Saturday, September 18, 2010

वक्त-वक्त की बात !

उपवन के एक सिरे पर
एक खिलता गुलाब,
यौवन से लबालब
चेहरे की रौनक संग,
मध्-भरी आँखों से
आईने को घूरते हुए
दर्पण में उभरे
अपने अक्स को
छेड़ते हुए कहता है
अरे अक्स रे,
मुझे प्रेम-रोग हो गया !

दूसरे छोर पर,
हाथों में कुछ थामे
ढलती शाम के
बुझे-बुझे से नयनों को
सूरज की ओर उठाते हुए
एक मुरझाया सा फूल,
चिंतित मन से पूछता है,
हे अक्स-रे,
मुझे कौन सा रोग हो गया ?
अक्स-रे कहे भी तो क्या ?
वो डाक्टर तो था नहीं !!

1 comment:

निर्मला कपिला said...

ाच्छी लगी रचना बधाई।