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Saturday, March 3, 2012

संकल्प !

क्षमा चाहता हूँ कि कल रात को शहीदी दिवस यानि ३० जनवरी हेतु एक कविता लिखने बैठा था और गलती से सेव करते हुए पब्लिश का बटन क्लिक कर गया था ! खैर, वैंसे  तो रविवार को वक्त कम ही मिलता है, लेकिन आज मेरे पास वक्त ही वक्त था, इसलिए आज ही इसे पूरा कर यहाँ आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ ;


   
भ्रष्टाचार के इस कानन में,
आग लगाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ।

अशक्त जन का हो रहा,
प्राबल्य सद्सद्विवेक नाश,
घर कर बैठे मन में भय को,
दूर भगाना चाहता हूँ॥


परिवार एवं बंशवाद का,
हम पर कोई राज न हो,
देश तमाम में जनमानस,
रोटी को मोहताज न हो।

प्रतिरूप हो जिसमे प्रजा का,
राज वो पाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥


महाभारत के कौशल में,
उपोद्घात न कोई छक्कों का,
जन्नत और न बने अब यह,
लुच्चे, चोर-उचक्कों का।

अस्मिता का मातृभूमि की,
गीत मैं गाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥


इंसाफ  पाने की अभिलाषा,
दीन से हरगिज दूर न हो,
खुदकुशी करने को कृषक, 
अपना कोई मजबूर न हो।

उपजी  युवा दिलों  की
कुंठाओं  को दबाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥


क्षुद्र सियासी लाभ हेतु,
इंतियाज न कोई संचित हो,
सम-सुयोग मिले सबको,
हक़ से न कोई वंचित हो।

ऊँच-नीच, धर्म-जाति का,
हर भेद मिटाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥


हर घर में यहाँ रोज
क्रिसमस, ईद और दीवाली हो,
देश के कोने-कोने में,
सुख-समृद्धि व खुशहाली हो।

शहीदों के सपनों का सच्चा,
स्वराज मैं लाना चाहता हूँ,
देश-प्रेम की नई वतन में,
अलख जगाना चाहता हूँ॥


छवि गूगल से साभार !




.

नाम की क्या फिकर तुझको.....

आज आप पहले मेरा ताजातरीन जोक पढ़िए, फिर नज्म ;

एक पड़ोसन दूसरी से पूछती है; तुम अपने शौहर से इतना क्यों झगडती हो,

आखिर इसका आउटकम क्या निकलता है?

दूसरी पड़ोसन: क्या करू, झगड़ना तो मैं भी नहीं चाहती मगर, वो घर से आउट कम निकलते है.....................:) :)











रूठो न इस तरह कि बात ख़ास से आम हो जाए,
अकुलाहट धडकनों की हयात सुबह की शाम हो जाए।

कुछ इस तरह संभाले हम, बिखरने की ये कवायदें,
फजीहत न महफ़िल में,रिश्तों की सरेआम हो जाए।

ढूंढें फिरे तहेदिल से, नफरतों में तेरी मुहब्बत को,
फीके न पड़े ये जलवे, कोशिश न नाकाम हो जाए।

संजोकर रखे हुए जख्मों को जरा मरहम लगाकर के,
दिलों को यूं मनायें कि जाँ, इक-दूजे के नाम हो जाए।

आगाज कर 'परचेत' कुछ ऐंसा सुखद अंजाम हो जाए,
नाम की क्या फिकर तुझको, मुन्नी बदनाम हो जाए।
छवि गुगुल से साभार

ऋतुराज यह वसंत आया !


