Wednesday, April 1, 2009

अभिशाप !

वो जमाना गया जब स्वर्गीय मुकेश ने गाया था " सदा खुश रहे तू .... इस मंदी के ज़माने में यह मुमकिन नहीं अतः;

बेबफ़ा ! तेरा भी जिगर जले, मेरे जिगर की तरह
खुदा करे, तेरा भी घर उजडे, मेरे इस घर की तरह
जलन के मारे सुबह से शाम तक तू भी करे हाय-हाय
डाइजीन बेअसर, तेरा भी सर घूमे मेरे सर की तरह
थी शायद मुझसे तेरी कोई पिछ्ले जन्म की दुश्मनायी
भला बेवजह कोई करे बैर क्यो, जल मे मगर की तरह
इस जिन्दगी की लहरो को तूने किनारे पे फेंक डाला
मझधार मे डूबे तेरी भी नैंया, किसी भंवर की तरह
गिरा न पाये है दो आंशू भी मायूस मेरे ये दो नयन
बहती रहे तेरी आंखे हर वक्त किसी नहर की तरह
कफ़न मे लिपटे तेरा वो पूरा का पूरा मन्हूस शहर
ज्यो उदासी के कोहरे मे लिपटे मेरे शहर की तरह

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