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Saturday, April 4, 2009

अधूरी तलाश !

पाने को चंद खुशियों भरे पल ,
वह कहां कहां नही भागा है
लोग दिन को शकुं से सोते है,
वह काली रात को जागा है

यूं तो हर एक रात हमे ,
चैन की नीद सुलाने आती है
कुछ सो जाते है अपनो संग,
कुछ को तन्हाई सुलाती है

कहानी तन्हाई के तड्पन की,
जब भोर सुहानी लाती है
सोई थी जिस विस्तर पर वह,
हर सलवट कह जाती हैं

सिरहाना दे न सका बाहो का
उसे,वह ऐसा एक अभागा है
पाने को चंद खुशियों भरे पल ,
वह कहां कहां नही भागा है

तोड के उस निर्मम बेडी को,
पडी जो अनजाने ही पांव मे
बनकर पतंग उड जाना चाहे,
वह कंही दूर गगन की छांव मे

पर सफ़र के आधे रस्ते मे ही,
जो टूट गया वो वह धागा है
पाने को चंद खुशियों भरे पल ,
वह कहां कहां नही भागा है

Friday, April 3, 2009

किस्सा चतुर पंडित का !

यह कविता नहीं, एक चतुर पंडित का है किस्सा
ज्योतिषी में प्रवीण, मगर पडोसियों से थी उन्हें ईर्ष्या

एक बार बड़ा यज्ञं लिया, कुंतलो जौ-तिल फूके
निश-दिन शिव अराधना में, महीनो तक रहे भूखे

शिवजी प्रसन्न हुए और एक घंटी दी उन्हें वरदान
कहा जो इच्छा हो, घंटी बजाना, करना मेरा ध्यान

मनवांछित फल मिलेगा आवश्यकता पर तुमको
ध्यान रहे , तुम्हे एक मिलेगा तो पडोसियों को दो

मुझे एक पडोसियों को दो! मन में ईर्ष्या घिर आई
घर में खाने को न था कुछ, पर घंटी नहीं बजाई

पंडीताईंन ने घंटी आजमाई, जब पंडित न था घर में
जो कुछ माँगा शिवजी से, मिल गया उसे पल भर में

इधर अनाज की एक ढेर लगी, पडोसियों की दो
झोपडी बदल गयी महल में, और पडोसियों के दो

पंडित जी जब घर लौटे, गाँव बदला-बदला पाया
कैसे हुआ यह चमत्कार, तुंरत समझ में आया

ईर्ष्या के मारे रात भर सोच में पड़े रहे,नींद नहीं आई
सुबह सबेरे जब खड़े हुए,एक तरकीब समझ में आई

नहा-धोकर,बड़े जोर से बजा घंटी,किया शिव का ध्यान
भगवन ! मेरी एक आँख फूट जाए, माँगा यह वरदान

पंडित की इस चतुर-मक्कारी पर पडोसी सब दिए रो
पंडित की तो एक आँख ही फूटी, पडोसियों की दो

पंडीताईंन फूली न समाई, पंडित की इस चतुराई पर
पडोसियों की सारी धन-दौलत बटोर लायी अपने घर

इसके बाद तो पंडित का सीना मानो गर्व से तन गया !
कुछ समय बाद चुनाव हुए और पंडत नेता बन गया !!
-गोदियाल

Wednesday, April 1, 2009

ऎ गम-ए-जिन्दगी !

न मुझको अब और सता,
तु कम से कम यह तो बता
ऎ गम-ए-जिन्दगी !
दिया किसने तुझे मेरे घर का पता ?

वो अवश्य मेरा कहने को कोई,
अपना ही रहा होगा
भला गैरो को क्या जुर्रत
और कहां इतनी फुर्सत
सीधे से नाम बता दे उसका
अब और न हमदर्दी जता
ऎ गम-ए-जिन्दगी !
दिया किसने तुझे मेरे घर का पता?

बे हया ! तू भी सीधी चली आयी,
बिन बुलाये मेहमान की तरह पर,
मेरी बेबसी का तनिक तो
ख्याल कर लिया होता
माना कि है नही कोई दरवाजा,
जिसे बंद रख पाता
तुझे धक्के दे निकाल न पाया,
तो थी इसमे मेरी क्या खता ?
ऎ गम-ए-जिन्दगी !
दिया किसने तुझे मेरे घर का पता ?

मत छेड़ दूखती रग को ?

