दर्द जुबाँ पे लाने से फायदा क्या,
अश्रुओ को पलकों में छुपाने से फायदा क्या !
अब-जब धडकने बंद हो ही गई तो,
खंजर को जिगर पर चुभाने से फायदा क्या !!
ताउम्र कोशिश बहुत की संवारने की,
पर फिर भी दिल की दुनिया सजाये न सजी !
दूर कर न पाए जो गम के अँधेरे,
अब भला ऐसे चराग जलाने से फायदा क्या !!
कान भी थक जाएँ जब सुन-सुनकर,
खाली तसल्ली, झूठी कसमें और कोरे वादों को !
सुर भटक जाएँ गजल की रियाज में,
फिर नज्म बन्दे को सुनाने से फायदा क्या !!
सिकवा किसी से कोई क्या करे,
वक्त आने पर साया भी साथ छोड़ जाता है !
ज़िन्दगी में कभी साथ तो दे न सके,
अब भला ये दूरियां मिटाने से फायदा क्या !!
तलाशा तो बहुत था मगर,
रिश्ते जाकर दूरियों में कहीं ओझल हो गए !
जिन्दगी ने हमेशा छलावे दिए,
तो नफरत दिल में बसाने से फायदा क्या !!
Friday, February 26, 2010
Thursday, February 25, 2010
दासता का दंश !

(छवि HT नेट से साभार)
Chronic hunger kills 50 in Orissa districtहर बात पर गाली सजाना, और जी हजूरी कर ताली बजाना,
लम्बी दासता की बेड़ियाँ हमको, बस दो ही गुर सिखा गई।
'माय बाप' को तो छोडिये, अब 'माय माँ' भी हावी हो रही,
'माय बाप' फूट का हल लगा गया, 'माय माँ' बीज बो रही।
भेड़ो के झुण्ड को राह,अपना अनुसरण करने की दिखा गई
लम्बी दासता की बेड़ियाँ हमको, बस दो ही गुर सिखा गई।
भौंतिक सुख के आकांक्षी, रखा न ध्यान आत्मसम्मान का,
बस तालियाँ बजा-बजाकर, गीत गा रहे उनके गुणगान का।
युग दर युग गुलाम बनकर रहना किस्मत में लिखा गई,
लम्बी दासता की बेड़ियाँ हमको, बस दो ही गुर सिखा गई।
Wednesday, February 24, 2010
भूली-बिसरी !

(छवि गुगुल से साभार)
याद तो होगी तुम्हे
वो होली,
जिस पर तुमने,
अपनी मुठ्ठी में
भींचे रखे गुलाल को हौले से,
मेरे चेहरे पर मला था,
और मैं,
पानी-पानी हो चला था,
मेरा तो रंग ही उड़ गया था !
और तुम्हारे चेहरे पे
एक अनोखा सा,
मस्ती भरा रंग चढ़ गया था !!
दुनिया को तो बस,
बाते बनाने का चाहिए बहाना,
एक तरफ तुम और मैं,
एक तरफ वह मगरूर ज़माना ,
या तो तुम ख़ूबसूरत न होती
या मैं ही जवां न होता,
अभी तो बस,
लिखना ही शुरू किया था और
अधूरी पटकथा को झठ से,
रिवाजों की अंधड़ धो गई,
दिल ने चाहा बहुत,
पर मिला कुछ नहीं,
मंजिले न जाने कहाँ खो गई,
ख्वाइशे बिखरकर बंदिशों की,
आगोश में जाकर सो गई !
जिस्म जला था जब तो
साथ उसके,
दिल भी जल चुका होगा,
राख के ढेर को टटोलने से
अब क्या फायदा,ऐ दोस्त!
वो होली,
जिस पर तुमने,
अपनी मुठ्ठी में
भींचे रखे गुलाल को हौले से,
मेरे चेहरे पर मला था,
और मैं,
पानी-पानी हो चला था,
मेरा तो रंग ही उड़ गया था !
और तुम्हारे चेहरे पे
एक अनोखा सा,
मस्ती भरा रंग चढ़ गया था !!
दुनिया को तो बस,
बाते बनाने का चाहिए बहाना,
एक तरफ तुम और मैं,
एक तरफ वह मगरूर ज़माना ,
या तो तुम ख़ूबसूरत न होती
या मैं ही जवां न होता,
अभी तो बस,
लिखना ही शुरू किया था और
अधूरी पटकथा को झठ से,
रिवाजों की अंधड़ धो गई,
दिल ने चाहा बहुत,
पर मिला कुछ नहीं,
मंजिले न जाने कहाँ खो गई,
ख्वाइशे बिखरकर बंदिशों की,
आगोश में जाकर सो गई !
जिस्म जला था जब तो
साथ उसके,
दिल भी जल चुका होगा,
राख के ढेर को टटोलने से
अब क्या फायदा,ऐ दोस्त!
अब बहुत देर हो गई !!
Tuesday, February 23, 2010
होली पर एक धमकी भरी गजल !
