Wednesday, December 19, 2012

मर्जी के मालिक हो गए, यहाँ के सब कारिंदे है।













तन-आबरू बचाते कुछ मर गये, तो कुछ जिंदे है,
हर दरख़्त की शाख पर बैठे,डरे-डरे सब परिंदे है

खौफजदा नजर आता है, हर सरपरस्त शहर का,
क्योंकि बेख़ौफ़ सड़कों पे घूमते फिर रहे दरिंदे है।

शठ-कुटिलो का ही है बोल-बाला यहाँ  हर तरफ,  
नारकीय जीवन जी रहे देखो,सुशील (वा)शिंदे हैं।
  
यह न पूछो कि दहशत का ये आलम हुआ कैसे,     
दरवान जो थे, कुछ सोये पड़े है तो कुछ उनींदे है।

शर्म से सर हिन्द का तो, झुक रहा अब बार-बार,
किन्तु बेशर्म बने बैठे भ्रष्ट,जनता के नुमाइन्दे है।
    
दर्द हजारों है, फरियाद करें तो करें किससे 'परचेत', 
मर्जी के मालिक हो गए , यहाँ के सब कारिंदे है।

3 comments:

Virendra Kumar Sharma said...

आभार

आपकी महत्वपूर्ण टिप्पणियों का .

बेहद तीखा तंज है व्यवस्था गत हराम खोरी पर ,हराम खोरों पर .

mridula pradhan said...

मर्जी के मालिक हो गए , यहाँ के सब कारिंदे है।bahut sahi bayan.....

आशा जोगळेकर said...


शठ-कुटिलो का ही है बोल-बाला यहाँ हर तरफ,

नारकीय जीवन जी रहे देखो,सुशील (वा)शिंदे हैं।

यह न पूछो कि दहशत का ये आलम हुआ कैसे,

दरवान जो थे, कुछ सोये पड़े है तो कुछ उनींदे है।

शर्म से सर हिन्द का तो, झुक रहा अब बार-बार,

किन्तु बेशर्म बने बैठे भ्रष्ट,जनता के नुमाइन्दे है।

एकदम सही चित्रण ।