तन्हाइयों संग ये जिन्दगी, यूँ ही कब तक चलती रहेगी,
इस घर में कब तक, आपकी गैर-मौजूदगी खलती रहेगी !
बहारें कहती है, बिन तुम्हारे वे भी न आयेगी चमन में,
आखिर कब तक जीवन लौ, यूँ स्नेह बिन जलती रहेगी !!
क्यूँ कर सताए है हमको हरदम, आपकी अनकही बाते,
यादों के पुरिंदे में कब तक, सुनहरी शामे ढलती रहेगी !
कहने को बहुत है मगर, कहे किससे अपना हाल-ए-दिल,
कब तक घुट-घुटके हमारी हस्ती,खाक में मिलती रहेगी !!
चले भी आओ इस जिन्दगी के अँधेरे को रोशन करने
वरना जीवनभर हमको, कमी तुम्हारी खलती रहेगी !
खुशिया और गम सब तुम्ही से, इन्तजार भी तुम्हारा है
तुम्हे पाने की ख्वाइश यूँही, दिल में सदा मचलती रहेगी !!
Saturday, June 6, 2009
Wednesday, May 27, 2009
हर बात से इत्तेफाक रखते है !
संग अपने हर वक्त अपनी बेगुनाही की ख़ाक रखते है !
ये सच है कि हम आपकी हर बात से इत्तेफाक रखते है !!
यूँ मुश्किल न था कुछ भी हमें, बेशर्मी की हद को लांघना !
ख्याल आपका आता है कि हम भी इक नाक रखते है !!
तरह आपकी हमने दर्द को पलकों में छुपाये नहीं रखा !
और न नजरो में अपनी हम कोई बला–ए–ताक रखते है !!
फ़ेंक दो निकाल गर दिल में है कोई बुरा ख़याल आपके !
जख्म-ए-जिगर में हम न कोई इरादा नापाक रखते है!!
लिख देना इसपर जब भी जी करे लिखने को कोई नज्म !
दिल श्याम-पट्ट है,जेब में हर वक्त हम चाक रखते है!!
ये सच है कि हम आपकी हर बात से इत्तेफाक रखते है !!
यूँ मुश्किल न था कुछ भी हमें, बेशर्मी की हद को लांघना !
ख्याल आपका आता है कि हम भी इक नाक रखते है !!
तरह आपकी हमने दर्द को पलकों में छुपाये नहीं रखा !
और न नजरो में अपनी हम कोई बला–ए–ताक रखते है !!
फ़ेंक दो निकाल गर दिल में है कोई बुरा ख़याल आपके !
जख्म-ए-जिगर में हम न कोई इरादा नापाक रखते है!!
लिख देना इसपर जब भी जी करे लिखने को कोई नज्म !
दिल श्याम-पट्ट है,जेब में हर वक्त हम चाक रखते है!!
Tuesday, May 19, 2009
निट्ठले बैठे थे जो...
सुना है कि बेनमाजी भी नमाजी बन गए है ।
निट्ठले बैठे थे जो, वो कामकाजी बन गए है।।
अपना वो खौफनाक असली चेहरा छुपाने को,
दाड़ी रखकर मिंयाँ घोटा हाजी बन गए है ।
अदाई की रस्म खुद तो निभानी आती नहीं,
और जनाव इस शहर के काजी बन गए है।।
यों तो लोगो को सिखाते फिर रहे हैं कि
ख़ुदा नाफरमान की हिमायत नहीं करता।
पर जब खुद फरमान बरदारी की बात आई,
शराफत को त्याग, दगाबाजी बन गए है।।
भोग-स्वार्थ के लिए आप तो रूदिवादिता व
असामाजिकता के दल-दल में धंसे रहते है।
हक़ की बात पर उनके लिए औरतों के
निट्ठले बैठे थे जो, वो कामकाजी बन गए है।।
अपना वो खौफनाक असली चेहरा छुपाने को,
दाड़ी रखकर मिंयाँ घोटा हाजी बन गए है ।
अदाई की रस्म खुद तो निभानी आती नहीं,
और जनाव इस शहर के काजी बन गए है।।
यों तो लोगो को सिखाते फिर रहे हैं कि
ख़ुदा नाफरमान की हिमायत नहीं करता।
पर जब खुद फरमान बरदारी की बात आई,
शराफत को त्याग, दगाबाजी बन गए है।।
भोग-स्वार्थ के लिए आप तो रूदिवादिता व
असामाजिकता के दल-दल में धंसे रहते है।
हक़ की बात पर उनके लिए औरतों के
Friday, May 15, 2009
वो क्या था ?
