भला आदमी न कोई मुझे कह सका,
मैं भला मानुष बनकर न रह सका !
सच कहने की जो ये मुई आदत है ,
मैं झूठ के जज्बातों में न बह सका !!
वह जो यथार्थ से बहुत ही दूर था,
वही सुनने को जमाने को मंजूर था !
यहाँ झूठे वादे दिलों को भिगोते है,
मुंए सच क्यों इतने कडवे होते है !!
सत्य,पल्लू तजने को रजामंद न था,
मिथ्या को संग अपने न सह सका !
भला आदमी न कोई मुझे कह सका,
मैं भला मानुष बनकर न रह सका !!
सैलाब जब दिल के समंदर का बहा,
बस जुबाँ ने जो सच था वही कहा !
फरेब के लोक से जब-जब दिल टूटा,
मानस पे तब ख्यालों का तूफान उठा !!
उजड़ गया सब कुछ उस 'अंधड़' में,
मगर कटु मेरा जमीर न ढह सका !
भला आदमी न कोई मुझे कह सका,
मैं भला मानुष बनकर न रह सका !!
Saturday, January 30, 2010
Friday, January 29, 2010
जो कुछ गुल खिलाये थे गए साल ने !
हालत पे मेरी न दिल उनके पसीजे ,
न शरमाया उन्हें मेरे इस फटे-हाल ने !
सिद्दत से बड़ी हमने संजो के रखे है ,
जो कुछ गुल खिलाये थे गए साल ने !!
यादों की गठरी को सीने पे रख कर,
किया मजबूर चलने को हमें पातळ ने !
क़दमों को अब तक संभाले हुए है,
डगमगाया बहुत रास्तों के जंजाल ने !!
दरख्तों के साये में खिलते है जो गुल ,
उन्हें बिखरा दिया धरा पर अनंतकाल ने !
पर जो गुल किस्मत के खिलाये हुए है,
चिपकाए रखा उन्हें वक्त की चाल ने !!
है मुग्ध क्यों इतना तू खुश्बुओ पर,
किया खुद को परेशां इस सवाल ने !
सिद्दत से बड़ी हमने संजो के रखे है ,
जो कुछ गुल खिलाये थे गए साल ने !!
न शरमाया उन्हें मेरे इस फटे-हाल ने !
सिद्दत से बड़ी हमने संजो के रखे है ,
जो कुछ गुल खिलाये थे गए साल ने !!
यादों की गठरी को सीने पे रख कर,
किया मजबूर चलने को हमें पातळ ने !
क़दमों को अब तक संभाले हुए है,
डगमगाया बहुत रास्तों के जंजाल ने !!
दरख्तों के साये में खिलते है जो गुल ,
उन्हें बिखरा दिया धरा पर अनंतकाल ने !
पर जो गुल किस्मत के खिलाये हुए है,
चिपकाए रखा उन्हें वक्त की चाल ने !!
है मुग्ध क्यों इतना तू खुश्बुओ पर,
किया खुद को परेशां इस सवाल ने !
सिद्दत से बड़ी हमने संजो के रखे है ,
जो कुछ गुल खिलाये थे गए साल ने !!
Thursday, January 21, 2010
एक देश के अन्दर, कई देश हैं !
बिके हुए यहाँ सब,
खादी, सफ़ेद और उजले परिवेश हैं !
इसीलिये आज भी ,
इस एक देश के अन्दर, कई देश हैं !!
देश-संस्कृति सिमट गई,
दूर-दराज किसी गाँव के द्वारे तक !
देश-प्रेम की भावना रह गई,
विविधता में एकता के नारे तक !!
कुटिल राजनीति के क्षेत्रवाद,
देते यहाँ सबको नित नये ठेस हैं !
इसीलिये आज भी ,
इस एक देश के अन्दर, कई देश हैं !!
कण-कण में पसरा हुआ,
लम्बी गुलामियत का खून है !
देश-धर्म से गद्दारी का,
हर जैचंद के सिर पर जूनून है !!
मेहनत से संजो के रखे अपने,
मुग़ल-अंग्रेज आंकाओ के अवशेष हैं !
इसीलिये आज भी ,
इस एक देश के अन्दर, कई देश हैं !!
खादी, सफ़ेद और उजले परिवेश हैं !
इसीलिये आज भी ,
इस एक देश के अन्दर, कई देश हैं !!
देश-संस्कृति सिमट गई,
दूर-दराज किसी गाँव के द्वारे तक !
