Sunday, May 2, 2010

पहला पैग !

जीना है तो आश जगा, दिल में इक अहसास जगा,
हर दरिया को तर सकता है, मन में यह विश्वाश जगा!

हलक उतरता जाम न हो, साकी फिर बदनाम न हो,
तृप्ति का कोई छोर नहीं है, पीना है तो प्यास जगा!

हमदर्द तेरा दिल तोड़ गया, तुझे राह अकेला छोड़ गया ,
आयेगा फिर हमराही बनके, ये तीरे-जिगर अभिलाष जगा!

दुःख देने वाला दुखी नहीं, सुख ढूढने वाला सुखी नहीं,
निराशाओं में भी आशाओं के दायरे अपने पास जगा!

पीछे छूटे का अफ़सोस न कर, किस्मत का दोष न कर,
चित-अन्धकार को रोशन कर दे, दीप वो बेहद ख़ास जगा!

21 comments:

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर कविता, धन्यवाद

मो सम कौन ? said...

वाह जी, गोदियाल साहब।
जगा कर ही छोड़ोगे।

M VERMA said...

आयेगा फिर हमराही बनकर, तीरे-जिगर अभिलाष जगा!
अभिलाषा की ताकत का सही आकलन
सुन्दर

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

bhaav achhe hain ...par

जीना है तो आश जगा, दिल में इक अहसास जगा,
हर दरिया को तर सकता है, मन में यह विश्वाश जगा!

हलक उतरता जाम न हो, साकी फिर बदनाम न हो,
तृप्ति का कोई छोर नहीं है, पीना है तो प्यास जगा!


in do ashaar ke baad lay kaheen kho si gayi .. baharhal ek achhi rachna

राजेन्द्र मीणा said...

दुःख देने वाला दुखी नहीं, सुख ढूढने वाला सुखी नहीं,
निराशाओं में भी आशाओं के दायरे अपने पास जगा!

शानदार प्रस्तुति ....मान गए जनाब

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बहुत बढ़िया...

Udan Tashtari said...

वाह वाह!! हर शेर लाजबाब!!

बहुत उम्दा!

परमजीत सिँह बाली said...

बहुत बढिया!!

सम्वेदना के स्वर said...

भाव बड़े अच्छे थे.. अतः लोभ सम्वरण न कर पाया इनको अपनी छोटी समझ से एक बहर में लाने की... लयबद्धता आ गई है... धृष्टता के लिए क्षमा चाहूँगा..

जीना है तो आस जगा, दिल में इक अहसास जगा,
हर दरिया तर सकता है तू, मन में यह विश्वास जगा!

हलक उतरता जाम न हो, साकी फिर बदनाम न हो,
तृप्ति का कोई छोर नहीं है, पीना है तो प्यास जगा!

बेदर्दी दिल तोड़ गया जो, बीच राह में छोड़ गया जो,
फिर हमराही बनकर आए, तीरे-जिगर अभिलाष जगा!

दुःख देने वाला दुखी नहीं, सुख ढूंढने वाला सुखी नहीं,
तम काट निराशा के, आशा के दायरे अपने पास जगा.

कुछ छूट गया अफ़सोस न कर, किस्मत का अपने दोष न कर,
चित-अन्धकार को रोशन कर दे, दीप वो बेहद ख़ास जगा!

वाणी गीत said...

अंधियारे को रौशन कर दे ...दीप बेहद ख़ास जगा ...
आस जगा ...
उत्साह से लबरेज सुन्दर कविता ....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

गोदियाल जी !
मन में आशाओं का संचार करते शानदार अशआरों के लिए आपको बधाई!

ललित शर्मा said...

गोदियाल जी,
हमारा तो हर पैग ही पहला होता है
जब तक खतम नही हो जाती बोतल।

सभी शेर सवासेर हैं, बधाई

पी.सी.गोदियाल said...

@ स्वप्निल कुमार जी एवं @संवेदनाओं के स्वर जी ,
आपका शुक्रिया , कुछ संशोधन कर लिए है !

SANJEEV RANA said...

पीछे छूटे का अफ़सोस न कर, किस्मत का दोष न कर,
चित-अन्धकार को रोशन कर दे, दीप वो बेहद ख़ास जगा

bahut acha godiyaal ji
aise hi likhtge raho
hum h na padhne ke liye

वन्दना said...

बहुत सुन्दर संदेश देते शेर्।

kunwarji's said...

हलक उतरता जाम न हो, साकी फिर बदनाम न हो,
तृप्ति का कोई छोर नहीं है, पीना है तो प्यास जगा
वाह!भावनाओं के हर छोर को छूती पंक्तियाँ!अब तक तो प्यास बुझाने के लिए ही मारे-मारे फिरे थे,अब प्यास जगाने की भी सोचेंगे....

कुंवर जी,

संजय भास्कर said...

प्रशंसनीय

संजय भास्कर said...

... बेहद प्रभावशाली

संजय भास्कर said...

हर शेर लाजबाब!!

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

हलक उतरता जाम न हो, साकी फिर बदनाम न हो,
तृप्ति का कोई छोर नहीं है, पीना है तो प्यास जगा!

वाह क्या खूब ! लाजवाब !
बस ये शेर अपने नेता लोगों के कान तक न पहुंचे ... वैसे ही वे खून के प्यासे रहते हैं :)

दिगम्बर नासवा said...

दुःख देने वाला दुखी नहीं, सुख ढूढने वाला सुखी नहीं,
निराशाओं में भी आशाओं के दायरे अपने पास जगा ..

सुंदर रचना है ... बहुत ही लाजवाब ....