दो बूँद गिर थे जब ,
छिटककर दूर आँखों से,
चट कर गया,
शायद वह टुकडा जमीं का बंजर था !
मिलने पडा जो ख़ाक में,
दूर दरख्त की छाव तले,
हुस्न से होकर रुखसत ,
दास्ताँ-ऐ-इश्क का अस्थिपंजर था!
घुट-घुट कर दम तोडा जिसने,
अभी कुछ पल दूर,
कोई नहीं वाकिफ कि
वह कितना भयावह मंजर था !
फूल उछलते देखा था सबने,
एक गुलाब के सा,
घाव मगर कुछ ऐसे दे गया,
फूल नही, वह कोई खंजर था !
छिटककर दूर आँखों से,
चट कर गया,
शायद वह टुकडा जमीं का बंजर था !
मिलने पडा जो ख़ाक में,
दूर दरख्त की छाव तले,
हुस्न से होकर रुखसत ,
दास्ताँ-ऐ-इश्क का अस्थिपंजर था!
घुट-घुट कर दम तोडा जिसने,
अभी कुछ पल दूर,
कोई नहीं वाकिफ कि
वह कितना भयावह मंजर था !
फूल उछलते देखा था सबने,
एक गुलाब के सा,
घाव मगर कुछ ऐसे दे गया,
फूल नही, वह कोई खंजर था !
देश अपना -लोग पराये !
बड़े बेमन से छोड़कर हम,प्यारा सा वो मुल्क अपना
लेकर चंद ख्वाईसे,तेरे अजनबी इस शहर में आये थे ,
बीच राह,मुसाफिरों की भीड़ में,बिखर गए सब अरमां
बेशक वतन तो अपना था,मगर यहाँ लोग पराये थे !
यूँ मंजूर न था दूर होना, अपने सुन्दर उस अंचल से
मगर कर भी क्या सकते थे, हम हालात के सताये थे,
मैं अकेला चला था,न कोई साथ आया, न कारवां बना
कहने को तो हम भी, आधे-अधूरे ही घर से आये थे !
भीड़ ही भीड़ थी यहाँ क़यामत की, हर कूंचा, हर गली
पर घर एकाकी था, व संग चलने को खुद के साये थे
ढूँढने निकले जिस घर में अपना एक मीत उत्तराँचल से
ठोकर लगी, तो जाना कि वो घर दुश्मन के बसाये थे !
जब आये भी जो कोई यहाँ, बनने को हमदर्द हमारे
गुलाब के फूलों संग छुपाके,वो खंजर भी लाये थे
जिन्दगी बन के रह गयी, इक दर्द भरा मंजर जहाँ,
देश तो अपना ही था, मगर यहाँ लोग पराये थे !
लेकर चंद ख्वाईसे,तेरे अजनबी इस शहर में आये थे ,
बीच राह,मुसाफिरों की भीड़ में,बिखर गए सब अरमां
बेशक वतन तो अपना था,मगर यहाँ लोग पराये थे !
यूँ मंजूर न था दूर होना, अपने सुन्दर उस अंचल से
मगर कर भी क्या सकते थे, हम हालात के सताये थे,
मैं अकेला चला था,न कोई साथ आया, न कारवां बना
कहने को तो हम भी, आधे-अधूरे ही घर से आये थे !
भीड़ ही भीड़ थी यहाँ क़यामत की, हर कूंचा, हर गली
पर घर एकाकी था, व संग चलने को खुद के साये थे
ढूँढने निकले जिस घर में अपना एक मीत उत्तराँचल से
ठोकर लगी, तो जाना कि वो घर दुश्मन के बसाये थे !
