Friday, November 13, 2009

ख़त उसके नाम !

बहा ले जाए सुप्त-थमे हुए दरिया में भी जो ,
यहाँ हर तरफ ऐसी कुछ मौजो के सफीने है,
तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली,
क्या बताऊ, यहाँ के तो पत्थर भी कमीने है !

माँ को माँ नहीं समझते, बहन को बहन नहीं,
बेरहमी का मंजर ये, मानो इनमें जहन नहीं
उंगली की मुन्दरिया के खोटे सब नगीने है,
तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली,
और तो और, यहाँ के तो पत्थर भी कमीने है !

प्यास बुझाने को भी तोल के मिलता पानी है
दीन-ईमान की बात तो, सब के सब बेईमानी है,
बेचने को समेटते बूँद-बूद टपके हुए पसीने है,
तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली,
तुम क्या जानो, यहाँ के पत्थर भी कमीने है !

बेशर्मी का आलम ये, शर्म न इनकी नाक में है
किसे लगाए ठोकर रहते,हरवक्त इसी ताक में है,
मार्बल के चेहरे इनके, तारकोल के जैसे सीने है,
तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली,
तुम्हे नहीं मालूम, यहाँ तो पत्थर भी कमीने है !

28 comments:

sada said...

तुम गांव में ही रहो ... बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली,
क्या बताऊ, यहाँ के तो पत्थर भी कमीने है !

आक्रामक कविता ....:)
गोदियाल साहब जीवन की विसंगतियां देख गुस्सा तो आएगा ही न...बेहतरीन...

ललित शर्मा said...

वाह-वाह क्या बात है गो्दियाल साब मजा आ गया,
भाभी जी गांव से शहर से आ गयी तो भंडा फ़ूट जाएगा और सारा राज खुल जाएगा इसलिए कितने प्रेम से भाभी जी को आप शहर डरा रहे हो,
पगली रह गई पगली की पगली
साहब ने शहर मे दुसरी रख ली
हा हा हा- नाईस, बड़े काम की चीज लि्खी है,
कईयों के काम आयेगी-हा हा हा

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर अभिव्‍यक्ति है !!

अंशुमाली रस्तोगी said...

पसंद आई। बढ़िया।

Mithilesh dubey said...

बहुत खूब लिखा है जनाब आपने, शानदार अभिव्यक्ति। बधाई

जी.के. अवधिया said...

"तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली,
क्या बताऊ, यहाँ के तो पत्थर भी कमीने है!"

वाह! क्या बात कही है गोदियाल जी!!

खुशदीप सहगल said...

गोदियाल जी,
आजकल अपने धर्मेंद्र भाजी खाली है...इन कमीनों का खून पीने के लिए उन्हें ठेका दे दीजिए...

जय हिंद...

pallavi trivedi said...

बढ़िया लिखा है...

महफूज़ अली said...

बेशर्मी का आलम ये, शर्म न इनकी नाक में है
किसे लगाए ठोकर रहते,हरवक्त इसी ताक में है,
मार्बल के चेहरे इनके, तारकोल के जैसे सीने है,
तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली,
तुम्हे नहीं मालूम, यहाँ तो पत्थर भी कमीने है !

wah! in panktiyon ne dill ko choo liya.....

bahut hi behtareen abhivyakti.......

योगेन्द्र मौदगिल said...

क्या बताऊ, यहाँ के तो पत्थर भी कमीने है !



Jai ho....बेहतरीन रचना..... साधुवाद स्वीकारें....

प्रबुद्ध said...

'मार्बल के चेहरे इनके, तारकोल के जैसे सीने है'- सबसे बेहतरीन लगी ये पंक्ति। क्यूंकि हसीं चेहरों की इस दुनिया में मुखौटे कुछ ज़्यादा हो चले हैं।

सुशील कुमार छौक्कर said...

तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली,
क्या बताऊ, यहाँ के तो पत्थर भी कमीने है !

