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Tuesday, December 6, 2011

कौतुक स्वांग !


झुकी पलके उठाकर के, खुली जुल्फें सवारेगी,
कजरारे मस्त नयनों से नरम परदा भी तारेगी,

एक रोज बैठकर अपने, अरमानों की डोली में,
नुक्कड़ से गुजरते साक़ी जब मधुशाला निहारेगी !

हाला अंगूरी नादाँ, जो हर ख्वाइश पे मरती थी,
फलक पे खड़े-खड़े अपनी किस्मत पर विचारेगी !

दिलजले आतुर खड़े होंगे, पीने को कतारों में,
तंदूर पर तड़पते मुर्गे को वो प्यासा ही मारेगी !

गमजदा महलों के वाशिंदे भी, हैराँ-परेशाँ होंगे,
मुग्ध-मुद्रा में उन्हें 'आइये हुजूर' कौन पुकारेगी !

Saturday, June 5, 2010

सोचो-सोचो !!

सिर्फ मुद्दा उठाने व चिंता व्यक्त कर देने भर से,
क्या सोचते हो देश-तंत्र सुधर जाएगा ?
जाने-अनजाने ये विनाश का बीज जो बो रहे है,
क्या पौधा बनके हमारे समक्ष नहीं आयेगा?
सोचो-सोचो !

लिख देने या फिर किसी एक के कहने भर से,
क्या यह देश कभी सुधरने वाला है ?
देश सुधारने के लिए क्या आज हमारे बीच कोई,
भगत सिंह व चंद्रशेखर बनने वाला है ?
सोचो-सोचो !

यों भी बताने को दुनिया को हमारा इतिहास,
कभी भी प्रेरणादायक रहा क्या ?
हमारी घृणित राजनीति का चेहरा यहाँ पर,
कहीं भी मुहं दिखाने लायक रहा क्या ?
सोचो-सोचो !

इस गरीब देश की निर्जीव सी अर्थव्यवस्था में,
और होने देंगे हम कितना घोटाला ?
साठ हजार करोड़ रूपये का चूना लगा गया ,
काले चश्मे वाले का मद्रासी ग्वाला !
सोचो-सोचो !

इस लोकतंत्र की (अ)राज(क) नीति की वजह से,
आमआदमी क्या कष्ट नहीं उठाते होंगे?
जब टेड़े मुहं वाले ही आईपीएल-बीपीएल खा गए,
तो सीधे मुहं वाले कितना नहीं खाते होंगे ?
सोचो-सोचो !

किसी ने सोचा था कि १८५७ में शुरू हुआ संग्राम,
१९४७ में जाकर ख़त्म होगा ?
अगर इस नए संग्राम की अब शुरुआत हुई भी तो
यह कब जाकर ख़त्म होगा ?
सोचो-सोचो !

Friday, June 4, 2010

छिटपुट शेर !

सीने में संजोई तेरी याद, कैसे मैं भुला लूंगा,
तुम जितने मर्जी गम दो, मैं मुस्कुरा लूंगा,
गुजारिश बस इतनी है, तेरे चेहरे की रौनक न बुझे,
अपने हिस्से के आंसू मुझे दे देना, मैं बहा लूंगा !!
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

खुशी सदा तेरे दर पे ठहर जाए, ये दुआ मांगता हूँ,
बस तेरी जिन्दगी संवर जाए, ये दुआ माँगता हूँ !
न कहीं जीवन सफ़र में अन्धेरा, कभी तेरी राह रोके,
तुझे हरतरफ रोशनी नजर आये, ये दुआ माँगता हूँ !!

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क्यों तूने इसतरह से पत्थर का बनाया मुझको,
मुहब्बत की सजा, ऐसी तो न दे खुदाया मुझको !
मैं सोने के वास्ते चिता पर करवटें बदलता रहा,
क्यों मौत ने न अपने सीने से लगाया मुझको !!

