Thursday, September 10, 2009

जब-जब इंसान की मति मारी गई !

सुख-चैन, यश-कीर्ति, मान-मर्यादा सारी गई,
धरा पर जब-जब इंसान की मति मारी गई !
भोग-विलासिता में चूर मत भूल, अरे नादान,
मरणोपरांत मान्धाता की लंगोट भी उतारी गई !!

दौलत के नशे में खो दिया तुमने अपना धैर्य,
छल-कपट की छाँव में पाकर यह सारा ऐश्वर्य !
टिकता नहीं फरेब बहुत दिनों तक, याद रख,
पाप की कमाई यहाँ अक्सर जुए में ही हारी गई !!

जिस दम पर उछल रहे हो अपने आहते में,
हिसाब सब दर्ज हो रहा वहाँ, उसके खाते में !
छुपा नहीं कुछ भी उसकी नजरो में, ध्यान रहे,
हर एक हरकत तुम्हारी उसके द्वारा निहारी गई !!

सुख-चैन, यश-कीर्ति, मान-मर्यादा सारी गई,
धरा पर जब-जब इंसान की मति मारी गई !
भोग-विलासिता में चूर मत भूल, अरे नादान,
मरणोपरांत मान्धाता की लंगोट भी उतारी गई !!

5 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

Insaan ki mati baar baar mari jati hai.aur use hosh nahi rahata ki insaniyat ke naam par kaisa kaisa kritya kar raha hai..

achchi kavita..badhayi..

Mishra Pankaj said...

बहूत खूब जनाब

seema gupta said...

दौलत के नशे में खो दिया तुमने अपना धैर्य,
छल-कपट की छाँव में पाकर यह सारा ऐश्वर्य !
टिकता नहीं फरेब बहुत दिनों तक, याद रख,
पाप की कमाई यहाँ अक्सर जुए में ही हारी गई !!
सत्य का दर्पण है इन शब्दों मे सुन्दर अभिव्यक्ति...
regards

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

लगता है मर्यादाएँ तो श्री राम जी के साथ ही पलायन कर गई हैं।
बढ़िया कविता!
बधाई।

Udan Tashtari said...

वाह!! क्या बात है!!