Saturday, March 3, 2012

नासमझ !














की होती अगर थोड़ी  वफ़ा जिन्दगी से,
तो होते न इस कदर खफा जिन्दगी से !


बढ़ाए जो कदम होते  ख्वाइशों के दर पर,
मुहब्बत फरमाकर इक दफा जिन्दगी से !


बनता न  दस्तूर तब ये जमाने का ऐसा,
रख लेता कमाकर जो नफ़ा जिन्दगी से !


किये क्यों बयां राज बेतकल्लुफी के ऐंसे,
बदले  में पाई जो हरदम जफा जिन्दगी से ! 


ऐतबार  बनता  न बेऐतबारी का  सबब,
जुड़ जाता जो इक फलसफा जिन्दगी से !  


छवि  गूगल  से  साभार ! 

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