मत पूछ ऎ दोस्त, किस तरह जीते है,
शराब छोड दी, अब अश्क ही पीते है,
खुशी बांट्ते अकेले, रोते भी अकेले है
6”x8”की पलंग पर सोते भी अकेले है
हर दिन महिने साल किस तरह बीते है
मत पूछ मेरे दोस्त, किस तरह जीते है
पीने को इक याद दिल मे संजो लाये थे
और इक याद कहीं दिल मे छोड आये थे
कभी सोचा पीने मे क्या रखा,खूब जियो,
कभी सोचा जीने मे क्या रखा,खूब पियो,
न जी पाये,न पी पाये,हाथ रीते थे रीते है
मत पूछ ऎ दोस्त, किस तरह जीते है,

अभिशाप !

वो जमाना गया जब स्वर्गीय मुकेश ने गाया था " सदा खुश रहे तू .... इस मंदी के ज़माने में यह मुमकिन नहीं अतः;

बेबफ़ा ! तेरा भी जिगर जले, मेरे जिगर की तरह
खुदा करे, तेरा भी घर उजडे, मेरे इस घर की तरह
जलन के मारे सुबह से शाम तक तू भी करे हाय-हाय
डाइजीन बेअसर, तेरा भी सर घूमे मेरे सर की तरह
थी शायद मुझसे तेरी कोई पिछ्ले जन्म की दुश्मनायी
भला बेवजह कोई करे बैर क्यो, जल मे मगर की तरह
इस जिन्दगी की लहरो को तूने किनारे पे फेंक डाला
मझधार मे डूबे तेरी भी नैंया, किसी भंवर की तरह
गिरा न पाये है दो आंशू भी मायूस मेरे ये दो नयन
बहती रहे तेरी आंखे हर वक्त किसी नहर की तरह
कफ़न मे लिपटे तेरा वो पूरा का पूरा मन्हूस शहर
ज्यो उदासी के कोहरे मे लिपटे मेरे शहर की तरह

Tuesday, March 31, 2009

मेरा मुल्क !

जालिमो ने मेरे इस मुल्क मे,
ये कौन से नये भंवर डाले है ?
गिर गया हर इंसान इतना कि
कंही हवाला है,तो कंही घोटाले है !

किस ओर जा रहे है हम सब ?
है हमारी ये कौन सी नई पह्चान?
हो गयी धन से मुह्ब्बत इतनी कि
हमने ईमान-धर्म सब बेच डाले है !

देश रक्षा की कस्मे खाते-खाते
पूरी तोप ही खा डाली हमने,
कुछ ने तो पशु-चारा भी नही छोडा
ये कसाई है या ग्वाले है ?


डाकुवो के हाथ मे है बाग्डोर
बाल्मिकि बन गये सारे के सारे चोर
खाद,वर्दी,अनाज सब खा चुके, अब
न जाने कौन सी रामायण लिखने वाले है

कहा ले जायेगी हमे इनकी ये सडक?
है कौन सा गोदाम जहां घुसते नही ये बेधडक
अब तो कानून भी इनका, पुलिस भी इनकी
मजबूर चाबियां है, लाचार ताले है

:-यह कविता मैंने बहुत पहले ०९ जून १९९६ को लिखी थी:



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ऎ खुदा! जो तुम्हे मंजूर, वो हमे मंजूर,
नैंया दोनो की है मजधार मे,
तुम भी मजबूर, हम भी मजबूर
क्या करे, किसे दोष दे, और देकर फायदा?
सब तकदीर के खेल है जहां वाले,
न तेरा कसूर, न मेरा कसूर !!

Monday, March 30, 2009

जिन्दगी, तु किस मोड पे ले आयी है !

किसी की बद्दुआ कहु इसे या फिर
अपनी किस्मत के सित्तम,
न जाने क्यों खुशियो के काफ़िले
बचकर मेरे घर से निकलते है!
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ऎ जिंदगी,यह तु किस मोड पे ले आयी है
आगे कुंआ,पीछे अतीत के जख्मो की खाई है
ऎ जिंदगी,यह तु किस मोड पे ले आयी है


जीना हमने भी चाहा तुझे,अपने ही ढंग से
रंगना हमने चाहा तुझे, मनचाहे रंग से,
पर जाने किस्मत कौन सा, बदरंग लायी है
ऎ जिंदगी,यह तु किस मोड पे ले आयी है