हिम्मत बा तोहरा में त अबकी तू,
गुजर कर देख हमार गली से,
नाम हमरा मुंती ना गर,
मरवा न देत तोहरा के कौनो नक्सली से!
डराय करत रहनी जो कबो तोरा से,
समझिएगा न हमका वो मुंती,
खूब चलत है अब आपन,
पूरा आदिवासी विरादरी हमरी है सुनती !
गुलाल डालकर छेड़ना तो दूर,
अब के सूरत देख ले हमार भली से,
नाम हमरा मुंती ना गर,
मरवा न देत तोहरा के कौनो नक्सली से!
तू अब इ न समझि ,
बन्दूक चलावे के सिर्फ तोहरे के आवत बा,
ए.के. सैंतालीस चलावेके,
अपने किशनजी हमरो के सिखावत बा!
खूबे बर्जिस हम हूँ करत बानि,
पहलवान कम नाही कौनो खली से,
हिम्मत बा तोहरा में त अबकी तू,
गुजर कर देख हमार गली से !
नाम हमरा मुंती ना गर,
मरवा न देत तोहरा के कौनो नक्सली से!!
भोजपुरी नाम-मात्र की जानता हूँ, अत: भाषाई त्रुटियों के लिए अग्रिम क्षमा !
गुजर कर देख हमार गली से,
नाम हमरा मुंती ना गर,
मरवा न देत तोहरा के कौनो नक्सली से!
डराय करत रहनी जो कबो तोरा से,
समझिएगा न हमका वो मुंती,
खूब चलत है अब आपन,
पूरा आदिवासी विरादरी हमरी है सुनती !
गुलाल डालकर छेड़ना तो दूर,
अब के सूरत देख ले हमार भली से,
नाम हमरा मुंती ना गर,
मरवा न देत तोहरा के कौनो नक्सली से!
तू अब इ न समझि ,
बन्दूक चलावे के सिर्फ तोहरे के आवत बा,
ए.के. सैंतालीस चलावेके,
अपने किशनजी हमरो के सिखावत बा!
खूबे बर्जिस हम हूँ करत बानि,
पहलवान कम नाही कौनो खली से,
हिम्मत बा तोहरा में त अबकी तू,
गुजर कर देख हमार गली से !
नाम हमरा मुंती ना गर,
मरवा न देत तोहरा के कौनो नक्सली से!!
भोजपुरी नाम-मात्र की जानता हूँ, अत: भाषाई त्रुटियों के लिए अग्रिम क्षमा !
Monday, February 22, 2010
नजारा !
कभी-कभी,
घर की ऊपरी मंजिल की खिडकी से,
परदा हटाकर बाहर झांकना भी,
मन को मिश्रित अनुभूति देता है।
दो ही विकल्प सामने होते है,
या तो चक्छुओ को
अपार आनन्द मिलता है,
या फिर, कान कटु-श्रुति पाता है ॥
ऐसे ही कल रात को,
मैने भी अपने घर की
ऊपरी मंजिल की खिडकी का
परदा सरकाकर झांका था,
बाहर बडा ही खुबसूरत सा नजारा था।
पास के घर की
एकल मंजिल की छत पर,
एक चांद टहल रहा था,
और उसके ठीक ऊपर,
आसमां से टूटने को बेताब इक तारा था॥
ठीक नीचे उस घर के आगे से
गुजरती इक गली है,
और उस गली के
एक सिरे पर खडा बिजली का खम्बा,
उस पर टंगा ब्लब,
गली मे बिखेरता उजारा था।
और उस खम्बे की ओंट मे खड़े
एक चकोर ने,
छत पर टहल रहे चांद को
सजग-कातर नजरों से निहारा था ॥
चांद ने भी
कुछ बलखाते हुए,
छत की मुन्डेर से मुस्कुराकर
उसकी तरफ़ किया एक इशारा था।
यह देख,
प्रफुलित मन से चकोर ने,
विजयी अंदाज में उंगलियाँ फेरकर
अपने लम्बे केशो को सवारा था ॥
फिर अचानक,
उस खुशमिजाजनुमा
वातावरण में एक
अजीबोगरीब खामोशी सी छा गई थी।
चकोर फुदककर
कहीं उड गया,
चांद दुबककर कहीं छुप गया,
क्योकि इस बीच कहीं से,
छत पर आमावस्या आ गई थी ॥
Wednesday, February 17, 2010
1411- बाघ वनों की शान है !
(चित्र गूगल से साभार )
बस्ती में जंगल-राज चल रहा,
अरे तू कैसा इंसान है !
हे व्याध ! बाघ को बचा के रख,
बाघ वनों की शान है !!
आग लगा के बाघ के वन में,
बाग़ सजाता उपवन में !
ध्वस्त कर दिया घर उसका ,
विरक्ति घोल दी जीवन में !!
जैसा करोगे, वैसा ही भरोगे ,
यह प्रकृति का विधान है !
हे व्याध ! बाघ को बचा के रख,
बाघ वनों की शान है !!
जंगल ही बाघ का गढ़ होता है,
उस गढ़ को क्यों उजाड़ रहा !