जब आये भी जो कोई यहाँ, बनने को हमदर्द हमारे
गुलाब के फूलों संग छुपाके,वो खंजर भी लाये थे
जिन्दगी बन के रह गयी, इक दर्द भरा मंजर जहाँ,
देश तो अपना ही था, मगर यहाँ लोग पराये थे !
Wednesday, May 13, 2009
खत्म हुआ महाकुम्भ
गोटी फिट कर रहे फिर से, राजनीति के खिलाडी,
दुविधा मे पडे है सबके सब, धुरन्दर और अनाडी,
सोच रहे इस महापर्व मे वो, परमपरागत मतदाता,
खुदा जाने उन पर कौन सा जुल्म, ढा गये होंगे !
पता नही कितने नेता, जो कल तक केन्द्र मे थे,
आज फिर से अचानक, हाशिए पर आ गये होंगे !!
सड्को पर फिर एक बार, खूब रोई आचारसंहिता,
सभी ग्रन्थ असहाय दिखे, क्या कुरान, क्या गीता,
सार्वजनिक मंचो पर अभद्रता ने, खूब जल्वे विखेरे,
विकास स्तब्ध, जाति-धर्म, ऊंच-नीच ही छा गये !
दिल्ली के संगम घाट पर, लोकतन्त्र के महाकुम्भ मे
एक बार फिर, जाने कितने और, पापी नहा गये ?????
xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
आज देश रोता है !
घी में गाय की चर्बी,
दूध में यूरिया,
अनाज में कंकड़,
मसालों में बुरादा,
सब्जी में रसायन,
दालो पर रंग !
और तो और,
जिसकी सर-जमीं पर,
सरकार ही मिलावटी है,
तो अब रोओ-हंसो,
जीना इन्ही संग !!
मिलावट और बनावटीपन
का युग है
अपने चरम पर पहुंचा
कलयुग है
आज सराफत की पट्टी
अल्कैदा लिए है !
उसे रोना ही होगा
अपनी किस्मत पर,
क्योंकि आजादी के बाद
उसकी माटी ने,
इंसान ही सारे मिलावटी
पैदा किये है !!
दुविधा मे पडे है सबके सब, धुरन्दर और अनाडी,
सोच रहे इस महापर्व मे वो, परमपरागत मतदाता,
खुदा जाने उन पर कौन सा जुल्म, ढा गये होंगे !
पता नही कितने नेता, जो कल तक केन्द्र मे थे,
आज फिर से अचानक, हाशिए पर आ गये होंगे !!
सड्को पर फिर एक बार, खूब रोई आचारसंहिता,
सभी ग्रन्थ असहाय दिखे, क्या कुरान, क्या गीता,
सार्वजनिक मंचो पर अभद्रता ने, खूब जल्वे विखेरे,
विकास स्तब्ध, जाति-धर्म, ऊंच-नीच ही छा गये !
दिल्ली के संगम घाट पर, लोकतन्त्र के महाकुम्भ मे
एक बार फिर, जाने कितने और, पापी नहा गये ?????
xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
आज देश रोता है !
घी में गाय की चर्बी,
दूध में यूरिया,
अनाज में कंकड़,
मसालों में बुरादा,
सब्जी में रसायन,
दालो पर रंग !
और तो और,
जिसकी सर-जमीं पर,
सरकार ही मिलावटी है,
तो अब रोओ-हंसो,
जीना इन्ही संग !!
मिलावट और बनावटीपन
का युग है
अपने चरम पर पहुंचा
कलयुग है
आज सराफत की पट्टी
अल्कैदा लिए है !
उसे रोना ही होगा
अपनी किस्मत पर,
क्योंकि आजादी के बाद
उसकी माटी ने,
इंसान ही सारे मिलावटी
पैदा किये है !!
