Thursday, April 29, 2010

खामियाजा !

दो ही रोज तो गुजरे
जुम्मे-जुम्मे
मगर अब शायद ही
याद हो तुम्हे,
किसी बेतुकी सी बात पर
भड़ककर
उतर आये थे तुम दल-बल
सडक पर,
तुमने अपनी नाखुशी जताने को
राह चलते राहगीर को सताने को ,
लिए हाथों में ईंट, पत्थर
तुम्हारा जन-जन
कर डाला मिलकर वो
क्रूर भौंडा सा प्रदर्शन ,
तब चरम पर पहुंचा
सबक का वो आह्वाहन
शिकार हुए मंजिल को जाते
अनगिनत वाहन,
हासिल होगा क्या?
समझा न सोचना जरूरी
कर डाली अपनी वो
विनाश की हसरत पूरी,
और शायद तुमने जो
एक बडा सा पत्थर,
उठाकर उस बेगुनाह सडक के
सीने पे जडा होगा !
आज अन्धेरे मे, उसी छोर से,
किसी मासूम के कराहने की
आवाजें आ रही थी,
शायद ठोकर खाकर,वहीं कहीं
गिर पडा होगा !!
काश कि तुममे भी थोड़ी
संवेदनशीलता होती
और थोड़ा सा
तुम्हारा भी दिल दुखता !
तनिक तुम भी
महसूस कर पाते कि
तुम्हारे आक्रोश का
खामियाजा किसने भुगता !!

Wednesday, April 28, 2010

महंगाई का ग्राफ भी अब नीचे आ गया !

महलों में झूठ के वर्क से कुछ और सजावट आ गई है,
लवों पर कुछ और कुटिल शब्दों की बनावट आ गई है!

सरकार की महंगाई का ग्राफ भी अब नीचे आ गया,
क्योंकि मानवीय मूल्यों में कुछ और गिरावट आ गई है !!

बच्चो ने भूख से समझौता कर बिलखना छोड़ दिया,
मजबूरी व हालात के टूटे तटबंधों में भरावट आ गई है !

गरीब के आंसुओं ने अब आग उगलना छोड़ दिया,
क्योंकि आँखों की नमी में लहू की तरावट आ गई है !!

अब प्यार-प्रेम के अभिनय सभी दिखावटी बन गए,
क्योंकि सेवाभाव और सादगी में भी दिखावट आ गई है!

अस्पतालों से निकल मरीज भी अब मिलावटी हो गए,
क्योंकि बोतलों से चढ़े खून में भी मिलावट आ गई है!!

Sunday, April 25, 2010

इस देश में इतने गद्दार क्यों है !

यहाँ लुच्चे-लफंगों की भरमार क्यों है,
मेरे इस देश में इतने गद्दार क्यों है !


जिसे देखो वो ढूढता है दवा मर्ज की ,
कोई ये न पूछे इतने बीमार क्यों है !

पृथ्वीराज आते यहाँ कंजूसी बरतकर,
मगर ये जैचंद आते हर बार क्यों है !

मगरमच्छ तो हाथी का मल खा गए,
होती परिंदे की बीट पर तकरार क्यों है !

तलवे चाटना परदेशी के पेशा जिनका,
वो ही बताते अपने को खुद्दार क्यों है !

आशाओं-उम्मीदों पे जो खरी न उतरे,
ताजो-तख़्त पे बैठी वो सरकार क्यों है !

Friday, April 23, 2010

ये दिल्ली वाले कम लेते है !

तू मेरी ऐ गल सुन कुडिये,
ये इश्क के बदले गम देते है,
ओये तू अब बस कर मुंडिये ,
ये दिल्ली वाले कम लेते है !

आँखों में दौलत का नशा है,
दिलों में इनकी जलन होती है,
बात करेंगे दुष्ट-दमन की
करनी आत्म-दलन होती है !

कदम डगमगाते घर से बाहर,
घर के अन्दर थम लेते है,
ओये तू अब बस कर मुंडिये ,
ये दिल्ली वाले कम लेते है !

आग लगाते घर दूजे के,
अपने घर अग्नि-शमन होती है,
वर्जना नहीं रंग-ढंग अपना ,
बंदिश कुतिया के चाल-चलन होती है !

यकीं न करते अपनों पर,
गैरों पे भरोसे जम लेते है,
ओये तू अब बस कर मुंडिये ,
ये दिल्ली वाले कम लेते है !

