Tuesday, April 28, 2009

पुनरावृत्ति !

एक सुनहले दिन ढले,
दो उभरती शामे
अपने एक सुखद,
पहले मिलन की
रजत जयंती पर !
बैठ फुरसत के,
चंद लम्हों तले,
शांत किसी समुद्र के
सुनशान 'बीच' पर !!
करते हुए,
कुछ अनबुझे सवाल
लगी कहने, प्रिये !
कालचक्र के साथ-साथ,
हर एक दिन ढल जाता है !
चाहे वह,
चाँद की चांदनी हो,
या हो सूरज की आग
सब शिथिल पड़ जाता है !!
अब तुम्हे नहीं लगता कि,
न जमीं तपती है,
न आस्मां बरसता है !
नील गगन की छांव तले,
सुदूर क्षितिज पर,
दिल फिर से,
मिलन को तरसता है !!
ऐसा क्यों होता है प्रिये,
क्या पुनरावृत्ति संभव नहीं ?

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