Friday, May 8, 2009
दृड़ संदेश
देश में राजनीति के अखाडे का,
महा कुम्भ खत्म हुआ समझो,
मगर अब ध्यान से सुनलें,
जिन्हे जिताया है वो,
सनद रहे कि सबका है,
तुम्हारे ही बाप का नही यह देश,
और इसे धमकी न समझना,
समझो मतदाता का दृड़ सन्देश,
इसलिये चाबी सौंपी है तुम्हे,
कि चलाना राज जरा देखभाल के,
वरना अबके जूता मैने भी रख दिया
एक,तरतीब से संभाल के !
अब तक के सब नाकाम रहे,
किन्तु मेरा वाला न चूकेगा,
तुम्हारे सिर पर वार करेगा,
और मुह पर थूकेगा,
फर्ज के प्रति जबाबदेह बनोगे,
काम मे पारदर्शिता लावोगे,
देश खुशहाल गर बनेगा,
तभी खुद को खुशहाल पावोगे
मत बनाना मोहरा जनता को,
अपनी किसी शतरंज की चाल के,
वरना अबके जूता मैने भी रख दिया
एक,तरतीब से संभाल के !
महा कुम्भ खत्म हुआ समझो,
मगर अब ध्यान से सुनलें,
जिन्हे जिताया है वो,
सनद रहे कि सबका है,
तुम्हारे ही बाप का नही यह देश,
और इसे धमकी न समझना,
समझो मतदाता का दृड़ सन्देश,
इसलिये चाबी सौंपी है तुम्हे,
कि चलाना राज जरा देखभाल के,
वरना अबके जूता मैने भी रख दिया
एक,तरतीब से संभाल के !
अब तक के सब नाकाम रहे,
किन्तु मेरा वाला न चूकेगा,
तुम्हारे सिर पर वार करेगा,
और मुह पर थूकेगा,
फर्ज के प्रति जबाबदेह बनोगे,
काम मे पारदर्शिता लावोगे,
देश खुशहाल गर बनेगा,
तभी खुद को खुशहाल पावोगे
मत बनाना मोहरा जनता को,
अपनी किसी शतरंज की चाल के,
वरना अबके जूता मैने भी रख दिया
एक,तरतीब से संभाल के !
Wednesday, May 6, 2009
महिमा-मंडन,जूते बनाने वाले का !
हो तेरा भला रहे तू हट्टा-कठ्ठा
साख पर कभी न लगे तेरी बट्टा,
सरेआम न कोई तेरी पगडी उछाले
क्या अदभुत अस्त्र है बनाया तूने ,
शाबाश रे जूता बनाने वाले !
डराते थे,जो कल तक बड़े-बड़े शस्त्र से
डरते है वो भी आज इस अमेध अस्त्र से
इन्द्रचक्र,सौरचक्र सभी फीके कर डाले,
क्या अदभुत अस्त्र है बनाया तूने ,
शाबाश रे जूता बनाने वाले !
नेता अब जूते से डरने लगे,
रहते है सब कुम्भकरण जगे-जगे,
पत्रकार सम्मलेन में भी पड़ गए लाले,
क्या अदभुत अस्त्र है बनाया तूने ,
शाबाश रे जूता बनाने वाले !
प्रत्याशी के हाथ में चुनाव का पर्चा है
हर जुबां पर तुम्हारी ही चर्चा है,
फूल वालो की दूकान पर पड़ गए ताले,
क्या अदभुत अस्त्र है बनाया तूने ,
शाबाश रे जूता बनाने वाले !
साख पर कभी न लगे तेरी बट्टा,
सरेआम न कोई तेरी पगडी उछाले
क्या अदभुत अस्त्र है बनाया तूने ,
शाबाश रे जूता बनाने वाले !
डराते थे,जो कल तक बड़े-बड़े शस्त्र से
डरते है वो भी आज इस अमेध अस्त्र से
इन्द्रचक्र,सौरचक्र सभी फीके कर डाले,
क्या अदभुत अस्त्र है बनाया तूने ,
शाबाश रे जूता बनाने वाले !
नेता अब जूते से डरने लगे,
रहते है सब कुम्भकरण जगे-जगे,
पत्रकार सम्मलेन में भी पड़ गए लाले,
क्या अदभुत अस्त्र है बनाया तूने ,
शाबाश रे जूता बनाने वाले !