खग-मृग,वृक्ष-वनों को तवाह कर,
पर्यावरण को क्यों बिगाड़ रहा !!
'जियो, जीने दो' का अर्थ न समझा,
तू कितना नादान है !
हे व्याध ! बाघ को बचा के रख,
बाघ वनों की शान है !!
क्षणभर के निज तुच्छ लाभ हेतु,
मत उसका भक्षण कर !
हे मूर्ख ! वह तेरा शत्रु नहीं, मित्र है,
उसका तू संरक्षण कर !!
चुन-चुन कर तूने बाघ को मारा,
तू इंसान नहीं शैतान है !
हे व्याध ! बाघ को बचा के रख,
बाघ वनों की शान है !!
-गोदियाल
अरे तू कैसा इंसान है !
हे व्याध ! बाघ को बचा के रख,
बाघ वनों की शान है !!
आग लगा के बाघ के वन में,
बाग़ सजाता उपवन में !
ध्वस्त कर दिया घर उसका ,
विरक्ति घोल दी जीवन में !!
जैसा करोगे, वैसा ही भरोगे ,
यह प्रकृति का विधान है !
हे व्याध ! बाघ को बचा के रख,
बाघ वनों की शान है !!
जंगल ही बाघ का गढ़ होता है,
उस गढ़ को क्यों उजाड़ रहा !
खग-मृग,वृक्ष-वनों को तवाह कर,
पर्यावरण को क्यों बिगाड़ रहा !!
'जियो, जीने दो' का अर्थ न समझा,
तू कितना नादान है !
हे व्याध ! बाघ को बचा के रख,
बाघ वनों की शान है !!
क्षणभर के निज तुच्छ लाभ हेतु,
मत उसका भक्षण कर !
हे मूर्ख ! वह तेरा शत्रु नहीं, मित्र है,
उसका तू संरक्षण कर !!
चुन-चुन कर तूने बाघ को मारा,
तू इंसान नहीं शैतान है !
हे व्याध ! बाघ को बचा के रख,
बाघ वनों की शान है !!
-गोदियाल
Saturday, February 13, 2010
हाई-टेक आशिकी !
सर्व-प्रथम, वेलेंटाइन-डे की पूर्व संध्या पर सभी आशिको और दिल-जलों को मेरी हार्दिक शुभ-कामनायें !
और यह कविता पिछले वेलेंटाइन डे पर पोस्ट की थी ;
एक बार प्यार जताने की चाह
जब हमारे भी दिल में आई,
शान्ति की राह छोड़ कर,
क्रान्ति की राह पकड़,
इजहार-ए-प्यार के खातिर,
एक वेलेंटाईन डे पर,
जरुरत से ज्यादा उत्साहित मैं,
मुझे याद है,
मैंने भी भेजा था एक फूल गोभी का,
अपनी प्रियतमा के घर,
और फिर उसी शाम को किसी ने
मेरा दर खटखटाया था,
अपने संदेशवाहक के मार्फत,
उनका जबाब आया था,
चंद शब्दों में लिखा था;
हे मेरे मजनू !
सुनहरी इस भोर में
महगाई के इस दौर में,
तकलीफ उठाने की जरुरत क्या थी,
'ढाई आखर प्रेम' के में ही,
खा लिए होते गोते ,
और जब तुमने खर्चा कर ही डाला था,
ऐ जानेमन !
तो दो चार आलू भी
साथ भेज दिए होते !!!
मम्मी-पापा की प्रेम कहानी !
मै अपनी बीबी से बोला,
अरे वो , सुनों न मेरी रानी,
आज सुनाता हूं तुम्हे अपने
मम्मी - पापा की प्रेम कहानी !
जब मेरे पापा स्वर्गवासी नही थे,
दामपत्य जीवन मे प्रवासी नही थे,
साठ पार कर गये थे पर बयासी नही थे,
तब एक बार जश्न के दरमियां रंगत मे आके,
मेरी मम्मी का हाथ थामे कुछ इसतरह कहे थे;
ऎ मेरी जोहरा जबी, तुम अभी तक हो हंसी,
और मैं जवां, तुझपे कुरबां वो मेरी जान, मेरी जान !
मेरी मम्मी ने भी
मुस्कुराते हुए
कहा था,
तुमपे
कुर्वां
वो
मेरी
जान
मेरी
जान !
यह सुनकर
दिखावे को हम भी भडक गए ,
मौका देख दो पैग और घडक गए !
