Saturday, March 20, 2010

खूब मजे लूट रहा, घर के भी, घाट के भी !

छवि गुगूल से साभार !

सुना था,
जब-जब अराजकता के बादल घिरते है,
यहाँ, आवारा हर कुत्ते के दिन फिरते है !

कमोबेश,
कुछ ऐसा ही परिस्थिति अबकी भी बार है,
दूषण - प्रदूषण से हुआ हर तंत्र बीमार है !

क्या कहने,
अब तो धोबी के कुत्ते के ठाठ-बाट के भी,
खूब मजे लूट रहा, घर के भी, घाट के भी !!

उसकी तो,
बस नजर, अपने बाहुल्य बढ़ाई में है,
पांचों उँगलियाँ घी में,सिर कढाई में है !

हर तरफ,
जिधर देखो, अराजकता ही नजर आती है,
रोटी की जगह टॉमी, बटर-ब्रेड खाती है !

ऐसी तो,
बादशाहत, हरगिज देखी न सुनी थी हमने,
अवाम-ए-हिंद, कभी किसी बड़े लाट के भी!
क्या कहने,
अब तो धोबी के कुत्ते के ठाठ-बाट के भी,
खूब मजे लूट रहा, घर के भी, घाट के भी !!

9 comments:

राज भाटिय़ा said...

कुछ ऐसा ही परिस्थिति अबकी भी बार है,
दूषण - प्रदूषण से हुआ हर तंत्र बीमार है !
ऊपर लगा चित्र बहुत कुछ कह रहा है जी, ओर आप कि यह कविता भी बहुत अच्छी लगी इस , आज का सच

ललित शर्मा said...

वा्ह गोदियाल जी,
आज तो अट्ठा मारा है।
गधे के साथ कुत्ते का
भी हुआ गुजारा है।
तंत्र जब से स्वतंत्र हुआ
अमन चैन किसे गवारा है।

आभार-टिप्पणी बक्सा खोलने के लिए।

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत अच्छी कविता ...

M VERMA said...

कुछ ऐसा ही परिस्थिति अबकी भी बार है,
दूषण - प्रदूषण से हुआ हर तंत्र बीमार है !
स्थिति तो यही है

डॉ टी एस दराल said...

आजकल तो कुत्तों के ही ज्यादा ठाठ बाठ हैं।
गोदियाल जी , ये कौन सा बनवास काटकर लौटे हैं।
खैर टिपण्णी खोलने का बहुत शुक्रिया।

AlbelaKhatri.com said...

badhiya

जी.के. अवधिया said...

"अब तो धोबी के कुत्ते के ठाठ-बाट के भी,
खूब मजे लूट रहा, घर के भी, घाट के भी !!"

बहुत खूब!

जोरदार ठाठ-बाट हैं भाई! आरसी पी रहे हैं और खीर खा रहे हैं! :-)

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बढ़िया कटाक्ष है..

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।