Thursday, September 24, 2009

तुम्हे तो मालूम है कि.....

तुम्हे तो मालूम है कि
समय कितना बलवान होता है
पल-पल, हर घड़ी,
इसलिए तूम भी समय बनो,
और अगर समय नहीं बन सकते,
तो कम से कम घड़ी तो बनो,
वह घड़ी, जो दूसरो को समय बताती है !

तुम्हे तो मालूम है कि
यहाँ इतनी आसान नहीं है
जीवन की डगर ,
तुम किसी की राह बनो,
और अगर राह नहीं बन सकते,
तो कम से कम छडी तो बनो,
वह छडी, जो दूसरो को राह दिखाती है !

तुम्हे तो मालूम है कि
यहाँ रिश्तो की क्या अहमियत है
बंधने के लिए,
तुम किसी का रिश्ता बनो,
और अगर रिश्ता नहीं बन सकते,
तो कम से कम कडी तो बनो,
वह कडी, जो रिश्तो को रिश्तो से निभाती है !

तुम्हे तो मालूम है कि
यहाँ साँसों की डोर की क्या अहमियत है
जिंदा रहने के लिए,
मैं जानता हूँ कि तुम,
किसी की साँसों की डोर नहीं बन सकते,
मगर कम से कम लड़ी तो बनो,
वह लड़ी, जो साँसों की डोर को जीना सिखाती है !

10 comments:

Shashidhar said...

bahut achchh. A great sequence. A great word.

M VERMA said...

और अगर रिश्ता नहीं बन सकते,
तो कम से कम कडी तो बनो,
अत्यंत खूबसूरत रचना.

विनोद कुमार पांडेय said...

Bahut Hi Sundar Sandesh aapne Diya hai is kavita ke Maddhyam se..

ek ek shabd vichar karane yogy hai..samay bano logo ko sawaron..bahut badhiya badhayi..

सुशील कुमार छौक्कर said...

गहरे जज्बातों को साधारण से शब्दों की माला में पिरा दिया। वाकई बहुत उम्दा लिखा है। यहाँ आकर अच्छा लगा।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

"पल-पल, हर घड़ी,
इसलिए तुम भी समय बनो,
और अगर समय नहीं बन सकते,
तो कम से कम घड़ी तो बनो,
वह घड़ी,
जो दूसरो को समय बताती है!"

वाह..वाह...
गोदियाल जी।
जीवन की सच्चाई से रूबरू कराती,
बेहतरीन नज़्म पेश की है आपने।
मुबारकवाद!

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

मैं जानता हूँ कि तुम,
किसी की साँसों की डोर नहीं बन सकते,
मगर कम से कम लड़ी तो बनो,
वह लड़ी, जो साँसों की डोर को जीना सिखाती है !

वाह्! बहुत ही उम्दा संदेश देती एक् लाजवाब रचना!

Babli said...

आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया! मुझे तो इस बात पर आश्चर्य लग रहा है आखिर मुझ पर ऐसा घिनौना इल्ज़ाम क्यूँ लगाया गया? मैं भला अपना नाम बदलकर किसी और नाम से क्यूँ टिपण्णी देने लगूं? खैर जब मैंने कुछ ग़लत किया ही नहीं तो फिर इस बारे में और बात न ही करूँ तो बेहतर है! आप लोगों का प्यार, विश्वास और आशीर्वाद सदा बना रहे यही चाहती हूँ!
बहुत ही ख़ूबसूरत और शानदार रचना लिखा है आपने! बधाई!

इस्लामिक वेबदुनिया said...

बहुत खूब

Vipin Goyal said...

वाह क्या बात है

दिगम्बर नासवा said...

और अगर राह नहीं बन सकते,
तो कम से कम छडी तो बनो,
वह छडी, जो दूसरो को राह दिखाती है .....

वाह... गोदियाल जी।
गहरी बात कही है इस रचना के माध्यम से ....... जीवन की सच्चाई से परिचय कराती है आपकी रचना ..... लाजवाब है इसमें छिपा सन्देश ......,