Saturday, March 3, 2012

नाम की क्या फिकर तुझको.....

आज आप पहले मेरा ताजातरीन जोक पढ़िए, फिर नज्म ;

एक पड़ोसन दूसरी से पूछती है; तुम अपने शौहर से इतना क्यों झगडती हो,

आखिर इसका आउटकम क्या निकलता है?

दूसरी पड़ोसन: क्या करू, झगड़ना तो मैं भी नहीं चाहती मगर, वो घर से आउट कम निकलते है.....................:) :)











रूठो न इस तरह कि बात ख़ास से आम हो जाए,
अकुलाहट धडकनों की हयात सुबह की शाम हो जाए।

कुछ इस तरह संभाले हम, बिखरने की ये कवायदें,
फजीहत न महफ़िल में,रिश्तों की सरेआम हो जाए।

ढूंढें फिरे तहेदिल से, नफरतों में तेरी मुहब्बत को,
फीके न पड़े ये जलवे, कोशिश न नाकाम हो जाए।

संजोकर रखे हुए जख्मों को जरा मरहम लगाकर के,
दिलों को यूं मनायें कि जाँ, इक-दूजे के नाम हो जाए।

आगाज कर 'परचेत' कुछ ऐंसा सुखद अंजाम हो जाए,
नाम की क्या फिकर तुझको, मुन्नी बदनाम हो जाए।
छवि गुगुल से साभार

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