देश-प्रेम की भावना रह गई,
विविधता में एकता के नारे तक !!
कुटिल राजनीति के क्षेत्रवाद,
देते यहाँ सबको नित नये ठेस हैं !
इसीलिये आज भी ,
इस एक देश के अन्दर, कई देश हैं !!
कण-कण में पसरा हुआ,
लम्बी गुलामियत का खून है !
देश-धर्म से गद्दारी का,
हर जैचंद के सिर पर जूनून है !!
मेहनत से संजो के रखे अपने,
मुग़ल-अंग्रेज आंकाओ के अवशेष हैं !
इसीलिये आज भी ,
इस एक देश के अन्दर, कई देश हैं !!
भारत और पाकिस्तान के बीच जो दो चीजे कॉमन है !
१) आपको पता है कि
अलकायदा और एलईटी
हिन्दुस्तानियों और पाकिस्तानियों
को ऊपर उठाने के लिए
क्यों इतने "Mad" है ?
क्योंकि
हिन्दुस्तान और पाकिस्तान
दोनों के अपने-अपने
Hydra* - "Bad" है
२) हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में
पता है महंगाई का बढना
क्यों निरंतर जारी है ?
क्योंकि
इधर सरदारी है
उधर जरदारी है ! :)
Hydra=क्रेन
अलकायदा और एलईटी
हिन्दुस्तानियों और पाकिस्तानियों
को ऊपर उठाने के लिए
क्यों इतने "Mad" है ?
क्योंकि
हिन्दुस्तान और पाकिस्तान
दोनों के अपने-अपने
Hydra* - "Bad" है
२) हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में
पता है महंगाई का बढना
क्यों निरंतर जारी है ?
क्योंकि
इधर सरदारी है
उधर जरदारी है ! :)
Hydra=क्रेन
बीबी की क्लोनिंग !
नित बढ्ती जरुरतों,
थकान और मानसिक तनावों
के मध्यनजर,
यह जरूरी हो गया,
यहां हर पुरुष के लिये,
कि उसके पास
कम से कम
पांच बीबियां हों,
उसकी मदद के लिये,
एक खाना खिलाये,
एक कपडे धोये,
एक घर संभाले,
एक बच्चे संभाले,
एक हर वक्त
उसके साथ रहकर,
उसकी मदद करे,
जब वो काम से थक जाये,
उसके हाथ-पैर दबाये,
इसलिये कम से कम पांच तो होनी चाहिये ही, ये उनका मत है !
मगर पुरुष,
कानून से डरता है ,
क्योंकि अपना कानून
एक से ज्यादा रखने की
मनाही करता है,
वह अब सोचता है कि
कानून की नजरों मे
धूल कैसे झोंकी जाती है,
पांचो बीबियां एक जैसी हों,
बाकी चार ने तो
घर पर ही रहना है,
बाहर साथ तो सिर्फ़ एक जाती है,
इसलिये जनाव आजकल “क्लोनिंग-शास्त्र” मे अध्ययनरत है !!
.
थकान और मानसिक तनावों
के मध्यनजर,
यह जरूरी हो गया,
यहां हर पुरुष के लिये,
कि उसके पास
कम से कम
पांच बीबियां हों,
उसकी मदद के लिये,
एक खाना खिलाये,
एक कपडे धोये,
एक घर संभाले,
एक बच्चे संभाले,
एक हर वक्त
उसके साथ रहकर,
उसकी मदद करे,
जब वो काम से थक जाये,
उसके हाथ-पैर दबाये,
इसलिये कम से कम पांच तो होनी चाहिये ही, ये उनका मत है !
मगर पुरुष,
कानून से डरता है ,
क्योंकि अपना कानून
एक से ज्यादा रखने की
मनाही करता है,
वह अब सोचता है कि
कानून की नजरों मे
धूल कैसे झोंकी जाती है,
पांचो बीबियां एक जैसी हों,
बाकी चार ने तो
घर पर ही रहना है,
बाहर साथ तो सिर्फ़ एक जाती है,
इसलिये जनाव आजकल “क्लोनिंग-शास्त्र” मे अध्ययनरत है !!
.
Wednesday, January 20, 2010
पसंद अपनी-अपनी !
दास्ताँ-ए-इश्क जब उन्होंने सुनाया,
अंदाज-ए-बयाँ हमें उनका खूब भाया ,
बनावटी मुस्कान चेहरे पे ओढ़कर ,
दर्द, दिल में छुपाना भी पसंद आया !
