Wednesday, October 14, 2009

ऐ यार मत करना !







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गफलतों में भी दगा दिल से,
ऐ यार मत करना !
सलवटों में दबके रह जाए,
वह प्यार मत करना !!

मन निश्छल न हो,
छल चेहरे पे नजर आये !
इस तरह के प्यार का ,
तुम इजहार मत करना !!

फूलो को तेरे कदरदान,
खरीदने पर उतर आयें !
गुल-ऐ-गुलशन को यों ,
सरेआम बाजार मत करना !!

घर के द्वारे पे जो खुद ही,
टकटकी लगाए खडा हो !
ऐसे चाँद का हरगिज,
तुम दीदार मत करना !!

पनाहों में किसी की जब,
गुजर रही हो जिन्दगी !
फ़ुर्सत के उन हसीं लमहो में,
जीना दुष्वार मत करना !!

9 comments:

अजय कुमार said...

फ़ुर्सत के उन हसीं लमहो में,
जीना दुष्वार मत करना
kya baat hai

अर्कजेश said...

मन निश्छल न हो,
छल चहरे पे नजर आये !
इस तरह के प्यार का ,
तुम इजहार मत करना !!

बहुत बढिया !

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर कविता.
धन्यवाद
आप को ओर आप के परिवार को दीपावली की शुभ कामनायें

M VERMA said...

सलवटों में दबके रह जाए,
वह प्यार मत करना !!
बहुत भावमय रचना और खूबसूरत एहसास

Udan Tashtari said...

वाह!! बहुत खूब!

महफूज़ अली said...

फूलो को तेरे कदरदान,
खरीदने पर उतर आयें !
गुल-ऐ-गुलशन को यों ,
सरेआम बाजार मत करना !!!!

wah! bahut khoob..........

bada achcha laga padh kar..........

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

गफलतों में भी दगा दिल से,
ऐ यार मत करना !
सलवटों में दबके रह जाए,
वह प्यार मत करना !!

वाह क्या बात है....
बहुत बढ़िया लिखा है।
धनतेरस, दीपावली और भइया-दूज पर
आपको ढेरों शुभकामनाएँ!

सैयद | Syed said...

वाह, क्या बात है... आपका ऐसा मिजाज़ तो शायद पहली बार देख रहा हूँ... बहुत सुन्दर ..

संजय भास्कर said...

बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन


SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com