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डिटर्जेंट से भी जो न निकल पाए कभी
हमने रगड़-रगड़ के वो दाग निकाले है ,
आस्तीन में दोस्तों की छुपे बैठे हो जो,
बीन बजा-बजा के वो नाग निकाले हैं,
दिल में तुम्हे पढने की तमन्ना जगी तो
अंतरजाल पे ढूढ़-ढूढ़ के ब्लॉग निकाले है !

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

तन्हा दिल को अपनों की बेरुखी मारती है,
मेरी आत्मा मुझको हरपल धिक्कारती है !
रंग बिखरे है पास कई सतरंगी-इन्द्रधनुषी,
किन्तु नजर एकटक शून्य को निहारती है !!

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

साकी तेरे मयखाने में जाम पिया किसने,
सरे-गुलशन फूल को बदनाम किया किसने!
दिल तोड़ने से पहले ये तो पता किया होता ,
कि तुमसे ऐसा ये इंतकाम लिया किसने !!

सोसिअल स्वैप !

पश्चिम से इम्पोर्ट किया हुआ
आइडिया है यह अपने देश में,
और दिनोदिन लोकप्रिय भी हो रहा है,
सोसिअल स्वैप बोले तो
वस्तु विनिमय केंद्र,
जहां आप घर की फालतू वस्तुवे
आसानी से डंप कर सकते है !
सुनने में आया है कि
बंगलौर में ऐसे ही एक
वोमन सोसिअल स्वैप में,
बहुत सी महिलाए
अपने पतियों को साथ लाई थी !!
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और चलते-चलते:-

अपना-अपना भाग्य !

Thursday, June 3, 2010

जमाना !




क्या ज़माना आ गया कि आईने में उभरते
अपने ही अक्श का संज्ञान नंगे नहीं लेते,
सरे राह किसी को एक रूपये का सिक्का
भीख में देना चाहो,तो भिखमंगे नहीं लेते !
गली से गुजरती इक मस्त-बयार कह रही थी
कि ये दुनिया सचमुच में बहुत खराब हो गई,
इसीलिये हम आजकल किसी से पंगे नहीं लेते !!







मेरे देश के लोगो !
चोर, लुच्चे-लफंगों के तुम और न कृतार्थी बनो,
जागो देशवासियों, स्वदेश में ही न शरणार्थी बनो !

भूल गए,शायद आजादी की उस कठिन जंग को ,
खुद दासता न्योताकर, अब और न परमार्थी बनो !

पाप व भ्रष्टाचार, लोकतंत्र के मूल-मन्त्र बन गए,
आदर्श बिगाड़, भावी पीढी के न क्षमा-प्रार्थी बनो !

ये विदूषक, ये अपनी तो ठीक से हांक नहीं पाते,
इन्हें समझाओ कि गैर के रथ के न सारथी बनो!

गैस पीड़ितों के भी इन्होने कफ़न बेच खा लिए,
कुछ त्याग करना भी सीखो, और न लाभार्थी बनो !

वरना तो, पछताने के सिवा और कुछ न बचेगा ,
वक्त है अभी सुधर जाओ,अब और न स्वार्थी बनो!

मैं चिंतित हूँ !

वो अमृत तलाशा जा रहा है
जिससे कि इंसान, यानि
भ्रष्ट, कातिल, दुराचारी,व्यभिचारी
और इन सबका बाप राजनेता,
मरेगा नहीं, चिरजीवी हो जाएगा !
गर शरीर का कोई अंग
निष्क्रिय हो जाए कभी,
तो नया अंग उग आयेगा ,
अपने ही जैसा एक और
भ्रष्ट, निकृष्ट व कमीना चाहिए तो
क्लोनिंग की सुविधा भी मौजूद,
तरोताजा रहने की औषधी,
और बुढापा तो कभी नहीं आएगा !!