अश्क टपके बूँद-बूंद जो नयनों से ,
वो दिल-दरिया से निकल के आये थे,
हमें गफलत में रखने को उनका वो,
प्याज छिलते जाना भी पसंद आया !
हमें आशियाने पर अपने बिठा कर,
किचन में तली पकोड़ी जब उन्होंने ,
सिलबट्टे पे पोदीना-चटनी को पीसते,
मधुर गीत गुनगुनाना भी पसंद आया !
प्यार से परोसी जब उन्होंने हमको,
गरमागरम चाय संग चटनी-पकोड़ी,
थाली के ऊपर से मक्खी भगाने को,
उनका वो पल्लू हिलाना भी पसंद आया !
अंदाज-ए-बयाँ हमें उनका खूब भाया ,
बनावटी मुस्कान चेहरे पे ओढ़कर ,
दर्द, दिल में छुपाना भी पसंद आया !
अश्क टपके बूँद-बूंद जो नयनों से ,
वो दिल-दरिया से निकल के आये थे,
हमें गफलत में रखने को उनका वो,
प्याज छिलते जाना भी पसंद आया !
हमें आशियाने पर अपने बिठा कर,
किचन में तली पकोड़ी जब उन्होंने ,
सिलबट्टे पे पोदीना-चटनी को पीसते,
मधुर गीत गुनगुनाना भी पसंद आया !
प्यार से परोसी जब उन्होंने हमको,
गरमागरम चाय संग चटनी-पकोड़ी,
थाली के ऊपर से मक्खी भगाने को,
उनका वो पल्लू हिलाना भी पसंद आया !
नामुराद वो हसीं पल !
जिस्म तो पूरा ही निर्दोष था पर,
अनाडी इन ओंठो का है दोष सारा !
उनकी गली से हम कई बार गुजरे,
पत्थर किसी ने इसी बार मारा !!
ठिठुरती ठण्ड में, कमबख्त ये ओंठ ,
सीटी बजाने की जिद पर अड़े थे !
नहीं था हमें ज़रा भी अहसास कि वो,
भाई के संग बरामदे में खड़े थे !!
घर भेजा उन्होंने हमें उस रोज,
अपनी उस गली से जख्मी बना के !
हाथ अब खुद उठकर सहसा ही ,
पहुच जाते है ढकने को सिर के टाँके !!
जब कभी भी याद आता है बैठे-बैठे
हमको, नामुराद वो हसीं नजारा !
उनकी गली से हम कई बार गुजरे,
पत्थर किसी ने इसी बार मारा !!
अनाडी इन ओंठो का है दोष सारा !
उनकी गली से हम कई बार गुजरे,
पत्थर किसी ने इसी बार मारा !!
ठिठुरती ठण्ड में, कमबख्त ये ओंठ ,
सीटी बजाने की जिद पर अड़े थे !
नहीं था हमें ज़रा भी अहसास कि वो,
भाई के संग बरामदे में खड़े थे !!
घर भेजा उन्होंने हमें उस रोज,
अपनी उस गली से जख्मी बना के !
हाथ अब खुद उठकर सहसा ही ,
पहुच जाते है ढकने को सिर के टाँके !!
जब कभी भी याद आता है बैठे-बैठे
हमको, नामुराद वो हसीं नजारा !
उनकी गली से हम कई बार गुजरे,
पत्थर किसी ने इसी बार मारा !!
वो भी दौर था !
पटाने को तब इक अदद सी हसीना,
इस दिल नौसिखिये ने झख लाख मारी !
परखने को दुनिया के इशारों की भाषा,
मजनू अनाडी ने एक नहीं,कई आँख मारी !!
आ गई जब पास जवानी की देहलीज,
ढूढने लगा दिल इक अदद यार अपना !
उस शहर में यूँ तो हसीनाएं बहुत थी,
हमने राह में ही हुश्न की मूरत ताक मारी !!
पहली नजर में ही हो गए हम दीवाने,
आस-पास मंडराए यूँ, ज्यों समा पे परवाने !
और फिर जब व्याह के आयी हसीना घर में,
कह उठे सब, चिडी तो तुमने बड़ी पाक मारी !!
चन्द लम्हे तो बड़े मौज-मस्ती में गुजरे,
घरवाली के चक्कर में, भूले सब दुनियादारी !
