चौक-चौराहों पे लटका दिया तेरे बुत को,
बनाके कुटिल राजनीतिक विपणन की ढाल !
एक बार आकर तो देख साबरमती के संत,
कि यहाँ तेरे ये भक्त, कर रहे क्या कमाल !!
थोक और फुटकर दोनों में खूब कमा रहे है,
गली-गली में खोल तेरे खादी की दुकान !
पांचो उंगलिया इनकी घी में, सर कडाई में,
करदाता के पैसो का खूब कर रहे फुकान !!
बनाके कुटिल राजनीतिक विपणन की ढाल !
एक बार आकर तो देख साबरमती के संत,
कि यहाँ तेरे ये भक्त, कर रहे क्या कमाल !!
थोक और फुटकर दोनों में खूब कमा रहे है,
गली-गली में खोल तेरे खादी की दुकान !
पांचो उंगलिया इनकी घी में, सर कडाई में,
करदाता के पैसो का खूब कर रहे फुकान !!
लालू, माया, अमर-मुलायम, राजा -रंक ,
चल पड़े सब रोडपति से करोड़पति की चाल !
एक बार आकर तो देख साबरमती के संत,
कि यहाँ तेरे ये भक्त कर रहे क्या कमाल !!
सादगी के नाम पर पिछले साठ-बासठ सालो में,
इन्होने यहाँ अपने लिए क्या-क्या नहीं है जोड़ा !
तोपे हजम कर ली, शहीदों के कफ़न खा गए,
और तो और पशुओ का चारा भी नहीं छोडा !!
इनकी बदौलत बनकर चले गए यहाँ से रातोरात,
पता नहीं कितने क्वात्रोक्की होकर माला-माल !
एक बार आकर तो देख साबरमती के संत,
कि यहाँ तेरे ये भक्त, कर रहे क्या कमाल !!