प्रत्याशी के हाथ में चुनाव का पर्चा है
हर जुबां पर तुम्हारी ही चर्चा है,
फूल वालो की दूकान पर पड़ गए ताले,
क्या अदभुत अस्त्र है बनाया तूने ,
शाबाश रे जूता बनाने वाले !
Tuesday, May 5, 2009
कलयुगी गुरु-शिष्य संवाद
हे गुरुजी, मुझ दास की,
विनय बस इतनी सुन लीजिये’
बात बडी गम्भीर है,
कृपया कान इधर कीजिये !
शाम को पढू,सुबह को चौपट,
याददास्त कमजोर क्यो?
आजीविका की लाईन मे ,
प्रतियोगिता का शोर क्यो ?
यह मुझे भी मालूम है गुरु,
कि यह पृथ्वी सारी गोल है
गोल है खोपडी मगर गुरु,
पास-लिस्ट से नम्बर क्यो गोल है?
गुरुजी ने कुर्सी खिसकाई,
खडे हुए,कान ऎठकर कहा बेटा !
जवानी भर मस्ती मारी,
फिल्म देखी,आराम से रहा लेटा
बिन तेरे फिल्म न देखने से,
मल्लिका शेरावत ,पिट तो न जाती,
अब अपना नम्बर गोल बताते हुए,
तुझे शर्म नही आती ?
अरे शर्म तो हमे आती है,
क्योंकि हम है तेरे गुरु,
अब पढाई के ख्वाब छोड,
कोई अवैध धन्धा कर शुरू,
बाहर दिखावे को देशी वस्तुवें,
अन्दर तस्करी का माल रखना
जरुरत पर कभी-कभार अपने,
इस गरीब गुरु का भी ख्याल रखना !!
विनय बस इतनी सुन लीजिये’
बात बडी गम्भीर है,
कृपया कान इधर कीजिये !
शाम को पढू,सुबह को चौपट,
याददास्त कमजोर क्यो?
आजीविका की लाईन मे ,
प्रतियोगिता का शोर क्यो ?
यह मुझे भी मालूम है गुरु,
कि यह पृथ्वी सारी गोल है
गोल है खोपडी मगर गुरु,
पास-लिस्ट से नम्बर क्यो गोल है?
गुरुजी ने कुर्सी खिसकाई,
खडे हुए,कान ऎठकर कहा बेटा !
जवानी भर मस्ती मारी,
फिल्म देखी,आराम से रहा लेटा
बिन तेरे फिल्म न देखने से,
मल्लिका शेरावत ,पिट तो न जाती,
अब अपना नम्बर गोल बताते हुए,
तुझे शर्म नही आती ?
अरे शर्म तो हमे आती है,
क्योंकि हम है तेरे गुरु,
अब पढाई के ख्वाब छोड,
कोई अवैध धन्धा कर शुरू,
बाहर दिखावे को देशी वस्तुवें,
अन्दर तस्करी का माल रखना
जरुरत पर कभी-कभार अपने,
इस गरीब गुरु का भी ख्याल रखना !!
Sunday, May 3, 2009
बिहार में प्रलय !
लल्लु भैया कहते है कि अबकी बारी वह
चुनाव हारे तो बिहार मे प्रलय आ जायेगा,
अरे बिहारियों,लल्लू को वोट देना वरना
सारण,पाट्लीपुत्र मे लालटेन कहर ढा जायेगा !
अब तनिक हम कहत है लल्लु भैया से, कि अरे
लल्लु भाई !तुम क्या बिहार मे कहर ढावोगे ?
बिहार की छोडो, अब अपनी फिक्र करो, कि
चुनाव के बाद, तुम किस रेल डब्बे मे जावोगे ?
तुम्हे तो मालूम ही होगा कि बिहार मे प्रलय
करीब, बीस साल पहले ही आ गई थी,
जब बछडे लगे थे,राशन की लंबी लाईन मे,
और दूध, सारा का सारा, रबडी खा गई थी !