मिलन की चाह मे महबूब की, अब और न,
किसी आशिक को दिमाग खर्च करना होगा,
जब जी करेगा पाने को झलक, इक दूजे की,
अन्तर्जाल पर बस ’गुगुल-सर्च’ करना होगा ॥
कर लो अब तो मिलने का वादा आशिको,
बिन सोचे-समझे, और किसी भी शर्त पर,
छुपा लें चाहे आशिको के घरवाले कही भी,
ठिकाना ढूंढ लेंगा दिलजला,’गुगुल-अर्थ’ पर॥
न ही किसी की नजरों का भय सतायेगा,
और न किसी को कोई सा भी फ़ाइन देंगे,
जब भी वेलेंटाइन का फूल देंगे साथी को,
बेहिचक, सुन्दर-सुगंधित, औन-लाइन देंगे॥
अब और न छुप-छुप के मिलने की दरकार,
न डरने की जरुरत किसी मेल-फ़ीमेल से,
बतियाने का दिल करे जब कभी मह्बूब से,
दिल खोल के कर लो बात, ’जी-मेल’ से ॥
सुनशान पार्क के कोने, वीरान सड्के देखकर,
शिव-राम सेना सोचे कि दुनिया सुधर गई,
देखकर धमाल इस हाई-टेक आशिकी का ,
’गोदियाल’ सोचे, बेटा, अपनी तो उमर गई॥
किसी आशिक को दिमाग खर्च करना होगा,
जब जी करेगा पाने को झलक, इक दूजे की,
अन्तर्जाल पर बस ’गुगुल-सर्च’ करना होगा ॥
कर लो अब तो मिलने का वादा आशिको,
बिन सोचे-समझे, और किसी भी शर्त पर,
छुपा लें चाहे आशिको के घरवाले कही भी,
ठिकाना ढूंढ लेंगा दिलजला,’गुगुल-अर्थ’ पर॥
न ही किसी की नजरों का भय सतायेगा,
और न किसी को कोई सा भी फ़ाइन देंगे,
जब भी वेलेंटाइन का फूल देंगे साथी को,
बेहिचक, सुन्दर-सुगंधित, औन-लाइन देंगे॥
अब और न छुप-छुप के मिलने की दरकार,
न डरने की जरुरत किसी मेल-फ़ीमेल से,
बतियाने का दिल करे जब कभी मह्बूब से,
दिल खोल के कर लो बात, ’जी-मेल’ से ॥
सुनशान पार्क के कोने, वीरान सड्के देखकर,
शिव-राम सेना सोचे कि दुनिया सुधर गई,
देखकर धमाल इस हाई-टेक आशिकी का ,
’गोदियाल’ सोचे, बेटा, अपनी तो उमर गई॥
और यह कविता पिछले वेलेंटाइन डे पर पोस्ट की थी ;
एक बार प्यार जताने की चाह
जब हमारे भी दिल में आई,
शान्ति की राह छोड़ कर,
क्रान्ति की राह पकड़,
इजहार-ए-प्यार के खातिर,
एक वेलेंटाईन डे पर,
जरुरत से ज्यादा उत्साहित मैं,
मुझे याद है,
मैंने भी भेजा था एक फूल गोभी का,
अपनी प्रियतमा के घर,
और फिर उसी शाम को किसी ने
मेरा दर खटखटाया था,
अपने संदेशवाहक के मार्फत,
उनका जबाब आया था,
चंद शब्दों में लिखा था;
हे मेरे मजनू !
सुनहरी इस भोर में
महगाई के इस दौर में,
तकलीफ उठाने की जरुरत क्या थी,
'ढाई आखर प्रेम' के में ही,
खा लिए होते गोते ,
और जब तुमने खर्चा कर ही डाला था,
ऐ जानेमन !
तो दो चार आलू भी
साथ भेज दिए होते !!!
मम्मी-पापा की प्रेम कहानी !
मै अपनी बीबी से बोला,
अरे वो , सुनों न मेरी रानी,
आज सुनाता हूं तुम्हे अपने
मम्मी - पापा की प्रेम कहानी !
जब मेरे पापा स्वर्गवासी नही थे,
दामपत्य जीवन मे प्रवासी नही थे,
साठ पार कर गये थे पर बयासी नही थे,
तब एक बार जश्न के दरमियां रंगत मे आके,
मेरी मम्मी का हाथ थामे कुछ इसतरह कहे थे;
ऎ मेरी जोहरा जबी, तुम अभी तक हो हंसी,
और मैं जवां, तुझपे कुरबां वो मेरी जान, मेरी जान !
मेरी मम्मी ने भी
मुस्कुराते हुए
कहा था,
तुमपे
कुर्वां
वो
मेरी
जान
मेरी
जान !
यह सुनकर
दिखावे को हम भी भडक गए ,
मौका देख दो पैग और घडक गए !
Friday, February 12, 2010
एक छोटा सा ख़त भोलेनाथ के नाम !
सर्वप्रथम सभी मित्रो और दोनों तरह के शिव भक्तो ( असली और दिखलावटी ) को मेरी तरफ से महाशिवरात्री पर्व की बधाई और ढेरो शुभकामनाये !
आज इस पावन अवसर पर एक छोटा सा ख़त भोलेनाथ के नाम ;
भोलेनाथ;
अब ज्यादा भोले भी मत बनो !
मेरी हर बात को गौर से सुनो!!
अपने पूर्वजो से बहुत सूना था,
कि आपकी तीसरी आँख भी है!
और अपने इस भारत देश पर,
आपकी रहती तांक-झाँक भी है!!