वो अल्हड बचपन, वो बेफिक्री के दिन-रैन
फूहड सी हंसी,भाव-निर्दोष चेहरा,चंचल नैन
गुमशुदगी पे इनकी रोने के, तु मुस्कुरायी है
ऎ जिंदगी,यह तु किस मोड पे ले आयी है


न जाने क्या-क्या जुल्मो-सित्तम हम पर हुए
खुसी मिलना तो दूर, बस गम ही गम सहे
इसे मजबूरी समझु कि ये तेरी बेबफ़ाई है
ऎ जिंदगी,यह तु किस मोड पे ले आयी है


करु भी अब और मै कोई शिकवा किससे
खौफ़जदा सा लगता यहा हर कोई मुझसे
डरने लगी अब मुझसे खुद की परछाई है
ऎ जिंदगी,यह तु किस मोड पे ले आयी है


आखों में हसरत है, ख्वाब मे अन्धेरे है
अजीब इक कशमकश हरपल मुझे घेरे है
भीड है कयामत की,पर दिल मे तन्हाई है
ऎ जिंदगी,यह तु किस मोड पे ले आयी है

-गोदियाल

Wednesday, March 25, 2009

हाँ, इनकी जय हो !

इन्होने ऊँच-नीच के अहसास को,
पिछले बासठ सालो से,
हर हिन्दुस्तानी के दिल में,
आरक्षण से जगाये रखा,
इसलिए इनकी जय हो !

इन्होने जाति-धर्म,क्षेत्र के हास को
पिछले बासठ सालो से,
छद्म-निरपेक्षता के अंगारों पर,
समाज में सुलगाये रखा,
इसलिए इनकी जय हो !

इन्होने गरीबी के उपहास को
पिछले बासठ सालो से,
अमीरो की जुबान में ,
तरतीब से सजाये रखा,
इसलिए इनकी जय हो !

इन्होने गुलामी के दास को
पिछले बासठ सालो से,
हर छोटे-बड़े नेता के घर में
दामाद बना के बिठाये रखा,
इसलिए इनकी जय हो !

इन्होने नेतावो के भोग-विलास को
पिछले बासठ सालो से,
चंदे और दलाली की विसात पर
बार और कोठो में पनपाये रखा,
इसलिए इनकी जय हो !

Friday, March 20, 2009

अल्लाह मेघ दे !

हे खुदा!
कर मुझी पे रहम इतना,
कि मेरी तकदीर,
वक्त-वेवक्त मुझसे,
हर इक बात पर मेरी रजा पूछे.
कि मेरी जिंदगी, मेरे हर गीत को,
वो नए अल्फाज़ दे
होकर मेहरबां, इस गले पर मेरे,
मुझे वो बुलंद आवाज दे
कि मंच पर माईक पकड़ क्षणिक,
मैं भी भौंक सकू !
व आँखों में किसी के धूल तनिक,
मैं भी झोंक सकू !!


मेरे निश्छल ने मुझे बेवकूफ, नालायक,
और न जाने क्या-क्या,
बचपन से ही कई उपनाम सुनाये,
दुनिया के मुख से,
उठते तूफां में हूँ इक 'दिया',
मेरे हौंसले को परवाज दे
हे खुदा ! मुझे भी छलने का कोई,
बढ़िया सा अंदाज दे
ताकि पाकर जनादेश जीत का पथिक,
मैं भी चौंक सकू!
व आँखों में किसी के धूल तनिक,
मैं भी झोंक सकू !!


फिर भर जाए तिजोरी मेरी,
लूट,खसौट और चंदे से,
रहम की भीख मांगे लोग,
आ-आकर इस बन्दे से
हे खुदा! अपार उस कुबेर के खजाने का,
मुझे वो राज दे
सालो उतरे न जो माथे से,
चमचमाता वो ताज दे
नोट अपने हाथो किसी को सार्वजनिक,
मैं भी सौंप सकू !
व आँखों में किसी के धूल तनिक,
मैं भी झोंक सकू !!
-गोदियाल


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बेबफाई पे अपनी, जब कभी
तुम देने लगो सफाई
तो करना बातें कुछ ऐसी निराली
कि अंदाज पे तुम्हारे मैं भी चौंक सकू !
तलाश यूँ तो हमको भी है ,
उन कुछ अदद आँखों की,
जिनमे कुछ पल को ही सही,
मगर चुटकी भर धूल, मैं भी झोंक सकू !!

Tuesday, March 17, 2009

अंधेरे का डर सताता है !

