Thursday, May 10, 2012

हर ज़ख्म दिल में महफूज़ न छुपाया होता!















तन्हा ही हर दर्द-ए-गम को न भुलाया होता,
मुदित सरगम तार वीणा का बजाया होता !


सरे वक्त जलते न पलकों पे अश्कों के दीये,
हर ज़ख्म दिल में महफूज़ न छुपाया होता!


चाह की मंडियों में अगर प्रेम बिकता बेगरज,
मुहब्बत का तनिक दांव हमने भी लगाया होता !


मुद्दतों से उनीन्दे शिथिल तृषित नयन आतुर,
भोंहें सहलाकर न इन्हें खुद ही सुलाया होता !


रास आ जाती सोहबत किंचित मुए चित को,
दीपक प्यार का इक हमने भी जलाया होता !


गैरों के जुर्म-कुसूर को भी अपना कबूलकर,
सर अपने हर तोहमत को न उठाया होता !


अगर मिलती न कम्वख्त ये खलिश 'परचेत',
मुकद्दर को हमने यूं पत्थर न बनाया होता !

3 comments:

India Darpan said...

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


इंडिया दर्पण
की ओर से आभार।

India Darpan said...

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


इंडिया दर्पण
की ओर से आभार।

expression said...

बहुत सुंदर.............
बेहतरीन गज़ल....

सादर