Tuesday, December 15, 2009

फिर हम तुम्हारे किसलिए ?

आ मिल-बैठ सुलझा ले आपसी कलह को,
ये विद्वेष सारे किसलिए ?
गर बात दिल की न हम से कह सको,
फिर हम तुम्हारे किसलिए ?

इक रोज तुम्ही ने तो हमको उठाकर,
अपनी पलकों में था बिठाया,
फिर इस तरह आज ये तन्हाई का
पल-पल, हम गुजारे किसलिए ?

याद है खाई थी हम-तुमने कसमे,
साथ सच का निभाने की उम्रभर
तो सच पर लगाये जा रहे अब नित ये,
झूठ के पैवंद प्यारे किसलिए ?

खाकर कसमें, भरोसा दिया था,
हम बनेगे हमेशा इक-दूजे का सहारा
फिर आज इतने पास रहकर भी,
हम-तुम हो गए बेसहारे किसलिए ?

बेचैन होकर रह गई दिल की उमंगें,
खफा हो गई अब रातों की नींद है,
सोचकर बताना हमें, हमने लगाए
अँधेरे गले, तजकर उजारे किसलिए ?

20 comments:

महफूज़ अली said...

आ मिल-बैठ सुलझा ले आपसी कलह को,
ये विद्वेष सारे किसलिए ?
गर बात दिल की न हम से कह सको,
फिर हम तुम्हारे किसलिए ?

पहली पंक्तियों ने ही दिल को छू लिया..... बहुत सुंदर रचना....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बेचैन होकर रह गई दिल की उमंगें,
खफा हो गई अब रातों की नींद है,
सोचकर बताना हमें, हमने लगाए
अँधेरे गले, तजकर उजारे किसलिए ?

बहुत बढ़िया!
महफूज अली ने दो लोगों को
फोन करके बुलाया तो था!
हुलिया बिगड़ गया दोनों महाशय जी का!

Suman said...

nice

संगीता पुरी said...

अरे वाह .. सुंदर अभिव्‍यक्ति !!

MUFLIS said...

गर बात दिल की न हम से कह सको,
फिर हम तुम्हारे किसलिए ?

sach kahaa aapne...
mitra, sakhaa, raazdaar hi to
jeevan ke meethe-khatte hr kshan mein kaam aata hai...
aapki panktiyaan hr pehlu ko chhooti haiN...
achhee kavita par abhivaadan .

AlbelaKhatri.com said...

dil jeet liya bhaaiji !

waaaaaaaaaaaaaah !

महेन्द्र मिश्र said...

इक रोज तुम्ही ने तो हमको उठाकर,
अपनी पलकों में था बिठाया,
फिर इस तरह आज ये तन्हाई का
पल-पल, हम गुजारे किसलिए ?

बहुत सुन्दर गोदियाल साहिब ....

मनोज कुमार said...

रचना अच्छी लगी ।

चंदन कुमार झा said...

प्रेम को तलाशती सुन्दर रचना !!!!!!

Udan Tashtari said...

बेचैन होकर रह गई दिल की उमंगें,
खफा हो गई अब रातों की नींद है,
सोचकर बताना हमें, हमने लगाए
अँधेरे गले, तजकर उजारे किसलिए ?


-एक सुन्दर रचना, बधाई.

विनोद कुमार पांडेय said...

आ मिल-बैठ सुलझा ले आपसी कलह को,
ये विद्वेष सारे किसलिए ?
गर बात दिल की न हम से कह सको,
फिर हम तुम्हारे किसलिए ?

बहुत सुंदर सुंदर बात..बढ़िया लिखा है आपने..अच्छा लगा...गोदियाल जी धन्यवाद

परमजीत सिँह बाली said...

बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण रचना है।ऐसा लगता है मानो कोई भीतर का दर्द शब्दों मे ढाल रहा हो.....

आ मिल-बैठ सुलझा ले आपसी कलह को,
ये विद्वेष सारे किसलिए ?
गर बात दिल की न हम से कह सको,
फिर हम तुम्हारे किसलिए ?

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

गर बात दिल की न हम से कह सको,
फिर हम तुम्हारे किसलिए ?

दिखने मैं सरल है पर गहरे भाव छिपे हैं इसमें...

Shashidhar said...

bahut khooh bhai.

वन्दना said...

ek behtreen rachna........dil ke jazbaton ko ukerti huyi.

डॉ टी एस दराल said...

आ मिल-बैठ सुलझा ले आपसी कलह को,
ये विद्वेष सारे किसलिए ?
गर बात दिल की न हम से कह सको,
फिर हम तुम्हारे किसलिए ?

वाह, गोदियाल जी, क्या खूब लिखा है।
बहुत बढ़िया।

Kusum Thakur said...

बहुत ही सुन्दर रचना ! बधाई !!

Rajey Sha said...

हम सब समझ लेंगे,बि‍न कहे भी जानम

मुश्‍ि‍कल कोशि‍शों से ये इशारे कि‍सलि‍ए ?

दिगम्बर नासवा said...

बेचैन होकर रह गई दिल की उमंगें,
खफा हो गई अब रातों की नींद है,...

प्यार भरा उल्हाना अच्छा लगा ........

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर गोदियाल साहिब ....