बरस बाद,जलवे दिखाने पे उतरी जब कमसिन ,
सोचते रह गए, तोप हमने क्या ख़ाक मारी !!
इस दिल नौसिखिये ने झख लाख मारी !
परखने को दुनिया के इशारों की भाषा,
मजनू अनाडी ने एक नहीं,कई आँख मारी !!
आ गई जब पास जवानी की देहलीज,
ढूढने लगा दिल इक अदद यार अपना !
उस शहर में यूँ तो हसीनाएं बहुत थी,
हमने राह में ही हुश्न की मूरत ताक मारी !!
पहली नजर में ही हो गए हम दीवाने,
आस-पास मंडराए यूँ, ज्यों समा पे परवाने !
और फिर जब व्याह के आयी हसीना घर में,
कह उठे सब, चिडी तो तुमने बड़ी पाक मारी !!
चन्द लम्हे तो बड़े मौज-मस्ती में गुजरे,
घरवाली के चक्कर में, भूले सब दुनियादारी !
बरस बाद,जलवे दिखाने पे उतरी जब कमसिन ,
सोचते रह गए, तोप हमने क्या ख़ाक मारी !!
Sunday, January 17, 2010
तू निश्चिन्त रह, तू मेरा हिन्दुस्तान है !
आज लोभ का मारा इन्सान, बन बैठा हैवान है,
पर तू व्यग्र न हो, तू तो मेरा हिन्दुस्तान है !
माना कि कलयुग अपने चरम पे है,
पर पाप-पुण्य तो अपने करम पे है,
सतपुरुष सोचता है कि जान है तो जहान है,
पर तू व्यग्र न हो, तू तो मेरा हिन्दुस्तान है !!
नेता-अफ़सर के भेष मे दिखता आदमी शैतान है,
पर तू व्यग्र न हो, तू तो मेरा हिन्दुस्तान है !
वह गवन की राह अपनायेगा ,
फिर भी कितना खा पायेगा?
खरीदेगा क्या? दो-चार कारें और मकान है,
पर तू व्यग्र न हो, तू तो मेरा हिन्दुस्तान है !!
खुद को संत बताने वाला, देख कितना नादान है ,
पर तू व्यग्र न हो, तू तो मेरा हिन्दुस्तान है !
पाप के सागर मे डूबा रहता है,
खुद को जगत का बापू कहता है,
नियंत्रण रहता न अब उसका, अपनी जुबान है,
पर तू व्यग्र न हो, तू तो मेरा हिन्दुस्तान है !!
सदियों से झेले यहां तूने, ये कुटिल बेईमान है,
पर तू व्यग्र न हो, तू तो मेरा हिन्दुस्तान है !
दास्ता के भूखे ये सभी नर-मुंड है,
गडरिये के बश आज भेडो के झुंड है,
स्वदेशी अश्व पर लगी फिर से विदेशी कमान है,
पर तू व्यग्र न हो, तू तो मेरा हिन्दुस्तान है !!
तेरी विजय मे जयचंदों ने, डाले सदा व्यवधान है,
पर तू दुखी न हो, तू तो मेरा हिन्दुस्तान है !
उत्तर मे हिमालय तेरी भाल है,
दक्षिण मे समन्दर तेरी ढाल है,
उसका कोई क्या बिगाडेगा, जिसका भगवान है,
तू निश्चिन्त रह, तू तो मेरा हिन्दुस्तान है !!
Saturday, January 16, 2010
उलझन !
जाऊं किधर,
मुसाफिर सोचता है,
दो राहे पर आकर खडा,
उसपे रहबरी का रंग यूँ चड़ा,
खुद राह में रह जाना पडा !
मालूम है
कि सब छोड़ना है,
फिर भी निरंतर लूटे जा रहा,
अजब है यह दस्तूर-ए-दुनिया,
यही सोच दिल दुखाना पडा !
सुख मिलता है
दूसरों की मदद में,
कर भला तो हो भला,
रंग बदलती दुनिया को देख,
अब ख्याल यह पुराना पडा !
संग चलने को
राजी न था जो,
दो-कदम बनके हमसफ़र,
कुछ अनमने मन से सही,
साथ उसको भी निभाना पडा !
जिसकी बांधती
कलतक थी दुनिया,
तारीफों के पुल यहाँ,
उस नामुराद को भी
आखिर में, तैर के जाना पडा !