छंट गया धरा से शिशिर का सघन कुहा ,

सितारों से सजीला तिमिर में गगन हुआ।


भेदता है मधुर कुहू-कुहू का गीत कर्ण,

आतप मंदप्रभा का हो रहा अपसपर्ण।


लाली ने छोड़ दी अब ओढ़नी पाख्ली,

मधुकर  ने फूल से मधु-सुधा  चाख ली।


डाल-पल्लव कोंपलों के रंग प्रकीर्ण है,

छटा-सौन्दर्य से हर चित माधुयीर्ण है।


जोत ने धारण किया सरसों के हार को,

उऋर्ण कर दिया अब शीत ने तुषार को।


भावे मन अमवा,महुआ की इत्रमय बयार,

सजीव बन गए सभी जवां और बूढ़े दयार।


विभूषित वसुंधरा बिखेरती पुरातन सुवर्ण,

कश्मीर से केरला, मणिपुर से मणिकर्ण।


तज सभी उद्वेग-रंज, खुशियाँ अनंत लाया,

करने पूरी मुराद ऋतुराज यह वसंत आया।।



शब्दार्थ: आतप मंद्प्रभा = सूरज की मंद किरणे, सघन कुहा= घना कुहरा,

अपसपर्ण=विस्तारण , पाख्ली = गर्म शॉल, प्रकीर्ण= भिन्न-भिन्न,

माधुयीर्ण=प्रमोद से भरा, उऋर्ण=भारमुक्त, तुषार= ओंस

छवि गुगुल से साभार !


Wednesday, January 11, 2012

काव्य-भरता !


फैसला फर्ज है
हुकूमत का मगर
अज्ञ कारिंदे* को
यह नहीं दिखता,
कि उड़ता है
कैंसे सरेआम
मजाक उनके फरमान का।

जिन्दगी तमाम हुई
कर निस्तारण में ,  
सरकार !
कुछ करो ऐंसा कि
मुर्दे को खुद ही
महसूल* भी
चुकाना पड़े शमशान का।
अनहद के अभ्यस्त 
जो है उन्हें यदि
रोक न पायें सरहदें,
खुदा ही मालिक है
फिर तो
इंसानियत के कदरदान का।

सोचा था
चुकता करेंगे प्रभु-उधार
ह्रस्व* आटे के पिंड से,
जनेऊ बह गया
धार में,
न पंडत तरा, न यजमान का।

इज़हार-ऐ-बेकसी
मन की
कोई तब
करे किससे,
अजनबियों के देश में,
न हो कोई अपनी पहचान का।

माना कि
वो आये थे दर पे
घोड़ियों पर चढ़कर,
थामकर तुम
निकले ही क्यों थे
दामन, अजनबी-अनजान का।

पीड़ा का मर्म
न समझे जो
उसे इंसान कहना
फिजूल है ,
खिजां* में डाली भी
बूझती है दर्द  
नख्ल़* से बिछड़े ख़ेज़ान* का।

सारे वादे और
अल्फाज बेअसर,
मुमकिन नहीं
यकीं दिलाना,
भरोसा  न  रहे
जब राम का,
न खुदा के रहमान का।

बदलते वक्त संग
उपकार भी
बदल रहा है पोशाके,
तोहफों से
चुकाने लगे लोग
बदला हर इक अपमान का।

रिश्तों के क़त्ल को
देकर नाम,
खुदगर्जों ने
प्रजाशाही  का,
खाप-पंचायत,
चौपालों में रोज
हाट सजता है झूठी शान का।

सुकून-ए-दिल
मिलता है महत*  
यथेष्ठ  मार-दर्शन करके ,
अंतर्द्वंद्व में गुम्फित,
कुंठित और
दिग्भ्रमित किसी नादान का।

शिक्षा की उपादेयता

तब विघ्नित मानिए
शत-प्रतिशत,
कतिपय जब
व्यावहारिक न हो 
उपयोग अर्जित ज्ञान का।


कारिंदे=कर्ता-धर्ता , महसूल = शुल्क (टैक्स) ,  ह्रस्व = छोटे ,  खिजां = पतझड़ ,नख्ल़ = पेड़ ,  ख़ेज़ान= पत्ता, महत = बहुत















 



Thursday, December 29, 2011

कबाब में हड्डी !



उद्विग्न,शिशिर,तिमिर व्योम की भी आँखे भर-भरा आई,
प्रीति पर ग्रहण लगा, जब निष्कपट प्रेम बीच धरा आई !


तोड़ डाला बेदर्दी से निष्ठुर ने, आशिक-मासुका का दिल,
जननी धीर की, क्यों उसको उनपर, रहमत न जरा आई !