अभी जब इनके
घृणित, काले कारनामे देखता हूँ,
दिल को कम से कम
यह तस्सल्ली तो रहती है कि
यह दुराचारी ,
भला साथ क्या ले जाएगा ?
यों भी अब हो ही गया है वह मरने को !
मगर, अब मैं चिंतित हूँ ,
जब यह जानता है कि
इसे एक न एक दिन मरना ही है,
तब ये हाल है,
अगर यह चिरजीवी हो गया,
तो फिर क्या हाल होगा, कभी सोचा ?
इन बेहूदी खोपड़ी के
निठल्ले अमेरिकी वैज्ञानिकों को,
कोई और काम क्यों नहीं देते यारों, करने को !!

Wednesday, June 2, 2010

दो जून की रोटी !

सुबह जागा
तो अचानक याद आया,
वो पहली मुलाकात,

दो जून याद आया,
जब तुम आई थी, मेरी कुटी पे,
चंचल, झील से दो नयना,
चेहरे पे वो कातिलाना मुस्कराहट लिए,
मैंने भी संकुचाते हुए पूछा था

जब तुम्हारा नाम ,
कुछ बलखाते ,

कुछ शर्माते हुए तुमने
अपना नाम बता भी दिया था !

सुनकर, पता नहीं अनगिनत कितने
लड्डू फूटे थे मेरे मन के अन्दर ,
फिर मैंने दूसरा सवाल दागा था
कि रहती कहाँ हो ?
कितने इत्मीनान से तुमने
घर तक पहुँचने के सारे दिशा-निर्देश
एक-एक कर मुझे समझाए थे,
और घर का पता भी दिया था !!

याद है तुम्हे ,
उस वक्त मैं चूल्हे पर,
अदगुंदे गीले आटे से बनी
रोटियाँ सेकने में लगा था ,
वो ईंट मिटटी के चूल्हे पर
धूं-धूं कर जलती लकडिया,
माथे पर छलकता पसीना ,
पीतल की परात पर गुंदा आटा,
और वो चूल्हे पर रखा तौवा काला !
जब देखो,
जला-भुना बैठा रहता है ताक में,
कैसे अपनी रोटियाँ सेकूं ,
बस इसी फिराक में,
सोचता हूँ कि इंसान भी कितना
स्वार्थी और कमीना होता है साला !!

मैं उस भट्टी का
एक अकुशल श्रमिक,
तुमने देखकर तुरंत ही भाप लिया था,
और कहा था,
हटो लाओ, मैं बना देती हूँ ,
और फिर तुम्हारे हुनर को मैं
एकटक निहारता रहा था,
वो वक्त, वो खुशनुमा हसीन लम्हें,
मुझसे भूलते नहीं भुलाए !
अरसा बीता,
वो नरम, मुलायम,
तुम्हारे हाथ की बनी,
दो जून की रोटी खाए !!

Monday, May 31, 2010

सबके सब बिन पैंदे के लोटे हो गए है !

बापू, अब तेरे देश में, अच्छे लोगो के टोटे हो गए है ,
जिधर देखो, सब के सब बिन पैंदे के लोटे हो गए है !
कोई लल्लू बन के लुडक रहा, कोई चिकना मुलायम,
खुद को अमर बताने वाले, खा-खा के मोटे हो गए है !!


तेरे इस देश के गरीब की तो माया भी निराली हो गई,
धन चिंता में दिल सफ़ेद और काया भी काली हो गई !
साम्यनिर्धन हिताषियों के तो कर्म ही खोटे हो गए है,
जिधर देखो, सब के सब बिन पैंदे के लोटे हो गए है !!


पास्ता माता के चरणों में, मुखिया भी लमलेट हो गया,
जनप्रतिनिधि सिपैसलार तो जैसे फौजी तमलेट हो गया !
घर-उदर इनके बड़े हो गए, किन्तु दिल छोटे हो गए है,
जिधर देखो, सबके सब बिन पैंदे के लोटे हो गए है !!


