Wednesday, April 28, 2010

महंगाई का ग्राफ भी अब नीचे आ गया !

महलों में झूठ के वर्क से कुछ और सजावट आ गई है,
लवों पर कुछ और कुटिल शब्दों की बनावट आ गई है!

सरकार की महंगाई का ग्राफ भी अब नीचे आ गया,
क्योंकि मानवीय मूल्यों में कुछ और गिरावट आ गई है !!

बच्चो ने भूख से समझौता कर बिलखना छोड़ दिया,
मजबूरी व हालात के टूटे तटबंधों में भरावट आ गई है !

गरीब के आंसुओं ने अब आग उगलना छोड़ दिया,
क्योंकि आँखों की नमी में लहू की तरावट आ गई है !!

अब प्यार-प्रेम के अभिनय सभी दिखावटी बन गए,
क्योंकि सेवाभाव और सादगी में भी दिखावट आ गई है!

अस्पतालों से निकल मरीज भी अब मिलावटी हो गए,
क्योंकि बोतलों से चढ़े खून में भी मिलावट आ गई है!!

11 comments:

नीरज जाट जी said...

बहुत खूब!!

नरेश सोनी said...

बहुत सुंदर पंक्तियां हैं।

डॉ टी एस दराल said...

क्योंकि मानवीय मूल्यों में कुछ और गिरावट आ गई !!
क्योंकि सेवाभाव और सादगी में भी दिखावट आ गई !
क्योंकि बोतलों से चढ़े खून में भी मिलावट आ गई !!
अमानवीय रूप से कठोर सच्चाई।

संजय भास्कर said...

... बेहद प्रभावशाली

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ said...

ब्लाग पर आना सार्थक हुआ
काबिलेतारीफ़ प्रस्तुति
आपको बधाई
सृजन चलता रहे
साधुवाद...पुनः साधुवाद
satguru-satykikhoj.blogspot.com

राज भाटिय़ा said...

कही सरकार को अपना सिहांसन डोलता नजर तो नही आ रहा???

'अदा' said...

Lajwaab hai Godiyal sahab aaj ki kavita..
bahut bahut dhanywaad aapka..

अजय कुमार said...

मिलावट का जमाना है ,जहर पीकर बचिये और दवा खाकर चलते बनिये

महफूज़ अली said...

बहुत खूब, लाजबाब !

SANJEEV RANA said...

अब प्यार-प्रेम के अभिनय सभी दिखावटी बन गए,
क्योंकि सेवाभाव और सादगी में भी दिखावट आ गई !

अस्पतालों से निकल मरीज भी मिलावटी हो गए,
क्योंकि बोतलों से चढ़े खून में भी मिलावट आ गई !

bahut khoob godial sahab
aise hi likhte rahiye

ताऊ रामपुरिया said...

बिल्कुल सटीक सटका दिया आपने. शुभकामनाएं.

रामराम.