मुसाफिर सोचता है,
दो राहे पर आकर खडा,
उसपे रहबरी का रंग यूँ चड़ा,
खुद राह में रह जाना पडा !
मालूम है
कि सब छोड़ना है,
फिर भी निरंतर लूटे जा रहा,
अजब है यह दस्तूर-ए-दुनिया,
यही सोच दिल दुखाना पडा !
सुख मिलता है
दूसरों की मदद में,
कर भला तो हो भला,
रंग बदलती दुनिया को देख,
अब ख्याल यह पुराना पडा !
संग चलने को
राजी न था जो,
दो-कदम बनके हमसफ़र,
कुछ अनमने मन से सही,
साथ उसको भी निभाना पडा !
जिसकी बांधती
कलतक थी दुनिया,
तारीफों के पुल यहाँ,
उस नामुराद को भी
आखिर में, तैर के जाना पडा !
Friday, January 8, 2010
बर्फबारी का मजा !

सुबह-सुबह वह आकर बोली;
क्यों दुबके हो बिस्तर में, Lol !
चलो,चलकर घूम आते है,
कुल्लू-मनाली,स्पीती-लाहोल,
दिल्ली के fog और ठण्ड में,
ठिठुर-ठिठुरकर फायदा क्या है,
Hills पर lovely मौसम है,
देख आते है snow fall !!
अब उठ भी जावो, hurry up!
भोजन भी हम बाहर करेंगे,
ताजे-ताजे बर्फ पर बैठ,
अपनी मुहब्बत का इजहार करेंगे,
न कोई discrimination होगा,
और न gender bias चलेगा,
snow skiing resorts पे प्यार करेंगे,
और प्यार हम 'At Par' करेंगे !!
इसलिए दोस्तों,
मेरी तो हो गई जेब खाली ,
क्योंकि साथ लेकर घरवाली !
I'm on the way to Manali !!
ऐसा ही होता है , जब पड़ते है डंडे ,
क्यों दुबके हो बिस्तर में, Lol !
चलो,चलकर घूम आते है,
कुल्लू-मनाली,स्पीती-लाहोल,
दिल्ली के fog और ठण्ड में,
ठिठुर-ठिठुरकर फायदा क्या है,
Hills पर lovely मौसम है,
देख आते है snow fall !!
अब उठ भी जावो, hurry up!
भोजन भी हम बाहर करेंगे,
ताजे-ताजे बर्फ पर बैठ,
अपनी मुहब्बत का इजहार करेंगे,
न कोई discrimination होगा,
और न gender bias चलेगा,
snow skiing resorts पे प्यार करेंगे,
और प्यार हम 'At Par' करेंगे !!
इसलिए दोस्तों,
मेरी तो हो गई जेब खाली ,
क्योंकि साथ लेकर घरवाली !
I'm on the way to Manali !!
ऐसा ही होता है , जब पड़ते है डंडे ,
Bye-बाय, see you on Monday :)
Thursday, January 7, 2010
बिल्डिंग रिलेशनशिप्स !
आज सुबह, जब घर से बाहर आया था,
तो देखा, चहु ओर घना कुहरा छाया था !
ऐसे में मैंने देखा कि गली में सामने से
पड़ोसी मिश्रा जी इधर से उधर आ रहे थे,
अपनी बिल्डिंग को पड़ोसन की बिल्डिंग से
एक लाल धागे से बार-बार बांधे जा रहे थे !
कौतुहलबश मैंने भी हिला दिए अपने लिप्स !
जबाब में वे बोले, उनके राशिफल में लिखा है;
दिस इज अ गुड डे फॉर "बिल्डिंग रिलेशनशिप्स" !!.
तो देखा, चहु ओर घना कुहरा छाया था !
ऐसे में मैंने देखा कि गली में सामने से
पड़ोसी मिश्रा जी इधर से उधर आ रहे थे,
अपनी बिल्डिंग को पड़ोसन की बिल्डिंग से
एक लाल धागे से बार-बार बांधे जा रहे थे !
कौतुहलबश मैंने भी हिला दिए अपने लिप्स !
जबाब में वे बोले, उनके राशिफल में लिखा है;
दिस इज अ गुड डे फॉर "बिल्डिंग रिलेशनशिप्स" !!.
Tuesday, January 5, 2010
मिक्स्ड राशिफल !