फतवे बेचने लगे, धर्म की भट्टी पे आग तापने वाले,
कोई और बाबरी ढूढ़ रहे, राम का राग अलापने वाले !
हकदार का हक़ मारने को, रिजर्वेशन कोटे हो गए है,
जिधर देखो, सबके सब बिन पैंदे के लोटे हो गए है !!

Saturday, May 29, 2010

विकसित होता भारत देखो !

अटल, सोनिया, एपीजे, मनमोहन और प्रतिभा-रत देखो,
लालू, मुलायम, ममता , येचुरी, प्रकाश-वृंदा कारत देखो !
संतरी देखो, मंत्री देखो, अफसर, प्रशासक सेवारत देखो,
आओ दिखाएँ तुमको अपना,विकसित होता भारत देखो !!




शहर,सड़क व गलियों की 'प्रगति-ज्वर' से हया मर गई,
जन-प्रतिनिधियों की नाक तज,शर्म पलायन देश कर गई !
बेशर्मी बंद वाताकूलन में, इनकी हर ओंछी शरारत देखो,
आओ दिखाएँ तुमको अपना, विकसित होता भारत देखो !!


निर्धन कुटिया की छान को, महंगाई का बोझ ढा गया,
नेता राशन,तोप, खेल, संचार,और पशु चारा खा गया !
भूखे व्याकुल जन, मवेशी और गइया कूड़ा चारत देखो,
आओ दिखाएँ तुमको अपना, विकसित होता भारत देखो !!


style="font-size:100%;">
जन-जन की आँख में पानी है,धरा के माथे परेशानी है,
चादर ओढ़ के मुखिया सो रहा, जाग लगाना बेमानी है !
लहुलुहान हो रही धरती माता, भाई-भाई को मारत देखो,
आओ दिखाएँ तुमको अपना, विकसित होता भारत देखो !!

कहने को इस लोकतंत्र में,जिस आम आदमी का राज है,
प्रतिनिधि उसी का कर रहा उसे, दाने-दाने को मोहताज है !
लूट मची जनता के धन की, माला कंठ में धारत देखो,
आओ दिखाएँ तुमको अपना, विकसित होता भारत देखो !!





Monday, May 24, 2010

यूं भी बावफा होते है लोग !


निसार राहे वफ़ा करके जाना कि राहे जफा होते है लोग,
सच में, हमें मालूम न था कि यूं भी खफा होते है लोग !

हम सोचते थे कि ये जज्बा नेमत है खुदा की, किसे पता,
वफ़ा की कस्मे खाने वाले, इस कदर बेवफा होते है लोग !

आग लगा जाते है घरों में, दनल से नफरत करने वालों के,
बेवक्त नीर बहाने वाले, उस वक्त ही क्यों दफा होते है लोग !

प्यार के खातिर सबकुछ न्योछावर करने का दम भरने वाले,
खुद का भरोसा बेच दे सरे राह,यूं भी बावफा होते है लोग!

दिल और आँख के रिश्तों की, अजब दास्तां हमने भी देखी,
नजर देखे, दिल शकूं पाए,समझदार यूं भी नफ़ा होते है लोग !

Friday, May 21, 2010

कल रात को मैं कुछ लिख न पाया !




मुझको मेरी रहमदिली ने सताया,
कल रात को मैं कुछ लिख न पाया !
धीमी- आहिस्ता शाम ढल रही थी,
मेरे सामने इक शमा जल रही थी !

तभी फिर वहाँ एक परवाना आया,
कल रात को मैं कुछ लिख न पाया !

पतंगा कोई एक गीत गा रहा था,
शम्मा के इर्द-गिर्द मंडरा रहा था !
प्यार के जुनून में था वह मनचला,
जब तक जली शमा वो भी जला !
'
'
कभी साथ ऐसा किसी ने निभाया,
कल रात को मैं कुछ लिख न पाया !