हे भाई-(चारे)की कथा अब पुरानी हो गई,
कहानी मे कब कौन्हु नया ट्विस्ट लावोगे ?
बिहार की छोडो, अब अपनी फिक्र करो, कि
चुनाव के बाद, तुम किस रेल डब्बे मे जावोगे ?
-गोदियाल
चुनाव हारे तो बिहार मे प्रलय आ जायेगा,
अरे बिहारियों,लल्लू को वोट देना वरना
सारण,पाट्लीपुत्र मे लालटेन कहर ढा जायेगा !
अब तनिक हम कहत है लल्लु भैया से, कि अरे
लल्लु भाई !तुम क्या बिहार मे कहर ढावोगे ?
बिहार की छोडो, अब अपनी फिक्र करो, कि
चुनाव के बाद, तुम किस रेल डब्बे मे जावोगे ?
तुम्हे तो मालूम ही होगा कि बिहार मे प्रलय
करीब, बीस साल पहले ही आ गई थी,
जब बछडे लगे थे,राशन की लंबी लाईन मे,
और दूध, सारा का सारा, रबडी खा गई थी !
हे भाई-(चारे)की कथा अब पुरानी हो गई,
कहानी मे कब कौन्हु नया ट्विस्ट लावोगे ?
बिहार की छोडो, अब अपनी फिक्र करो, कि
चुनाव के बाद, तुम किस रेल डब्बे मे जावोगे ?
-गोदियाल
Saturday, May 2, 2009
असमंज !
जली फिर से है दिल मे इक लौ नई
रिश्ता नया जोड़ा है इस आग ने,
बडी कशमकश मे हूँ इस बात की,
धुंआ रोशनी ने छोडा या चिराग ने ?
हैं कौन सी अजब ये उलझने,
सब्ज ये नया जोड़ा है इस बाग ने ,
बडी कशमकश मे हूं इस बात की,
धुंआ रोशनी ने छोडा या चिराग ने ?
है कौन सी राह दिखा रही रोशनी
सततता को तोडा है, किस राग ने,
बडी कशमकश मे हूं इस बात की,
धुंआ रोशनी ने छोडा या चिराग ने ?
इठ्लाने लगा फिर वह चाल-चलन
जिसे राह से मोडा है इक दाग ने,
बडी कशमकश मे हूं इस बात की,
धुंआ रोशनी ने छोडा या चिराग ने ?
क्यो किये है विचलित इस तरह
रिश्ता क्यो जोडा है इस भाग ने?
बडी कशमकश मे हूं इस बात की,
धुंआ रोशनी ने छोडा या चिराग ने ?
रिश्ता नया जोड़ा है इस आग ने,
बडी कशमकश मे हूँ इस बात की,
धुंआ रोशनी ने छोडा या चिराग ने ?
हैं कौन सी अजब ये उलझने,
सब्ज ये नया जोड़ा है इस बाग ने ,
बडी कशमकश मे हूं इस बात की,
धुंआ रोशनी ने छोडा या चिराग ने ?
है कौन सी राह दिखा रही रोशनी
सततता को तोडा है, किस राग ने,
बडी कशमकश मे हूं इस बात की,
धुंआ रोशनी ने छोडा या चिराग ने ?
इठ्लाने लगा फिर वह चाल-चलन
जिसे राह से मोडा है इक दाग ने,
बडी कशमकश मे हूं इस बात की,
धुंआ रोशनी ने छोडा या चिराग ने ?
क्यो किये है विचलित इस तरह
रिश्ता क्यो जोडा है इस भाग ने?
बडी कशमकश मे हूं इस बात की,
धुंआ रोशनी ने छोडा या चिराग ने ?
Tuesday, April 28, 2009
पुनरावृत्ति !
एक सुनहले दिन ढले,
दो उभरती शामे
अपने एक सुखद,
पहले मिलन की
रजत जयंती पर !
बैठ फुरसत के,
चंद लम्हों तले,
शांत किसी समुद्र के
सुनशान 'बीच' पर !!
करते हुए,
कुछ अनबुझे सवाल
लगी कहने, प्रिये !
