Thursday, March 11, 2010

तू क्या निकला !!

धर्म का पुण्य समझा था तुझे, तू अधर्म का पाप निकला,
मानवता का कलंक निकला, पर्यावरण का अभिशाप निकला !

हांकता है बाहुबल के जोर पर, तू यहाँ हर इक झुण्ड को,
भेड़ियों से है भय तुझे, भेड़ पर जुल्म का ताप निकला !

महापंच की चौधराहट दिखाई, निरीह प्रेमियों की राह में,
मुस्लिमों का तालिबां निकला, हिन्दुओ का खाप निकला !

सरिता, सुदूर पर्वतों से निकल,जाती है सागर से मिलन को,
उसकी भी राह रोक डाली, तू तो खाप का भी बाप निकला !

धन-ऐश्वर्य की लालसा ने, इस कदर अँधा बना के रख दिया,
भूखों के मुह का लिवाला छीनकर, गरीबी का संताप निकला !

वो अब तक खुला घूमता है, पशुओ का चारा खा गया जो,
निर्दोष मर-खप गया कारागाह में, यह तेरा इन्साफ निकला !!

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