बाणी-भाव अशुद्ध नीरसता का,
शब्द-कुटिलता सघन होती है,
ईमान लुडकता वैंगन की तरह,
जुबां में भी फिसलन होती है !

रुतवे की धौंस के मारे बच्चे,
माँ-बाप के दम पर दम लेते है,
ओये तू अब बस कर मुंडिये ,
ये दिल्ली वाले कम लेते है !

मुख प्रसन्नचित प्रसाधन से,
अवसाद की थैली मन होती है,
देख करे क्या भाव प्रकट उसे ,
हर पल यह उलझन होती है !

संपर्क न कोई पास-पड़ोस से,
अपने-आप में रम लेते है,
ओये तू अब बस कर मुंडिये ,
ये दिल्ली वाले कम लेते है !

Tuesday, April 20, 2010

ऐ वक्त ! तू इतना कमवख्त क्यों है !

मन-पांखी हो रहा अशक्त क्यों है,
ऐ वक्त ! तू इतना कमवख्त क्यों है !

खुद कहे, हर दम मेरे साथ चल,
राहे-सफ़र करता फिर विभक्त क्यों है !

डगमगाने लगी कश्ती मझधार में ,
लहरों का साहिल पे भरोसा सख्त क्यों है !

फरेब की जमीं पर झूठ की पौधे देख,
फुसफुसाता ये चिनार का दरख़्त क्यों है !

शहंशाहों का घमंड में चूर होकर,
ताज उछलते देखा,उछलता तख़्त क्यों है !

Monday, April 19, 2010

एक नालायक पुत्र की पिता को सलाह !


अपनों में ढूंढो,
बेगानों में ढूंढो,
चमन में ढूंढो,
वीरानो में ढूंढो,
पहाड़ों में ढूंढो,
मैदानों में ढूढो,
फ्लैटों में ढूंढो,
मकानों में ढूंढो,
शमाओ में ढूंढो,
परवानो में ढूंढो,
आशिकों में ढूंढो,
दीवानों में ढूंढो,
इस दौर में ढूंढो,
जमानों में ढूंढो,
मगर मेरे बाप !
इस तरह तुम
हाथ पर हाथ
धरे मत बैठो,
ये सदा मेरी
अंतरात्मा से
आ रही है !
क्योंकि,
तुम्हारे बेटे की
शादी की उम्र,
हाथ से निकले
जा रही है !!

Friday, April 16, 2010

निट्ठले व खडूस सारे कामकाजी बन गए है!


मरकर बहतर हूरों व जन्नत पाने की चाह में,
जीते जी दोजख जाने को राजी बन गए है।
सुना है कि बेनमाजी भी नमाजी बन गए है,
निट्ठले व खडूस सारे कामकाजी बन गए है।।

अपना खौफनाक असली चेहरा छुपाने को,
दाड़ी रखकर मिंयाँ घोटा हाजी बन गए है ।
अदाई की रस्म खुद तो निभानी आती नहीं,
और जनाव इस शहर के काजी बन गए है।।

यों तो लोगो को सिखाते फिर रहे हैं कि
ख़ुदा नाफरमान की हिमायत नहीं करता।
पर जब खुद फरमान बरदारी की बात आई,
शराफत को त्याग, दगाबाजी बन गए है।।

भोग-स्वार्थ के लिए आप तो रूदिवादिता व
असामाजिकता के दल-दल में धंसे रहते है।
हक़ की बात पर उनके लिए औरतों के
मुकाम सियासी और समाजी बन गए है ।।

धर्म के नाम पर लोगो को गुमराह करके ,
रंक भी आजकल खुद ही शाहजी बन गए है ।
अपने स्वार्थ हेतु कलयुगी पंडत-मुल्लों के धंधे,
झूठ बोलना और जालसाजी बन गए है।।

Wednesday, April 14, 2010

हमें ऐसा न कोई तट मिला

आशिकी जिस दर से की थी,
वहाँ बेनामियों का पनघट मिला,
दोस्ती इक समंदर से की थी,

मगर सूनामियों का झंझट मिला !

खातिर नाम के अपने उम्रभर,
हम हरगिज नहीं भागे कहीं,
पर इक नाम जब ओंठो ने पुकारा,

बदनामियों का जमघट मिला !

पाने को हम भटकते रह गए,
इक झलक हुश्न-ऐ-यार की,
जिस द्वार को भी कान हम दिए,

नाकामियों का खट-खट मिला !