कालचक्र के साथ-साथ,
हर एक दिन ढल जाता है !
चाहे वह,
चाँद की चांदनी हो,
या हो सूरज की आग
सब शिथिल पड़ जाता है !!
अब तुम्हे नहीं लगता कि,
न जमीं तपती है,
न आस्मां बरसता है !
नील गगन की छांव तले,
सुदूर क्षितिज पर,
दिल फिर से,
मिलन को तरसता है !!
ऐसा क्यों होता है प्रिये,
क्या पुनरावृत्ति संभव नहीं ?
दो उभरती शामे
अपने एक सुखद,
पहले मिलन की
रजत जयंती पर !
बैठ फुरसत के,
चंद लम्हों तले,
शांत किसी समुद्र के
सुनशान 'बीच' पर !!
करते हुए,
कुछ अनबुझे सवाल
लगी कहने, प्रिये !
कालचक्र के साथ-साथ,
हर एक दिन ढल जाता है !
चाहे वह,
चाँद की चांदनी हो,
या हो सूरज की आग
सब शिथिल पड़ जाता है !!
अब तुम्हे नहीं लगता कि,
न जमीं तपती है,
न आस्मां बरसता है !
नील गगन की छांव तले,
सुदूर क्षितिज पर,
दिल फिर से,
मिलन को तरसता है !!
ऐसा क्यों होता है प्रिये,
क्या पुनरावृत्ति संभव नहीं ?
Saturday, April 25, 2009
मै अपने गांव गया था !

हिमछादित उपत्यकाओं
के मध्य,
जीवन दायिनी
मां गंगा के पावन तट पर,
सप्तरंग समेटे खडा,
हिमालय लिये
उदर मे सतसरोबर,
कई वर्षो बाद,
भीड भरे इस
शहर से निकलकर,
जा पहुचा सीधे,
अपने उस लाटा गांव मे !
खुशनुमा गर्मी के मौसम मे,
लाटा-लाटा सा हुआ
हर तरफ़ समा था,
छुट्टियां बिताने पहुंचा
मेरे जैसे कई लाटो का
गांवभर मे हुजूम जमा था,
दिल खुश था देखकर
वो छोटे-छोटे पौधे,
जिन्हे कभी छोड आया था
मै अकेला आते शहर,
लम्बे-लम्बे दरख्त बन चुके थे
रहकर उन चन्द,
बुजुर्ग तरुवो की छांव मे !
किसी ने उन्हें इन शहरी
पौधों की तरह,
कभी फवारे से पानी
न सींचा, और न
मदरडेरी की खाद खिलाई
जितने दिन मै वहा रुका,
देखकर उनका वो अल्हड्पन,
वो बेफ़िक्री की जिन्दगी
याद मुझे बहुत आया
अपना भी बचपन,
यही सोचता रहा
कि पेट के खातिर,
इन्सान जाने क्यो
डाल देता है खुद ही
बेडियां अपने पांव मे !
Monday, April 13, 2009
नया शौक !
पाक-साफ़ रह कर भी हमको क्या मिला
मिला क्या पाले लाजो-शर्म जमाने का,
अब तो तमन्ना लिए फिरते है ऐ-गाफिल
दाग कोई अपने दामन पर लगाने का !
यूँ तो हर इक मंजिल-मुकाम पर अब भी
प्रयास बदस्तूर कायम है हमें सताने का
तोड़ डाल सारे रस्मो रिवाज के बंधन
ये आगाज हुआ फिर किसी अफ़साने का !
कभी दिल में इक ख्वाब था संजोया हमने
भाग्य को अपने संवार कर दिखाने का
पर अब सर्द हवाओं ने रुख बदल लिया
भूल कर जैसे पता कहीं अपने ठिकाने का !
आफताब करने दिल का जर्रा-जर्रा, हमने
रुख कर लिया साक़ी शब-ए-महखाने का
पड़ जाए कुर्ते पे जरा लाल-लाल छींटे
पाला है शौक नया हमने पान चबाने का !