चेहरे पर भोर के उजाले के,
जो आया था परास्त कर
लम्बी,काली रात को अकेले ही,
अजीब सा इक खौफ,
अब साफ़ नजर आता है,
क्योंकि दिल के किसी कोने मे,
उसे भी अंजान किसी,
अन्धेरे का डर सताता है !

सूरज की एक किरण,
समेटे लिये ढेर सारी,
रोशनी अपने आँचल मे
दूर गगन से चली आती थी,
चिनार की पाती पर गिरी,
एक अकेली विरहन सी,
ओंस की बूंद को गले लगाने,
उसे अब वीरान वो मंज़र,
यहाँ नजर आता है !
क्योंकि दिल के किसी कोने मे,
उसे भी अंजान किसी,
अन्धेरे का डर सताता है !


तुफ़ान जो आतुर रहता था,
कभी औरो पर
कहर बरपाने को,
गरज कर जो था निकलता,
उन मंचली आंधियों के संग-संग,
किसी अशान्त समन्दर से,
वादियो की ओर
खफ़ा होकर,
बढती हवाओ बेवफ़ाई से
कभी-कभी,खुद के ही घर को,
तवाह कर जाता है !
क्योंकि दिल के किसी कोने मे,
उसे भी अंजान किसी,
अन्धेरे का डर सताता है !

कही दूर जंगल का,
कोई दकियानुसी ख्वाब,
चला था कही पहुंचकर ,
काल को सुधारने,
मगर नादान को,
नही था यह मालूम कि
सुदृड़ आधुनिक,
विज्ञान के धरातल पर फैली
कौशल की चिकनी राहो पर,
प्रगति के रंग मे सरागोश ,
वक्त कहा ठहर पाता है !
क्योंकि दिल के किसी कोने मे,
उसे भी अंजान किसी,
अन्धेरे का डर सताता है !

जिसे देख रहे है,
हम-तुम अचरज से ,
और जो आज सामने है,
हम सब के है वह
शायद, कलयुग का अपना
एक चरम बताता है,
पाप-पुण्य के
सागर के इस मन्थन मे,
असुर उठा रहा आज,
हर लुफ़्त अमृत का
और सुर थक-हारकर,
मजबूरन जहर खाता है !
क्योंकि दिल के किसी कोने मे,
उसे भी अंजान किसी,
अन्धेरे का डर सताता है !

Tuesday, March 3, 2009

कविता- आया फिर से चुनाव है !

गाँव-गाँव, शहर-शहर, हर कूचा और गली-गली,
लूचे-लफंगे,चोर-उचक्के, छोटे बड़े सभी बाहुबली!

आज अपनी मुछो पर हर कोई, दे रहा ताव है
क्यूंकि इस देश में यारो,आया फिर से चुनाव है !

आया चुनाव है, नेतागण फिर हो रहे विनम्र है,
इस महाकुम्भ में स्नान को कस रहे कमर है!

अपने किये पापो को धोने, गंगा में लगा रहे गोते,
शेर की खाल पहन, फिर गलियों में घूम रहे खोते!

मुख में इनके फिर सत्यवचन, माथे पर चन्दन है,
नए-पुराने इनके फिर, बन-बिगड़ रहे गठबंधन है!

इधर लोकतंत्र के महाकुम्भ का, गूंज रहा शंखनाद है
उधर चारो तरफ हमारे, फल-फूल रहा आतंकवाद है!

नापुंसको ने भी खूब उड़ाया, इस लोकतंत्र का मखौल,
अब इनकी शक्ले देख जनता का, खून रहा है खौल !

महंगाई और बेरोजगारी का दिलो पर ताजा घाव है,
लोकतंत्र के महापर्व का अब फिर से आया चुनाव है !

-गोदियाल

Thursday, February 5, 2009

वेलेंटाईन डे की सुनहरी यादे !

प्यार जताने की चाह
जब हमारे दिल में आई,
हमने जोर की ली अंगड़ाई ,
क्रान्तिकारी योजना बनाई,
अगले ही वेलेंटाईन-डे पर,
भेज दिया एक बड़ा सा,
गोभी का फूल उनके घर,

 उसी शाम किसी ने फिर
मेरा दर खटखटाया था,
संदेशवाहक के मार्फत,
उनका जबाब आया था,
चंद शब्दों में लिखा था;
मधुर-सुहानी इस भोर पर, 
जरूरी सारे काम छोड़कर,
इतना तकल्लुफ  क्यों उठाया,
एसएम्एस में ही खा लेते गोते,
अगर खर्चा कर ही लिया था,
तो मूर्ख!  दो चार आलू भी
साथ में भेज दिए होते  !!