दिनकर चला था करने,दीदार उसके हुस्नो-शबाब का,
योवन की इक लहर आई, शशि बनके अप्सरा आई !


सज-संवर,खिले मुख यों सम्मुख खड़ी थी आदित्य के,
ज्यों नज़्म फिर घूमकर वापस मुखड़े पे अंतरा आई !


इत्तेफाक देखता रहा चिलमन में दम तोडती संवेदना 'परचेत',
प्रेम-बंधनों में विरक्ति लाने की यह कैसी परम्परा आई !

Wednesday, December 28, 2011

यही वो पाप है जिसपर,जुर्माना नहीं लगता !

घर घराना नहीं लगता, सफ़र वीराना नहीं लगता,
ठट्ठा खाते-खाते अब तो, ताना,ताना नहीं लगता !



घुसे हैं जबसे डोमिनो,इटैलियन,चाइनीज पकवानों में,
'लजीज'गुम-शुदा हो गया, खाना, खाना नहीं लगता !



अपने-पराये के रिश्तों को,जख्म इतना उलझा गए,
लगते है यहाँ सभी अपने,कोई बेगाना नहीं लगता !



अंक अल्पतर पड़े जबसे,अपने उम्रदराज ऐनक के,
बहुत जाना हुआ चेहरा भी,अब पहचाना नहीं लगता !



चतुर करार दिया मुझको,मेरे प्राण-बीमा कराने पर,
यही वो पाप है 'परचेत'जिसपर,जुर्माना नहीं लगता !(*)







नोट : इस गजल को मुख्य ब्लॉग पर देखने हेतु कृपया गजल के शीर्षक पर क्लिक करें !





(*)उलटे मुआवजा मिलता है, घरवालों को :)

Tuesday, December 6, 2011

कौतुक स्वांग !


झुकी पलके उठाकर के, खुली जुल्फें सवारेगी,
कजरारे मस्त नयनों से नरम परदा भी तारेगी,

एक रोज बैठकर अपने, अरमानों की डोली में,
नुक्कड़ से गुजरते साक़ी जब मधुशाला निहारेगी !

हाला अंगूरी नादाँ, जो हर ख्वाइश पे मरती थी,
फलक पे खड़े-खड़े अपनी किस्मत पर विचारेगी !

दिलजले आतुर खड़े होंगे, पीने को कतारों में,
तंदूर पर तड़पते मुर्गे को वो प्यासा ही मारेगी !

गमजदा महलों के वाशिंदे भी, हैराँ-परेशाँ होंगे,
मुग्ध-मुद्रा में उन्हें 'आइये हुजूर' कौन पुकारेगी !

Monday, December 5, 2011

पशोपेश !






मुकद्दर की लकीरों से
तेरे नाम के महल का

एक ख़ूबसूरत आरेखण

मैंने भी सजाया था,

और चला था मैं

हिमालय के ठीक सामने

यादों की वह

मनचाही

ऊँची मीनार

खडी करने !

मगर दिल के जज्बात

कब इन्तकामी हो गए,

नहीं मालूम !!







Thursday, December 1, 2011

प्यासा हलक !


एक मंझे हुए, कुशल


आखेटक की भांति,
टकटकी लगाए

तकती रही वो तब तलक !
कमवक्त एक तरसाती बूँद,
पा नहीं गया जब
उसका तड़पता जिस्म
और प्यासा हलक !

वक्त सचमुच
बहुत बदल गया है ,
जभी तो,
जरूरत पर अक्सर
अब बादल भी
बेवफाई कर जाते है,
और धरा के कंठ से
दूर पहाड़ों पर
मीठे जलगीत भी नहीं फूटते !!





Friday, November 18, 2011

वृद्धत्व व्यथा !

उजड़ी-उजड़ी,

बिखरी गुमसुम सी

वह बगिया जिसमें,

फूलों की चाहत में

मिलकर बोये थे

इने-गिने बीज हमने कभी ,

पता नहीं शूल कैसे उग गए वहाँ !

