Saturday, March 3, 2012

बादह-कश !












मुरीद ये माह-जबीं
मधुशाला के दर पर,
एक जीवन जी गया,
आब-ऐ-आतिश,
आधी खपी बांटने में,
बाकी बची खुद पी गया।

आब-ऐ-आतिश= शराब
फिर शाम रंगीं
मीना की हुई, छूकर
गुलाबी आतिश-ऐ-तर,
मय को दर्द-ऐ-दिल में
जन्नत मिली,
साकी लब सी गया।

मीना-मय की प्याली, आतिश-ऐ-तर=आशिक के ओंठ
हमनशीं को रख लिया
दिल में छुपाकर,
जाहिरी के खौफ से,
अल्फ़ाजों ने अपनी चाल बदली,
रंग चेहरे का आफताबी गया।

आफताबी= सुनहला रंग (सूरज जैसा)
पलक ही बंद हम कर गए थे ,
नजरें मेहरबाँ होने से पहले,
इर्द-गिर्द गश्त-ऐ-काएनात में,
मुकम्मल भूगोल भी गया।

गश्त-ऐ-काएनात= दुनिया की सैर
ख्वाइशे जाने कहाँ
गुम हो गई फिर,
दश्त की वीरानियों में,
ज़ुल्मत में, दीदार
चाँद-तारों का हुआ,
हुनर आगाही गया।

ज़ुल्मत=अंधकार में, आगाही= चेतन युक्त बादह-कश = शराबी
छवि  गूगल  से  साभार ! 

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