Friday, August 8, 2014

नादां !

थाम लो उम्मीद का दामन, छूट न जाए,
  रखो अरमाँ सहेजकर, कोई लूट न जाए।   
तुम्हारे ख़्वाबों से भी नाजुक है दिल मेरा,
  हैंडल विद एक्स्ट्रा केयर,कहीं टूट न जाए।


उलटबासी 
शायद ही बचा रह गया हो कोई धाम,
क्या मथुरा, क्या वृंदावन,क्या काशी,
किस-किस से नहीं पूछा पता उसका,
क्या धोबी,क्या डाकिया,क्या खलासी, 
 सबके सब फ़लसफ़े,इक-इककर खफ़े, 
       लिए घुमते रहे बनाकर सूरत रुआँसी,        
उम्र गुजरी,तब जाके ये अहसास हुआ,
जिंदगी घर में थी, हमने मौत तलाशी। 

No comments: