Saturday, May 15, 2010

अदभुत !

दर्द इस दिल को जमीं दे रही है,
संताप सारा आसमान दे रहा है!
पलकों में सुलगते नफरतों के शोले
यादों में तपता जहान दे रहा है !!

वो चले गए हमसे दामन छुड़ाकर,
हमारे दिल के फेल होने के डर से !
इक सब्र है जो हमसफ़र बनकर
संग हरइक घड़ी इम्तहान दे रहा है !!

जो सच था वही तो हम कह गए,
मुख पर कहने की आदत बुरी है!
अब मान-हानि के दावे की धमकी
हमको हर इक बेईमान दे रहा है!!

अनजाने से क्यों बने फिर रहे वो,
हवाओं के रुख पर जान लेने वाले!
है कोई इसका सज्ञान लेने वाला कि
क्यों एक निर्दोष जान दे रहा है !!

दुष्टता-क्लिष्टता, धृष्टता-निकृष्टता से,
अब पापों के सारे घड़े भर गए है!
जिसके लिए मौत मुह खोले खडी है ,
वही जीने का हमको ज्ञान दे रहा है !!

21 comments:

Arvind Mishra said...

vaah!

सुनील दत्त said...

अदभुत से बड़ा शब्द हमारे ध्यान में नहीं इसलिए लिख रहे हैं
अदभुत

संजय भास्कर said...

फिर से प्रशंसनीय रचना - बधाई

संजय भास्कर said...

... बेहद प्रभावशाली ।

honesty project democracy said...

जो सच था वही तो हम कह गए,
मुख पर कहने की आदत बुरी है!
अब मान-हानि के दावे की धमकी
हमको हर इक बेईमान दे रहा है!!
एकदम सही कहा गोदियाल जी आपने ,ये चोर उचक्के ही हमें धमकी देतें हैं और हम असहाय सा देखते रहते हैं /

M VERMA said...

इक सब्र है जो हमसफ़र बनकर
संग हरइक घड़ी इम्तहान दे रहा है !!
कहते है कि सब्र का फल मीठा होता है. सब्र ही तो हमसफर बनकर चलने के काबिल है
सुन्दर रचना

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

दरअसल अब कोतवाल इनके सैंया हो गये हैं>..

VICHAAR SHOONYA said...

Sunil Dutt sahab se sahmat.

राज भाटिय़ा said...

बहुत अच्छी रचना जी, धन्यवाद

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

दुष्टता-क्लिष्टता, धृष्टता-निकृष्टता से,
अब पापों के सारे घड़े भर गए है!
जिसके लिए मौत मुह खोले खडी है ,
वही जीने का हमको ज्ञान दे रहा है !!

बिव्कुल सही!
अद्भुत रचना!

दिलीप said...

waah sir bahut khoob...sundar rachna har baar ki tarah...

विनोद कुमार पांडेय said...

जो सच था वही तो हम कह गए,
मुख पर कहने की आदत बुरी है!
अब मान-हानि के दावे की धमकी
हमको हर इक बेईमान दे रहा है!!

क्योंकि सच कोई पसंद नही करता ना इस बेईमानों की दुनिया में..बहुत बढ़िया भाव..सुंदर रचना के लिए बधाई

ललित शर्मा said...

दुष्टता-क्लिष्टता, धृष्टता-निकृष्टता से,
अब पापों के सारे घड़े भर गए है!

बहुत बढिया गोदयाल जी,

भगवान परशुराम जयंती की शुभकामनाएं

योगेन्द्र मौदगिल said...

wahwa....

राजेन्द्र मीणा said...

कुछ नहीं कह सकता इस शानदार प्रस्तुति के बारे ..शब्द नहीं मिल रहे , मेरा शब्दकोष छोटा लग रहा है ,,,,,,अपनी भाषा में कहूं तो 'एक दम रापचिक माल' है ये ...आपको सादर प्रणाम ......फिर से बार - बार पढ़ने को तैयार हूँ इस रचना को ..पढ़ रहा हूँ ...सम्पूर्ण रचना लाजवाब हर पंक्ति खुद में पूर्ण और प्रभावशाली है

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

बहुत सुन्दर रचना है ... खास कर ये पंक्तियाँ मुझे बहुत अच्छी लगी -
इक सब्र है जो हमसफ़र बनकर
संग हरइक घड़ी इम्तहान दे रहा है !!

अनजाने से क्यों बने फिर रहे वो,
हवाओं के रुख पर जान लेने वाले!
है कोई इसका सज्ञान लेने वाला कि
क्यों एक निर्दोष जान दे रहा है !!

हमेशा निर्दोष कि जान ही जाती आ रही है ... और समाज हमेशा अनजान बना फिरता है ...
आपने जन्मदिन कि बधाइयाँ दी .. उसके लिए शुक्रिया !

Dr Satyajit Sahu said...

bahut accha hai ,badhai aapko

राजकुमार सोनी said...

अच्छी रचना के लिए बधाई।

Udan Tashtari said...

वाह! अद्भुत!

SANJEEV RANA said...

फिर से प्रशंसनीय रचना - बधाई

दिगम्बर नासवा said...

जो सच था वही तो हम कह गए,
मुख पर कहने की आदत बुरी है!
अब मान-हानि के दावे की धमकी
हमको हर इक बेईमान दे रहा है!..

वाह ... गौदियाल जी .. की बात कही है ... ये ही तो दस्तूर है ज़माने का ...