Wednesday, February 17, 2010

1411- बाघ वनों की शान है !



(चित्र गूगल से साभार )


 बस्ती  में जंगल-राज चल रहा,
अरे तू कैसा इंसान है !
हे व्याध ! बाघ को बचा के रख,
बाघ वनों की शान है !!

आग लगा के बाघ के वन में,
बाग़ सजाता उपवन में !
ध्वस्त कर दिया घर उसका ,
विरक्ति घोल दी जीवन में !!

जैसा करोगे,  वैसा ही भरोगे ,
यह प्रकृति का विधान है !
हे व्याध ! बाघ को बचा के रख,
बाघ वनों की शान है !!

जंगल ही बाघ का गढ़ होता है,
उस गढ़ को क्यों उजाड़ रहा !
खग-मृग,वृक्ष-वनों को तवाह कर,
पर्यावरण को क्यों बिगाड़ रहा !!

'जियो, जीने दो' का अर्थ न समझा,
तू कितना नादान है !
हे व्याध ! बाघ को बचा के रख,
बाघ वनों की शान है !!

क्षणभर के निज तुच्छ लाभ हेतु,
मत उसका भक्षण कर !
हे मूर्ख ! वह तेरा शत्रु नहीं, मित्र है,
उसका तू संरक्षण कर !!

चुन-चुन कर तूने बाघ को मारा,
तू इंसान नहीं शैतान है !
हे व्याध ! बाघ को बचा के रख,
बाघ वनों की शान है !!
-गोदियाल

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