Thursday, January 20, 2011

शायद !

गर फैसले हमने गैरों पे टाले न होते,

तो आज देश में इतने घोटाले न होते।

सांप-छुछंदर आस्तीन में पाले न होते,

तो आज देश में इतने घोटाले न होते॥

मक्कार खुद छुपे रहकर परदे के पीछे,

कठपुतलिया नचाये, डोरी से खींचे।

सिंहासन, कैकई-धृतराष्ट्र संभाले न होते,

तो आज देश में इतने घोटाले न होते ॥

हर कोई रमा बैठा है सिर्फ अपने में,

संत-महात्मा लगे है स्वार्थ जपने में।

गर जनता के मुह पड़े ताले न होते,

तो आज देश में इतने घोटाले न होते॥

समाज यहाँ इस कदर बँटा न होता,

देश अपना जयचंदों से पटा न होता।


गर नेता-शाहों के दिल काले न होते,

तो आज देश में इतने घोटाले न होते ॥

राजनीति के ये खेल अजब निराले है,

कोयले की दलाली में हाथ काले है।

गर गोता लगाने को गंदे नाले न होते,

तो आज देश में इतने घोटाले न होते ॥

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