मगर सच बताऊँ तो अपनी तो,
पैदाइसी वक्त से बुद्धि भी मंद है!
तीसरी की बात छोडो, लगता है,
आपकी तो दो आँखे भी बंद है !!
इस देश की यह हालत न होती,
अगर सचमुच ऐसी बात न होती !
चारो तरफ मचा हां-हाकार न होता,
दुर्जन को मिली ये सौगात न होती!!
ठेकेदार बना बैठा है, जो कल तक
बताता था खुद को आपका सेनापति!
आपका नाम बदनाम कर रहा है,
बुढापे में फिर गई है उसकी मति !!
गर तीसरी आँख रखते हो सच में,
तो कृपा करके अब उसे खोल दो !
"बम' बोलने का अब ज़माना गया,
शब्दों को नहीं, क्रिया को मोल दो !!
आपका एक भक्त - गोदियाल !
आज इस पावन अवसर पर एक छोटा सा ख़त भोलेनाथ के नाम ;
भोलेनाथ;
अब ज्यादा भोले भी मत बनो !
मेरी हर बात को गौर से सुनो!!
अपने पूर्वजो से बहुत सूना था,
कि आपकी तीसरी आँख भी है!
और अपने इस भारत देश पर,
आपकी रहती तांक-झाँक भी है!!
मगर सच बताऊँ तो अपनी तो,
पैदाइसी वक्त से बुद्धि भी मंद है!
तीसरी की बात छोडो, लगता है,
आपकी तो दो आँखे भी बंद है !!
इस देश की यह हालत न होती,
अगर सचमुच ऐसी बात न होती !
चारो तरफ मचा हां-हाकार न होता,
दुर्जन को मिली ये सौगात न होती!!
ठेकेदार बना बैठा है, जो कल तक
बताता था खुद को आपका सेनापति!
आपका नाम बदनाम कर रहा है,
बुढापे में फिर गई है उसकी मति !!
गर तीसरी आँख रखते हो सच में,
तो कृपा करके अब उसे खोल दो !
"बम' बोलने का अब ज़माना गया,
शब्दों को नहीं, क्रिया को मोल दो !!
आपका एक भक्त - गोदियाल !
Thursday, February 11, 2010
उस देश का यारों क्या कहना !!!!!!!!!!!!!!!!!
नेताओ की खुशामदगी की हद जहां ऐसी हो,
कि युवराज की चप्पल के लिए सरफरोशी हो,
कि युवराज की चप्पल के लिए सरफरोशी हो,
जहां चमचों के मस्तिष्क में कूट-कूट समाई,
चाटुकारिता,जी हजूरी,गुलामी की मदहोशी हो,
जिस देश के महामहीम का ही खुद का पति,
गरीब-गुरबों की, जमीन हड़पने का दोषी हो,
जहां देश की बागडोर थामे, लोगो का नुमाइंदा,
कोई बूढा माननीय, किसी मैडम का प्रोक्सी हो,
जहाँ लाचार पिस रहा हो, न्याय की चक्की में,
बाहुबली की सजा पर, क़ानून की खामोशी हो,
शहीद का परिवार मोहताज हो अपने हक़ को,
और कसाई आतंकी के प्रति जहां गर्मजोशी हो,
जहां महंगाई से बेबस जनता, दाने को तरसे,
और नेता को सुरा संग साकी भी परोसी हो,
उस देश का यारों क्या कहना !!!!!!!!!!!!!!!!!
जय हिंद,
जय भारती !!!!!!
चाटुकारिता,जी हजूरी,गुलामी की मदहोशी हो,
जिस देश के महामहीम का ही खुद का पति,
गरीब-गुरबों की, जमीन हड़पने का दोषी हो,
जहां देश की बागडोर थामे, लोगो का नुमाइंदा,
कोई बूढा माननीय, किसी मैडम का प्रोक्सी हो,
जहाँ लाचार पिस रहा हो, न्याय की चक्की में,
बाहुबली की सजा पर, क़ानून की खामोशी हो,
शहीद का परिवार मोहताज हो अपने हक़ को,
और कसाई आतंकी के प्रति जहां गर्मजोशी हो,
जहां महंगाई से बेबस जनता, दाने को तरसे,
और नेता को सुरा संग साकी भी परोसी हो,
उस देश का यारों क्या कहना !!!!!!!!!!!!!!!!!
जय हिंद,
जय भारती !!!!!!
Wednesday, February 10, 2010
ख्वाईश !
हर तलाश तुम्हारी,
अंजाम तक पहुचाता !
काश ! अगर मैं भी
'गुगुल सर्च' जैसा बन पाता !!
ज्यों तलाशने
अपने मन की जिज्ञासा,
कोई जिज्ञासू,
शीघ्र पहुच जाता है,
'गुगुल सर्च' पर
और अंतर्जाल के सहारे,
सर्च विन्डो पर करता है
कुछ शब्द टंकित ।
जब कभी तुम भी,
अपने दिल का संशय मिटाने
ढूढने निकलती,
प्यार की परिभाषा,
और अपनी नरम हथेलिया,
मेरे सीने पे टिकाकर ,
कोमल उंगलियों से
मेरे दिल की खिडकी पर,
आहिस्ता-आहिस्ता,
प्रेम के ढाई अक्षर
जब करती अंकित ॥
क्षणभर मे तुम्हारे दिल के
अहसासों को समझ जाता !