लेखन का कतई मूड तो नहीं था, किन्तु कल के अपने ब्लॉग पर दिए एक सुझाव पर प्राप्त टिप्पणियों से यह जानकर प्रसन्नता हुई कि हमारे अधिकाँश शीर्षस्थ ब्लॉगर मित्रो ने आंग्लभाषा को हिन्दी भाषा के एक पूरक के रूप में अपनी मान्यता दे दी है ! अत: मुझे भी एक खुरापात सूझ गई ! लीजिये अब आप ही झेलिये ;
आज अखबार में खुद का राशि भविष्यफल पढ़कर, खून बढ़ गया एक औंस !
चूँकि लिखा था, देयर इज अ पोसिबिलिटी ऑफ़ गेटिंग अ पोजेटिव रेस्पोंस...... !!
भविष्यफल को पढ़ते-पढ़ते अचानक अति उत्साहित हो गया था मै भी !
मुझे ख़याल नहीं रहा कि माय वाइफ इज आल्सो सिटिंग इन फ्रंट आफ मी....!!
तब ऊँचे स्वर में पढ़े गए भविष्यफल को सुनकर, तन गए उसके आइ ब्रू !
जब सुना उसने कि, अ पेंडिंग रिलेसनशिप डील विद यौर गर्ल फ्रेंड कुड कम थ्रू...!!
मगर आखिर में यह सुनकर, हंस पडी मुझ पर जोर से सामने बैठी स्त्रीलिंग !
जब पढ़ा मैने कि मिक्सिंग गर्ल फ्रेंड विद फेमली टाइम विल स्पोयेल ऐवरीथिंग.....!!
आज अखबार में खुद का राशि भविष्यफल पढ़कर, खून बढ़ गया एक औंस !
चूँकि लिखा था, देयर इज अ पोसिबिलिटी ऑफ़ गेटिंग अ पोजेटिव रेस्पोंस...... !!
भविष्यफल को पढ़ते-पढ़ते अचानक अति उत्साहित हो गया था मै भी !
मुझे ख़याल नहीं रहा कि माय वाइफ इज आल्सो सिटिंग इन फ्रंट आफ मी....!!
तब ऊँचे स्वर में पढ़े गए भविष्यफल को सुनकर, तन गए उसके आइ ब्रू !
जब सुना उसने कि, अ पेंडिंग रिलेसनशिप डील विद यौर गर्ल फ्रेंड कुड कम थ्रू...!!
मगर आखिर में यह सुनकर, हंस पडी मुझ पर जोर से सामने बैठी स्त्रीलिंग !
जब पढ़ा मैने कि मिक्सिंग गर्ल फ्रेंड विद फेमली टाइम विल स्पोयेल ऐवरीथिंग.....!!
Saturday, January 2, 2010
विज्ञापन-मैं चाँद बेचना चाहता हूँ !
दो साल पहले मैंने खरीदा था
एक टुकडा चाँद का
एक बंगाली प्रोपर्टी डीलर के मार्फ़त,
आज अचानक मिला
वहाँ के एक वाशिंदे का ख़त !
लिखा था,
यहाँ भी मंदी का दौर छा रहा,
नित प्रोपर्टी का दाम नीचे जा रहा!
प्रोपर्टी में लोग पैसा कम लगा रहे,
आजकल खरीददार भी बहुत कम आ रहे !
२१ दिसंबर, २०१२ की चिंता सारी है
सम्पति बेच,
लिक्विडिटी रखने की मारा मारी है!
हर शख्स कैश साथ ले जाएगा,
बिकवाना हो तो ब्लोगवाणी अथवा
चिटठा जगत पर विज्ञापन देना,
वहाँ आपको कोई न कोई
सिरफिरा मिल ही जाएगा !
एक टुकडा चाँद का
एक बंगाली प्रोपर्टी डीलर के मार्फ़त,
आज अचानक मिला
वहाँ के एक वाशिंदे का ख़त !
लिखा था,
यहाँ भी मंदी का दौर छा रहा,
नित प्रोपर्टी का दाम नीचे जा रहा!
प्रोपर्टी में लोग पैसा कम लगा रहे,
आजकल खरीददार भी बहुत कम आ रहे !
२१ दिसंबर, २०१२ की चिंता सारी है
सम्पति बेच,
लिक्विडिटी रखने की मारा मारी है!
हर शख्स कैश साथ ले जाएगा,
बिकवाना हो तो ब्लोगवाणी अथवा
चिटठा जगत पर विज्ञापन देना,
वहाँ आपको कोई न कोई
सिरफिरा मिल ही जाएगा !
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