Tuesday, March 17, 2009

अंधेरे का डर सताता है !

चेहरे पर भोर के उजाले के,
जो आया था परास्त कर
लम्बी,काली रात को अकेले ही,
अजीब सा इक खौफ,
अब साफ़ नजर आता है,
क्योंकि दिल के किसी कोने मे,
उसे भी अंजान किसी,
अन्धेरे का डर सताता है !

सूरज की एक किरण,
समेटे लिये ढेर सारी,
रोशनी अपने आँचल मे
दूर गगन से चली आती थी,
चिनार की पाती पर गिरी,
एक अकेली विरहन सी,
ओंस की बूंद को गले लगाने,
उसे अब वीरान वो मंज़र,
यहाँ नजर आता है !
क्योंकि दिल के किसी कोने मे,
उसे भी अंजान किसी,
अन्धेरे का डर सताता है !


तुफ़ान जो आतुर रहता था,
कभी औरो पर
कहर बरपाने को,
गरज कर जो था निकलता,
उन मंचली आंधियों के संग-संग,
किसी अशान्त समन्दर से,
वादियो की ओर
खफ़ा होकर,
बढती हवाओ बेवफ़ाई से
कभी-कभी,खुद के ही घर को,
तवाह कर जाता है !
क्योंकि दिल के किसी कोने मे,
उसे भी अंजान किसी,
अन्धेरे का डर सताता है !

कही दूर जंगल का,
कोई दकियानुसी ख्वाब,
चला था कही पहुंचकर ,
काल को सुधारने,
मगर नादान को,
नही था यह मालूम कि
सुदृड़ आधुनिक,
विज्ञान के धरातल पर फैली
कौशल की चिकनी राहो पर,
प्रगति के रंग मे सरागोश ,
वक्त कहा ठहर पाता है !
क्योंकि दिल के किसी कोने मे,
उसे भी अंजान किसी,
अन्धेरे का डर सताता है !

जिसे देख रहे है,
हम-तुम अचरज से ,
और जो आज सामने है,
हम सब के है वह
शायद, कलयुग का अपना
एक चरम बताता है,
पाप-पुण्य के
सागर के इस मन्थन मे,
असुर उठा रहा आज,
हर लुफ़्त अमृत का
और सुर थक-हारकर,
मजबूरन जहर खाता है !
क्योंकि दिल के किसी कोने मे,
उसे भी अंजान किसी,
अन्धेरे का डर सताता है !

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