काश ! अगर मैं भी
'गुगुल सर्च' जैसा बन पाता !!
और फिर ,
तुम्हारे नयनों से नयन मिला,
मुस्कुराता हुआ,
अपने चेहरे और
अधरों की स्क्रीन पर,
दुनियां भर का प्यार और प्रेम,
तुम्हारे लिये
और सिर्फ़ तुम्हारे लिये,
डिसप्ले कर देता,
ढेर सारे विकल्प
तुम्हारे समक्ष होते,
और तुम रह जाती
यह सब देखकर चकित ॥
असीम कितना है मेरा प्यार,
दिल का हर पन्ना बतलाता !
काश ! अगर मैं भी
'गुगुल सर्च' जैसा बन पाता !!
अंजाम तक पहुचाता !
काश ! अगर मैं भी
'गुगुल सर्च' जैसा बन पाता !!
ज्यों तलाशने
अपने मन की जिज्ञासा,
कोई जिज्ञासू,
शीघ्र पहुच जाता है,
'गुगुल सर्च' पर
और अंतर्जाल के सहारे,
सर्च विन्डो पर करता है
कुछ शब्द टंकित ।
जब कभी तुम भी,
अपने दिल का संशय मिटाने
ढूढने निकलती,
प्यार की परिभाषा,
और अपनी नरम हथेलिया,
मेरे सीने पे टिकाकर ,
कोमल उंगलियों से
मेरे दिल की खिडकी पर,
आहिस्ता-आहिस्ता,
प्रेम के ढाई अक्षर
जब करती अंकित ॥
क्षणभर मे तुम्हारे दिल के
अहसासों को समझ जाता !
काश ! अगर मैं भी
'गुगुल सर्च' जैसा बन पाता !!
और फिर ,
तुम्हारे नयनों से नयन मिला,
मुस्कुराता हुआ,
अपने चेहरे और
अधरों की स्क्रीन पर,
दुनियां भर का प्यार और प्रेम,
तुम्हारे लिये
और सिर्फ़ तुम्हारे लिये,
डिसप्ले कर देता,
ढेर सारे विकल्प
तुम्हारे समक्ष होते,
और तुम रह जाती
यह सब देखकर चकित ॥
असीम कितना है मेरा प्यार,
दिल का हर पन्ना बतलाता !
काश ! अगर मैं भी
'गुगुल सर्च' जैसा बन पाता !!
Monday, February 8, 2010
थोडा खाओं और सुखी रहो !
न्याय की राह मत तजो,
अन्याय को भी मत सहो !
लालच बुरी बला है दोस्तों ,
थोडा खाओ और सुखी रहो !!
एक दिन यहाँ सब का सब
रह जाएगा धरा का धरा,
आजतक कम खाकर भी
शायद ही कोई हो मरा,
झूठ बोलकर हासिल क्या होगा,
जहां तक हो सके सत्य कहो !
लालच बुरी बला है दोस्तों ,
थोडा खाओ और सुखी रहो !!
दौलत के पीछे पागल हुआ,
आज सारा जग-जमाना है !
भुल गये, खाली हाथ आये थे
और खाली ही हाथ जाना है !!
पूत-सपूत निकल आये बस,
भावनाओ में मत बहो !
लालच बुरी बला है दोस्तों ,
थोडा खाओ और सुखी रहो !!
अन्याय को भी मत सहो !
लालच बुरी बला है दोस्तों ,
थोडा खाओ और सुखी रहो !!
एक दिन यहाँ सब का सब
रह जाएगा धरा का धरा,
आजतक कम खाकर भी
शायद ही कोई हो मरा,
झूठ बोलकर हासिल क्या होगा,
जहां तक हो सके सत्य कहो !
लालच बुरी बला है दोस्तों ,
थोडा खाओ और सुखी रहो !!
दौलत के पीछे पागल हुआ,
आज सारा जग-जमाना है !
भुल गये, खाली हाथ आये थे
और खाली ही हाथ जाना है !!
पूत-सपूत निकल आये बस,
भावनाओ में मत बहो !
लालच बुरी बला है दोस्तों ,
थोडा खाओ और सुखी रहो !!
तेरे ही अपने घर की चुहिया कुतर गई है !