यूं तो उन्हें अब

उपेक्षित ही रखता हूँ,

मगर राह चलते कमवक्त

वक्त-बेवक्त पैरों को

जख्म दे ही जाते है!

तुम्हारी हिदायतों के मध्यनजर

शब्द तो अक्सर खामोश ही रखे मैंने,

किन्तु जाने क्यों

चंद अश्रुओं के झुण्ड,

डगर पर चहलकदमी को

फिर भी निकल ही पड़ते है !!

Tuesday, October 25, 2011

यथास्थिति !

एक मरियल सा माली है, बगिया में बदहाली है,
दस्यु सुन्दरी नचा रही, वादक गुंडा और मवाली है !
दरोगा घर भर-भर रहा,चोर तिजोरी साफ़ कर रहा ,
निष्कपट बैठा लुटा-पिटा, कपटी के घर दीवाली है !
शठता की चकाचौंध में नेकता,नैन-दृष्ठि खो बैठी है,
सावन के अंधे की मति में, हरयाली ही हरियाली है !
सबल बेख़ौफ़ होकर इतराए,दुर्बल को क़ानून डराए,
भैंस हांक ले वही जा रहा अब, जो यहाँ बलशाली है !
न्याय नित पैंतरे बदलता,छानबीन का नाटक चलता,
दाल में काला क्या ढूढें , जब पूरी दाल ही काली है !!





आपको दीपावली की हार्दिक शुभ-कामनाएं !


Monday, September 19, 2011

अबूझ !




तुम जब भी देखोगे
मेरा चेहरा,
तुम्हे सिर्फ और सिर्फ
हंसी ही बिखरी नजर आयेगी,
क्योंकि, नयनों से निकले
तमाम मोतियों को,
दिल के समंदर में
सीपियाँ समेट ले जाती है !

ये बात और है कि
खिली धूप में भी
कभी न कभी
जीवनपथ पर,
बारिश की फुहारों के
हम चश्मदीद तो बनते ही है !!

Sunday, June 5, 2011

खुदा लगता है नजर से भी गया,और कान से !

उदर भरता नहीं इनका, मौद्रिक रसपान से,
हैवान बन गए हैं नेता, नौकरशाह, इंसान से  !
शरीक होकर भी अपने, अंतिम संस्कार में,
लौट आते है ये कमवख्त, फिर शमशान से !!
 दिमाग के खाली है, चाल-चरित्र से ढीले है,
खेलते है हर खेल अपना, कुटिल जुबान से !
अपहृत कर लिया प्रजातंत्र, इन बटमारों ने,
बेवश सा देख रहा रखवाला,खडी मचान से !!
 सत्र चलता है बेशर्मों का, अब रोज तिहाड़ से,
भूखा गरीब  पोषता  इन्हें, कर और लगान से !
 वो जाए कहाँ, जिसको प्यार है देश से 'परचेत',
खुदा लगता है नजर से भी गया,और कान से !!

Monday, May 16, 2011

दास्ताने टेररिस्तान !

नाम पाक, मंसूबे निर्मम नापाक,

लत संत्रास स्वाद की,

सब झूठे,मक्कार, स्तुति करूँ क्या

किसी एक-आद की !        

पिद्दीभर एबटाबाद तो अपना

इनसे सम्भाला न गया,

और कंगले, बात करते फिरते थे

हमारे अहमदाबाद की !!  


बीज जैसा, पौध वैसी, उसपर

खुराक द्वेष-खाद की,  

छीनकर दुनिया का अमन-चैन,

सुख-शांति बर्बाद की !

कांटे खुद बोये,दोष हमें दिया,

अरे कायरों ! हम तुमसा

दाऊद-ओसामा नहीं पालते,

ये भूमि है गांधी, बोष,

राजगुरु, भगतसिंह, आजाद की !!


जिन्दगी की गाडी, सुबह से शाम तक जाम में फंसी है,
मंजिल-ए-सड़क, नाकामियों की दल-दल में धंसी है, !
राह में जिसे मौक़ा मिला, साला  ठोक के चला गया,
अब तो, कभी खुद पे, कभी हालात पे आती हंसी है!!