Saturday, April 4, 2009

अधूरी तलाश !

पाने को चंद खुशियों भरे पल ,
वह कहां कहां नही भागा है
लोग दिन को शकुं से सोते है,
वह काली रात को जागा है

यूं तो हर एक रात हमे ,
चैन की नीद सुलाने आती है
कुछ सो जाते है अपनो संग,
कुछ को तन्हाई सुलाती है

कहानी तन्हाई के तड्पन की,
जब भोर सुहानी लाती है
सोई थी जिस विस्तर पर वह,
हर सलवट कह जाती हैं

सिरहाना दे न सका बाहो का
उसे,वह ऐसा एक अभागा है
पाने को चंद खुशियों भरे पल ,
वह कहां कहां नही भागा है

तोड के उस निर्मम बेडी को,
पडी जो अनजाने ही पांव मे
बनकर पतंग उड जाना चाहे,
वह कंही दूर गगन की छांव मे

पर सफ़र के आधे रस्ते मे ही,
जो टूट गया वो वह धागा है
पाने को चंद खुशियों भरे पल ,
वह कहां कहां नही भागा है

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