बदन अपना वो लौ में लुटाता रहा,
हालत उसकी देख मैं छटपटाता रहा !
जिन्दगी से जाने क्यों रुष्ट था वो,
इरादे का पक्का बड़ा दुष्ट था वो !

दृड़-प्रण वो उसका मुझे बहुत भाया,
कल रात को मैं कुछ लिख न पाया !!

Wednesday, May 19, 2010

स्पष्ठीकरण !

इर्द-गिर्द सदा ही घूम पाता, मैंने तो
तुमसे वो धूरी चाही थी, दूरी नहीं,
दिल की बात हम हक़ से कह जाते,
वो सहभागिता चाही थी, मजबूरी नहीं !

मेरे दिल में रखने की आदत बुरी है,
हर ख्वाब दिल के कोने में सजाता हूँ,
इजहार-ए-इश्क पलकें कर लेती है ,
हर बात लबों पे आये, ये जरूरी नहीं !

अक्सर ही ख्वाब तुम्हारे सजाने को,
हरदम आँखे चुराता हूँ रातों को नींद से,
बनाई ख़्वाबों ने जब भी तस्वीर तेरी,
पहुंचाई मुकाम पर है, छोडी अधूरी नहीं !

दिल की दीवारों पर टंगी तेरी तस्वीर में ,
प्रेम की कुंची से इन्द्रधनुषी रंग बुनता हूँ,
हसरते यों तो बहुत रखे था दिल में पाले,
न जाने क्यों ये तमन्नायें होती पूरी नही !

Monday, May 17, 2010

सड़क !


आड़ी-तिरछी ,
टेडी-मेडी,
कहीं चिकनी,
कहीं कड़क,
सुनशान
पहाडी सड़क,
यों समेटे है खूबसूरती
वह भी शुद्ध सब,
दीखने में मगर
एकदम खूसट सी
गंवार, बेअदब,
रास्तों का मंजर और
खुशनुमा पलों का प्राकृतिक सौन्दर्य ,
पथिक को भाता है,
मगर
कोप- इजहार सभी को डराता है!
पथिक का मन रखने को,
झूठ भी नहीं बोल पाती,
और सीधे ही
सतर्कता का संकेत लगाती,
उसे तो
बनावटी बनना ही नहीं आता है !!


दूसरी तरफ
लिए ढेरों तड़क-भड़क,
वो मैदानी सड़क,
खूब चौड़ी और
बड़ी-बड़ी,
अनेकानेक
सौन्दर्य सुधार के
लेप से दबी पडी,
दीखने में एकदम
सीधी लगती है, मानो
कोई सी उलझनों में
वो ना घिरी हो,
एकदम चिकनी सपाट,
ऐसी कि हया भी
फिसलकर कहीं,
किसी गटर में जा गिरी हो,
मुस्कुराकर स्वागत करती
हर पथिक का,
उसकी हर इक अदा
यों तो बनावटी है,
मगर लगती खरी है,
राही को तनिक अहसास
नहीं होने पाता !
जिस राह पर वो चल रहा,
आगे वो राह
इसकदर काँटों भरी है,
कि चलना बेहद कठिन हो जाता!!


नोट: छवि गुगुल से साभार !

Saturday, May 15, 2010

अदभुत !

दर्द इस दिल को जमीं दे रही है,
संताप सारा आसमान दे रहा है!
पलकों में सुलगते नफरतों के शोले
यादों में तपता जहान दे रहा है !!

वो चले गए हमसे दामन छुड़ाकर,
हमारे दिल के फेल होने के डर से !
इक सब्र है जो हमसफ़र बनकर
संग हरइक घड़ी इम्तहान दे रहा है !!

जो सच था वही तो हम कह गए,
मुख पर कहने की आदत बुरी है!
अब मान-हानि के दावे की धमकी
हमको हर इक बेईमान दे रहा है!!

अनजाने से क्यों बने फिर रहे वो,
हवाओं के रुख पर जान लेने वाले!
है कोई इसका सज्ञान लेने वाला कि
क्यों एक निर्दोष जान दे रहा है !!