निष्पक्षता दल-दल मे धस गई है,
निडरता कुटिलता से डर गई है,
कागज ने बागी तेवर दिखा दिये,
और कलम आत्महत्या कर गई है।
अराजकता के इस दौर मे लुटेरे,
बेखौफ़ हो अपना खेल खेल रहे,
भ्रष्ठाचार के नित बढ्ते प्रदुषण मे,
ईमानदारी घुट-घुट के मर गई है।
हया कहीं गुमशुदा बनकर रह गई,
क्योंकि समाज के चन्द ठेकेदार,
उसका अपहरण कर ले गये और,
महलों मे अब बेहयाई पसर गई है।
अब सच का आईना दिखाने वाले,
खुद बिककर आईने बन गए है,
शराफत की परतें नेता के चेहरे से,
एक-एक कर सरे-आम उतर गई है।
बडे ही लग्न और मेहनत से जो,
लिखी थी बाबा सहाब तुमने,
मोटी सी वो किताब, सुना है,
तेरे ही अपने घर की, चुहिया कुतर गई है ।
निडरता कुटिलता से डर गई है,
कागज ने बागी तेवर दिखा दिये,
और कलम आत्महत्या कर गई है।
अराजकता के इस दौर मे लुटेरे,
बेखौफ़ हो अपना खेल खेल रहे,
भ्रष्ठाचार के नित बढ्ते प्रदुषण मे,
ईमानदारी घुट-घुट के मर गई है।
हया कहीं गुमशुदा बनकर रह गई,
क्योंकि समाज के चन्द ठेकेदार,
उसका अपहरण कर ले गये और,
महलों मे अब बेहयाई पसर गई है।
अब सच का आईना दिखाने वाले,
खुद बिककर आईने बन गए है,
शराफत की परतें नेता के चेहरे से,
एक-एक कर सरे-आम उतर गई है।
बडे ही लग्न और मेहनत से जो,
लिखी थी बाबा सहाब तुमने,
मोटी सी वो किताब, सुना है,
तेरे ही अपने घर की, चुहिया कुतर गई है ।
Sunday, February 7, 2010
गुमशुदा की तलाश !
नाम शर्म है,
हिन्दु धर्म है,
काया नाजुक,
लाज से जन्म-मरण का नाता है ।
अरसा हुआ
गुम हुए, यह
सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है ॥
देखकर देश की दुर्दशा,
थी बहुत विचलित,
नित आसमान छूंती मंहगाई से ।
निकली थी घर से
गुहार लगाने,
सत्ता पे काबिज, देश की रहनुमाई से ॥
कुछ सफ़ेद वसनधारी,
धर्मनिर्पेक्ष अपहर्ता,
दिखावे को, बनते जो थे नेक से ।
उठा ले गये उसे,
दिन-दोपहर,
सरेआम, नई दिल्ली-१ से ॥
अब पता नही,
जिंदा है भी, या नही,
बगैर उसके यंहा जिन्दगी जहन्नुम हुई है ।
बेशर्मी और अराजकता,
खूब चांदी काट रही,
जब से अपने देश से शर्म गुम हुई है ॥
Saturday, February 6, 2010
हर कदम रखना तुम देख-भाल के !
दोस्तों! पता नहीं ऐसा आप लोगो का दिल भी करता है अथवा नहीं, मगर मेरा दिल तो कभी-कभी मार खाने की भी ख्वाइशे पालता है ! :) खैर, अब वेलेंटाइन डे भी नजदीक आ रहा है, तो क्यों न आज कुछ नसीहते अपने युवा मित्रो को दे डालू ( नसीहत देने की पुरानी आदत जो है )
आ न जाना चक्कर में कभी किसी की चाल के
जीवन साथी तलाश रहे हो तो ज़रा-देख भाल के
बहेलिये खड़े छुपे है कई राह में, चारा डाल के
फांसने की ताक में बेताब फंदे उनकी जाल के
वैसे तो युवा तुम हो आजकल बड़े कमाल के
ध्यान रहे कि तुम भविष्य हो भारत विशाल के
चुन न लेना किसी को यूँ लालच में मॉल के
मिल जाए तो रखना उसे तुम ज़रा संभाल के
फिर पछताना ना पड़े बैठ के पहलू में काल के
भाग जाए जब कभी वो घर से बुर्का डाल के
राधे-राधे ! :)
आ न जाना चक्कर में कभी किसी की चाल के
जीवन साथी तलाश रहे हो तो ज़रा-देख भाल के
बहेलिये खड़े छुपे है कई राह में, चारा डाल के
फांसने की ताक में बेताब फंदे उनकी जाल के
वैसे तो युवा तुम हो आजकल बड़े कमाल के
ध्यान रहे कि तुम भविष्य हो भारत विशाल के
चुन न लेना किसी को यूँ लालच में मॉल के
मिल जाए तो रखना उसे तुम ज़रा संभाल के
फिर पछताना ना पड़े बैठ के पहलू में काल के
भाग जाए जब कभी वो घर से बुर्का डाल के
राधे-राधे ! :)
Thursday, February 4, 2010
जीना तो बस टाइम पास रह गया !
मकसद न यहाँ जीने का,अब कुछ ख़ास रह गया,
यूँ समझिये, जीना तो, बस टाइम पास रह गया !
ढोये जा रहे बोझ को, कुली की तरह दिन-रात,
स्टेशन पर गाडी आई-गई,यही अहसास रह गया !
मंजिल-ए-मुसाफिर ने कभी,हाल-ए-सफ़र न सुनाया,
है बेरहम ये दुनिया सोचकर,दिल उदास रह गया !
