Monday, March 30, 2009

जिन्दगी, तु किस मोड पे ले आयी है !

किसी की बद्दुआ कहु इसे या फिर
अपनी किस्मत के सित्तम,
न जाने क्यों खुशियो के काफ़िले
बचकर मेरे घर से निकलते है!
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ऎ जिंदगी,यह तु किस मोड पे ले आयी है
आगे कुंआ,पीछे अतीत के जख्मो की खाई है
ऎ जिंदगी,यह तु किस मोड पे ले आयी है


जीना हमने भी चाहा तुझे,अपने ही ढंग से
रंगना हमने चाहा तुझे, मनचाहे रंग से,
पर जाने किस्मत कौन सा, बदरंग लायी है
ऎ जिंदगी,यह तु किस मोड पे ले आयी है


वो अल्हड बचपन, वो बेफिक्री के दिन-रैन
फूहड सी हंसी,भाव-निर्दोष चेहरा,चंचल नैन
गुमशुदगी पे इनकी रोने के, तु मुस्कुरायी है
ऎ जिंदगी,यह तु किस मोड पे ले आयी है


न जाने क्या-क्या जुल्मो-सित्तम हम पर हुए
खुसी मिलना तो दूर, बस गम ही गम सहे
इसे मजबूरी समझु कि ये तेरी बेबफ़ाई है
ऎ जिंदगी,यह तु किस मोड पे ले आयी है


करु भी अब और मै कोई शिकवा किससे
खौफ़जदा सा लगता यहा हर कोई मुझसे
डरने लगी अब मुझसे खुद की परछाई है
ऎ जिंदगी,यह तु किस मोड पे ले आयी है


आखों में हसरत है, ख्वाब मे अन्धेरे है
अजीब इक कशमकश हरपल मुझे घेरे है
भीड है कयामत की,पर दिल मे तन्हाई है
ऎ जिंदगी,यह तु किस मोड पे ले आयी है

-गोदियाल

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