मिला क्या पाले लाजो-शर्म जमाने का,
अब तो तमन्ना लिए फिरते है ऐ-गाफिल
दाग कोई अपने दामन पर लगाने का !
यूँ तो हर इक मंजिल-मुकाम पर अब भी
प्रयास बदस्तूर कायम है हमें सताने का
तोड़ डाल सारे रस्मो रिवाज के बंधन
ये आगाज हुआ फिर किसी अफ़साने का !
कभी दिल में इक ख्वाब था संजोया हमने
भाग्य को अपने संवार कर दिखाने का
पर अब सर्द हवाओं ने रुख बदल लिया
भूल कर जैसे पता कहीं अपने ठिकाने का !
आफताब करने दिल का जर्रा-जर्रा, हमने
रुख कर लिया साक़ी शब-ए-महखाने का
पड़ जाए कुर्ते पे जरा लाल-लाल छींटे
पाला है शौक नया हमने पान चबाने का !
Sunday, April 12, 2009
आदर्श नागरिक बने !
कद पांच फुट आठ इंच, रंग सावला और चेहरा गोल
मुख मुद्रा ऐसी मानो, मुंह से अभी फूट पडेंगे बोल,
उम्र पचास, सफ़ेद लिबास उसके बदन पर खूब भाता है
शक्ल से वह किसी अच्छे ब्रांड का चोर नजर आता है !
पांच वर्ष हुए,करबद्ध होकर मेरी गली मे आया था
वादो का एक बडा पुलिंदा,संग अपने वह लाया था
मांगता फिरता था विनम्र होकर वह लोगो से वोट
अपने विरोधी पर करता था वादाखिलापी की चोट
अबके नही आया,गत जुलाई मे ऊंचे दाम बिका जो
वादा निभाना तो दूर, पांच साल से नही दिखा वो
कोई जानकारी, सुराग मिले इस गुमशुदा के बारे मे
सूचित करने का कष्ट करे, आकर जनता दरवारे मे
राजनीति के गटर मे,एक लावारिश शव पड़ा मिला है
सफ़ेद कफ़न मे लिपटा, कई दिनो का सडा-गला है
भ्रष्टाचार के धागे से किसी ने उसकी जुबान सिली है
जेब से फटी-पुरानी एक आचार संहिता भी मिली है
इस सन्दर्भ मे कहीं एक प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज है
इन्सान होने के नाते, पहचान करना आपका फर्ज है
कोई जानकारी, सुराग मिले गर दिवंगत के बारे मे
सूचित करने का कष्ट करे जनता जनार्धन के द्वारे मे
- धन्यवाद !
मुख मुद्रा ऐसी मानो, मुंह से अभी फूट पडेंगे बोल,
उम्र पचास, सफ़ेद लिबास उसके बदन पर खूब भाता है
शक्ल से वह किसी अच्छे ब्रांड का चोर नजर आता है !
पांच वर्ष हुए,करबद्ध होकर मेरी गली मे आया था
वादो का एक बडा पुलिंदा,संग अपने वह लाया था
मांगता फिरता था विनम्र होकर वह लोगो से वोट
अपने विरोधी पर करता था वादाखिलापी की चोट
अबके नही आया,गत जुलाई मे ऊंचे दाम बिका जो
वादा निभाना तो दूर, पांच साल से नही दिखा वो
कोई जानकारी, सुराग मिले इस गुमशुदा के बारे मे
सूचित करने का कष्ट करे, आकर जनता दरवारे मे
राजनीति के गटर मे,एक लावारिश शव पड़ा मिला है
सफ़ेद कफ़न मे लिपटा, कई दिनो का सडा-गला है
भ्रष्टाचार के धागे से किसी ने उसकी जुबान सिली है
जेब से फटी-पुरानी एक आचार संहिता भी मिली है
इस सन्दर्भ मे कहीं एक प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज है
इन्सान होने के नाते, पहचान करना आपका फर्ज है
कोई जानकारी, सुराग मिले गर दिवंगत के बारे मे
सूचित करने का कष्ट करे जनता जनार्धन के द्वारे मे
- धन्यवाद !
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