अपने ही पैमानों पर कभी , जीने चले थे जिन्दगी,
वक्त की ठोकर में अटका, कतरा-ए-सांस रह गया !
पड़ते जमीं पर थे कदम जिसके, शुतुरमुर्ग की तरह
बैसाखियों पर सिमटा क्यों,बन्दा-ए-बिंदास रह गया !
यूँ समझिये, जीना तो, बस टाइम पास रह गया !
ढोये जा रहे बोझ को, कुली की तरह दिन-रात,
स्टेशन पर गाडी आई-गई,यही अहसास रह गया !
मंजिल-ए-मुसाफिर ने कभी,हाल-ए-सफ़र न सुनाया,
है बेरहम ये दुनिया सोचकर,दिल उदास रह गया !
अपने ही पैमानों पर कभी , जीने चले थे जिन्दगी,
वक्त की ठोकर में अटका, कतरा-ए-सांस रह गया !
पड़ते जमीं पर थे कदम जिसके, शुतुरमुर्ग की तरह
बैसाखियों पर सिमटा क्यों,बन्दा-ए-बिंदास रह गया !
Wednesday, February 3, 2010
यही द्वन्द होने लगा है !
अब सोचने को रहा भी क्या है बाकी ,
मन को बस यही द्वन्द होने लगा है,
जिंदगी के सब ख्वाब धूमिल हो चुके,
इन्तजार का हर पहलु बंद होने लगा है !
उम्मीद दामन छुडाने को बेताब है,
धैर्य दिल का भी मंद होने लगा है,
तन्हाइयां कुरेदने लगी है जख्मो को,
असंतुलित भावो का छंद होने लगा है !
रह-रहे थे अभी तक जिस शहर में,
वाशिंदा वहां फिकरमंद होने लगा है,
पगला गया यहाँ एक और गमजदा ,
खुसफुसाहट गली में चंद होने लगा है !
छुपा दिया खुद ही को काल कोठरी में,
संग अंधेरों का पसंद होने लगा है,
अब सोचने को रहा भी क्या है बाकी ,
मन को बस यही द्वन्द होने लगा है !
मन को बस यही द्वन्द होने लगा है,
जिंदगी के सब ख्वाब धूमिल हो चुके,
इन्तजार का हर पहलु बंद होने लगा है !
उम्मीद दामन छुडाने को बेताब है,
धैर्य दिल का भी मंद होने लगा है,
तन्हाइयां कुरेदने लगी है जख्मो को,
असंतुलित भावो का छंद होने लगा है !
रह-रहे थे अभी तक जिस शहर में,
वाशिंदा वहां फिकरमंद होने लगा है,
पगला गया यहाँ एक और गमजदा ,
खुसफुसाहट गली में चंद होने लगा है !
छुपा दिया खुद ही को काल कोठरी में,
संग अंधेरों का पसंद होने लगा है,
अब सोचने को रहा भी क्या है बाकी ,
मन को बस यही द्वन्द होने लगा है !
Monday, February 1, 2010
हे कृष्ण ! अब तुम्हारा क्या लक्ष्य है ?
आज यहाँ खुद ही, सवालों में घिरा यक्ष है,
अपने ही घर से बेघर, हो गया निष्पक्ष है !
ईमान का बेटा दीन, दर-दर भटक रहा है,
शठ का बेटा कपट, भ्रष्टता में हुआ दक्ष है !!
धूर्त का घर हर रोज, मना रहा है दीवाली,
वीरान-सुनशान पडा, हरीशचंद्र का कक्ष है !
चोर-उचक्के, लुच्चे-लफंगे, गद्दी पर काबिज हुए,
कौवा मूंग दल रहा यहाँ, हंस के वक्ष है !!
लूट-खसौट, अत्याचार-दुराचार, सब शीर्ष गए,
जो हो रहा, वो छुपा नहीं, आपके समक्ष है !
हे कृष्ण, भूल गए तुम, यदा-यदा ही धर्मस्य..
गोदियाल पूछता है तुम्हे, तुम्हारा क्या लक्ष है ??
अपने ही घर से बेघर, हो गया निष्पक्ष है !
ईमान का बेटा दीन, दर-दर भटक रहा है,
शठ का बेटा कपट, भ्रष्टता में हुआ दक्ष है !!
धूर्त का घर हर रोज, मना रहा है दीवाली,
वीरान-सुनशान पडा, हरीशचंद्र का कक्ष है !
चोर-उचक्के, लुच्चे-लफंगे, गद्दी पर काबिज हुए,
कौवा मूंग दल रहा यहाँ, हंस के वक्ष है !!
लूट-खसौट, अत्याचार-दुराचार, सब शीर्ष गए,
जो हो रहा, वो छुपा नहीं, आपके समक्ष है !
हे कृष्ण, भूल गए तुम, यदा-यदा ही धर्मस्य..
गोदियाल पूछता है तुम्हे, तुम्हारा क्या लक्ष है ??
Subscribe to:
Posts (Atom)