दुष्टता-क्लिष्टता, धृष्टता-निकृष्टता से,
अब पापों के सारे घड़े भर गए है!
जिसके लिए मौत मुह खोले खडी है ,
वही जीने का हमको ज्ञान दे रहा है !!

ब्लॉगरों ने तो लगता है पी ली भांग है !

ब्लॉगरों ने तो लगता है पी ली भांग है ,
कुछ ठीक नहीं चल रहा सब उटपटांग है!
निकले तो हिंदी की दुर्दशा सुधारने को थे,
और खीच रहे बस एक-दूजे की टांग है!!

लिखने का मकसद क्या सिर्फ वोट है?
लगता है कि हिंदी में ही कही खोट है!
वरना क्यों हर एक साहित्य सेवक
बन गया आज मानसिक विकलांग है!!

अपनों से ही अगर हम कलेश लेंगे ,
फिर दूसरों को क्या ख़ाक सन्देश देंगे !
मिलजुलकर हिन्दी विकास पर ध्यान,
यही आज हम सब से वक्त की मांग है!!

ब्लॉगरों ने तो लगता है पी ली भांग है ,
कुछ ठीक नहीं चल रहा सब उटपटांग है!
निकले तो हिंदी की दुर्दशा सुधारने को थे,
और खीच रहे बस एक-दूजे की टांग है !!

Tuesday, May 11, 2010

अभी तुम्हे तो बहुत दूर तक चलना है !

आज उदित सूरज है हर हाल में तुम्हे जलना है !
कल सांझ चौखट पे दस्तक देगी, तुम्हे ढलना है !!

ये सच है कि पहाड़ सी जिन्दगी जीना आसां नहीं !
फिर भी पहाड़ बनके क्षण-क्षण हिम सा गलना है !!

वातावरण से छीन के कोई ले गया है खुसबूओ को !
तुम्हे चट्टान बनके उन हवाओं का रुख बदलना है !!

भूल गए, माँ ने तुम्हे शेरनी का सा दूध पिलाया था !
तुम्हे सिखाया किसने, तुम्हारा काम हाथ मलना है !!

थककर रोक ले कहीं पर कदम ये मुमकिन नहीं !
'गोदियाल' अभी तुम्हे तो बहुत दूर तक चलना है !!

Monday, May 10, 2010

इस बार मेरी माँ ने ख़त नहीं भेजा गाँव से !

कल मदर्स डे के सुअवसर पर मैंने उस बाबत कुछ नहीं लिखा, क्योंकि मुझे अपनी माँ से एक शिकायत है कि उसने मुझे घडियाली आंसू बहाना नहीं सिखाया ! पता नहीं क्यों ? एक दूसरी वजह भी थी , जिसे यहाँ बयाँकर रहा हूँ इन चंद पंक्तियों में ;

इस बार, इस दिन पर
सैर सपाटे नहीं गया, मदर्स डे की नाव से !
अबके यूँ भी मेरी माँ ने
इस अवसर पर ख़त नहीं भेजा गाँव से !!
पिछली जो चिट्ठी आई थी,
लिख भेजा था उसने अपना दुखड़ा !
यह भी एक वजह रही थी कि
इस मदर्स डे पर रहा उखडा- उखडा !!
अश्रु ज्योति मोतियाबिंद खा गई,
बूढ़ी काया लाचार हो गई पाँव से !
अबके यूँ भी मेरी माँ ने
इस अवसर पर ख़त नहीं भेजा गाँव से !!

Saturday, May 8, 2010

निरुपमा के बहाने एक गजल !