वाह क्या बात है। बहुत ही पसंद आई आपकी ये रचना।

नीरज गोस्वामी said...

सच शहर उतना ही बेरहम है जितना आपने लिखा है...शायद उस से एक कदम अधिक ही...बहुत सच्ची और अच्छी रचना..वाह...
नीरज

अजय कुमार said...

पत्थर भी कमीने हैं
और दिल भी पत्थर हैं

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत लाजवाब रचना.

रामराम.

M VERMA said...

बेशर्मी का आलम ये, शर्म न इनकी नाक में है
किसे लगाए ठोकर रहते,हरवक्त इसी ताक में है,
य़थार्थ तो यही है
बेहतर है कि गाँव मे ही ---

ओम आर्य said...

बहुत ही सुन्दर हैखत उनके नाम ......पर क्या करें गोन्दियाल जी आजकल पत्थर तो गांव के भी कुछ अच्छे नही दिख रहे है वहा के फिजाओ मे भी कुछ शहरी कीडो का वास हो गया है !नीली फिल्मो ने वहा के पत्थर को भी कमीना बना दिया है !

रचना लय और ताल मे बधी है कि गुनगुनाने को जी चाहता है !

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर व सही।
घुघूती बासूती

Sainny Ashesh said...

Har shahar me bhatakti hai
koi na koi pagli
Kyonki...
Har gaon me kameene hain...
Tu apne hi paas rahna pagli
Tere apne calander me hi
Teri zindagi ke maheene hain...

-Sainny Ashesh

राज भाटिय़ा said...

माँ को माँ नहीं समझते, बहन को बहन नहीं,
बेरहमी का मंजर ये, मानो इनमें जहन नहीं
उंगली की मुन्दरिया के खोटे सब नगीने है,
तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली,
और तो और, यहाँ के तो पत्थर भी कमीने है !
बहुत ही सुंदर दिल को छ गई आप की यह रचना.
धन्यवाद

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बेशर्मी का आलम ये, शर्म न इनकी नाक में है
किसे लगाए ठोकर रहते,हरवक्त इसी ताक में है,
मार्बल के चेहरे इनके, तारकोल के जैसे सीने है,
तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली,
तुम्हे नहीं मालूम, यहाँ तो पत्थर भी कमीने है !

बहुत वजनदार लिखा है!
बधाई!

Udan Tashtari said...

बेशर्मी का आलम ये, शर्म न इनकी नाक में है
किसे लगाए ठोकर रहते,हरवक्त इसी ताक में है,
मार्बल के चेहरे इनके, तारकोल के जैसे सीने है,
तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली,
तुम्हे नहीं मालूम, यहाँ तो पत्थर भी कमीने है !


-बहुत सुन्दर, भाई जी!! बेहतरीन!!

बवाल said...

बहुत ख़ूब।

पंकज said...

शहरी जिन्दगी पर एक खूबसूरत कटाक्ष. पर क्या शहरों ऐसा हम सब ही नहीं बनाती, वरना आज के सब शहर कल गांव ही थे.

वन्दना said...

माँ को माँ नहीं समझते, बहन को बहन नहीं,
बेरहमी का मंजर ये, मानो इनमें जहन नहीं
उंगली की मुन्दरिया के खोटे सब नगीने है,
तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली,
और तो और, यहाँ के तो पत्थर भी कमीने है !

ek behtreen kataksh hai shahar ki zindagi aur aaj ke halat par.

निर्झर'नीर said...

बहा ले जाए सुप्त-थमे हुए दरिया में भी जो ,
यहाँ हर तरफ ऐसी कुछ मौजो के सफीने है,
तुम गाँव में ही रहो, शहर मत आना पगली,
क्या बताऊ, यहाँ के तो पत्थर भी कमीने है

excellent kya marmik abhivyakti hai
bandhai swikaren

सुधाकल्प said...

बहुत ख़ूब! यहाँ तो पत्थर भी कमीने हैं।