Sunday, March 14, 2010

तू हिन्द है !

निभा सकता है तू जहां तक और जबतक, बस निभाता रह,
सहिष्णुता तेरा मूल मंत्र है, दिखा सके जबतक, दिखाता रह

असुर तो हमेशा की तरह ही, पथ मे तेरे कंटक बोता रहेंगा,
फूल प्रेम के तू राह उसकी बिछा सके जबतक, बिछाता रह

बैरी को भले ही खुशियां तेरी, देख पाना हरगिज मंजूर हो,
पीडा के अश्रु पीकर भी मुस्कुरा सके जबतक, मुस्कुराता रह

मानव सभ्यता के दुश्मन भले ही, बदन तेरा लहु-लुहां कर दे,
बोझ उनकी दुष्ठता क्रुरता का उठा सके जबतक, उठाता रह

कुटिल-कायरों की अधर्म-सापेक्षता से, असल धर्म अस्तगामी है,
देह पर क्षरण के रिस्ते घावों को छुपा सके जबतक, छुपाता रह

गीत यही तेरावैष्णव जन तो तेने कहीये जै पीड पराई जाणे रे”,
हिन्द हूं, मैं हिन्द हूं,गर्व से गुनगुना सके जबतक, गुनगुनाता रह ।।

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