लोगो से सुनी हमने भी थी,
एक मजबूर के बिकने की खबर,
मगर हमें किसी राह भी,

नीलामियों का लाग ना लपट मिला !

भावनाओं के सागर में बहते-बहते,
पहुँच गए न जाने हम कहाँ,
ठौर कर लेते पलभर किसी छोर पे,

हमको ऐसा न कोई तट मिला !

मित्रों, क्षमा चाहता हूँ कि अत्यधिक व्यस्तता के कारण ब्लॉग को समय नहीं दे पा रहा, आज ब्लॉग जगत पर कुछ लेखो के आगे मुहतोड़ टिपण्णी देने का भी मन किया था, मगर समय .....!

Tuesday, April 13, 2010

एवरी डॉग हैज इट्स डे !

आज लिखने का कतई मूड नहीं है, एक अपनी पुरानी कविता दोबारा पोस्ट कर रहा हूँ , उम्मीद करता हूँ कि आप लोगो को पसंद आयेगी;

इक दिन वो भी दिन आयेगा,
जब मेरी भी दाल गलेगी दिल्ली में !
'साडे ली ते तुसी ही ग्रेट हो मौन जी,
साड्डी त्वाडे नाल गलेगी दिल्ली में !!

ईर्ष्य न मुझको कुछ भी तुमसे,
तुमने भी अपनी खूब गलाई यहाँ !
मगर जब मेरी गलनी चालू होगी ,
तो सालो-साल गलेगी दिल्ली में !!

ऐसे लूच्चे-लफंगे यहाँ गला रहे है,
कैसे-कैसे गुंडे-मवाली चला रहे है !
मैं तो इनसे फिर भी बेहतर हूँ,
मेरी हर हाल गलेगी दिल्ली में !!

अपने दम पर मैं लड़ता आया हूँ,
कदम-कदम बढ़ता आया हूँ !
तुम मैडम की बाणी में कहते हो ,
मेरी वाचाल गलेगी दिल्ली में !!

गरीब की न फिर ऐसी गत होगी,
हर बच्चे के सिर छत होगी !
पेट-फिकर में तब और न कोई माँ,
ऐसे बदहाल गलेगी दिल्ली में !!

Monday, April 12, 2010

टेंशन मत लो सर जी....!

कल यानी रविवार का यह वाकया है! बंद गेट के बाहर कुछ लोग खड़े जोर-जोर से बाते कर रहे थे , और गेट के अन्दर मौजूद सिक्योरिटी गार्ड से उलझ रहे थे! लोग मांग कर रहे थे कि वह उन्हें अन्दर जाने देने के लिए गेट खोले ! गार्ड विनम्रता से बस एक ही वाक्य कहे जा रहा था कि सहाब ये गेट बंद है , चाभी अन्दर ऑफिस में है, अत: यह गेट नहीं खुल सकता, आप गेट नंबर दो से अन्दर जा सकते है! अपनी बौसियत दिखाते-दिखाते कुछ लोग अपनी औकात में उतर आये थे और गार्ड को एक ने बहन की गाली दे दी ! बस फिर क्या था, गार्ड भी अपना संतुलन खो बैठा और पैर से जूता निकाल लिया ! फिर एक सज्जन ने जो कुछ उस गार्ड को समझाया उसे कविता में वयाँ कर रहा हूँ ;

लगती पग-पग यहाँ दिल को ठेस है,
टेंशन मत लो सरजी, गधो का देश है !
एक कान से सुनो, दूसरे से निकाल दो,
ये भी मुमकिन न हो तो रूइं डाल दो !!
बहस करके क्यों फिजूल पालता कलेश है,
टेंशन मत लो सरजी, गधो का देश है !
किस-किस की सुनोगे और जबाब दोगे,
जिसे देखो वही ढेंचू-ढेंचू कर रहा है !
अनाज गोदामों में सड़कर बेकार हो गया,
इंसान कुत्ते की मौत भूख से मर रहा है !!
लूटता यहाँ से है, संभालता उसे विदेश है,
टेंशन मत लो सरजी, गधो का देश है !

और चलते-चलते एक कार्टून ;


बस एक आखिरी सवाल सोएब जी, क्या इस निकाह में
शरीक होने के लिए आपकी बड़ी बहन, मेरा मतलब
आपकी महाआपा आयशा जी भी आ रही है ?

Wednesday, April 7, 2010

ख़्वाबों के सुनहरे तिलिस्म टूटे है !