Wednesday, January 14, 2009

अनिष्ट से आशंकित एक कलि !

देश की धड़कन दिल्ली में
हुमायु की कब्र के पास,
इक  छोटे से उपवन में
बैठी थी एक कलि उदास !

कलि  कुछ पल में खिलकर,
फूल बनने के दर पर थी,
उज्जवल भविष्य की चाहते, 
ढेरों उसके मस्तिष्क पर थी !

तभी आ गया वहाँ का माली
उपवन के पौधों को पानी देने,
साथ में लिए अपनी घरवाली,
और लगा उससे यह कहने !

फलां नेता बीमार बड़ा है
बचने की उम्मीद क्षणिक है,
कबसे मृत्यु शय्या पर पड़ा है
उठ जाने की आशा  अधिक है !

फूलो की मांग अधिक होगी
या खुदा ! कल धूप खूब खिले,
धूप से कलिया पोषित होंगी
और बगिया से ढेरो फूल मिले !

सहम गई वह कलि बेचारी
माली की सुनकर यह बात,
रोती थी देख स्व-लाचारी
दुआ करे वो,  हो लम्बी रात !

मागने लगी आशीष खुदा से, प्रभु !
फिजा छादो मुझे न खिलने देना,
भ्रष्ट नेताओ  के जनाजे पर, हे हरी !
फूल  कोई न हरगिज डलने देना !!

Friday, December 26, 2008

हद-ए-झूठ !

रंगों की महफिल में
सिर्फ़ हरा रंग तीखा,
बाकी सब फीके !
सच तो खैर,इस युग में
कम ही लोग बोलते है ,
मगर झूठ बोलना तो कोई
इन पाकिस्तानियों से सीखे !!


झूठ भी ऐंसा कि एक पल को,
सच लगने लगे !
दिमाग सफाई के धंधे  में इन्होने
न जाने कितने युवा ठगे !!
गुनाहों को ढकने के लिए,
खोजते है रोज नए-नए तरीके !
सच तो खैर, इस युग में
कम ही लोग बोलते है,
मगर झूठ बोलना तो कोई
इन पाकिस्तानियों से सीखे !!


जुर्म का अपने ये
रखते नही कोई हिसाब !
भटक गए राह से अपनी,
पता नही कितने कसाब !!
पाने की चाह है उस जन्नत को
मरके, जो पा न सके जी के !
सच तो खैर, इस युग में
कम ही लोग बोलते है ,
मगर झूठ बोलना तो कोई
इन पाकिस्तानियों से सीखे !!


इस युग में सत्य का दामन,
यूँ तो छोड़ दिया सभी ने !
असत्य के बल पर उछल रहे है,
आज टुच्चे और कमीने !!
देखे तो है बड़े-बड़े झूठे,
मगर देखे न इन सरीखे !
सच तो खैर, इस युग में
कम ही लोग बोलते है ,
मगर झूठ बोलना तो कोई
इन पाकिस्तानियों से सीखे !!


दहशतगर्दी के इस खेल में
मत फंसो मिंया जरदारी !
पड़ ना जाए कंही तुम्ही पर
तुम्हारी यह करतूत भारी !
करो इस तरह कि तुम्हारी
कथनी व करनी में फर्क न दीखे !
सच तो खैर, इस युग में
कम ही लोग बोलते है,
मगर झूठ बोलना तो कोई
इन पाकिस्तानियों से सीखे !!

जिसकी लाठी उसकी भैंस !

सबल और निर्बल के मध्य,  
आज दंगल का  खेल सारा है !
बलशाली जश्न में मदहोश,
निर्बल लाचार, थका-हारा है !!

दुबले को नसीब होती  है,
लज्जा, लाचारी, कलंक, खेद !
बाहुबली  की जेब में गए,
सारे  साम, दाम, दंड, भेद !!

चाह किसे नहीं मगर दुर्बल,
वक्त और हालात का मारा है !
सबल और निर्बल के मध्य,  
 आज दंगल का खेल सारा है !!

भूमंडलीकरण के दौर में,
बेचारा स्वदेशी बह चला है!
पूंजीवाद,साम्यवाद के बीच,
बस दिखावे का फासला है !


देशी छोड़ो, विदेशी अपनावो,
यही सभ्य समाज का नारा है !
सबल और निर्बल के मध्य,  
आज दंगल का खेल सारा है !!