मित्रो, व्यस्तता की वजह से आज ब्लोग-जगत पर मेरी उपस्थिति कम ही रही, मगर मैं समझता हू कि अभी भी यहां इस ब्लोग जगत पर पत्रकार निरुपमा की असामयिक और दर्दनाक मौत से समबन्धित चर्चाओं का बाजार काफ़ी गरम है। जैसा कि मैने कुछ ब्लोग मित्रों के ब्लोगो पर कुछ टिप्पणियों मे भी कहा और अब भी कह रहा हूं कि मीडिया के साथ-साथ अनेक ब्लोगर मित्रों ने बिना सोचे-समझे निष्कर्षो पर पहुंच इस पूरे प्रकरण को एकपक्षीय बनाकर जरुरत से ज्यादा तूल दिया। खैर, भग्वान निरुपमा की आत्मा को शान्ति प्रदान करे, यही प्रार्थना करता हूं, और इस पूरे घटना के मद्यनजर पेश है एक गजल;

त्याग कर पुरा-रीतियां, निकली नये अभियानों पर ।
बदलने लगी है दुनिया, सभ्यता के दरमियानों पर ॥

न स्वयम्बर की दरकार रही, न युवराजों की जंग ।
जंक खाती जा रही तलवारें ,पडे-पडे मयानों पर ॥

क्या पूनम, क्या अमावस, शुक्ल क्या कृष्ण पक्ष ।
सूरज ग्रहण लगा रहे है, चांद के आशियानों पर ॥

कह रहे थे लोग,माली ने खुद गुलशन उजाड डाला।
करें भी कोई ऐतवार कैसे, अपने इन सयानों पर॥

सबूत मिटा डाले उसी ने, जिस पर दारोमदार था ।
मुकदमा दर्ज हुआ भी तो, गिरगिट के बयानों पर ॥

Friday, May 7, 2010

कोई तो बताये मिलती कहाँ होगी ?

कुछ शर्म खरीदनी है,
अपने लिए भी और
अपने देशवासियों के लिए भी !

मुझे लगता है कि शरीर में
विटामिन की तरह इसकी भी
नित कमी होती जा रही,
लाख जुतियाने पे भी
ये कम्वख्त शर्म नहीं आ रही !

हर शख्स का
भ्रष्टाचार के दलदल में खिला चेहरा
यहाँ कमल जलज लगता है ,
और हवाओं का रुख भी
जरुरत से ज्यादा निर्लज्ज लगता है !

अरे भाई कही तो मिलती होगी ?
ढूंढो इसे, यह सन्देश है मेरा,
स्वदेशियों के लिए भी,
और प्रवासियों के लिए भी !

कुछ शर्म खरीदनी है,
अपने लिए भी और
अपने देशवासियों के लिए भी !!

Wednesday, May 5, 2010

वो शख्स !

वो शख्स !
जो जिन्दगी से हुआ 'बोर' है,
और पैदाइशी कामचोर है,
मेहनत करना नहीं चाहता,
भूखों मरना नहीं चाहता,
जुए-उठाईगिरी में भाग्य आजमाया,
मगर कहीं भी शकून न पाया,
अभी कल ही सड़क पर जाती
बग्गियों से गन्ना लूछ रहा रहा था,
मुझे देखा तो मुझसे से पूछ रहा था,
भाई साहब, आप सिर मत खुजाओ,
मुझे सिर्फ और सिर्फ इतना बताओ,
मेरी किस्मत में बिजनेस का योग है,
ये 'आइ वास' घरेलू है या लघु उद्योग है ?
मैंने कहा,क्या बात की है भैया !
लग जायेगी तुम्हारी भी पार नैया,
नाम भले ही इसका धोखा है ,
मगर धंधा बड़ा चोखा है ,
ये तो अब हाईप्रोफाइल पेशा बन गया,
लघु क्या ये तो वृहत उद्योग बन गया ,
फटाफट फैक्ट्री लगाओ,
फिर बिजनेस तो क्या
राजनीति में भी किस्मत आजमाओ .
इस देश की जनता के खूब मन भावोगे,
'लक' अच्छा रहा तो
किसी दिन मंत्री-संत्री भी बन जावोगे !!