सड़क वीरां क्यों लगती है, उखड़े-उखड़े से खूंटे है,
आसमां को तकते नजर पूछे, ये बादल क्यों रूठे है!

डरी सी शक्ल बताती है, महीन कांच के टुकडो की
क्रोध में सुरीले कंठ से, कुछ कड़े अल्फाज फूटे है!

रसोई के सब बिखरे बर्तन, आहते में पडा चाक-बेलन,
उन्हें देखकर कौन कहेगा कि ये बेजुबाँ सब झूठे है !

अजीजो को फोन कर दे दी, मेरे मरने की खबर झूठी,
आपके तो बेरुखी-तकरार के, अंदाज ही अनूठे है!

उस 'अंधड़' को खुद तुमने, झिंझोड़ कर जगाया था,
मलाल यह है कि ख़्वाबों के सुनहरे तिलिस्म टूटे है !!

Sunday, April 4, 2010

जनगणना मे यह जानकारी भी ली जानी चाहिये थी…

जैसा कि सभी जानते है कि देश में जनगणना का काम एक अप्रैल से शुरु हो चुका है। इस बार इस जनगणना मे भरे जाने वाले फ़ार्म मे एक आम नागरिक के जीवन से समबन्धित बहुत सी बातों की जानकारी लेने का प्रयासकिया जा रहा है। साथ ही मगर मेरा यह भी मानना था कि क्या ही अच्छा होता कि सरकार यह भी इस जन गणना के माध्यम से जानने का प्रयास करती कि दूसरों को बडे-बडे उपदेश देने वाले हमारे इन भ्रष्ठ प्रजाति के प्राणि की मलीन बस्तियों से देश रक्षा का जज्बा लेकर राजनीतिक नेतावों के कितने बच्चे पिछले दस सालों मे सेना मे गए?



मातृ-रुंधन
चाहे गुहार समझो मेरी,
या समझ लो इसे दृढ ऐलान,
दूंगी अब एक भी सपूत अपना
तुम्हें करने को देश पर बलिदान

एक तरफ़ तो सेना मे
अफ़सरों की कमी का रोना रो रहे,
दूसरी तरफ़ उन्हे घटिया हथियार और
निरन्तर मिग दुर्घटनाओं मे खो रहे।

देश मे व्याप्त लूट-भ्रष्ठाचारी का
कर दोगे जब तक निदान ,
दूंगी तब तक एक भी सपूत अपना
तुम्हें करने को देश पर बलिदान

अपना तो तुम्हारा कुटिल,कपटी, कपूत
नित हर रहा द्रोपदी के चीर को,
और पेंशन को भी मोह्ताज कर दिया,
देश रक्षा करने वाले वीर को

सीख लो जब तक करना
सह्रदय से वीरों का सम्मान,
मैं दूंगी एक भी सपूत अपना
करने को तुम्हें देश पर बलिदान


Friday, April 2, 2010

गुड फ्राई डे !

आज इस सुअवसर पर दो आड़ी तिरछी कविता की लाइने लोर्ड जीसस के नाम ;

I'm a Hindu,
but still I think
I'm not much different
from the people of your community.

Yes Jesus, I respect you
and love to read
your autobiography because it is
full of life and sacrifice for humanity.


I know, on this day
people commemorate your suffering,
and death on the cross,
I wish you a Blessed Good Friday!

But I think,
it's gonna be a bad day for me,
because in Delhi,
it's observed as DRY day. :)

Thursday, April 1, 2010

तकरार-ए-अप्रैल फूल !


कली ने कांटे से कहा तू फूल है,
कांटे ने कहा यह तेरी भूल है !
लाख मगर कोई कोशिश कर ले,
वो फूल नहीं बन सकता जो शूल है !!

फूल तो जाकर कलियाँ बनती है,
भंवरा मंडराए इसलिए बन-ठनती है !
प्रहरी बनके रहना कांटे का असूल है,
वो फूल नहीं बन सकता जो शूल है !!

फूलों की किस्मत में महकना लिखा है,
हमारी किस्मत में बस तकना लिखा है !
जो तुम्हे छूने लगे उसे डसना ही उसूल है,
वो फूल नहीं बन सकता जो शूल है !!

कली बोली, तेरे मुह लगना ही मेरी भूल है,
यह नहीं जानता कि आज अप्रैल फूल है !
खैर, तुझ से झख मारना ही फिजूल है,
तू फूल नहीं बन सकता, तू तो शूल है !!