Thursday, November 5, 2009

जाने क्यूँ ?


जाने क्यूँ ?
हम पक्षी भी न,
बड़े अजीब होते है
मेहनत करके
आशियाना कोई और बनाते है !
और तिनका-तिनका समेट
सपने सजाने हम पहुँच जाते है !!

तुम्हे याद होगा,
वह बड़ा सा घर
और उसकी सह्तीर
जिसपर,
तुम्हारे और मेरे
माँ-अब्बू ने भी
अपने-अपने घरौंदे सजाये थे,
अपने सपनो का जहां बसाया था
सुदूर उस अंचल, उस पहाड़ में !
याद है
कितनी मेहनत करते थे वो
सर्द बर्फीली हवाओं से लड़कर,
हमारे लिए,
दाना-दाना जुटाने के जुगाड़ में !!

और जब
हमारे पर निकल आये तो....
तुम्हे याद होगा,
तुम्ही ने तो उकसाया था
मुझे संग अपने उड़ जाने को !
और मैं भी,
फुर्र करके उड़ दी थी,
तुम्हारे संग इक नया
अपना आशियाना बसाने को !!

करते-करते
इतने बरस बीते,
अपना घर-अंगना छोड़,
इस अजनवी परदेश में,
सब कुछ होते हुए भी
मन के बर्तन है रीते,
जाने क्यों ?
अपने लिए इक अदद घोंसला
तक नहीं ढूँढ पाए अब तक
सिर्फ इस भय से डरकर यूँ !
कि अगर हमारे बच्चे भी
हमारी ही तरह किसी दिन,
हमारा घर छोड़,
पंख फडफडाकर उड़ गये कहीं तो...
ये बेहतर विकल्प भी
घर से दूर ही होते हैं
अक्सर, न जाने क्यूँ !!



साभार: समीर जी के आज के लेख "आसमानी रिश्ते भी टूट जाते है" से प्रेरित लेकर !

12 comments:

अम्बरीश अम्बुज said...

अपने लिए इक अदद घोंसला
तक नहीं ढूँढ पाए अब तक
सिर्फ इस भय से डरकर यूँ !
कि अगर हमारे बच्चे भी
हमारी ही तरह किसी दिन,
हमारा घर छोड़,
पंख फडफडाकर उड़ गये कहीं तो...
ghonsle aur ghonslewalon ka badalte rahna ek aisa sach hai jise koi jhuthla nahi sakta..
shandaar rachna..

दिगम्बर नासवा said...

ये बेहतर विकल्प भी
घर से दूर ही होते हैं
अक्सर, न जाने क्यूँ ....

BAHOOT HI BHAVOK PRANG CHED DIYA HAI GODIYAAL JI AAJ TO .... HAM JAISE PRAVAASIYON KA DIL BHAR AAYA ISKO PADH KAR .....
SACH HI LIKHA HAI SHAYAD ISI KA NAAM JEEVAN HAI ... NAYE GHARONDE KI TALAASH MEIN JAANA HI NAYE JEEVAN KA SRAJAN HAI ...

sada said...

पंख फडफडाकर उड़ गये कहीं तो...

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना, भावमय प्रस्‍तुति के लिये बधाई ।

ajit gupta said...

कविता पढ़ते समय ही लग रहा था कि आज आप समीर जी से प्रभावित है। अन्‍त में आपने लिख ही दिया। एक जीवन का नवीन सत्‍य है जिसे हम सब को स्‍वीकार करना है।

नीरज गोस्वामी said...

समीर जी को हार्दिक बधाई जिनकी पोस्ट इस विलक्षण रचना के को रचने का कारण बनी...बहुत ही सुन्दर कविता...ढेरों बधाईयाँ...
नीरज

Vinay Prajapati 'Nazar' said...

हृदय से लिखी गयी, हृदय को छूने वाली रचना

---
चाँद, बादल और शाम

Mithilesh dubey said...

बेहतरीन..............................................

Mishra Pankaj said...

सुन्दर भाव पूर्ण कविता

वन्दना said...

ek behtreen rachna............aaj to apne desh mein bhi pravasi ho rahe hain ,ek shahar mein rahkar bhi pravasi ho rahe hain...........umda prastuti.
करते-करते
इतने बरस बीते,
अपना घर-अंगना छोड़,
इस अजनवी परदेश में,
सब कुछ होते हुए भी
मन के बर्तन है रीते,
जाने क्यों ?

bahut hi badhiya lagi ye panktiyan.

ओम आर्य said...

अपने लिए इक अदद घोंसला
तक नहीं ढूँढ पाए अब तक
सिर्फ इस भय से डरकर यूँ !
कि अगर हमारे बच्चे भी
हमारी ही तरह किसी दिन,
हमारा घर छोड़,
पंख फडफडाकर उड़ गये कहीं तो...
ek aisi rachanaa jisame jiwan ka yatharth hai ..........jisame jiwan hai manwiy samwedanaye bhi kut kutkar hari padi hai..........ek aisi rachana jo antarman ko chhoo gayi ........sundar prastuti.

अजय कुमार said...

जहाँ जिसकी दाल-रोटी लिखी है वहां जाना ही पड़ेगा
लेकिन कोशिश करना चाहिए अपने जड़ों से जुड़े रहने के
लिए

M VERMA said...

ये बेहतर विकल्प भी
घर से दूर ही होते हैं
आशियाना की तलाश और फिर बिखरने का डर
आखिर तुम्ही बताओ कहाँ बनाये हम अपना घर