Thursday, December 29, 2011

कबाब में हड्डी !



उद्विग्न,शिशिर,तिमिर व्योम की भी आँखे भर-भरा आई,
प्रीति पर ग्रहण लगा, जब निष्कपट प्रेम बीच धरा आई !


तोड़ डाला बेदर्दी से निष्ठुर ने, आशिक-मासुका का दिल,
जननी धीर की, क्यों उसको उनपर, रहमत न जरा आई !


दिनकर चला था करने,दीदार उसके हुस्नो-शबाब का,
योवन की इक लहर आई, शशि बनके अप्सरा आई !


सज-संवर,खिले मुख यों सम्मुख खड़ी थी आदित्य के,
ज्यों नज़्म फिर घूमकर वापस मुखड़े पे अंतरा आई !


इत्तेफाक देखता रहा चिलमन में दम तोडती संवेदना 'परचेत',
प्रेम-बंधनों में विरक्ति लाने की यह कैसी परम्परा आई !

7 comments:

Vaneet Nagpal said...

"टिप्स हिंदी" में ब्लॉग की तरफ से आपको नए साल के आगमन पर शुभ कामनाएं |

टिप्स हिंदी में

प्रेम सरोवर said...

आपका पोस्ट बहुत ही अच्छा लगा .। मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है । नव वर्ष की अशेष शुभकामनाए ।

Kailash Sharma said...

लाज़वाब प्रस्तुति...नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें !

avanti singh said...

आप और आप के परिवार को नव वर्ष की हार्दिक बधाई .....:) अलग तरह की रचना.... पढ़ कर अच्छा लगा .....

Kewal Joshi said...

sundar kavita.

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

behad sundar rachna..umda ... NavVarsh par shubhkaamnayen

dheerendra said...

बहुत बढिया प्रस्तुति,सुंदर रचना
new post--जिन्दगीं--