा जहां आज भौरों ने घेरा है !,
लेकिन ऐ दोस्त ! तुझे याद है कि
तेरा प्यार ही तो यहाँ,सब कुछ मेरा है !!
तुम्हे बताऊ,तुम्हे भुलाना नामुमकिन है !
युगों से मेरा दिल,
ज्यों किसी बूढ़े खलिहान की तरह
टूटकर हो गया छिन्न-भिन्न है !!

I know, your life is full of bumblebee,
But, your love is everything for me .
do you remember, eh, Mate ?
you are so hard, so hard to forget.
I miss you, I wanna tell you,
for epoch,an old barn falling apart!
across the inner circle of my heart !!


तकदीर का उसकी ख़याल न कर,
जो तुमने लिखे प्यार के चार अक्षर ,
नहीं मालूम कि
जान के लिखा था या अनजाने में !
ताजे बर्फ की उस चादर पर ,
तुम्हारी कला के हर कण ने
क्या खुशी भरी थी मेरे दिल के तहखाने में !!

Once, without knowing its fate,
You wrote ‘l’ ‘o’’v’’e’, four alphabets.
willingly or unwillingly don’t know,
Like on the keffiyeh of fresh snow.
And gladness filled
every ounce of your art !
across the inner circle of my heart !!


मेरा पागलपन कह लो इसे मगर,
तुम रुकी थी वहाँ , मेरे दिल के बीचो-बीच ,
और मासूमियत से यह उल्लेख किया था
कि तुमने मुझसे प्यार किया !
और फिर प्यार से इसतरह मारा
कि एक तीर
मेरे दिल के पार उतार दिया !!
At middle of the circle on a hoarding,
It looks funny, but you had a boarding.
and you mentioned innocently there,
“I love you so much, oh, my dear”
You killed me loftly-softly
with a dart !
across the inner circle of my heart !!


धीमे से वहाँ बैठकर रंगने लगी थी
तुम मेरे दिल को यों,
सच है न ? फिर तस्वीर बिगड़ी
अचानक क्यों ?
याद करो उन खुशनुमा पलो में !
मै चुस्त और तुम अभी भी ख़ूबसूरत
चलकर बस जाए फिर से दिलो में !!

You sat down slowly and began to paint,
and you colored entire my heart, ain’t ?
why painting turned suddenly so bad ?
Remember the good times that we had?
you’re equally beautiful,
‘m smart !
across the inner circle of my heart !!


बिना किसी द्वेष और हिचक के
आ जाओ तुम मेरे पास, तुम्हारा स्वागत है
कोई बोझ नहीं, कोई कर नहीं !
जब चाहो उतर आना दिल में गाडी समेत ,
दिल की सड़क हर वक्त खुली है,
और उसमे कोई दर नहीं !!

Without any hesitation and malice
you are always welcome at my place
no levy, no toll-tax, no gate even
anytime, as the road is open 24x7
you can joy drive in
with your cart !
across the inner circle of my heart !!

Tuesday, December 1, 2009

Foggy memory !

यों तो अग्रेजी में हाथ बहुत साफ़ नहीं है ,या यूँ कह लीजिये कि बहुत तंग है ! मगर आज बस, परखने के लिए एक अंगरेजी पोएम लिखी, इसे भी ब्लॉग पर ठेल रहा हूँ आपके सुझाओ की प्रतीक्षा में ;

I know, your life is full of bumblebee,
But, your love is everything for me .
do you remember, eh, Mate ?
you are so hard, so hard to forget.
I miss you, I wanna tell you,
for epoch,an old barn falling apart!
across the inner circle of my heart !!

Once, without knowing its fate,
You wrote ‘l’ ‘o’’v’’e’, four alphabets.
willingly or unwillingly don’t know,
Like on the keffiyeh of fresh snow.
And gladness filled
every ounce of your art !
across the inner circle of my heart !!

At middle of the circle on a hoarding,
It looks funny, but you had a boarding.
and you mentioned innocently there,
“I love you so much, oh, my dear”
You killed me loftly-softly
with a dart !
across the inner circle of my heart !!

You sat down slowly and began to paint,
and you colored entire my heart, ain’t ?
why painting turned suddenly so bad ?
Remember the good times that we had?
you’re equally beautiful,
‘m smart !
across the inner circle of my heart !!

Without any hesitation and malice
you are always welcome at my place
no levy, no toll-tax, no gate even
anytime, as the road is open 24x7
you can joy drive in
with your cart !
across the inner circle of my heart !!